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Bhagavad Gita · BG 8.24

Bhagavad Gita 8.24 — Commentary

19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः

agnir jyotir ahaḥ śhuklaḥ ṣhaṇ-māsā uttarāyaṇam tatra prayātā gachchhanti brahma brahma-vido janāḥ

"Fire, light, daytime, the bright fortnight, the six months of the northern path of the sun (the northern solstice) departing, then men who know Brahman go to Brahman."

Scholar Commentaries (19)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

अग्निः कालाभिमानिनी देवता। तथा ज्योतिरपि देवतैव कालाभिमानिनी। अथवा अग्निज्योतिषी यथा श्रुते एव देवते। भूयसा तु निर्देशो यत्र काले (गीता 8।23) तं कालम् (गीता 8।23) इति आम्रवणवत्। तथा अहः देवता अहरभिमानिनी अहः शुक्लः शुक्लपक्षदेवता षण्मासा उत्तरायणम् तत्रापि देवतैव मार्गभूता इति स्थितः अन्यत्र अयं न्यायः। तत्र तस्मिन् मार्गे प्रयाताः मृताः गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो ब्रह्मोपासकाः ब्रह्मोपासनपरा जनाः। क्रमेण इति वाक्यशेषः। न हि सद्योमुक्तिभाजां सम्यग्दर्शननिष्ठानां गतिः आगतिर्वा क्वचित् अस्ति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इति श्रुतेः। ब्रह्मसंलीनप्राणा एव ते ब्रह्ममया ब्रह्मभूता एव ते।

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

अग्निः ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् इति संवत्सरादीनां प्रदर्शनम्।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

ज्योतिरर्चिः। तेऽर्चिषमभिसम्भवन्ति [बृ.उ.6।2।15] इति हि श्रुतिः। तथा च नारदीये -- अग्निं प्राप्य ततश्चार्चिस्ततश्चाप्यहरादिकम् इति। अभिमानिदेवताश्चाग्न्यादयः। कथमन्यथाअह्न आपूर्यमाणपक्षं [छा.उ.5।1।1] इति युज्यते।दिवादेदेवताभिस्तु पूजितो ब्रह्म याति हि इति ब्राह्मे। मासाभिमानिभ्यो अयनाभिमानी च पृथक्। तच्चोक्तं गारुडे -- पूजितस्त्वयनेनासौ मासाः परिवृतेन हि इति। अहरभिजिता शुक्लं पौर्णमास्यायनं विषुवा सह तच्चोक्तं ब्रह्मवैवर्ते -- साह्ना मध्यन्दिनेनाथ शुक्लेन च सपूर्णिमा। सविष्वा चायनेनासौ पूजितः केशवं व्रजेत्। इति।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

इस श्लोक में क्रममुक्ति के मार्ग को दर्शाया गया है। वेदप्रतिपादित कर्म एवं उपासना के समुच्चय अर्थात् दोनों का साथसाथ अनुष्ठान करने वाले साधक और उसी प्रकार जिन लोगों को वर्तमान जीवन में ही ब्रह्म का साक्षात् अनुभव न हुआ हो ऐसे ब्रह्म के उपासक इस क्रममुक्ति के अधिकारी होते हैं। उपनिषदों के अनुसार ये साधक जन देह त्याग के पश्चात् देवयान (देवताओं के मार्ग) के द्वारा ब्रह्मलोक अर्थात् सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के लोक में प्रवेश करते हैं। वहाँ कल्प की समाप्ति तक दिव्य अलौकिक विषयों के आनन्द का अनुभव करके प्रलय के समय ब्रह्माजी के साथ वे सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। उपनिषदों में प्रयुक्त शब्दों का उपयोग कर भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ देवयान को इंगित करते हैं। ऋषि प्रतिपादित तत्त्व ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिये अध्यात्म दृष्टि से यह श्लोक विशेष अर्थपूर्ण है।अग्नि ज्योति दिन शुक्लपक्ष उत्तरायण के षण्मास ये सब सूर्य के द्वारा अधिष्ठित देवयान को सूचित करते हैं। प्रश्नोपनिषद् में परम सत्य की सृष्टि से उत्पत्ति का वर्णन करते हुए इन मार्गों को स्पष्ट रूप से बताया गया है। वहाँ गुरु बताते हैं कि सृष्टिकर्ता प्रजापति स्वयं सूर्य और चन्द्र बन गये। आकाश में दृश्यमान सूर्य और चन्द्र क्रमशः चेतन और जड़ तत्त्व के प्रतीक स्वरूप हैं।चेतन तत्त्व के साथ तादात्म्य स्थापित करके जो सत्य का उपासक अपना जीवन जीता है वह मरण के समय भी जीवन पर्यन्त की गई उपासना के उपास्य (ध्येय) का ही चिन्तन और स्मरण करता है स्वाभाविक है कि ऐसा उपासक अपने उपास्य के लोक को प्राप्त होगा क्योंकि वृत्ति के अनुरूप व्यक्ति बनता है। सम्पूर्ण जीवन काल में रचनात्मक दैवी एवं विकासशील विचारों का ही चिन्तन करते रहने पर मनुष्य निश्चित ही वर्तमान शरीर का त्याग करने पर विकास के मार्ग पर ही अग्रसर होगा। इस मार्ग को अग्नि ज्योति दिन आदि शब्दों से लक्षित किया गया है। इस प्रकार उपनिषदों की अपनी विशिष्ट भाषा में ब्रह्म के उपासकों की मुक्ति का मार्ग उत्तरायण कहलाता है। क्रममुक्ति को बताने के लिए ऋषियों द्वारा प्रायः प्रयोग किये जाने वाले इस शब्द उत्तरायण में उपर्युक्त सभी अभिप्राय समाविष्ट हैं।इस मार्ग के विपरीत वह मार्ग जिसे प्राप्त करने पर पुनः संसार को लौटना पड़ता है उसका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं --

