Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्

योगी इसको (शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको) जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

SindhiIND

ويد جي مطالعي، قربانين جي عمل، سادگيءَ ۽ توفيقن مان حاصل ڪرڻ لاءِ (صحيفن ۾) جيڪي به خوبيون بيان ڪيون ويون آهن، انهن سڀني کان اڳتي آهي يوگي، اهو ڄاڻي ٿو. ۽ هو اعليٰ، پريم (پهريون يا قديم) گهر تائين پهچي ٿو.

TamilIND

வேதங்கள், யாகங்கள், துறவுகள் மற்றும் வரங்கள் ஆகியவற்றிலிருந்து (வேதங்களில்) எந்தப் பலனைப் பெறுவது என்று (வேதங்களில்) அறிவிக்கப்பட்டாலும், இதையெல்லாம் தாண்டி யோகி இதை அறிந்திருக்கிறார்; மேலும் அவர் உச்ச, முதன்மையான (முதல் அல்லது பழமையான) உறைவிடத்தை அடைகிறார்.

MalayalamIND

വേദങ്ങളിൽ നിന്ന് (വേദപഠനത്തിൽ നിന്നും) യാഗങ്ങളിൽ നിന്നും (തപസ്സുകൾ ചെയ്യുന്നതും) ദാനങ്ങളിൽ നിന്നും ലഭിക്കുമെന്ന് (വേദഗ്രന്ഥങ്ങളിൽ) പ്രഖ്യാപിച്ചിട്ടുള്ള ഏത് ഗുണഫലവും, ഇതിനെല്ലാം അതീതമായി യോഗി ഇത് അറിഞ്ഞുകൊണ്ട് പോകുന്നു; അവൻ പരമോന്നതവും പ്രാചീനവുമായ (ആദ്യത്തേതോ പുരാതനമായതോ) വാസസ്ഥലത്തെത്തുന്നു.

NepaliIND

वेदको अध्ययन (अध्ययन) यज्ञ, (तपस्या) र वरदानबाट प्राप्त हुने पुण्यको फल (शास्त्रहरूमा) घोषित गरिएको छ, यो सबै भन्दा परे योगीले जान्दछ। र उसले सर्वोच्च, आदिम (प्रथम वा प्राचीन) निवासमा पुग्छ।

GujaratiIND

વેદોના (અધ્યયન) (અધ્યયન) ત્યાગ, (તપસ્યા) અને ઉપહારોમાંથી પ્રાપ્ત કરવા માટે (શાસ્ત્રોમાં) જે પણ યોગ્યતાનું ફળ જાહેર કરવામાં આવ્યું છે, તે બધાથી આગળ યોગી આ જાણીને જાય છે; અને તે સર્વોચ્ચ, આદિમ (પ્રથમ અથવા પ્રાચીન) નિવાસસ્થાન સુધી પહોંચે છે.

TeluguIND

వేదాల (అధ్యయనం) త్యాగాలు, (ఆచరణ) తపస్సులు మరియు బహుమతుల నుండి (గ్రంధాలలో) ఏ పుణ్యఫలం ప్రకటించబడిందో, యోగి దీనిని తెలుసుకున్నాడు; మరియు అతను సర్వోన్నత, ప్రాచీన (మొదటి లేదా పురాతన) నివాసాన్ని చేరుకుంటాడు.

KannadaIND

ವೇದಗಳಿಂದ (ಅಧ್ಯಯನದಿಂದ) ಯಜ್ಞಗಳಿಂದ, (ತಪಸ್ಸಿನ ಅಭ್ಯಾಸದಿಂದ) ಮತ್ತು ಉಡುಗೊರೆಗಳಿಂದ (ಶಾಸ್ತ್ರಗಳಲ್ಲಿ) ಯಾವ ಪುಣ್ಯಫಲವನ್ನು ಘೋಷಿಸಲಾಗಿದೆಯೋ, ಯೋಗಿಯು ಇದನ್ನು ತಿಳಿದ ನಂತರ, ಮತ್ತು ಅವನು ಸರ್ವೋಚ್ಚ, ಅಪೂರ್ವ (ಮೊದಲ ಅಥವಾ ಪ್ರಾಚೀನ) ವಾಸಸ್ಥಾನವನ್ನು ತಲುಪುತ್ತಾನೆ.

