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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 39
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन

यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें? — VaniSagar

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GujaratiIND

હે જનાર્દન (કૃષ્ણ), આપણે કુટુંબોના વિનાશમાં દુષ્ટતા સ્પષ્ટપણે જોતા, આ પાપથી દૂર રહેવાનું કેમ ન શીખવું જોઈએ?

TeluguIND

కుటుంబాల విధ్వంసంలోని దుర్మార్గాన్ని స్పష్టంగా చూసే మనం, ఓ జనార్దనా (కృష్ణా) ఈ పాపం నుండి వైదొలగడం ఎందుకు నేర్చుకోకూడదు?

OdiaIND

ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ (କୃଷ୍ଣ), ପରିବାରର ବିନାଶରେ ମନ୍ଦତାକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବରେ ଦେଖୁଥିବା ଆମେ କାହିଁକି ଏହି ପାପରୁ ବିମୁଖ ହେବା ଶିଖିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ?

NepaliIND

हे जनार्दन (कृष्ण), परिवारको विनाशमा दुष्टता स्पष्ट देख्ने हामीले किन यो पापबाट फर्कन सिक्नु हुँदैन?

KannadaIND

ಕುಟುಂಬಗಳ ವಿನಾಶದ ದುಷ್ಟತನವನ್ನು ಸ್ಪಷ್ಟವಾಗಿ ನೋಡುವ ನಾವು ಈ ಪಾಪದಿಂದ ದೂರವಿರಲು ಏಕೆ ಕಲಿಯಬಾರದು, ಓ ಜನಾರ್ದನ (ಕೃಷ್ಣ)?

PunjabiIND

ਹੇ ਜਨਾਰਦਨ (ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ) ਸਾਨੂੰ, ਜੋ ਪਰਵਾਰਾਂ ਦੇ ਵਿਨਾਸ਼ ਵਿੱਚ ਬੁਰਾਈ ਨੂੰ ਸਪਸ਼ਟ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਵੇਖਦੇ ਹਨ, ਇਸ ਪਾਪ ਤੋਂ ਦੂਰ ਹੋਣਾ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਸਿੱਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ?

MarathiIND

हे जनार्दना (कृष्णा) आपण ज्यांना कुळांच्या नाशात दुष्टता स्पष्टपणे दिसत आहे, त्यांनी या पापापासून दूर व्हायला का शिकू नये?

BengaliIND

হে জনার্দন (কৃষ্ণ) আমরা কেন, যারা পরিবার ধ্বংসের মধ্যে অশুভ দেখতে পাচ্ছি, এই পাপ থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতে শিখব না কেন?

TamilIND

குடும்பங்களின் அழிவின் தீமையைத் தெளிவாகக் காணும் நாம் ஏன் இந்தப் பாவத்திலிருந்து விலகக் கற்றுக் கொள்ளக்கூடாது, ஓ ஜனார்தனா (கிருஷ்ணா)?

SindhiIND

اي جناردن (ڪرشن)، اسان کي ڇو نه گهرجي، جيڪي صاف طور تي خاندانن جي تباهي ۾ برائي کي ڏسن ٿا، هن گناهه کان منهن موڙڻ جي ڪوشش ڪريون؟

KonkaniIND

कुटुंबांच्या नाशांत वायटपण स्पश्टपणान पळोवपी आमी कित्याक शिकचे न्हय, हे जनार्दन (कृष्ण) ह्या पापांतल्यान वळपाक?