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

8.24 अग्निः fire? ज्योतिः light? अहः day? शुक्लः the bright fortnight? षण्मासाः six months? उत्तरायणम् the northern path of the sun? तत्र there? प्रयाताः departed? गच्छन्ति go? ब्रह्म to Brahman? ब्रह्मविदः knowers of Brahman? जनाः people.Commentary This is the UttaraMarga or Devayana? the northern path or the path of light? by which the Yogis go to Brahman. This path leads to salvation. It takes the devotee to Brahmaloka. The six months of the northern solstice is from the middle of January to the middle of July. It is regarded as the better period for death. There is a vivid description in the Chhandogya Upanishad? the Kaushitaki Upanishad and the Brahma Sutras? chapter IV.3 and 4? ii. 18 and 21.On the road beginning with light (the departed soul proceeds)? on account of that being widely known.Having reached the path of the gods he comes to the world of Agni (fire)? to the world of Vayu (air)? to the world of Varuna (rain)? to the world of Indra (king of the gods)? to the world of Prajapati (the Creator)? to the world of Brahman.They go to the light? from the light to day? from day to the waxing half of the moon? from the waxing half of the moon to the six months when the sun goes to the north? from those months to the year? from the year to the sun.When the person goes away from this world he comes to Vayu (air). Then Vayu room for him like the hole of a wheel and through it he mounts higher. He comes to the sun.From the moon to the lightning there a person that is not human leads him to Brahman.Time is here used in the sense of the path or the stage on the path. Fire and light are the deities who preside over time. Daytime is the deity who presides over the day. The bright fortnight is the deity presiding over it. The six months of the northern solstice are the deity who presides over the northern path.This is the path of illumination that leads to liberation.The lifreaths of the liberated sages who have attained knowledge of the Self do not depart. They are absorbed in Brahman. The Jivanmuktas who attain KaivalyaMoksha or immediate,salvation or liberation have no place to go to or return from. They become one with the allpervading Brahman.Each step may mean a plane or a state of consciousness or the degree of purity or illumination. The more the purity the more the divine light. There are bright objects throughout the course of the path. There is illumination or knowledge when one passes along this path. Hence it is called the path of light.After Bhishma was mortally wounded? he lay on the bed of arrows till the onset of the northern solstice and then departed from here to the Abode of the Lord.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या--'अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्'--इस भूमण्डलपर शुक्लमार्गमें सबसे पहले अग्निदेवताका अधिकार रहता है। अग्नि रात्रिमें प्रकाश करती है, दिनमें नहीं; क्योंकि दिनके प्रकाशकी अपेक्षा अग्निका प्रकाश सीमित है। अतः अग्निका प्रकाश थोड़ी दूरतक (थोड़े देशमें) तथा थोड़े समयतक रहता है; और दिनका प्रकाश बहुत दूरतक तथा बहुत समयतक रहता है।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

यहाँ अग्नि कालाभिमानी देवताका वाचक है तथा ज्योति भी कालाभिमानी देवताका ही वाचक है अथवा अग्नि और ज्योति नामवाले दोनों प्रसिद्ध वैदिक देवता ही हैं। जिस वनमें आमके पेड़ अधिक होते हैं उसको जैसे आमका वन कहते हैं उसी प्रकार यहाँ कालाभिमानी देवताओंका वर्णन अधिक होनेसे यत्र काले तं कालम् इत्यादि कालवाचक शब्दोंका प्रयोग किया गया है। ( अभिप्राय यह कि जिस मार्गमें अग्निदेवता ज्योतिदेवता ) दिनका देवता शुक्लपक्षका देवता और उत्तरायणके छः महीनोंका देवता है उस मार्गमें ( अर्थात् उपर्युक्त देवताओंके अधिकारमें ) मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता यानी ब्रह्मकी उपासनामें तत्पर हुए पुरुष क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यहाँ उत्तरायण मार्ग भी देवताका ही वाचक हैं क्योंकि अन्यत्र ( ब्रह्मसूत्रमें ) भी यही न्याय माना गया है। जो पूर्ण ज्ञाननिष्ठ सद्योमुक्ितके पात्र होते हैं उनका आनाजाना कहीं नहीं होता श्रुति भी कहती है उसके प्राण निकलकर कहीं नहीं जाते। वे तो ब्रह्मसंलीनप्राण अर्थात् ब्रह्ममय -- ब्रह्मरूप ही हैं।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

यथोपक्रमं व्याख्याय यथाश्रुतं व्याख्याति -- अथवेति। कथं तर्हि देवतानामतिनेत्रीणां ग्रहणे कालप्राधान्येन निर्देशः श्लिष्यते तत्राह -- भूयसां त्विति। मार्गद्वयेऽपि कालाद्यभिमानिन्यो देवताः कालशब्देनोच्यन्ते। कालाभिमानिनीनां भूयस्त्वात्कालशब्देन सर्वासां देवतानामुपलक्षणत्वं विवक्षित्वा कालकथनमित्यर्थः। यथाम्राणां भूयस्त्वाद्विद्यमानेष्वपि द्रुमान्तरेषु आम्रैरेव वनं निर्दिश्यते तद्वदित्युदाहरणमाह -- आम्रेति। ननु मार्गचिह्नानां भोगभूमीनां वा तत्तच्छब्दैरुपादानसंभवे किमिति देवताग्रहणमित्याशङ्क्यातिवाहिकास्तल्लिङ्गादिति न्यायेनोत्तरमाह -- इति स्थित इति। तेषामग्न्यादीनां समीपमिति सामीप्ये तत्रेति सप्तमी। ब्रह्म कार्योपाधिकं परं वा ब्रह्म परंपरया मुक्त्यालम्बनम्। अतएव क्रमेणेत्युक्तम्। निर्गुणमप्रपञ्चं ब्रह्मास्मीति विद्यावतो व्यवच्छिनत्ति -- ब्रह्मोपासनेति। ननु ब्रह्मशब्दस्य मुख्यार्थत्वार्थं परब्रह्मविदामेवेयं गतिरुच्यते न बादर्यधिकरणविरोधादित्याह -- नहीति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