MarathiIND

वेदांचे (अभ्यास) (अध्ययन) यज्ञ, (तपस्या) आणि भेटवस्तू यांमुळे (शास्त्रात) जे काही गुणवत्तेचे फळ घोषित केले जाते, ते या सर्वांच्या पलीकडे जाऊन योगी हे जाणतात; आणि तो सर्वोच्च, आद्य (प्रथम किंवा प्राचीन) निवासस्थानापर्यंत पोहोचतो.

PunjabiIND

ਵੇਦਾਂ ਦੇ ਅਧਿਐਨ, ਤਪੱਸਿਆ ਅਤੇ ਦਾਤਾਂ ਤੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਣ ਲਈ ਜੋ ਵੀ ਗੁਣ (ਸ਼ਾਸਤਰਾਂ ਵਿੱਚ) ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਇਸ ਸਭ ਤੋਂ ਪਰੇ ਯੋਗੀ ਇਸ ਨੂੰ ਜਾਣਦਾ ਹੈ; ਅਤੇ ਉਹ ਪਰਮ, ਪਰਮ (ਪਹਿਲੇ ਜਾਂ ਪ੍ਰਾਚੀਨ) ਨਿਵਾਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

BengaliIND

বেদ অধ্যয়ন, যজ্ঞ, তপস্যা এবং দান থেকে যা কিছু অর্জনের জন্য (শাস্ত্রে) গুণের ফল ঘোষণা করা হয়, এই সবের বাইরে যোগী এই জেনে যান; এবং তিনি সর্বোচ্চ, আদিম (প্রথম বা প্রাচীন) আবাসে পৌঁছান।

KonkaniIND

वेदांतल्यान (शास्त्रांत) जें पुण्याचें फळ (शास्त्रांत) मेळटा अशें जाहीर केलां, यज्ञांतल्यान (अभ्यासांतल्यान) तपांतल्यान, दानांतल्यान (अभ्यास) आनी दानांतल्यान मेळटा, ह्या सगळ्यांभायर योगी हें जाणून वता; आनी तो परम, आदिम (पयलें वा पुर्विल्लें) निवासस्थान मेळयता.

