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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन

हे अर्जुन ! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MarathiIND

सूर्य म्हणून, मी उष्णता देतो; मी पाऊस थांबवून पाठवतो. हे अर्जुना, मी अमरत्व आहे आणि मृत्यू, अस्तित्व आणि अस्तित्वहीन आहे.

TamilIND

சூரியனைப் போல, நான் வெப்பத்தைத் தருகிறேன்; நான் மழையைத் தடுத்து அனுப்புகிறேன்; நான் அழியாதவன் மற்றும் இறப்பு, இருப்பு மற்றும் இல்லாதவன், ஓ அர்ஜுனா.

KannadaIND

ಸೂರ್ಯನಂತೆ, ನಾನು ಶಾಖವನ್ನು ನೀಡುತ್ತೇನೆ; ನಾನು ಮಳೆಯನ್ನು ತಡೆದು ಕಳುಹಿಸುತ್ತೇನೆ; ನಾನು ಅಮರತ್ವ ಮತ್ತು ಸಾವು, ಅಸ್ತಿತ್ವ ಮತ್ತು ಅಸ್ತಿತ್ವದಲ್ಲಿಲ್ಲ, ಓ ಅರ್ಜುನ.

MalayalamIND

സൂര്യനെപ്പോലെ ഞാൻ ചൂട് നൽകുന്നു; ഞാൻ മഴ തടഞ്ഞുനിർത്തുന്നു; ഹേ അർജുനാ, ഞാൻ അനശ്വരതയും മരണവും അസ്തിത്വവും അസ്തിത്വവുമാണ്.

PunjabiIND

ਜਿਵੇਂ ਸੂਰਜ, ਮੈਂ ਗਰਮੀ ਦਿੰਦਾ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਮੀਂਹ ਨੂੰ ਰੋਕਦਾ ਹਾਂ ਅਤੇ ਭੇਜਦਾ ਹਾਂ; ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਮੈਂ ਅਮਰਤਾ ਹਾਂ ਅਤੇ ਮੌਤ, ਹੋਂਦ ਅਤੇ ਗੈਰ-ਹੋਂਦ ਵੀ ਹਾਂ।

GujaratiIND

સૂર્ય તરીકે, હું ગરમી આપું છું; હું વરસાદને રોકીને મોકલું છું; હે અર્જુન, હું અમરત્વ છું અને મૃત્યુ, અસ્તિત્વ અને અ-અસ્તિત્વ પણ છું.

NepaliIND

सूर्य जस्तै, म गर्मी दिन्छु; म रोक्छु र वर्षा पठाउँछु। हे अर्जुन, म अमर हुँ र मृत्यु, अस्तित्व र अस्तित्व पनि हुँ।

BengaliIND

সূর্যের মতো আমি তাপ দেই; আমি বৃষ্টি রোধ করে পাঠাই; হে অর্জুন, আমি অমরত্ব এবং মৃত্যু, অস্তিত্ব এবং অ-অস্তিত্বও।

SindhiIND

جيئن سج، مان گرمي ڏيان ٿو. مون مينهن کي روڪيو ۽ موڪليو. اي ارجن، مان لافاني آهيان ۽ موت، وجود ۽ غير موجود آهيان.

TeluguIND

సూర్యుని వలె, నేను వేడిని ఇస్తాను; నేను వర్షాన్ని నిలిపివేసి పంపుతాను; నేను అమరత్వం మరియు మరణం, ఉనికి మరియు అస్తిత్వం, ఓ అర్జునా.

MaithiliIND

सूर्य जकाँ हम ताप दैत छी; हम बरखा रोकैत छी आ पठा दैत छी। हम अमरत्व छी आ मृत्यु सेहो, अस्तित्व आ अस्तित्व नहि हे अर्जुन।

BhojpuriIND

जइसे सूरज, हम ताप देत बानी; हम बरखा के रोक के भेजत बानी; हम अमरता हईं आ मृत्यु भी, अस्तित्व आ अस्तित्वहीन हे अर्जुन।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --'तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च'--'पृथ्वीपर जो कुछ अशुद्ध, गंदी चीजें हैं, जिनसे रोग पैदा होते हैं, उनका शोषण करके प्राणियोंको नीरोग करनेके लिये अर्थात् ओषधियों, जड़ी-बूटियोंमें जो जहरीला भाग है, उसका शोषण करनेके लिये और पृथ्वीका जो जलीय भाग है, जिससे अपवित्रता होती है, उसको सुखानेके लिये मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ। सूर्यरूपसे उन सबके जलीय भागको ग्रहण करके और उस जलको शुद्ध तथा मीठा बना करके समय आनेपर वर्षारूपसे प्राणिमात्रके हितके लिये बरसा देता हूँ, जिससे प्राणिमात्रका जीवन चलता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, मैं ही सूर्य होकर अपनी कुछ प्रखर रश्मियोंसे सबको तपाता हूँ और कुछ किरणोंसे वर्षा करता हूँ तथा वर्षा कर चुकनेपर फिर कुछ रश्मियोंद्वारा आठ महीनेतक जलका शोषण करता रहता हूँ और वर्षाकाल आनेपर फिर बरसा देता हूँ। हे अर्जुन देवोंका अमृत और मर्त्यलोकमें बसनेवालोंकी मृत्यु तथा सत् और असत् सब मैं ही हूँ अर्थात् जो जिसके सम्बन्धसे विद्यमान है वह और जो उसके विपरीत है वह भी मैं ही हूँ। परंतु ( यह ध्यानमें रखना चाहिये कि ) स्वयं भगवान् अत्यन्त असत् नहीं हैं। अथवा सत् और असत्का अर्थ यहाँ कार्य और कारण समझना चाहिये। जो ज्ञानी पहले कहे हुए क्रमानुसार एकत्वपृथक्त्व आदि विज्ञानरूप यज्ञोंसे पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं वे अपने विज्ञानानुसार मुझे ही प्राप्त होते हैं।

