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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 24
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते

क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ; परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है। — VaniSagar

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NepaliIND

किनकि म एक्लै सबै बलिदानहरूको भोगकर्ता र प्रभु हुँ; तर तिनीहरूले मलाई वास्तविक रूपमा चिन्दैनन्, र यसरी तिनीहरू यस नश्वर संसारमा फर्कन्छन्।

GujaratiIND

કારણ કે હું એકલો જ સર્વ બલિદાનોનો આનંદ લેનાર અને પ્રભુ છું; પરંતુ તેઓ મને વાસ્તવિકતામાં જાણતા નથી, અને આમ તેઓ આ નશ્વર દુનિયામાં પાછા ફરે છે.

MalayalamIND

എന്തെന്നാൽ, എല്ലാ ത്യാഗങ്ങളുടെയും ആസ്വാദകനും കർത്താവും ഞാൻ മാത്രമാണ്. എന്നാൽ അവർ എന്നെ യഥാർത്ഥത്തിൽ അറിയുന്നില്ല, അങ്ങനെ അവർ ഈ നശ്വരമായ ലോകത്തേക്ക് മടങ്ങുന്നു.

PunjabiIND

ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਹੀ ਸਾਰੇ ਬਲੀਆਂ ਦਾ ਭੋਗਣ ਵਾਲਾ ਅਤੇ ਪ੍ਰਭੂ ਹਾਂ; ਪਰ ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਅਸਲੀਅਤ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੇ, ਅਤੇ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਹ ਇਸ ਨਾਸ਼ਵਾਨ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਪਰਤ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।

MaithiliIND

कारण, हम असगरे सभ यज्ञक भोक्ता आ प्रभु छी। मुदा ओ सभ हमरा यथार्थ मे नहि जनैत छथि, आ एहि तरहेँ ओ सभ एहि नश्वर संसार मे घुरि जाइत छथि |

AssameseIND

কিয়নো সকলো বলিদানৰ ভোগকাৰী আৰু প্ৰভু অকল মই; কিন্তু তেওঁলোকে মোক বাস্তৱত চিনি নাপায়, আৰু এইদৰে তেওঁলোকে এই মৰ্ত্যলোকলৈ উভতি যায়।

DogriIND

कीजे सारे बलिदानें दा भोगी ते प्रभु मैं अकेला ऐं; पर ओह़ मिगी असल च नेई जानदे, ते इस चाल्ली ओह़ इस नश्वर संसारे च बापस औंदे ह़न।

BengaliIND

কারণ আমি একাই সমস্ত ত্যাগের ভোগকারী ও প্রভু; কিন্তু তারা আমাকে বাস্তবে জানে না, এবং এইভাবে তারা এই নশ্বর পৃথিবীতে ফিরে আসে।

MarathiIND

कारण मी एकटाच सर्व यज्ञांचा उपभोग घेणारा व स्वामी आहे; पण ते मला वास्तवात ओळखत नाहीत आणि अशा प्रकारे ते या नश्वर जगात परत जातात.

KannadaIND

ಯಾಕಂದರೆ ನಾನು ಮಾತ್ರ ಎಲ್ಲಾ ತ್ಯಾಗಗಳ ಭೋಗ ಮತ್ತು ಭಗವಂತ; ಆದರೆ ಅವರು ನನ್ನನ್ನು ವಾಸ್ತವದಲ್ಲಿ ತಿಳಿದಿರುವುದಿಲ್ಲ ಮತ್ತು ಆದ್ದರಿಂದ ಅವರು ಈ ಮಾರಣಾಂತಿಕ ಜಗತ್ತಿಗೆ ಮರಳುತ್ತಾರೆ.

TamilIND

ஏனென்றால், நான் மட்டுமே எல்லா தியாகங்களையும் அனுபவிப்பவன் மற்றும் இறைவன்; ஆனால் அவர்கள் உண்மையில் என்னை அறியவில்லை, இதனால் அவர்கள் இந்த மரண உலகத்திற்குத் திரும்புகிறார்கள்.

