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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्

जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

ఎవరి గురించి ఆలోచించకుండా, నన్ను మాత్రమే ఆరాధించే వారి కోసం, ఎప్పుడూ ఐక్యంగా ఉన్నవారి కోసం, వారు ఇప్పటికే కలిగి లేని వాటిని నేను భద్రపరుస్తాను మరియు ఇప్పటికే కలిగి ఉన్న వాటిని భద్రపరుస్తాను.

TamilIND

என்னை மட்டும் வணங்கும் மனிதர்களுக்கு, வேறு யாரையும் நினைக்காமல், எப்போதும் ஒற்றுமையாக இருப்பவர்களுக்கு, அவர்களிடம் இல்லாததை நான் பத்திரப்படுத்தி, ஏற்கனவே வைத்திருப்பதைக் காப்பாற்றுகிறேன்.

MarathiIND

जे लोक फक्त माझीच उपासना करतात, इतर कोणाचाही विचार करत नाहीत, सदैव एकात्म असलेल्यांसाठी, त्यांच्याकडे जे आधीपासून नाही ते मी सुरक्षित ठेवतो आणि त्यांच्याकडे जे आहे ते मी सुरक्षित ठेवतो.

BengaliIND

যারা একমাত্র আমারই উপাসনা করে, অন্য কাউকে না ভেবে, যারা চির-একত্রিত তাদের জন্য, আমি তাদের কাছে যা নেই তা সুরক্ষিত রাখি এবং তাদের ইতিমধ্যে যা আছে তা সংরক্ষণ করি।

PunjabiIND

ਉਹਨਾਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਲਈ ਜੋ ਇਕੱਲੇ ਮੇਰੀ ਭਗਤੀ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਬਾਰੇ ਨਹੀਂ ਸੋਚਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਲਈ ਸਦਾ-ਸਦਾ ਲਈ, ਮੈਂ ਉਹ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਰੱਖਦਾ ਹਾਂ ਜੋ ਉਹਨਾਂ ਕੋਲ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਨਹੀਂ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਉਹਨਾਂ ਕੋਲ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਰੱਖਦਾ ਹਾਂ.

GujaratiIND

જે માણસો એકલા મારી જ ભક્તિ કરે છે, બીજા કોઈનો વિચાર નથી કરતા, સદા-સંબંધિત લોકો માટે, તેમની પાસે જે નથી તે હું સુરક્ષિત રાખું છું અને તેમની પાસે જે છે તે સાચવું છું.

NepaliIND

अरु कसैको न सोचेर मेरो मात्र पूजा गर्ने मानिसहरुका लागि, सधैं एकताबद्ध हुनेहरुका लागि, म उनीहरुसँग पहिले नै नभएका कुराहरु सुरक्षित गर्छु र उनीहरुसँग भएका कुराहरु जोगाउँछु ।

MalayalamIND

മറ്റാരെയും കുറിച്ച് ചിന്തിക്കാതെ എന്നെ മാത്രം ആരാധിക്കുന്ന പുരുഷന്മാർക്ക്, സദാ ഐക്യമുള്ളവർക്കായി, അവർ ഇതുവരെ കൈവശം വച്ചിട്ടില്ലാത്തത് ഞാൻ സുരക്ഷിതമാക്കുകയും അവരുടെ കൈവശമുള്ളത് സംരക്ഷിക്കുകയും ചെയ്യുന്നു.

KannadaIND

ನನ್ನನ್ನು ಮಾತ್ರ ಪೂಜಿಸುವವರಿಗೆ, ಬೇರೆಯವರ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸದೆ, ಯಾವಾಗಲೂ ಐಕ್ಯವಾಗಿರುವವರಿಗೆ, ಅವರು ಈಗಾಗಲೇ ಹೊಂದಿರದಿದ್ದನ್ನು ನಾನು ಭದ್ರಪಡಿಸುತ್ತೇನೆ ಮತ್ತು ಅವರು ಈಗಾಗಲೇ ಹೊಂದಿರುವುದನ್ನು ಸಂರಕ್ಷಿಸುತ್ತೇನೆ.

