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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः

यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिये तैयार हो गये हैं! — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

અરે! અમે એક મહાન પાપમાં સામેલ છીએ, કારણ કે અમે રાજ્યના આનંદના લોભથી અમારા સગાઓને મારી નાખવા તૈયાર છીએ.

KannadaIND

ಅಯ್ಯೋ! ನಾವು ಒಂದು ದೊಡ್ಡ ಪಾಪದಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿದ್ದೇವೆ, ಏಕೆಂದರೆ ನಾವು ನಮ್ಮ ಬಂಧುಗಳನ್ನು ಕೊಲ್ಲಲು ಸಿದ್ಧರಾಗಿದ್ದೇವೆ, ರಾಜ್ಯದ ಸಂತೋಷದ ದುರಾಶೆಯಿಂದ.

TeluguIND

అయ్యో! రాజ్య భోగ దురాశతో మన బంధుమిత్రులను చంపడానికి సిద్ధపడ్డాం కాబట్టి మనం ఒక మహా పాపంలో కూరుకుపోయాము.

PunjabiIND

ਹਾਏ! ਅਸੀਂ ਇੱਕ ਵੱਡੇ ਪਾਪ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹਾਂ, ਕਿਉਂਕਿ ਅਸੀਂ ਇੱਕ ਰਾਜ ਦੇ ਅਨੰਦ ਦੇ ਲਾਲਚ ਵਿੱਚ, ਆਪਣੇ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ ਨੂੰ ਮਾਰਨ ਲਈ ਤਿਆਰ ਹਾਂ.

MalayalamIND

കഷ്ടം! നാം ഒരു മഹാപാപത്തിൽ ഏർപ്പെട്ടിരിക്കുന്നു, കാരണം ഒരു രാജ്യസുഖത്തോടുള്ള അത്യാഗ്രഹത്താൽ നമ്മുടെ ബന്ധുക്കളെ കൊല്ലാൻ ഞങ്ങൾ തയ്യാറാണ്.

BengaliIND

হায়রে! আমরা একটি মহাপাপের সাথে জড়িত, কারণ আমরা একটি রাজ্যের আনন্দের লোভে আমাদের আত্মীয়দের হত্যা করতে প্রস্তুত।

NepaliIND

हाय! हामी ठूलो पापमा संलग्न छौं, किनकि हामी राज्यको सुखको लोभमा हाम्रा आफन्तहरूलाई मार्न तयार छौं।

MarathiIND

अरेरे! आपण मोठ्या पापात गुंतलो आहोत, कारण राज्याच्या सुखाच्या लोभापोटी आपण आपल्या नातेवाईकांना मारायला तयार आहोत.

SindhiIND

افسوس! اسان وڏي گناهه ۾ ملوث آهيون، ڇو ته اسان بادشاهي جي خوشين جي لالچ ۾، پنهنجن مائٽن کي مارڻ لاء تيار آهيون.

TamilIND

ஐயோ! நாம் ஒரு பெரிய பாவத்தில் ஈடுபட்டுள்ளோம், ஏனென்றால் ஒரு ராஜ்யத்தின் இன்பத்தின் பேராசையால், எங்கள் உறவினர்களைக் கொல்ல நாங்கள் தயாராக இருக்கிறோம்.

BhojpuriIND

अफसोस बा! हमनी के एगो बड़हन पाप में फंसल बानी जा, काहे कि हमनी के अपना रिश्तेदारन के मारे खातिर तइयार बानी जा, कवनो राज्य के सुख के लालच से।

OdiaIND

ହାୟ! ଆମେ ଏକ ବଡ ପାପରେ ଜଡିତ, କାରଣ ଆମେ ନିଜ ସମ୍ପର୍କୀୟମାନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ, ଏକ ରାଜ୍ୟର ଭୋଗ ପାଇଁ ଲୋଭରୁ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