MaithiliIND

परिवारक विनाश मे दुष्टता केँ स्पष्ट रूप सँ देखनिहार हमरा लोकनि एहि पाप सँ मुँह मोड़ब किएक नहि सीखब हे जनार्दन (कृष्ण) ?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'यद्यप्येते न पश्यन्ति ৷৷. मित्रद्रोहे च पातकम्'-- इतना मिल गया, इतना और मिल जाय; फिर ऐसा मिलता ही रहे--ऐसे धन, जमीन, मकान, आदर, प्रशंसा, पद, अधिकार आदिकी तरफ बढ़ती हुई वृत्तिका नाम 'लोभ' है। इस लोभ-वृत्तिके कारण इन दुर्योधनादिकी विवेक-शक्ति लुप्त हो गयी है, जिससे वे यह विचार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस राज्यके लिये हम इतना बड़ा पाप करने जा रहे हैं, कुटुम्बियोंका नाश करने जा रहे हैं, वह राज्य हमारे साथ कितने दिन रहेगा और हम उसके साथ कितने दिन रहेंगे? हमारे रहते हुए यह राज्य चला जायगा तो हमारी क्या दशा होगी? और राज्यके रहते हुए हमारे शरीर चले जायेंगे तो क्या दशा होगी क्योंकि मनुष्य संयोगका जितना सुख लेता है, उसके वियोगका उतना दुःख उसे भोगना ही पड़ता है। संयोगमें इतना सुख नहीं होता, जितना वियोगमें दुःख होता है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें लोभ छा जानेके कारण इनको राज्य-ही-राज्य दीख रहा है। कुलका नाश करनेसे कितना भयंकर पाप होगा, वह इनको दीख ही नहीं रहा है। जहाँ लड़ाई होती है, वहाँ समय, सम्पत्ति, शक्तिका नाश हो जाता है। तरह-तरह की चिन्ताएँ और आपत्तियाँ आ जाती हैं। दो मित्रोंमें भी आपसमें खटपट मच जाती है, मनोमालिन्य हो जाता है। कई तरहका मतभेद हो जाता है। मतभेद होनेसे वैरभाव हो जाता है। जैसे द्रुपद और द्रोण--दोनों बचपनके मित्र थे। परन्तु राज्य मिलनेसे द्रुपदने एक दिन द्रोणका अपमान करके उस मित्रताको ठुकरा दिया। इससे राजा द्रुपद और द्रोणाचार्यके बीच वैरभाव हो गया। अपने अपमानका बदला लेनेके लिये द्रोणाचार्यने मेरेद्वारा राजा द्रुपदको परास्त कराकर उसका आधा राज्य ले लिया। इसपर द्रुपदने द्रोणाचार्यका नाश करनेके लिये एक यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न और द्रौपदी--दोनों पैदा हुए। इस तरह मित्रोंके साथ वैरभाव होनेसे कितना भयंकर पाप होगा, इस तरफ ये देख ही नहीं रहे हैं! विशेष बात अभी हमारे पास जिन वस्तुओंका अभाव है, उन वस्तुओंके बिना भी हमारा काम चल रहा है, हम अच्छी तरहसे जी रहे हैं। परन्तु जब वे वस्तुएं हमें मिलनेके बाद फिर बिछुड़ जाती हैं, तब उनके अभावका बड़ा दुःख होता है। तात्पर्य है कि पहले वस्तुओंका जो निरन्तर अभाव था, वह इतना दुःखदायी नहीं था, जितना वस्तुओंका संयोग होकर फिर उनसे वियोग होना दुःखदायी है। ऐसा होनेपर भी मनुष्य अपने पास जिन वस्तुओंका अभाव मानता है उन वस्तुओंको वह लोभके कारण पानेकी चेष्टा करता रहता है। विचार किया जाय तो जिन वस्तुओंका अभी अभाव है, बीचमें प्रारब्धानुसार उनकी प्राप्ति होनेपर भी अन्तमें उनकी अभाव ही रहेगा। अतः हमारी तो वही अवस्था रही, जो कि वस्तुओंके मिलनेसे पहले थी। बीचमें लोभके कारण उन वस्तुओंको पानेके लिये केवल परिश्रम-ही-परिश्रम पल्ले पड़ा, दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ा। बीचमें वस्तुओंके संयोगसे जो थोड़ा-सा सुख हुआ है, वह तो केवल लोभके कारण ही हुआ है। अगर भीतरमें लोभ-रूपी दोष न हो, तो वस्तुओंके संयोगसे सुख हो ही नहीं सकता। ऐसे ही मोहरूपी दोष न हो, तो कुटुम्बियोंसे सुख हो ही नहीं सकता। लालचरूपी दोष न हो तो संग्रहका सुख हो ही नहीं सकता। तात्पर्य है कि संसारका सुख किसी-न-किसी दोषसे ही होता है। कोई भी दोष न होनेपर संसारसे सुख हो ही नहीं सकता। परन्तु लोभके कारण मनुष्य ऐसा विचार कर ही नहीं सकता। यह लोभ उसके विवेक-विचारको लुप्त कर देता है। 'कथं न ज्ञेयमस्माभिः ৷৷৷৷ प्रपश्यद्भिर्जनार्दन'--अब अर्जुन अपनी बात कहते हैं कि यद्यपि दुर्योधनादि अपने कुलक्षयसे होनेवाले दोषको और मित्रद्रोहसे होनेवाले पापको नहीं देखते, तो भी हमलोगोंको कुलक्षयसे होनेवाली अनर्थपरम्पराको देखना ही चाहिये [जिसका वर्णन अर्जुन आगे चालीसवें श्लोकसे चौवालीसवें श्लोकतक करेंगे़]; क्योंकि हम कुलक्षयसे होनेवाले दोषोंको भी अच्छी तरहसे जानते हैं और मित्रोंके साथ द्रोह-(वैर, द्वैष-) से होनेवाली पापको भी अच्छी तरहसे जानते हैं। अगर वे मित्र हमें दुःख दें, तो वह दुःख हमारे लिये अनिष्टकारक नहीं है। कारण कि दुःखसे तो हमारे पूर्वपापोंका ही नाश होगा हमारी शुद्धि ही होगी। परन्तु हमारे मनमें अगर द्रोह--वैरभाव होगा, तो वह मरनेके बाद भी हमारे साथ रहेगा और जन्म-जन्मान्तर-तक हमें पाप करनेमें प्रेरित करता रहेगा जिससे हमारा पतन-ही-पतन होगा। ऐसे अनर्थ करनेवाले और मित्रोंके साथ द्रोह पैदा करनेवाले इस युद्धरूपी पापसे बचनेका विचार क्यों नहीं करना चाहिये? अर्थात् विचार करके हमें इस पापसे जरूर ही बचना चाहिये। यहाँ अर्जुनकी दृष्टि दुर्योधन आदिके लोभकी तरफ तो जा रही है, पर वे खुद कौटुम्बिक स्नेह-(मोह-) में आबद्ध होकर बोल रहे हैं--इस तरफ उनकी दृष्टि नहीं जा रही है। इस कारण वे अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहे हैं। यह नियम है कि मनुष्यकी दृष्टि जबतक दूसरोंके दोषकी तरफ रहती है, तबतक उसको अपना दोष नहीं दीखता ,उलटे एक अभिमान होता है कि इनमें तो यह दोष है, पर हमारेमें यह दोष नहीं है। ऐसी अवस्थामें वह यह सोच ही नहीं सकता कि अगर इनमें कोई दोष है तो हमारेमें भी कोई दूसरा दोष हो सकता है। दूसरा दोष यदि न भी हो तो भी दूसरोंका दोष देखना--यह दोष तो है ही। दूसरोंका दोष देखना एवं अपनेमें अच्छाईका अभिमान करना-- ये दोनों दोष साथमें ही रहते हैं। अर्जुनको भी दुर्योधन आदिमें दोष दीख रहे हैं और अपनेमें अच्छाईका अभिमान हो रहा है (अच्छाईके अभिमानकी छायामें मात्र दोष रहते हैं), इसलिये उनको अपनेमें मोहरूपी दोष नहीं दीख रहा है। सम्बन्ध कुलका क्षय करनेसे होनेवाले जिन दोषोंको हम जानते हैं, वे दोष कौन-से हैं? उन दोषोंकी परम्परा आगेके पाँच श्लोकोंमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