SindhiIND

انھن ماڻھن لاءِ جيڪي مون کي اڪيلو پوڄيندا آھن، ڪنھن ٻئي جي باري ۾ نه سوچيندا آھن، انھن لاءِ جيڪي ھميشه متحد آھن، انھن لاءِ جيڪي انھن وٽ اڳي ئي نه آھن، انھن کي محفوظ ڪندو آھيان ۽ اھو محفوظ ڪندو آھيان جيڪو انھن وٽ آھي.

OdiaIND

ସେହି ବ୍ୟକ୍ତିମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯେଉଁମାନେ ମୋତେ ଏକାକୀ ଉପାସନା କରନ୍ତି, ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ଚିନ୍ତା କରନ୍ତି ନାହିଁ, ସେହିମାନଙ୍କ ପାଇଁ, ମୁଁ ଯାହା ସୁରକ୍ଷିତ ଅଛି ତାହା ସୁରକ୍ଷିତ କରେ ଏବଂ ଯାହା ପୂର୍ବରୁ ଅଛି ତାହା ସଂରକ୍ଷଣ କରେ |

MizoIND

Mi dang ngaihtuah lo, Keimah chauh chibai buktute tan chuan, inpumkhat rengte tan chuan an neih loh chu ka humhim a, an neih tawh chu ka humhim bawk.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते'--जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आ रहा है, वह सब-का-सब भगवान्का स्वरूप ही है और उसमें जो कुछ परिवर्तन तथा चेष्टा हो रही है, वह सब-की-सब भगवान्की लीला है -- ऐसा जो दृढ़तासे मान लेते हैं, समझ लेते हैं, उनकी फिर भगवान्के सिवाय कहीं भी महत्त्वबुद्धि नहीं होती। वे भगवान्में ही लगे रहते हैं। इसलिये वे 'अनन्य' हैं। केवल भगवान्में ही महत्ता और प्रियता होनेसे उनके द्वारा स्वतः भगवान्का ही चिन्तन होता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो निष्कामी -- पूर्ण ज्ञानी हैं --, जो संन्यासी अनन्यभावसे युक्त हुए अर्थात् परमदेव मुझ नारायणको आत्मरूपसे जानते हुए मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरी श्रेष्ठ -- निष्काम उपासना करते हैं? निरन्तर मुझमें ही स्थित उन परमार्थज्ञानियोंका योगक्षेम मैं चलाता हूँ। अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिका नाम योग है और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम क्षेम है? उनके ये दोनों काम मैं स्वयं किया करता हूँ। क्योंकि ज्ञानीको तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूँ और वह मेरा प्यारा है इसलिये वे उपर्युक्त भक्त मेरे आत्मारूप और प्रिय हैं। पू0 -- अन्य भक्तोंका योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं उ0 -- यह बात ठीक है? अवश्य भगवान् ही चलाते हैं किंतु उसमें यह भेद है कि जो दूसरे भक्त हैं वे स्वयं भी अपने लिये योगक्षेमसम्बन्धी चेष्टा करते हैं? पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेमसम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। क्योंकि वे जीने और मरनेमें भी अपनी वासना नहीं रखते? केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