SindhiIND

ڇاڪاڻ ته مان اڪيلو آهيان لطف اندوز ۽ رب سڀني قربانين جو؛ پر اهي مون کي حقيقت ۾ نٿا ڄاڻن، ۽ اهڙيء طرح اهي هن فاني دنيا ڏانهن موٽندا آهن.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[दूसरे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि जो भोग और ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, वे 'मेरेको केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है' -- ऐसा निश्चय नहीं कर सकते (2। 44)। अतः परमात्माकी तरफ चलनेमें दो बाधाएँ मुख्य हैं-- अपनेको भोगोंका भोक्ता मानना और अपनेको संग्रहका मालिक मानना। इन दोनोंसे ही मनुष्यकी बुद्धि उलटी हो जाती है, जिससे वह परमात्मासे सर्वथा विमुख हो जाता है। जैसे, बचनपमें बालक माँके बिना रह नहीं सकता पर बड़ा होनेपर जब उसका विवाह हो जाता है, तब वह स्त्रीसे 'मेरी स्त्री है' ऐसा सम्बन्ध जोड़कर उसका भोक्ता और मालिक बन जाता है। फिर उसको माँ उतनी अच्छी नहीं लगती, सुहाती नहीं। ऐसे ही जब यह जीव भोग और ऐश्वर्यमें लग जाता है अर्थात् अपनेको भोगोंका भोक्ता और संग्रहका मालिक मानकर उनका दास बन जाता है और भगवान्से सर्वथा विमुख हो जाता है, तो फिर उसको यह बात याद ही नहीं रहती कि सबके भोक्ता और मालिक भगवान् हैं। इसीसे उसका पतन हो जाता है। परन्तु जब इस जीवको चेत हो जाता है कि वास्तवमें मात्र भोगोंके भोक्ता और मात्र ऐश्वर्यके मालिक भगवान् ही हैं, तो फिर वह भगवान्में लग जाता है, ठीक रास्तेपर आ जाता है। फिर उसका पतन नहीं होता।] 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च'-- शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार मनुष्य यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि जितने शुभकर्म करते हैं तथा अपने वर्ण-आश्रमकी मर्यादाके अनुसार जितने व्यावहारिक और शारीरिक कर्तव्य-कर्म करते हैं, उन सब कर्मोंका भोक्ता अर्थात् फलभागी मैं हूँ। कारण कि वेदोंमें, शास्त्रोंमें, पुराणोंमें, स्मृतिग्रन्थोंमें प्राणियोंके लिये शुभकर्मोंका जो विधान किया गया है, वह सब-का-सब मेरा ही बनाया हुआ है, और मेरेको देनेके लिये ही बनाया हुआ है,जिससे ये प्राणी सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंसे और उनके फलोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहें, कभी अपने स्वरूपसे च्युत न हों और अनन्य भावसे केवल मेरेमें ही लगे रहें। अतः उन सम्पूर्ण शुभ-कर्मोंका और व्यावहारिक तथा शारीरिक कर्तव्य-कर्मोंका भोक्ता मैं ही हूँ।जैसे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता (फलभागी) मैं ही हूँ, ऐसे ही सम्पूर्ण संसारका अर्थात् सम्पूर्ण लोक, पदार्थ, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया और प्राणियोंके शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदिका मालिक भी मैं ही हूँ। कारण कि अपनी प्रसन्नताके लिये ही मैंने अपनेमेंसे इस सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना की है; अतः इन सबकी रचना करनेवाला होनेसे इनका मालिक मैं ही हूँ। विशेष बात भगवान्का भोक्ता बनना क्या है? भगवान्ने कहा है कि महात्माओंकी दृष्टिमें सब कुछ वासुदेव ही है (7। 19) और मेरी दृष्टिमें भी सत्-असत् सबकुछ मैं ही हूँ (9। 19)। जब सब कुछ मैं ही हूँ, तो कोई किसी देवताकी पुष्टिके लिये यज्ञ करता है, उस यज्ञके द्वारा देवतारूपमें मेरी ही पुष्टि होती है। कोई किसीको दान देता है, तो दान लेनेवालेके रूपमें मेरा ही अभाव दूर होता है, उससे मेरी ही सहायता होती है। कोई तप करता है, तो उस तपसे तपस्वीके रूपमें मेरेको ही सुख-शान्ति मिलती है। कोई किसीको भोजन कराता है, तो उस भोजनसे प्राणोंके रूपमें मेरी ही तृप्ति होती है। कोई शौचस्नान करता है, तो उससे उस मनुष्यके रूपमें मेरेको ही प्रसन्नता होती है। कोई पेड़-पौधोंको खाद देता है,उनको जलसे सींचता है तो वह खाद और जल पेड़-पौधोंके रूपमें मेरेको ही मिलता है और उनसे मेरी ही पुष्टि होती है। कोई किसी दीनदुःखी, अपाहिजकी तन-मन-धनसे सेवा करता है तो वह मेरी ही सेवा होती है। कोई वैद्यडाक्टर किसी रोगीका इलाज करता है, तो वह इलाज मेरा ही होता है। कोई कुत्तोंको रोटी डालता है कबूतरोंको दाना डालता है गायोंकी सेवा करता है भूखोंको अन्न देता है प्यासोंको जल पिलाता है तो उन सबके रूपमें मेरी ही सेवा होती है। उन सब वस्तुओंको मैं ही ग्रहण करता हूँ । जैसे कोई किसी मनुष्यकी सेवा करे, उसके किसी अङ्गकी सेवा करे, उसके कुटुम्बकी सेवा करे, तो वह सब सेवा उस मनुष्यकी ही होती है। ऐसे ही मनुष्य जहाँकहीं सेवा करे, जिस-किसीकी सहायता करे, वह सेवा और सहायता मेरेको ही मिलती है। कारण कि मेरे बिना अन्य कोई है ही नहीं। मैं ही अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ हूँ -- 'बहु स्यां प्रजायेय' (तैत्तिरीय0 2। 6)। तात्पर्य यह हुआ कि अनेक रूपोंमें सब कुछ ग्रहण करना ही भगवान्का भोक्ता बनना है।भगवान्का मालिक बनना क्या हैभगवत्तत्त्वको जाननेवाले भक्तोंकी दृष्टिमें अपरा और पराप्रकृतिरूप मात्र संसारके मालिक भगवान् ही हैं। संसारमात्रपर उनका ही अधिकार है। सृष्टिकी रचना करें या न करें, संसारकी स्थिति रखें या न रखें, प्रलय करें या न करें प्राणियोंको चाहे जहाँ रखें, उनका चाहे जैसा संचालन करें, चाहे जैसा उपभोग करें,अपनी मरजीके मुताबिक चाहे जैसा परिवर्तन करें, आदि मात्र परिवर्तन-परिवर्द्धन करनेमें भगवान्की बिलकुल स्वतन्त्रता है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे भोगी पुरुष भोग और संग्रहका चाहे जैसा उपभोग करनेमें स्वतन्त्र है (जबकि उसकी स्वतन्त्रता मानी हुई है, वास्तवमें नहीं है), ऐसे ही भगवान् मात्र संसारका चाहे जैसा परिवर्तनपरिवर्द्धन करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र हैं। भगवान्की वह स्वतन्त्रता वास्तविक है। यही भगवान्का मालिक बनना है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उनका पूजन करना अविधिपूर्वक कैसे है सो कहते हैं कि --, श्रौत और स्मार्त समस्त यज्ञोंका देवतारूपसे मैं ही भोक्ता हूँ और मैं ही स्वामी हूँ। मैं ही सब यज्ञोंका स्वामी हूँ यह बात अधियज्ञोऽहमेवात्र इस श्लोकमें भी कही गयी है। परंतु वे अज्ञानी इस प्रकार यथार्थ तत्त्वसे मुझे नहीं जानते। अतः अविधिपूर्वक पूजन करके वे यज्ञके असली फलसे गिर जाते हैं अर्थात् उनका पतन हो जाता है।