तं कालं वक्ष्यामीति प्रतिज्ञानुरोधेनाग्निः कालाभिमानिनी देवता एवं ज्योतिरपि कालाभिमानिनी देवतैव। अथवाग्निरदेवता ज्योतिर्ज्योतिर्देवतेति यथाश्रुते एव देवते। ननु यत्र काले तं कालं वक्ष्यामीति कथं युज्यते इति चेत् कालाभिमानिनीनां देवतानां मार्गद्वेयेऽपि भूयसां वक्तव्यत्वेन कालशब्देन सर्वासां देवतानामुपलक्ष्यत्वं विवक्षित्वा तथा निर्देशः। यथाऽन्येषां गन्तृ़णां सत्वेऽपि छत्रिणां भूयस्त्वे छत्रिणो यान्तीति निर्देशः। यथावा वृक्षान्तराणां सत्वेऽप्याम्राणां भूयस्त्वादम्रैरेव वनमिति निर्दिश्यते तद्वत्। एतेन कालाभिमानिदेवतापलक्षितं मार्गै वक्ष्यामि। कालशब्दस्य मुख्यार्थत्वेऽग्निज्योतिर्धूमशब्दानामनुपपत्तिः गतिसृतिशब्दयोश्चेति प्रत्युक्तम्। यतोऽत्र किं यस्मिन्मार्गे जनाः सुखेन गच्छन्ति तं मार्गे वक्ष्यामीति प्रतिज्ञाय यथा कश्चिदुपदिशति आदौ गिरिस्ततो न्यग्राधस्ततो नदीति तथा मार्गोपदेश उत यत्र सुखेन नगरं ग्रामं वा गच्छन्ति तं वक्ष्यामीति प्रतिज्ञाय कश्चिदुपदिशति आदौ वृषयानं ततोऽश्वयानं ततो नरयानं ततः पादयानमिति तद्वन्। आद्येआतिवाहाकास्तलिङ्गात्इत्यधिकरणविरोधः। द्वितीये उक्तरीत्याग्न्यादिशब्दानां सम्यगुपपत्त्या लक्षणावैयर्थ्य श्रुतावतिवाहिका इतिन्यायेनार्चिरादीनामतिवाहिकत्वस्थापनादप्यग्न्यादीनामतिवाहिकत्वेन ग्राह्यत्वावश्यकत्वेन तं कालं वक्ष्यामीति प्रतिज्ञावक्येऽपि कालाभिमानिन्यो देवता वक्ष्यामीत्यर्थस्यैव सभ्यवत्वं च। यथागमनाधिकरणए पृथिवीप्रदेशेऽस्मिन्मार्गे एते गच्छन्तीति व्यवहारस्तथा योगगमनाधिकारणरुपासु कालाभिमानिनीष्वग्नयादिषु देवतासु इति न वक्ष्यमाणगतिसृतिश्बदयोरनुपपत्तिः। यद्वा भाष्येऽपि कालशब्देन कालाभिमानिदेवतोपलक्षितं मार्गे वक्ष्यामीति व्याख्याय यथाकथंचिदविरोधः संपाद्यः। एतच्चान्यासामपि श्रुत्युक्तानां देवतानामुपलक्षणार्थम्। तथाच श्रुतिःतेऽर्चषमभिसंभवन्त्यर्चिषोहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षात् यान् षडुदङ्डेति मासांस्तान्मासेभ्यः संवात्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एतान्ब्रह्म गमयत्येष ब्रह्मपथो देवपथ इमं मानवमावर्ते नावर्तन्ते इति। अत्र श्रुतावपि श्रुत्यन्तरानुसारेण संवत्सरोद्दवलोकं देवलोकाद्वायुं वायोरादित्यमिति विद्युतोऽनन्तरं च विद्युतो वरुणं वरुणाद्विन्द्रमिन्द्रात्प्रजापतिमिति बोध्यम्। तत्र तस्मिन्देवयाने प्रयाता मृता ब्रह्मविदः क्रमेण ब्रह्म गच्छन्ति। ब्रह्मविद इति ब्रह्मपासका ग्राह्या नतु सभ्यग्दर्शननिष्ठाः सद्योमुक्तिभाजः।न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इत्यादिश्रुत्या तेषां गतिमागतिं च प्रतिषिध्य ब्रह्मसंलीनप्राणात्वब्रह्मभूतत्वप्रतिपादनात्। तथाच भगवतो व्यावस्य सूत्रम्कार्य वादरिरस्य गत्युपपत्तेः इत। स एतान्ब्रह्म गमयतीत्यत्र विचकित्स्यते किं कार्यमपरं ब्रह्म गमयति आहोस्वित्परमेवाऽविकृतं मुख्यं ब्रह्मेति। कुतः संशयः। ब्रह्मशब्दप्रयोगात् गतिश्रुतेश्च। तत्र कार्यमेव सगुणमपरं ब्रह्म नयत्येतानमानवः पुरुष इति बादरिराचार्यो मन्यते। कुतः गत्युपपत्तेरस्य हि कार्यस्य ब्रह्मणोन्तव्यत्वमुपपद्यते प्रदेशवत्त्वात् नतु परस्मिन्ब्रह्मणि गन्तृत्वं गन्तव्यत्वं गतिर्वावकल्पते सर्वगत्वात् प्रत्यगात्मत्वाच्च गन्तृ़णामिति।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

