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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 26
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः

क्योंकि शुक्ल और कृष्ण -- ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्-(प्राणिमात्र-) के साथ सम्बन्ध रखनेवाली मानी गई हैं। इनमेंसे एक गतिमें जानेवालेको लौटना नहीं पड़ता और दूसरी गतिमें जानेवालेको लौटना पड़ता है। — VaniSagar

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DogriIND

संसार दे उज्ज्वल ते न्हेरे रस्ते गी शाश्वत समझेआ जंदा ऐ; इक गी वापसी नेईं होने दी ओर लेई जंदा ऐ, ते दूआ वापस औने दी ओर लेई जंदा ऐ।

MaithiliIND

संसारक उज्ज्वल आ अन्हार बाट केँ शाश्वत मानल जाइत अछि; एकटा सँ कोनो वापसी नहि होइत छैक, आ दोसर घुरि क' जाइत छैक।

KonkaniIND

संवसारांतले उजवाड आनी काळे मार्ग शाश्वत अशें मानतात; एकल्यान परत येवपाक मेळना आनी दुसरो परतून येवपाक कारण जाता.

SindhiIND

دنيا جا روشن ۽ اونداهي رستا ابدي سمجهيا وڃن ٿا. هڪ واپسي ڏانهن نه وٺي ٿو، ۽ ٻيو واپسي ڏانهن وٺي ٿو.

BengaliIND

পৃথিবীর উজ্জ্বল ও অন্ধকার পথকে চিরন্তন বলে মনে করা হয়; একটি কোন প্রত্যাবর্তনের দিকে নিয়ে যায়, এবং অন্যটি প্রত্যাবর্তনের দিকে পরিচালিত করে।

ManipuriIND

ꯃꯥꯂꯦꯃꯒꯤ ꯃꯉꯥꯜ ꯅꯥꯏꯔꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯟꯙ꯭ꯔ ꯄ꯭ꯔꯗꯦꯁꯀꯤ ꯂꯝꯕꯤꯁꯤꯡ ꯑꯁꯤ ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ ꯂꯝꯕꯤꯅꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯈꯜꯂꯤ; ꯑꯃꯅꯥ ꯍꯜꯂꯀꯄꯗꯥ ꯂꯃꯖꯤꯡꯏ, ꯑꯗꯨꯒꯥ ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯍꯜꯂꯀꯄꯗꯥ ꯂꯃꯖꯤꯡꯏ꯫

BhojpuriIND

दुनिया के उज्ज्वल आ अन्हार रास्ता के शाश्वत मानल जाला; एक से कवनो वापसी ना होला आ दोसरका वापसी के ओर ले जाला.

AssameseIND

জগতৰ উজ্জ্বল আৰু অন্ধকাৰ পথবোৰ চিৰন্তন বুলি ভবা হয়; এটাই উভতি নাযায়, আৰু আনটোৱে ঘূৰি আহিবলৈ লৈ যায়।

MizoIND

Khawvel kawng eng leh thim tak takte hi chatuan daih nia ngaih a ni a; pakhat chuan kir leh lohnaah a hruai a, pakhat chuan kir lehna kawngah a hruai bawk.

GujaratiIND

વિશ્વના તેજસ્વી અને અંધકાર માર્ગો શાશ્વત હોવાનું માનવામાં આવે છે; એક કોઈ વળતર તરફ દોરી જાય છે, અને બીજું વળતર તરફ દોરી જાય છે.

TamilIND

உலகின் பிரகாசமான மற்றும் இருண்ட பாதைகள் நித்தியமானவை என்று கருதப்படுகிறது; ஒன்று திரும்பாததற்கு வழிவகுக்கிறது, மற்றொன்று திரும்புவதற்கு வழிவகுக்கிறது.

TeluguIND

ప్రపంచంలోని ప్రకాశవంతమైన మరియు చీకటి మార్గాలు శాశ్వతమైనవిగా భావించబడతాయి; ఒకటి తిరిగి రాకుండా చేస్తుంది, మరియు మరొకటి తిరిగి రావడానికి దారితీస్తుంది.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते'--शुक्ल और कृष्ण--इन दोनों मार्गोंका सम्बन्ध जगत्के सभी चर-अचर प्राणियोंके साथ है। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगतिके साथ मनुष्यका तो साक्षात् सम्बन्ध है और चर-अचर प्राणियोंका परम्परासे सम्बन्ध है। कारण कि चर-अचर प्राणी क्रमसे अथवा भगवत्कृपासे कभी-न-कभी मनुष्य-जन्ममें आते ही हैं और मनुष्यजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार ही ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति होती है। अब वे ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करें अथवा न करें, पर उन सबका सम्बन्ध ऊर्ध्वगति अर्थात् शुक्ल और कृष्ण-गतिके साथ है ही।जबतक मनुष्योंके भीतर असत् (विनाशी) वस्तुओंका आदर है, कामना है, तबतक वे कितनी ही ऊँची भोग-भूमियोंमें क्यों न चले जायँ, पर असत् वस्तुका महत्त्व रहनेसे उनकी कभी भी अधोगति हो सकती है। इसी तरह परमात्माके अंश होनेसे उनकी कभी भी ऊर्ध्वगति हो सकती है। इसलिये साधकको हरदम सजग रहना चाहिये और अपने अन्तःकरणमें विनाशी वस्तुओंको महत्त्व नहीं देना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मप्राप्तिके लिये किसी भी लोकमें, योनिमें कोई बाधा नहीं है। इसका कारण यह है कि परमात्माके साथ किसी भी प्राणीका कभी सम्बन्ध-विच्छेद होता ही नहीं। अतः न जाने कब और किस योनिमें वह परमात्माकी तरफ चल दे-- इस दृष्टिसे साधकको किसी भी प्राणीको घृणाकी दृष्टिसे देखनेका अधिकार नहीं है।चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने 'योग' को अव्यय कहा है। जैसे योग अव्यय है, ऐसे ही ये शुक्ल और कृष्ण -- दोनों गतियाँ भी अव्यय, शाश्वत हैं अर्थात् ये दोनों गतियाँ निरन्तर रहनेवाली हैं, अनादिकालसे हैं और जगत्के लिये अनन्तकालतक चलती रहेंगी।