कोऽसौ कुलक्षये दोषो यद्दर्शनाद्युष्माकं युद्धादुपरतिरपेक्ष्यते तत्राह कुलेति। कुलस्य हि क्षये कुलसंबन्धिनश्चिरन्तना धर्मास्तत्तदग्निहोत्रादिक्रियासाध्यानाशमुपयान्ति। कर्तुरभावादित्यर्थः। धर्मनाशेऽपि किं स्यादिति चेत्तत्राह धर्म इति। कुलप्रयुक्ते धर्मे कुलनाशादेव नष्टे कुलक्षयकरस्य कुलं परिशिष्टमखिलमपि तदीयोऽधर्मोऽभिभवति। अधर्मभूयिष्ठं तस्य कुलं भवतीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

अस्मात्पापान्निवर्तितुं निवृत्त्यर्थ कुलक्षयकृतं दोषं प्रकर्षेण पश्यद्भिरस्माभिस्तद्दोषशब्दितं पापं कथं न ज्ञातव्यं तस्मात्पापपरिज्ञानं विना तत्र प्रवृत्तिपरिहारसंभवात्तज्ज्ञानमेवेचितं पापान्निवर्तितुं नतु पापसाधके युद्धे प्रवर्तितुं तदज्ञानमिति भावः। सदैव निर्लिप्तस्य तवैव परमेश्वरस्य प्रलयादौ जनानामर्दनेन पापसंश्लेषो नत्वन्यस्येति सूचयन्संबोधयति हे जनार्दनेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kathamwhy
nanot
jñeyamshould be known
asmābhiḥwe
pāpātfrom sin
asmātthese
nivartitumto turn away
kulakṣhaya
kṛitamdone
doṣhamcrime
prapaśhyadbhiḥwho can see
janārdanahe who looks after the public, Shree Krishna
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.38
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्

यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों न करें? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत

कुल का क्षय होने पर सदा से चलते आये कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं और धर्म का नाश होनेपर (बचे हुए) सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 39
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 39
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन

यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 39 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 39 का हिंदी अर्थ: "यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 39?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 39 translates to: "Why should we not, who clearly see the evil in the destruction of families, learn to turn away from this sin, O Janardana (Krishna)? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्द" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 39 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें? — Van Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kathaṁ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitum" mean in English?

"kathaṁ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitum" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 39. Why should we not, who clearly see the evil in the destruction of families, learn to turn away from this sin, O Janardana (Krishna)? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.