तत्रोपासकानां देवयानं पन्थानमाह -- अग्निरिति। अग्निर्ज्योतिरित्यर्चिरभिमानिनी देवता लक्ष्यते। एवमहरित्यहरभिमानिनी। एवं शुक्लपक्षस्य षष्ठमाससंमितोत्तरायणस्य चाभिमानिन्यौ देवते एव। एतच्चान्यासामप्युपलक्षणम्। तत्र प्रयाता उत्क्रान्ता ब्रह्मकार्यं ब्रह्मतद्वारा परं च गच्छन्ति। ब्रह्मविदो ब्रह्मोपासका जनाः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

तत्रानावृत्तिमार्गमाह -- अग्निरिति। अग्निज्योतिःशब्दाभ्यांतेऽर्चिषमभिसंभवन्ति इति श्रुत्युक्तार्चिरभिमानिनी देवतोपलक्ष्यते। अहरिति दिवसाभिमानिनी। शुक्ल इति शुक्लपक्षाभिमानिनी। उत्तरायणरूपाः षण्मासा इत्युत्तरायणाभिमानिनी। एतच्चान्यासामपि श्रुत्युक्तानां संवत्सरदेवलोकादिदेवतानामुपलक्षणार्थम्। एवंभूतो यो मार्गस्तत्र प्रयाता गता भगवदुपासका जनाः ब्रह्म प्राप्नुवन्ति। यतस्ते ब्रह्मविदः। तथाच श्रुतिःतेऽर्चिषमभिसंभवन्ति अर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकम् इति। नहि सद्योमुक्तिभाजां सम्यग्दर्शननिष्ठानां गतिर्वा क्वचिदस्तिन तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इति श्रुतेः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