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Sri Anandgiri

ननु वस्वादित्येन्द्रादिज्ञानपूर्वकमेव तद्भक्तास्तद्याजिनो भवन्तीति कथमविधिपूर्वकं तेषां यजनमिति शङ्कते -- कस्मादिति। देवतान्तरयाजिनां यजनमविधिपूर्वकमित्यत्र हेत्वर्थत्वेन श्लोकमुत्थापयति -- उच्यत इति। सर्वेषां द्विविधानां यज्ञानां वस्वादिदेवतात्वेनाहमेव भोक्ता स्वेनान्तर्यामिरूपेण प्रभुश्चाहमेवेति प्रसिद्धमेतदिति हिशब्दः। प्रभुरेव चेत्युक्तं विवृणोति -- मत्स्वामिको हीति। तत्र पूर्वाध्यायगतवाक्यं प्रमाणयति -- अधियज्ञोऽहमिति। तथापि देवतान्तरयाजिनां यजनमविधिपूर्वकमिति कुतः सिद्धं तत्राह -- तथेति। ममैव यज्ञेषु भोक्तृत्वे प्रभुत्वे च सतीति यावत्। तयोर्भोक्तृप्रभ्वोर्भावस्तत्त्वं तेन भोक्तृत्वेन प्रभुत्वेन च मां यथावद्यतो न जानन्त्यतो भोक्तृत्वादिना ममाज्ञानान्मय्यनर्पितकर्माणश्चयवन्ते कर्मफलादित्याह -- अतश्चेति।

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Sri Dhanpati

एतदेव स्फोरयति -- अहमिति। सर्वयज्ञानां श्रौतानां स्मार्तानां च देवतारुपेण भोक्तन्तर्यामिरुपेण फलप्रदातृरुपेण प्रभूरेव चाहं हि प्रसिद्धमेतत्। तथा चैतादृशं मा यतस्तत्त्वेन ये नाभिजानन्तिं अतोऽविथोपूर्वकमिष्ट्वा यागफलभोगान्ते च्यवन्ति ते मर्त्यलोकं विशन्ति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ahamI
hiverily
sarvaof all
yajñānāmsacrifices
bhoktāthe enjoyer
chaand
prabhuḥthe Lord
evaonly
chaand
nanot
tubut
māmme
abhijānantirealize
tattvenadivine nature
ataḥtherefore
chyavantifall down (wander in samsara)
tethey
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येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्

हे कुन्तीनन्दन! जो भी भक्त (मनुष्य) श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अविधिपूर्वक — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.25
यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्

(सकामभावसे) देवताओंका पूजन करनेवाले (शरीर छोड़नेपर) देवताओंको प्राप्त होते हैं। पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं। परन्तु मेरा पूजन करनेवाले मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 24
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 24
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते

क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ; परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ: "क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ; परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 24?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 24 translates to: "For I alone am the enjoyer and Lord of all sacrifices; but they do not know Me in reality, and thus they return to this mortal world. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 24 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ; परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha" mean in English?

"ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 24. For I alone am the enjoyer and Lord of all sacrifices; but they do not know Me in reality, and thus they return to this mortal world. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.