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Sri Anandgiri

इतश्च सर्वात्मत्वे भगवतो न विवदितव्यमित्याह -- किञ्चेति।आदित्याज्जायते वृष्टिः इति स्मृतिमवष्टभ्य व्याचष्टे -- कैश्चिदिति। वर्षोत्सर्गनिग्रहावेकस्यैकस्मिन्काले विरुद्धावित्याशङ्क्याह -- अष्टभिरिति। ऋतुभेदेन वर्षस्य निग्रहोत्सर्गावेककर्तृकावविरुद्धावित्यर्थः। यस्य कारणस्य संबन्धित्वेन,यत्कार्यमभिषज्यते तदिह सदित्युच्यते? कारणसंबन्धेनानभिव्यक्तं कारणमेवानभिव्यक्तनामरूपमसदिति व्यवह्रियते तदेतदाह -- सदिति। शून्यवादं व्युदस्यति -- न पुनरिति। भगवतोऽत्यन्तासत्त्वे कार्यकारणकल्पना निरधिष्ठाना न तिष्ठतीत्यर्थः। तर्हि यथाश्रुतं कार्यस्य सत्त्वं कारणस्य चासत्त्वमास्थेयमित्याशङ्क्य वाशब्देन निषेधति -- कार्येति। नहि कार्यस्यात्यन्तिकं सत्त्वं वाचारम्भणश्रुतेर्नापीतरस्यात्यन्तिकमसत्त्वंकुतस्तु खलु इत्यादिश्रुतेरित्यर्थः। उक्तैर्ज्ञानयज्ञैर्भगवदभिनिविष्टबुद्धीनां किं फलमित्याशङ्क्यह सद्यो वा क्रमेण वा मुक्तिरित्याह -- य इति।

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Sri Dhanpati

किंचाहमादित्यो भूत्वा कैश्चित्किरणैः ग्रीष्मर्तौ तपामि। कैश्चित्करणैरहं वर्षं पूर्वं मयैव त्यक्तं अष्टसु मासेषु निगृह्णामि। कैश्चित्किणैरहं वर्षं पुनर्वर्षासूत्सृजामि। अमृतं चैवाहमेव मर्त्यानां मृत्युश्चाहमेव। सदसच्चाहमेव यस्य कारणस्य संबन्धितया यत्कार्यं नामरुपाभ्यां व्यज्यते तदत्र सज्छब्देनोपादीयते। कारणासंबन्धेन नामरुपाभ्यामनभिव्यक्तं कारणात्मना स्थितमसदित्युच्यते। ननु सदसच्छब्दयोर्मुख्योऽर्थः कुतो नाङ्गीक्रियते इतिचेत्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यं?तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः। विमतं मिथ्यादृश्यत्वात् परिच्छिन्नत्वात् जडत्वात् शुक्तिरुप्यवत्।तरति शोकमात्मवित् इति श्रुत्युक्तबन्धोपलक्षितसंसारनिवृत्तेः प्रपञ्चमिथ्यात्वं विनानुपपत्तिरिति श्रुतिसूत्रानुमानार्थापत्तिभ्यः कार्यजातस्यासत्त्वावधारणात् सर्वाधिष्ठानस्य शून्यत्वायोगाच्चेति गृहाण। एवंभूतः सन्नपि वस्तुतः सर्वोपाधिविनिर्मुक्तः स्वच्छ एवास्मीति ध्वनयमन् संबोधयति -- हे अर्जुनेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tapāmiradiate heat
ahamI
ahamI
varṣhamrain
nigṛihṇāmiwithhold
utsṛijāmisend forth
chaand
amṛitamimmortality
chaand
evaalso
mṛityuḥdeath
chaand
sateternal spirit
asattemporary matter
chaand
ahamI
arjunaArjun
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गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

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Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन

हे अर्जुन ! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "हे अर्जुन ! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 19 translates to: "As the sun, I give heat; I withhold and send forth the rain; I am immortality and also death, existence and non-existence, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। हे अर्जुन ! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha" mean in English?

"tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 19. As the sun, I give heat; I withhold and send forth the rain; I am immortality and also death, existence and non-existence, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.