।। 8.24 यत्र काले तु इत्यादेःयोगयुक्तो भवार्जुन [8।27] इत्यन्तस्य तात्पर्यमाह -- अथेति। अत्र धूमादिमार्गकथनं हेयत्वार्थम् अर्चिरादिमार्गोपदेशस्तु तदनुसन्धानार्थ एवेति तत्रैव तात्पर्यमिति भावः। ननु परमपुरुषार्थनिष्ठस्यैव ह्यर्चिरादिगतिः तत्कथमत्र साधारण्यमुच्यते इत्यत्राह -- द्वयोरपीति। आत्मनिष्ठस्याप्यपुनरावृत्तेः पूर्वोक्तत्वात्तस्याप्यर्चिरादिकैव गतिरिति दर्शयितुमाह -- सा चेति। साधारण्यापुनरावृत्त्योः श्रुतिमेव दर्शयति -- यथेति। अङ्गिफलमेवाङ्गेऽपि व्यपदिश्यत इत्याशङ्क्य परिहरति -- नचेति। हेतुमाह -- ये चेति। यद्यप्यङ्गिफलमेवाङ्गेऽपि निर्देष्टुं युक्तम् तथाप्यङ्गिना सहाङ्गस्य तुल्यवत्पृथङ्निर्दिष्टस्य तत्फलनिर्देशो न युक्त इति भावः। एतेन प्रथमषट्कोदितप्रत्यगात्मवेदनादत्रत्याक्षरयाथात्म्यानुसन्धानस्य भेदोऽपि दर्शितः।तद्य इत्थं विदुः इत्यस्य प्रत्यगात्मनिष्ठविषयत्वं कथं इत्यत्राह -- पञ्चाग्निविद्यायां चेति। आपः पुरुषवचसो भवन्ति [छां.उ.5।9।14] इति त्रिवृत्कृतानामभिधीयमानत्वाद्भूतान्तरसंसर्गसिद्धिः।अपामेवेत्यात्मस्वरूपपरिणामव्युदासायोक्तम्। एवंविधशरीरसम्बन्धमात्रस्याप्यौपाधिकत्वप्रदर्शनायाहपुण्यपापहेतुक इति। रमणीयचरणा रमणीयां योनिं ৷৷. कपूयचरणाः कपूयां योनिम् इत्यादिवचनान्न केवलाचिद्विषयमिदं प्रकरणम्। तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते इत्युक्तयद्वृत्तद्वयस्य तेऽर्चिषम् इत्येकेन तद्वृत्तेन प्रतिनिर्देशादुभयोर्गतिरविशिष्टेति ज्ञापनाय तद्य इत्थं विदुः तेऽर्चिषम् इति व्यवहितमुपात्तम्। इत्थंशब्दानूदितं प्रस्तुताकारविशेषं दर्शयति -- विविक्ते इति। ननुतत्पुरुषोऽमानवः स एनान् ब्रह्म गमयति [छां.उ.4।15।6] इत्यर्चिरादिना गतस्य ब्रह्मप्राप्तिः श्रूयते तत्कथं केवलात्मोपासकस्य ब्रह्मप्रापकार्चिरादिगतिप्राप्तिः इत्यत्राह -- आत्मयाथात्म्येति। अयं पञ्चाग्निविद्यानिष्ठो न केवलात्मोपासकः अपितु ब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धायीति भावः। अन्यथा तत्क्रतुन्यायविरोध इत्यभिप्रायेणाह -- तत्क्रतुन्यायाच्चेति। चकार इतरेतरयोगे। यथावस्थितात्मानुसन्धानस्य परशेषतैकरसत्वानुसन्धानरूपत्वे प्रमाणमाह -- य आत्मनीति। आदिशब्देन पतिं विश्वस्य [तै.ना.6।11।3] करणाधिपाधिपः [श्वे.उ.6।9] इत्यादिवाक्यशतं गृह्यते। अत्र शारीरकभाष्यादिविरोधो मन्दैराशङ्कितः इह तावच्छ्रुतिसूत्रभाष्यादिष्वन्यत्र च पञ्चाग्निविदः परमात्मात्मकस्वात्मानुसन्धातृत्वमर्चिरादिगतिश्चाविशेषेणोच्यते। तस्याश्च ब्रह्मगमयितृत्वस्य श्रुत्यादिष्विह चतत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः इति सिद्धत्वात् पञ्चाग्निविदोऽपि परमात्मप्राप्तिरस्त्येवेति स्वीकर्तव्यम्। तत्र प्राप्तौ ज्ञानिनां परमात्मात्मकस्वात्मानुसन्धानस्य स्वविशिष्टो भोग्यः अक्षरयाथात्म्यनिष्ठानां तु स्वस्वरूपमेव पूर्वं भोग्यम् वस्वादिपदप्राप्तिपूर्वकब्रह्मप्राप्तिसाधनमधुविद्यादिन्यायादन्ततो ब्रह्मप्राप्तिः ईदृशपर्वक्रमप्रतिनियमश्च प्राचीनापेक्षाभेदात् स च प्राचीनकर्मविशेषात्चतुर्विधा भजन्ते माम् [7।16] इति प्रागेव दर्शितः।न चात्र जिज्ञासोरन्य एवात्मयाथात्म्यविदिति भाष्यते जिज्ञासुवेद्यतयोक्तस्वभावविसर्गयोरत्र च पञ्चाग्निविद्योदाहरणात् मध्ये च कैवल्यार्थिन एव मूर्धन्यनाड्या निष्क्रमणमनावृत्तिश्चोक्ता आत्मयाथात्म्याक्षरयाथात्म्यशब्दयोश्चात्र न भिन्नार्थत्वम् तस्योपासने किञ्चिदस्ति विशेषः अक्षरयाथात्म्यविदः -- परमात्मशरीरभूतस्वात्मोपासकाः ज्ञानिनस्तु स्वात्मशरीरकपरमात्मोपासका इत्ययमेव विशेषः तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये [छां.उ.5।10।1] इति विभागनिर्देशाभिप्रेत इति भाष्यादिषूक्तः। सारे तुउभयेऽपि हि परिपूर्णं ब्रह्मोपासते मुखभेदेन स्वात्मशरीरकं ब्रह्म केचन ब्रह्मात्मकस्वात्मानमितरे [वे.सा.4।3।14] इति। अत एव सप्तमे प्रक्रान्तो जिज्ञासुः परमात्मप्राप्तिकामज्ञानिव्यतिरिक्तत्वात् अब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धायीति न भ्रमितव्यम्। तस्य चोदारकोटिमात्रे निवेशः स्वात्मानुभवविलम्बिविमुखज्ञानिव्यतिरेकात्।अर्चिरादिगतिनिषेधस्तु ब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धानरहितस्वात्मोपासनविषयः। इदमपि भाष्यादिषु व्यक्तमेवोक्तंतस्मादचिन्मिश्रं केवलं वा चिद्वस्तु ब्रह्मदृष्ट्या तद्वियोगेन च य उपासते न तान्नयति अपितु परं ब्रह्मोपासीनान् आत्मानं च प्रकृतिवियुक्तं ब्रह्मात्मकमुपासीनानातिवाहिको गुणो नयति [ब्र.सू.भा.4।3।15] इत्यादिभिः। यत्पुनरुच्यते ये तु शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः। सर्वे च्यवनधर्माणः प्रतिबुद्धस्तु मोक्षभाक् [म.भा.12।341।35] इति तत्रापि आत्ममात्रानुभवसुखस्य स्थिरत्वादेव च्यवनधर्मत्वमुच्यते न तावता पुनः संसारप्रसङ्गःइन्द्रलोकात्परिभ्रष्टो मम लोकपरायणः। प्रमुक्तः सर्वसंसारैर्मम लोकं च गच्छति [वा.पु.139।98] प्रच्युतो वा एषोऽस्माल्लोकादसतो देवलोकम् [यजुः6।1।1।5] इत्यादिष्विवोत्तरोत्तरातिशयितपदप्राप्तावपि पूर्वपदभ्रंशमात्राच्च्यवनधर्मत्ववाचो युक्तेरविरोधात् परिमितसुखानुभवविलम्बनेन तदानीं निरतिशयसुखानुभवाद्भ्रष्टत्वेनापि निन्दोपपत्तेश्च। उपासनदशानुभूते परमात्मनि फलदशायां किञ्चित्कालमनुभवविच्छेदाद्वा प्राप्तभ्रंशलक्षणं च्यवनधर्मत्वम्।प्रतिबुद्धस्तु मोक्षभाक् [म.भा.12।341।35] इति चाव्यवहितमोक्षभाक्त्वं प्रतिबुद्धस्योच्यते न तावतान्यस्य मोक्षाभावःभुक्त्वा च भोगान्विपुलांस्त्वमन्ते मत्प्रसादतः। ममानुस्मरणं प्राप्य मम लोकमवाप्स्यसि [वि.