फलमनभिसंधाय त्वामेवाराधयतां सम्यग्दर्शननिष्ठानामत्यन्तनिष्कामानां(णां) कथं योगक्षेमौ स्यातामित्याशङ्क्याह -- ये पुनरिति। तेषां योगक्षेमं वहामीत्युत्तरत्र संबन्धः। येभ्योऽन्यो न विद्यत इति,व्युत्पत्तिमाश्रित्याह -- अपृथगिति। कार्यस्येव कारणे कर्मतादात्म्यं व्यावर्तयति -- परमिति। अहमेव वासुदेवः सर्वात्मा न मत्तोऽन्यत्किंचिदस्तीति ज्ञात्वा तमेव प्रत्यञ्चं सदा ध्यायन्त इत्याह -- चिन्तयन्त इति। प्राकृतान्व्यावर्त्य मुख्यानधिकारिणो निर्दिशति -- संन्यासिन इति। पर्युपासते परितः सर्वतोऽनवच्छिन्नतया पश्यन्तीत्यर्थः। नित्याभियुक्तानां नित्यमनवरतमादरेण ध्याने व्यापृतानामित्याह -- सततेति। योगश्च क्षेमश्च योगक्षेमम्। तत्रापुनरुक्तमर्थमाह -- योग इति। किमर्थं परमार्थदर्शिनां योगक्षेमं वहसीत्याशङ्क्याह -- ज्ञानीत्विति। अतस्तेषां योगक्षेमं वहामीति संबन्धः। सम्यग्दर्शननिष्ठानामेव योगक्षेमं वहति भगवानिति विशेषणममृष्यमाणः शङ्कते -- नन्विति। अन्येषामपि भक्तानां भगवान्योगक्षेमं वहतीत्येतदङ्गीकरोति -- सत्यमिति। तर्हि भक्तेषु ज्ञानिषु च विशेषो नास्तीति पृच्छति -- किंत्विति। तत्र विशेषं प्रतिज्ञाय विवृणोति -- अयमित्यादिना। योगक्षेममुद्दिश्य स्वयमीहन्ते चेष्टां कुर्वन्तीति यावत्। आत्मविदां स्वार्थं योगक्षेममुद्दिश्य चेष्टाभावं स्पष्टयति -- नहीति। गृद्धिरपेक्षा कामना तामित्येतत्। ज्ञानिनां तर्हि सर्वत्रानास्थेत्याशङ्क्याह -- केवलमिति। तेषां तदेकशरणत्वे फलितमाह अत इति। इतिशब्दो विशेषशब्देन संबध्यते।

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Sri Dhanpati

ननु कामकामानां तु तत्तत्कामनया कर्मानुष्ठाने कृते सति भोगादिकं सिध्यति? ये पुनर्निष्कामाः तत्त्वदर्शिनस्त्वां पर्युपासते तेषां भोगकामनारहितानामपि शरीरस्थितिहेतुभूतौ योगक्षेमौ खतं स्यातामिति तत्राह -- अनन्या इति। मत्तोऽपृथग्भूताः परं देवं वासुदेवं ममात्मत्वेन प्रतिपन्नाः सन्ते जना मां चिन्तयन्तोऽहमेव वासुदेव इति ज्ञात्वा प्रत्यभिन्नं मां ध्यायन्तः पर्युपासते परितः सर्वतोऽनवच्छिन्नतया पश्यन्तीत्यर्थः। तेषां सभ्यग्दर्शिनां नित्याभियुक्तानां नित्यं सततमत्यादरेण मच्चिन्तने व्यापृतानां योगक्षेमं वहाम्यहं योगश्च क्षेमश्चेति समाहारद्वन्द्वः। अलब्धस्य प्रापणं योगः। लब्धस्य परिपालनं क्षेमस्तदुभयं वहामि प्रापयामि। यतः कारणात् ज्ञानिनो ममात्मभूतत्वादतिप्रियाः। तदुक्तम्उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतं?स च मम प्रियः इति। यद्यप्यन्येषामपि भक्तानां योगक्षेमं भगवान्वहत्येव तथाप्यन्ये ये भक्तास्ते आत्मार्थं स्वयमपि योगक्षेममीहन्ते अनन्यदर्शिनस्तु नेति विशेषः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ananyāḥalways
chintayantaḥthink of
māmme
yethose who
janāḥpersons
paryupāsateworship exclusively
teṣhāmof them
nitya abhiyuktānāmwho are always absorbed
yogasupply spiritual assets
kṣhemamprotect spiritual assets
vahāmicarry
ahamI
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.21
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते

वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.23
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्

हे कुन्तीनन्दन! जो भी भक्त (मनुष्य) श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अविधिपूर्वक — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 22
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्

जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ: "जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 22?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 22 translates to: "For those men who worship Me alone, thinking of no one else, for those ever-united, I secure what they have not already possessed and preserve what they already possess. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 22 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate" mean in English?

"ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 22. For those men who worship Me alone, thinking of no one else, for those ever-united, I secure what they have not already possessed and preserve what they already possess. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.