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Sri Harikrishnadas Goenka

शुक्ल और कृष्ण -- ये दो मार्ग अर्थात् जिसमें ज्ञानका प्रकाश है -- वह शुक्ल और जिसमें उसका अभाव है वह कृष्ण -- ऐसे ये दोनों मार्ग जगत्के लिये नित्य -- सदासे माने गये हैं क्योंकि जगत् नित्य है। यहाँ जगत्शब्दसे जो ज्ञानी और कर्मी उपर्युक्त गतिके अधिकारी हैं उन्हींको समझना चाहिये क्योंकि सारे संसारके लिये यह गति सम्भव नहीं है। उन दोनों मार्गोंमेंसे एक -- शुक्लमार्गसे गया हुआ तो फिर लौटता नहीं है और दूसरे मार्गसे गया हुआ लौट आता है।

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Sri Anandgiri

आरोहावरोहयोरभ्यासवाचिना पुनःशब्देन संसारस्यानादित्वं सूच्यते। रात्र्यादौ मृतानां ब्रह्मविदामब्रह्मप्राप्तिशङ्कानिवृत्त्यर्थमभिमानिदेवताग्रहणाय मार्गयोर्नित्यत्वमाह -- शुक्लेति।,ज्ञानप्रकाशकत्वाद्विद्याप्राप्यत्वादर्चिरादिप्रकाशोपलक्षितत्वाच्च शुक्ला देवयानाख्या गतिस्तदभावाज्ज्ञानप्रकाशकत्वाभावाद्धूमाद्यप्रकाशोपलक्षितत्वादविद्याप्राप्यत्वाच्च कृष्णा पितृयाणलक्षणा गतिस्तयोर्गत्योः श्रुतिस्मृतिप्रसिद्ध्यर्थो हिशब्दः। जगच्छब्दस्य ज्ञानकर्माधिकृतविषयत्वेन संकोचे हेतुमाह -- न जगत इति। अन्यथा ज्ञानकर्मोपदेशानर्थक्यादित्यर्थः। तयोर्नित्यत्वे हेतुमाह -- संसारस्येति। मार्गयोर्यावत्संसारभावित्वे फलितमाह -- तत्रेति। क्रममुक्तिरनावृत्तिः। भूयो भोक्तव्यकर्मक्षये शेषकर्मवशादित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

शुक्ला ज्ञानप्रकाशहेतुत्वात्तदभावात्कृष्णा। एते शुक्लकृष्णे गती मार्गो जगतः उपासनायां कर्मणि चाधिकृतस्य,शाश्वते नित्ये अनादिरुपे मते अभिप्रेते संसारस्यानादित्वात्। तत्रैकया शुक्लया गत्या अनावृत्तिं याति अन्यया कृष्णया गत्या पुनर्भूयः आवर्तते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhuklabright
kṛiṣhṇedark
gatīpaths
hicertainly
etethese
jagataḥof the material world
śhāśhvateeternal
mateopinion
ekayāby one
yātigoes
anāvṛittimto non return
anyayāby the other
āvartatecomes back
punaḥagain
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Bhagavad Gita · 8.25
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते

जिस मार्गमें धूमका अधिपति देवता, रात्रिका अधिपति देवता, कृष्णपक्षका अधिपति देवता और छः महीनोंवाले दक्षिणायनका अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर उस मार्गसे गया हुआ योगी (सकाम मनुष्य) चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर लौट आता है अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.27
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन

हे पृथानन्दन ! इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। अतः हे अर्जुन ! तू सब समयमें योगयुक्त हो जा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 26
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः

क्योंकि शुक्ल और कृष्ण -- ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्-(प्राणिमात्र-) के साथ सम्बन्ध रखनेवाली मानी गई हैं। इनमेंसे एक गतिमें जानेवालेको लौटना नहीं पड़ता और दूसरी गतिमें जानेवालेको लौटना पड़ता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "क्योंकि शुक्ल और कृष्ण -- ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्-(प्राणिमात्र-) के साथ सम्बन्ध रखनेवाली मानी गई हैं। इनमेंसे एक गतिमें जानेवालेको लौटना नहीं पड़ता और दूसरी गतिमें जानेवालेको लौटना पड़ता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 26 translates to: "The bright and dark paths of the world are thought to be eternal; one leads to no return, and the other leads to return. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। क्योंकि शुक्ल और कृष्ण -- ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्-(प्राणिमात्र-) के साथ सम्बन्ध रखनेवाली मानी गई हैं। इनमेंसे एक गतिमें जानेवालेको लौटना नहीं पड़ता और दूसरी गतिमें जानेवालेको लौटना पड़ता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhukla-kṛiṣhṇe gatī hyete jagataḥ śhāśhvate mate" mean in English?

"śhukla-kṛiṣhṇe gatī hyete jagataḥ śhāśhvate mate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 26. The bright and dark paths of the world are thought to be eternal; one leads to no return, and the other leads to return. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.