पु.5।19।26] इतिवदविरोधात्।यथा च मुमुक्षोरेव कस्यचिन्मध्ये ब्रह्मकायनिषेवणसुखमुच्यते तथात्रापि स्थानविशेषे स्वात्मानुभवविलम्बः। यथा चअथवा नेच्छते तत्र ब्रह्मकायनिषेवणम्। उत्क्रामति च मार्गस्थः शीतीभूतो निरामयः इत्यादिना ब्रह्मकायनिषेवणसङ्गात् मुक्तस्य देवयानेन मार्गेण परमाकाशगमनमुच्यते तद्वदिहापि स्वात्मानुभवस्थानात्प्रच्युतस्य परमव्योमाधिरोहः स्यात् अर्चिरादिगतिश्चास्यावान्तरफलानुभवात्पश्चाद्वा गतिमध्ये वा। दक्षिणायनमृतस्य चन्द्रमसः सायुज्यवद्विश्रममात्ररूपोऽयमवान्तरफलानुभव इत्युभयधापि न विरोधः। एतेन पश्चादेवास्याप्रतीकालम्बनत्वमित्यपि निरस्तं मधुविद्यावदेव प्रथममपि तदुपपत्तेः। स्मरन्ति च स्वात्मानुभवस्थानं मुक्तिस्थानादर्वाचीनंयोगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम्। एकान्तिनः सदा ब्रह्मध्यायिनो योगिनो हि ये। तेषां तत्परमं स्थानं यद्वै पश्यन्ति सूरयः [वि.पु.1।6।38] इति। अमृतस्थानवर्तिनां च मुक्तत्वव्यपदेशो जरामरणादिविरहात्पुनर्जन्महेतुभूतपुण्यपापविगमाच्च।अस्ति च परित्यक्तस्थूलदेहानामपि तत्तदुपासनाविशेषाधीनमपवर्गादर्वाचीनं फलम्। तच्च प्रकृतिलयादिशब्देन साङ्ख्याः पठन्तिधर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद्भवत्यधर्मेण। ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्धः।।वैराग्यात्प्रकृतिलयः संसारो भवति राजसाद्रागात्। ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यासः।।[सां.स.का.44।45] इति।विपर्ययादिष्यते बन्धः इत्यत्र च वाचस्पतिना व्याख्यातं -- विपर्ययात् -- अतत्त्वंज्ञानात् इष्यते बन्धः स च त्रिविधः प्राकृतिको वैकृतिको दाक्षायणिकश्चेति। तत्र प्रकृतावात्मज्ञानाद्ये प्रकृतिमुपासते तेषां प्राकृतिको बन्धः। यः पुराणे प्रकृतिलयान् प्रकृत्योच्यते -- पूर्णं वर्षसहस्रं तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः इति। वैकारिको बन्धः तेषाम् ये विकारानेव भूतेन्द्रियाहङ्कारबुद्धीरुपासते पुरुषबुद्ध्या तान् प्रतीदमुच्यते यथा -- दश मन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः। भौतिकास्तु शतं पूर्णं सहस्रं त्वाभिमानिकाः।।बौद्धा दश सहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः। ते खल्वमी विदेहा येषां वैकृतिको बन्धः।। इति।एवमव्यक्तादितत्त्वचिन्तकानामिव प्रत्यगात्मतत्त्वचिन्तकानामपि तदुचितदेशकालं ततोऽनिश्चितमतिशयितं फलमुपपद्यते। अत एव भूमविद्यायां प्रत्यगात्ममात्रोपासकस्याप्यतिवादित्वमुक्तम्। ब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धाने तु ब्रह्मप्राप्तौ विश्रमादपुनरावृत्तिरिति विशेषः। अत एवाक्षरानुभवस्यान्तवत्त्वे तदर्थिनां कथमैश्वर्याधिकारणोऽधिकार्यन्तरत्वमित्यपि निरस्तम् बाह्यान्तरभोक्तव्यविभागादावृत्त्यनावृत्तियोग्यताभेदाच्च तद्भेदोपपत्तेः। विलम्बाक्षमाणां पुनरियं निष्ठा -- सर्वधर्मांश्च सन्त्यज्य सर्वलोकांश्च साक्षरान्। लोकविक्रान्तचरणौ शरणं तेऽव्रजं विभो।। इति।कैवल्यं भगवन्तं च मन्त्रोऽयं साधयिष्यति [बृ.हा.स्मृ.3।40] इत्यादिष्वपि कैवल्यशब्देनात्ममात्रानुभवसुखं तदपेक्षिभिः प्राप्यमुच्यते। एतच्चान्तरायकोटिनिविष्टत्वादादितः सावधाना ज्ञानिनः परिहरन्ति। केचित्तु ब्रह्मानुभववैमुख्येन नित्यमात्मानुभवसुखमिच्छन्ति न तत्र भाष्यकारादिसम्प्रदायं प्रमाणं युक्तिं वा पश्यामः निश्शेषकर्मक्षये स्वाभाविकरूपाविर्भावेन ब्रह्मानुभवावश्यम्भावात् कर्मशेषयोगे तु संसारप्रसङ्गाच्च जरामरणादिहेतुभूतसर्वकर्मविनाशादसंसारः तावन्मात्रेण च मुक्तत्वव्यपदेशः। ब्रह्मानुभवप्रतिबन्धककर्मणस्त्वविनाशात्तदुभयाभाव इति चेत् -- अस्त्वेवम् एतत्कर्म परस्तादपि न नङ्क्ष्यतीत्यत्र न नियामकमस्ति -- इत्येषा दिक्।। -- परप्राप्त्यादिरहितनित्यकैवल्यकल्पना। सूत्रभाष्यश्रुतिस्मृत्याद्य बाधेन न सिध्यति।अतोऽधिकारिभेदेन ह्यवस्थाभेदमाश्रिताः। अन्यामपि गतिं प्राञ्चः प्रतीचीं प्रत्यपादयन्।।तत्रावृत्तिपरप्राप्तिवैरूप्यादेरयोगतः। अस्मदुक्तं श्रुतिस्मृत्योरनपायं रसायनम्।।ननु -- अर्चिरादिगतिमाहेति कथमुच्यतेयत्र काले इति कालविशेषो ह्युपक्रम्यत इत्यत्राहअत्र कालशब्द इति। शारीरके दक्षिणायनादिमृतस्यापि मोक्ष उक्तः अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे [ब्र.सू.4।2।20] इति। अत्र चशुक्लकृष्णे गती ह्येते [8।26] इत्यनन्तरमेवोच्यते अन्यथाअग्निर्ज्योतिः इत्यादिना च विरुध्येतनैते सृती पार्थ जानन् [8।27] इति च मार्गवाचिना शब्देनोपसंह्रियत इति भावः।यत्र काले प्रयाता इति व्यवहितेन सम्बन्धं दर्शयन् योगिनामावृत्तिः कथमिति च शङ्कां परिहरन्यत्र काले इति श्लोकस्य वाक्यार्थमाह -- यस्मिन्निति। अत्र योगिनः ज्ञानिनः पुण्यकर्मसम्बन्धिनश्च।सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ [अष्टा.1।2।64]। यद्वा पुण्यकर्माण इत्यध्याहृतम्। तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्नआपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान् षडुदङ्ङेति मासांस्तान्मासेभ्यः संवत्सरम् [छां.उ.5।10।12] इत्यादिश्रुत्यनुसारेणोक्तंसंवत्सरादीनां प्रदर्शनमिति। एतद्वैशद्यमर्चिरादिपादे। तत्रैवं सङ्गृहीतं वरदगुरुभिःअर्चिरहस्िसतपक्षानुदगयनाब्दमरुदर्केन्दून्। अपि वैद्युतवरुणेन्द्रप्रजापतीनातिवाहिकानाहुः [त.सा.102] इति।अग्निर्ज्योतिः इति अग्निरूपज्योतिरित्यर्थः। तेन देवयानपथमपर्वस्थार्चिर्विवक्षा। अत एवाग्निज्योतिषोर्भिन्नदेवतात्वं कालाभिमानिदेवतात्वं च वदन्तः प्रत्युक्ताः।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