MizoIND

Veda (zirna) a\anga lo chhuak tur (Pathian Lehkhabuah) puan a nih chuan, inthawina (a tih) a\angin, (a tih) a\angin, thilpek a\angin, heng zawng zawng piah lamah hian Yogi chuan a kal a, hei hi a hre tawh a;.. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. tin, Supreme, Primeval (first or ancient) Abode a thleng bawk.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'वेदेषु यज्ञेषु तपःसु ৷৷. स्थानमुपैति चाद्यम्'--यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि जितने भी शास्त्रीय उत्तम-से-उत्तम कार्य हैं और उनका जो फल है, वह विनाशी ही होता है। कारण कि जब उत्तम-से-उत्तम कार्यका भी आरम्भ और समाप्ति होती है, तो फिर उस कार्यसे उत्पन्न होनेवाला फल अविनाशी कैसे हो सकता है? वह फल चाहे इस लोकका हो, चाहे स्वर्गादि भोग-भूमियोंका हो, उसकी नश्वरतामें किञ्चिन्मात्र भी फरक नहीं है। जीव स्वयं परमात्माका अविनाशी अंश होकर भी विनाशी पदार्थोंमें फँसा रहे, तो इसमें उसकी अज्ञता ही मुख्य है। अतः जो मनुष्य तेईसवें श्लोकसे लेकर छब्बीसवें श्लोकतक वर्णित शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको समझ लेता है, वह यज्ञ, तप, दान आदि सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है। कारण कि वह यह समझ लेता है कि भोग-भूमियोंकी भी आखिरी हद जो ब्रह्मलोक है, वहाँ जानेपर भी लौटकर पीछे आना पड़ता है; परन्तु भगवान्को प्राप्त होनेपर लौटकर नहीं आना पड़ता (8। 16); और साथ-साथ यह भी समझ लेता है कि मैं तो साक्षात् परमात्माका अंश हूँ तथा ये प्राकृत पदार्थ नित्य-निरन्तर अभावमें, नाशमें जा रहे हैं, तो फिर वह नाशवान् पदार्थोंमें, भोगोंमें न फँसकर भगवान्के ही आश्रित हो जाता है। इसलिये वह आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है, जिसको इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें 'परमगति' और 'परमधाम' नामसे कहा गया है।नाशवान् पदार्थोंके संग्रह और भोगोंमें आसक्त हुआ मनुष्य उस आदिस्थान परमात्मतत्त्वको नहीं जान सकता। न जाननेकी यह असामर्थ्य न तो भगवान्की दी हुई है, न प्रकृतिसे पैदा हुई है और न किसी कर्मका फल ही है अर्थात् यह असामर्थ्य किसीकी देन नहीं है; किन्तु स्वयं जीवने ही परमात्मतत्त्वसे विमुख होकर इसको पैदा किया है। इसलिये यह स्वयं ही इसको मिटा सकता है। कारण कि अपने द्वारा की हुई भूलको स्वयं ही मिटा सकता है और इसको मिटानेका दायित्व भी स्वयंपर ही है। इस भूलको मिटानेमें यह जीव असमर्थ नहीं है, निर्बल नहीं है, अपात्र नहीं है। केवल संयोगजन्य सुखकी लोलुपताके कारण यह अपनेमें असामर्थ्यका आरोप कर लेता है और इसीसे मनुष्यजन्मके महान् लाभसे वञ्चित रह जाता है। अतः मनुष्यको संयोगजन्य सुखकी लोलुपताका त्याग करके मनुष्यजन्मको सार्थक बनानेके लिये नित्य-निरन्तर उद्यत रहना चाहिये।छठे अध्यायके अन्तमें भगवान्ने पहले योगीकी महिमा कही और पीछे अर्जुनको योगी हो जानेकी आज्ञा दी (6। 46); और यहाँ भगवान्ने पहले अर्जुनको योगी होनेकी आज्ञा दी और पीछे योगीकी महिमा कही। इसका तात्पर्य है कि छठे अध्यायमें योगभ्रष्टका प्रसङ्ग है, और उसके विषयमें अर्जुनके मनमें सन्देह था कि वह कहीं नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? इस शङ्काको दूर करनेके लिये भगवान्ने कहा कि 'कोई किसी तरहसे योगमें लग जाय तो उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, इस योगका जिज्ञासुमात्र भी शब्दब्रह्मका अतिक्रमण कर जाता है।' इसलिये योगीकी महिमा पहले कही और पीछे अर्जुनके लिये योगी होनेकी आज्ञा दी। परन्तु यहाँ अर्जुनका प्रश्न रहा कि नियतात्मा पुरुषोंके द्वारा आप कैसे जाननेमें आते हैं? इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान्ने कहा कि 'जो सांसारिक पदार्थोंसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होता है, उस योगीके लिये मैं सुलभ हूँ', इसलिये पहले 'तू योगी हो जा' ऐसी आज्ञा दी और पीछे योगीकी महिमा कही।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

योगका माहात्म्य सुन --, इनको जानकर अर्थात् इन सात प्रश्नोंके निर्णयद्वारा कहे हुए रहस्यको यथार्थ समझकर और उसका अनुष्ठान करके योगी पुरुष भलीभाँति पढ़े हुए वेद श्रेष्ठ गुणोंसहित सम्पादन किये हुए यज्ञ भली प्रकार किये हुए तप और यथार्थ पात्रको दिये हुए दान इन सबका शास्त्रोंने जो पुण्यफल बतलाया है उस सबको अतिक्रम कर जाता है और आदिमें होनेवाले सबके कारणरूप परम श्रेष्ठ ऐश्वरपदको अर्थात् ब्रह्मको पा लेता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