1.45।। व्याख्या-- 'अहो बत ৷৷. स्वजनमुद्यताः'--ये दुर्योधन आदि दुष्ट हैं। इनकी धर्मपर दृष्टि नहीं है। इनपर लोभ सवार हो गया है। इसलिये ये युद्धके लिये तैयार हो जायँ तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। परन्तु हमलोग तो धर्म-अधर्मको, कर्तव्य-अकर्तव्यको, पुण्य-पापको जाननेवाले हैं। ऐसे जानकार होते हुए भी अनजान मनुष्योंकी तरह हमलोगोंने बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय--विचार कर लिया है। इतना ही नहीं, युद्धमें अपने स्वजनोंको मारनेके लिये अस्त्र-शस्त्र लेकर तैयार हो गये हैं ! यह हमलोगेंके लिये बड़े भारी आश्चर्यकी और खेद-(दुःख-) की बात है अर्थात् सर्वथा अनुचित बात है। हमारी जो जानकारी है, हमने जो शास्त्रोंसे सुना है, गुरुजनोंसे शिक्षा पायी है, अपने जीवनको सुधारनेका विचार किया है, उन सबका अनादर करके आज हमने युद्धरूपी पाप करनेके लिये विचार कर लिया है--यह बड़ा भारी पाप है --'महत्पापम्' । इस श्लोकमें 'अहो' और 'बत'--ये दो पद आये हैं। इनमेंसे 'अहो' पद आश्चर्यका वाचक है। आश्चर्य यही है कि युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराको जानते हुए भी हमलोगोंने युद्धरूपी बड़ा भारी पाप करनेका पक्का निश्चय कर लिया है! दूसरा 'बत' पद खेदका, दुःखका वाचक है। दुःख यही है कि थोड़े दिन रहेनेवाले राज्य और सुखके लोभमें आकर हम अपने कुटुम्बियोंको मारनेके लिये तैयार हो गये हैं! पाप करनेका निश्चय करनेमें और स्वजनोंको मारनेके तैयार होनेमें केवल राज्यका और सुखका लोभ ही कारण है। तात्पर्य है कि अगर युद्धमें हमारी विजय हो जायगी तो हमें राज्य, वैभव मिल मिल जायगा, हमारा आदर-सत्कार होगा, हमारी महत्ता बढ़ जायगी, पूरे राज्यपर हमारा प्रभाव रहेगा, सब जगह हमारा हुक्म चलेगा, हमारे पास धन होनेसे हम मनचाही भोग-सामग्री जुटा लेंगे, फिर खूब आराम करेंगे, सुख भोगेंगे--इस तरह हमारेपर राज्य और सुखका लोभ छा गया है, जो हमारे-जैसे मनुष्योंके लिये सर्वथा अनुचित है। इस श्लोकमें अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि अपने सद्विचारोंका, अपनी जानकारीका आदर करनेसे ही शास्त्र, गुरुजन आदिकी आज्ञा मानी जा सकती है। परन्तु जो मनुष्य अपने सद्विचारोंका निरादर करता है, वह शास्त्रोंकी, गुरुजनोंकी और सिद्धान्तोंकी अच्छी-अच्छी बातोंको सुनकर भी उन्हें धारण नहीं कर सकता। अपने सद्विचारोंका बार-बार निरादर, तिरस्कार करनेसे सद्विचारोंकी सृष्टि बंद हो जाती है। फिर मनुष्यको दुर्गुण-दुराचारसे रोकनेवाला है ही कौन? ऐसे ही हम भी अपनी जानकारीका आदर नहीं करेंगे, तो फिर हमें अनर्थ-परम्परासे कौन रोक सकता है? अर्थात् कोई नहीं रोक सकता। यहाँ अर्जुनकी दृष्टि युद्धरूपी क्रियाकी तरफ है। वे युद्धरूपी क्रियाको दोषी मानकर उससे हटना चाहते हैं; परन्तु वास्तवमें दोष क्या है--इस तरफ अर्जुनकी दृष्टि नहीं है। युद्धमें कौटुम्बिक मोह, स्वार्थभाव, कामना ही दोष है, पर इधर दृष्टि न जानेके कारण अर्जुन यहाँ आश्चर्य और खेद प्रकट कर रहे हैं, जो कि वास्तवमें किसी भी विचारशील, धर्मात्मा, शूरवीर क्षत्रियके लिये उचित नहीं है। [अर्जुनने पहले अड़तीसवें श्लोकमें दुर्योधनादिके युद्धमें प्रवृत्त होनेमें, कुलक्षयके दोषमें और मित्रद्रोहके पापमें लोभको कारण बताया; और यहाँ भी अपनेको राज्य और सुखके लोभके कारण महान् पाप करनेको उद्यत बता रहे हैं। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन पापके होनेमें 'लोभ' को हेतु मानते हैं। फिर भी आगे तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनने 'मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों कर बैठता है'--ऐसा प्रश्न क्यों किया? इसका समाधान है कि यहाँ तो कौटुम्बिक मोहके कारण अर्जुन युद्धसे निवृत्त होनेको धर्म और युद्धमें प्रवृत्त होनेको अधर्म मान रहे हैं अर्थात् उनकी शरीर आदिको लेकर केवल लौकिक दृष्टि है, इसलिये वे युद्धमें स्वजनोंको मारनेमें लोभको हेतु मान रहे हैं। परन्तु आगे गीताका उपदेश सुनते-सुनते उनमें अपने श्रेय--कल्याणकी इच्छा जाग्रत् हो गयी (गीता 3। 2)। इसलिये वे कर्तव्यको छोड़कर न करनेयोग्य काममें प्रवृत्त होनेमें कौन कारण है--ऐसा पूछते हैं अर्थात् वहाँ (3। 36 में) अर्जुन कर्तव्यकी दृष्टिसे, साधककी दृष्टिसे पूछते हैं।]