अग्निरिति। धूमेति। उत्तरेण ऊर्ध्वेन अयनं षाण्मासिकम्। तच्च प्रकाशादिधर्मकत्वात् दहनादिकैः शब्दैरुपचर्यते। अतो विपरीतं विपर्ययेण। तत्र चन्द्रमसो भोग्यांशानुप्रवेशात् भोगायावृत्तिः।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

ज्योतिश्शब्दस्यानेकार्थत्वाद्विवक्षितमर्थमाह -- ज्योतिरिति। अभिसम्भवन्ति प्राप्नुवन्ति। श्रुतिपुराणयोरह्नः प्रागर्चिषः प्राप्तेरुक्तेस्तत्समाख्यानादित्यर्थः। प्रातीतिक एवार्थः किं न स्यात् कुतोऽभिमानिदेवताग्रहणम् इत्यत आह -- अभिमानीति। आदिशब्दसमर्थनेन सह समुच्चयार्थश्चशब्दः। अन्यथा मरणकालपरिग्रहे इति श्रुतिः। उपलक्षणमेतत्अहः शुक्लः इति गीताऽपि। अहोरात्रव्यतिरिक्तपक्षाभावादिति भावः। समाख्यानाच्चैवमित्याह -- दिवादीति। किञ्चषण्मासा उत्तरायणम्षण्मासा दक्षिणायनम् [8।25] इत्येदपि अभिमानिदेवतां गमयति। मांसातिरिक्तायनाभावादभिमानिनां तु पृथक्त्वेन पृथगुक्तिसम्भवादिति भावेनाह -- मासेति। अनेन षण्मासा एवायनमिति व्याख्यानं च निरस्तं भवति पुराणविरोधात्। अत्रानुक्तमपि किञ्चिदध्याहरति -- अहरिति। सहस्थितं यातीत्यप्यत्र द्रष्टव्यमिति भावः। एतदप्यभिमानिदेवतापरिग्रहसमर्थनार्थम्। प्राधान्यादेरविवक्षितत्वात् साह्नेत्युक्तम्। सपूर्णिमासपूर्णिमेनसुपां सुलुक् [अष्टा.7।1।39] इत्यादेः। विषुशब्दस्योवङ्यणादेशविकल्पछान्दसः।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

तत्रोपासकानां देवयानं पन्थानमाह -- अग्निर्ज्योतिरित्यर्चिरभिमानिनी देवता लक्ष्यते। अहरित्यहरभिमानिनी। शुक्लपक्ष इत शुक्लपक्षाभिमानिनी। षण्मासा उत्तरायणमिति उत्तरायणरूपषण्मासाभिमानिनी देवतैव लक्ष्यते।आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् इति न्यायात्। एतच्चान्यासामपि श्रुत्युक्तानां देवतानामुपलक्षणार्थम्। तथाच श्रुतिःतेऽर्चिरभिसंभवन्त्यर्चिषोहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान्मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते इति। अत्र श्रुत्यन्तरानुसारात्संवत्सरानन्तरं देवलोकदेवता ततो वायुदेवता तत आदित्य इत्याकरे निर्णीतम्। एवं विद्युतोऽनन्तरं वरुणेन्द्रप्रजापतयस्तावता मार्गपरिपूर्तिः। तत्रार्चिरहःशुक्लपक्षोत्तरायणदेवता इहोक्ताः। संवत्सरो देवलोको वायुरादित्यश्चन्द्रमा विद्युद्वरुण इंन्द्रः प्रजापतिश्चेत्यनुक्ता अपि द्रष्टव्याः। तत्र देवयानमार्गे प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्मकार्योपाधिकंकार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः इति न्यायात्। निरुपाधिकं तु ब्रह्म तद्द्वारैव क्रममुक्तिफलत्वात्। ब्रह्मविदः सगुणब्रह्मोपासका जनाः अत्रएतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते इति श्रुताविममिति विशेषणात्कल्पान्तरे केचिदावर्तन्त इति प्रतीयते। अतएवात्र भगवतोदासितं श्रौतमार्गकथनेनैव व्याख्यानात्।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