श्रद्धाविवृद्ध्यर्थं योगं स्तौति -- शृण्विति। पवित्रपाणित्वप्राङ्मुखत्वादिसाहित्यमध्ययनस्य सम्यक्त्वम्। अङ्गोपाङ्गोपेतत्वमनुष्ठानस्य साद्गुण्यम्। तपसां सुतप्तत्वं मनोबुद्ध्याद्यैकाग्र्यपूर्वकत्वम्। दानस्य च सम्यक्त्वं देशकालपात्रानुगुणत्वम्। इदं विदित्वेत्यत्रेदंशब्दार्थमेव स्फुटयति -- सप्तेति। यद्यपिकिं तद्ब्रह्म इत्यादौअधियज्ञः कथं कोऽत्र इत्यत्र प्रश्नद्वयं प्रतिभासानुसारेण कैश्चिदुक्तं तथापि प्रतिवचनालोचनायां द्वित्वप्रतीत्यभावात्प्रकारभेदविवक्षया चशब्दद्वयस्य प्रतिनियतत्वान्न सप्तेति विरुध्यते। न चेदं वेदनमापातिकं किंत्वनुष्ठानपर्यन्तमित्याह -- सम्यगिति। प्रकृतो ध्याननिष्ठो योगीत्युच्यते। ऐश्वर्यं विष्णोः परमं पदं तदेव तिष्ठत्यस्मिन्नशेषमिति स्थानं योगानुष्ठानादशेषफलातिशायिमोक्षलक्षणं फलं क्रमेण लब्धुं शक्यमिति भावः। तदनेन सप्तप्रश्नप्रतिवचनेन योगमार्गं दर्शयता ध्येयत्वेन तत्पदार्थो व्याख्यातः।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दगिरिकृत0अष्टमोऽध्यायः

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

श्रद्धाविवृद्य्धर्थै योगस्य माहात्म्यं श्रावयति। वेदेषु सम्यगधीतेषु। अध्ययनस्य सम्यवक्त्वं च पवित्रपाणित्वप्राङ्युरवत्वगर्वधीनत्वब्रह्मचर्यपालनत्वादिसाहित्यम् यज्ञेषु श्रद्धयाङोपाङ्गसाहि तपस्सु शास्त्रेक्तेषु मनोबुद्य्धाद्यैकाग्र्येण श्रद्धया सुप्तप्तेषु दानेषु तुलापुरुषादिषु देशे काले पात्रे च श्रद्धया सभ्यग्दत्तेषु यत्पुण्यफलं पुण्यस्य धर्मस्य फलं स्वर्गस्वाराज्यादि प्रदिष्टं शास्त्रेण अतेयत्यतिक्रामति तत्सर्वं इदं पूर्वोक्तसप्तप्रश्ननिरुपणद्वारेणोक्तं विदित्वा सभ्यगनुष्ठानपर्यन्तमवधार्यानुष्ठानाय च योगी ध्याननिष्ठः न केवलं तदतिक्रामति परं सर्वोत्कृष्टमैश्वरं स्थानमाद्यं सर्वकारणं उपैति च प्रतिपद्यते च। सर्वकारणं ब्रह्मैव प्राप्नोतीत्यर्थः। तदनेनाध्यायेन ध्येत्वेन तत्पादार्थो व्याख्यातः।इति श्रीमत्परहंसपरिव्राजकाचार्यश्राविश्वेश्वरसलस्वतीपादशिष्यमधुसूदनसरस्वतीविरतचितायां श्रीभगवद्गीतागूढार्थदीपिकायां अक्षरपरब्रह्मयोगो नाम अष्ठमोऽध्यायः

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vedeṣhuin the study of the Vedas
yajñeṣhuin performance of sacrifices
tapaḥsuin austerities
chaand
evacertainly
dāneṣhuin giving charities
yatwhich
puṇyaphalam
pradiṣhṭamis gained
atyetisurpasses
tat sarvamall
idamthis
viditvāhaving known
yogīa yogi
paramSupreme
sthānamAbode
upaitiachieves
chaand
ādyamoriginal
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 8.27
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन

हे पृथानन्दन ! इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। अतः हे अर्जुन ! तू सब समयमें योगयुक्त हो जा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 28
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्

योगी इसको (शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको) जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ: "योगी इसको (शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको) जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 28?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 28 translates to: "Whatever fruit of merit is declared (in the scriptures) to accrue from (the study of) the Vedas, (the performance of) sacrifices, (the practice of) austerities, and gifts, beyond all this goes the Yogi, having known this; and he attains to the Supreme, Primeval (first or ancient) Abode. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 28 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। योगी इसको (शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको) जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva" mean in English?

"vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 28. Whatever fruit of merit is declared (in the scriptures) to accrue from (the study of) the Vedas, (the performance of) sacrifices, (the practice of) austerities, and gifts, beyond all this goes the Yogi, having known this; and he attains to the Supreme, Primeval (first or ancient) Abode. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.