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

यद्येवं युद्धे विमुखः सन्परपरिभवप्रतीकाररहितो वर्तेथास्तर्हि त्वां शस्त्रपरिग्रहरहितं शत्रुं शस्त्रपाणयो धार्तराष्ट्रा निगृह्णीयुरित्याशङ्क्याह यदीति। प्राणत्राणादपि प्रकृष्टो धर्मः प्राणभृतामहिंसेति भावः।

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Sri Dhanpati

राज्यप्राप्तिसुखोपभोगलोभेन युद्धार्थमत्रागमनमपि शोचनीयमित्याह अहो इति। अहो बतेत्यत्यन्तखेदे। वयं महत्पापं कर्तुं व्यवसिता निश्चिताः। यद्राज्यसुखलोभेन स्वजनं हन्तुमुद्यताः युद्धोद्योगेनात्रागताः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ahoalas
batahow
mahatgreat
pāpamsins
kartumto perform
vyavasitāḥhave decided
vayamwe
yatbecause
rājyasukha
hantumto kill
svajanam
udyatāḥintending
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Bhagavad Gita · 1.44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम

हे जनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरकों में वापस होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्

अगर ये हाथों में शस्त्र-अस्त्र लिये हुए धृतराष्ट्र के पक्षपाती लोग युद्धभूमि में सामना न करनेवाले तथा शस्त्ररहित मुझ को मार भी दें, तो वह मेरे लिये बड़ा ही हितकारक होगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 45
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः

यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिये तैयार हो गये हैं! — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 45 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 45 का हिंदी अर्थ: "यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिये तैयार हो गये हैं! — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 45?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 45 translates to: "Alas! We are involved in a great sin, for we are prepared to kill our kinsmen, out of greed for the pleasures of a kingdom. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 45 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिये तैयार हो गये हैं! — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "aho bata mahat pāpaṁ kartuṁ vyavasitā vayam" mean in English?

"aho bata mahat pāpaṁ kartuṁ vyavasitā vayam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 45. Alas! We are involved in a great sin, for we are prepared to kill our kinsmen, out of greed for the pleasures of a kingdom. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.