तत्र पूर्वमनावृत्तिज्ञापककालस्वरूपमाह -- अग्निरिति। अग्निर्ज्योतिः। तापयुक्तज्योतिर्युक्तः अहः दिवसः। शुक्लः शुक्लपक्षः। षण्मासा उत्तरायणं प्राप्य भवन्ति। तत्र तस्मिन् काले प्रयाता ब्रह्मविदो जना भक्ताः। ब्रह्म भगवत्स्वरूपमनावृत्त्यात्मकं गच्छन्ति। अत्रायं भावः आयुर्भोगपूर्णतया कालवशेनोत्तरायणादिविशिष्टकालमृताः सर्व एव न तत् प्राप्नुवन्ति किन्तु भगवद्भक्ता भीष्मवत् तत्काल आगते भगवन्निष्ठैकतया ये प्राणांस्त्यक्त्वा यातास्ते प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। एतज्ज्ञापनायैव ब्रह्मविद इत्युक्तम्। एतदेव तज्ज्ञापकमित्यर्थः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

तत्रानावृत्तिमार्गमाह -- अग्निरिति। निष्कामानामग्निहोत्रिणां अग्निरित्यादिसंवत्सरदेवलोकाधिदेवतानामुपलक्षणार्थं निष्कामाग्निहोत्रगम्यतदीयज्योतिःकाले शुक्ले उत्तरायणे प्रयाता मृताः मार्गे वा तत्र प्रयाता ब्रह्माक्षरं भगवन्महिमभूतं क्रममुक्तिप्रकारेण गच्छन्ति। श्रीपुरुषोत्तमतत्त्वज्ञानिनस्तु तदा सद्योमुक्तिप्रकारेण प्रयाता भगवन्तमुपासीना भवन्तीति द्वितीयस्कन्धे निरूप्यतेयादृशी भावना यस्य तादृशं तस्य तत्फलम्। हरिरेकाक्षरतया भावुकानामिदं फलम्। हरिं रसात्मकतया भावुकानां परं फलम्। तल्लीलामध्यपातित्वं तत्समीपनिवासतः। एते तु ब्रह्म तदक्षरं प्राप्नुवंति तथा च श्रुतौ तेऽर्चिषमभिसंविशन्ति। अर्चिषोऽहरहरापूर्यमाणपक्षं आपूर्यमाणपक्षवान् षण्मासानुदगादित्यं प्रैति मासेभ्यो देवलोकं इत्यादि।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

8.24 Agnih, fire-is a deity presiding over a period of time; similarly, jyotih, light-also is a deity presiding over a period of time. Or fire and light are the well-known Vedic deities. As the expression 'mango grove' is used with regard to a place where mango trees are more numerous, similarly, the expressions 'at which time' and 'that time' (in the earlier verse) are used in view of the predominance (of the deities presiding over time). [If the first two (fire and light) are taken as Vedic deities, then the remaining three are the only deities of time. Still, the latter being numerically greater, all the five deities are referred to as deities of time. The deities of both the Paths-of gods and manes, or of the Northern and the Southern Paths as they are called-who are gods of time, are referred to here as 'time' by such words as day, fortnight, six months, etc.] So also, ahah, daytime, means the deity of daytime. Suklah, the bright fortnight, implies the deity presiding over the bright fortnight. Sanmasah uttarayanam, the six months of the Northern solstice-here, too, is understood the deity presiding over the Path. This is the principle (of interpretation followed elsewhere (in the Upanisads also). Tatra, following this Path; janah, persons; who are brahma-vidah, knowers of Brahman, those engaged in meditation on (the alified) Brahman; gacchanti, attain; brahma, Brahman; prayatah, when they die. It is understood that they attain Brahman through stages. Indeed, according to the Upanisadic text, 'His vital forces do not depart' (Br. 4.4.46), there is neither going nor coming back for those established in full realization, who are fit for immediate Liberation. Having their organs merged in Brahman, they are suffused with Brahman, they are verily identified with Brahman.

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

8.23 - 8.24 Here, the term 'time' denotes a path, having many deities beginning with day and ending with year. The deities preside over divisions of time. The meaning is - I declare to you the path departing in which Yogins do not return and also the path departing in which the doers of good actions return. By the clause, 'Light in the form of fire, the day, bright fortnight, six months of the northern course,' year also is denoted.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 8.24?

अग्निः कालाभिमानिनी देवता। तथा ज्योतिरपि देवतैव कालाभिमानिनी। अथवा अग्निज्योतिषी यथा श्रुते एव देवते। भूयसा तु निर्देशो यत्र काले (गीता 8।23) तं कालम् (गीता 8।23) इति आम्रवणवत्। तथा अहः देवता अहरभिमानिनी अहः शुक्लः शुक्लपक्षदेवता षण्मासा उत्तरायणम् तत्रापि देवतैव मार्गभूता इति स्थितः अन्यत्र अयं न्यायः। तत्र तस्मिन् मार्गे प्रयाताः मृताः गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो ब्रह्मोपासकाः ब्रह्मोपासनपरा जनाः

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 8.24, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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