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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 10
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्

वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar

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SindhiIND

موت جي وقت، هڪ غير متزلزل ذهن سان، عقيدت سان ڀريل، يوگا جي طاقت سان، سڄي زندگي جي سانس کي ٻن ابرن جي وچ ۾ طئي ڪري، هو ان شاندار پريم شخص تائين پهچي ٿو.

TamilIND

இறக்கும் நேரத்தில், அசையாத மனதுடன், பக்தியுடன், யோக சக்தியால், இரண்டு புருவங்களின் நடுவில் முழு உயிர் மூச்சையும் நிலைநிறுத்தி, அந்த ஒளிமயமான பரம புருஷனை அடைகிறார்.

GujaratiIND

મૃત્યુ સમયે, અટલ મનથી, ભક્તિથી સંપન્ન, યોગની શક્તિથી, આખા જીવન-શ્વાસને બે ભ્રમરોની મધ્યમાં સ્થિર કરીને, તે તે તેજસ્વી પરમપુરુષ સુધી પહોંચે છે.

NepaliIND

मृत्युको बेला अटल चित्त, भक्तिद्वारा सम्पन्न, योगशक्तिद्वारा, सम्पूर्ण जीवन-श्वासलाई दुई भौंको बीचमा राखेर, त्यो तेजस्वी परमपुरुषमा पुग्छ।

OdiaIND

ମୃତ୍ୟୁ ସମୟରେ, ଏକ ଅଦମ୍ୟ ମନ ସହିତ, ଭକ୍ତି ସହିତ ଯୋଗ, ଯୋଗର ଶକ୍ତି ଦ୍ୱାରା, ଦୁଇ ଆଖି ମ the ିରେ ସମଗ୍ର ଜୀବନ-ନିଶ୍ୱାସକୁ ଠିକ୍ କରି ସେ ସେହି ସୁପ୍ରିମୋ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କ ନିକଟରେ ପହଞ୍ଚିଲେ |

BhojpuriIND

मृत्यु के समय भक्ति से संपन्न अटल मन से योग के शक्ति से पूरा प्राण-श्वास के दुनो भौंह के बीच में स्थिर क के ऊ ओह तेजस्वी परमात्मा तक पहुँच जाला।

AssameseIND

মৃত্যুৰ সময়ত ভক্তিৰে সমৃদ্ধ অদম্য মনেৰে যোগৰ শক্তিৰে ভ্ৰু দুটাৰ মাজত সমগ্ৰ প্ৰাণ-নিশাহ স্থিৰ কৰি সেই উজ্জ্বল পৰম ব্যক্তিজনৰ ওচৰ পায়গৈ।

DogriIND

मौत दे समें, भक्ति कन्नै संपन्न अटल मन कन्नै, योग दी शक्ति कन्नै, पूरी प्राण-श्वास गी दो भौंएं दे बिच्च स्थिर करियै, ओह् उस तेजस्वी परमात्मा तगर पुज्जदा ऐ।

KannadaIND

ಮರಣದ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ಅಚಲವಾದ ಮನಸ್ಸಿನಿಂದ, ಭಕ್ತಿಯಿಂದ, ಯೋಗದ ಬಲದಿಂದ, ಎರಡು ಹುಬ್ಬುಗಳ ಮಧ್ಯದಲ್ಲಿ ಇಡೀ ಜೀವ ಉಸಿರನ್ನು ಸರಿಪಡಿಸಿ, ಅವನು ಆ ತೇಜಸ್ವಿ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ತಲುಪುತ್ತಾನೆ.

MalayalamIND

മരണസമയത്ത്, അചഞ്ചലമായ മനസ്സോടെ, ഭക്തിയാൽ, യോഗശക്തിയാൽ, രണ്ട് പുരികങ്ങൾക്ക് നടുവിൽ മുഴുവൻ ജീവശ്വാസവും ഉറപ്പിച്ച്, അവൻ ആ ശോഭയുള്ള പരമപുരുഷനിൽ എത്തിച്ചേരുന്നു.

TeluguIND

మరణ సమయంలో, అచంచలమైన మనస్సుతో, భక్తితో, యోగబలంతో, రెండు కనుబొమ్మల మధ్యలో మొత్తం జీవశ్వాసను స్థిరపరచి, ఆ తేజోవంతుడైన పరమాత్మను చేరుకుంటాడు.

PunjabiIND

ਮੌਤ ਦੇ ਸਮੇਂ, ਅਡੋਲ ਚਿੱਤ, ਭਗਤੀ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ, ਯੋਗ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਦੁਆਰਾ, ਦੋ ਭਰਵੱਟਿਆਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਸਾਰਾ ਜੀਵਨ-ਸੁਆਸ ਟਿਕਾ ਕੇ, ਉਹ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਵਾਨ ਪਰਮ ਪੁਰਖ ਕੋਲ ਪਹੁੰਚ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --प्रयाणकाले मनसाचलेन ৷৷. स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्--यहाँ भक्ति नाम प्रियताका है; क्योंकि उस तत्त्वमें प्रियता (आकर्षण) होनेसे ही मन अचल होता है। वह भक्ति अर्थात् प्रियता स्वयंसे होती है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं। अन्तकालमें कवि, पुराण, अनुशासिता आदि विशेषणोंसे (पीछेके श्लोकमें) कहे हुए सगुण-निराकार परमात्मामें भक्तियुक्त मनुष्यका मन स्थिर हो जाना अर्थात् सगुण-निराकार-स्वरूपमें आदरपूर्वक दृढ़ हो जाना ही मनका अचल होना है।पहले प्राणायामके द्वारा प्राणोंको रोकनेका जो अधिकार प्राप्त किया है, उसका नाम 'योगबल' है। उस योगबलके द्वारा दोनों भ्रुवोंके मध्यभागमें स्थित जो द्विदल चक्र है, उसमें स्थित सुषुम्णा नाड़ीमें प्राणोंका,अच्छी तरहसे प्रवेश करके वह (शऱीर छोड़कर दसवें द्वारसे होकर) दिव्य परम पुरुषको प्राप्त हो जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, ( जो योगी ) अन्त समय -- मृत्युकालमें भक्ति और योगबलसे युक्त हुआ -- अर्थात् भजनका नाम भक्ति है उससे युक्त हुआ और समाधिजनित संस्कारोंके संग्रहसे उत्पन्न हुई चित्तस्थिरताका नाम योगबल है उससे भी युक्त हुआ चञ्चलतारहित -- अचल मनसे पहले हृदयकमलमें चित्तको स्थिर करके फिर ऊपरकी ओर जानेवाली नाड़ीद्वारा चित्तकी प्रत्येक भूमिको क्रमसे जय करता हुआ भ्रुकुटिके मध्यमें प्राणोंको स्थापन करके भली प्रकार सावधान हुआ ( परमात्मस्वरूपका चिन्तन करता है ) वह ऐसा बुद्धिमान् योगी कविं पुराणम् इत्यादि लक्षणोंवाले उस दिव्य -- चेतनात्मक परम पुरुषको प्राप्त होता है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

इतश्च भगवदनुस्मरणं सफलत्वादनुष्ठेयमित्याह -- किञ्चेति। कदा तदनुस्मरणे प्रयत्नातिरेकोऽभ्यर्थ्यते तत्राह -- प्रयाणकाल इति। कथं तदनुस्मरणमित्युपकरणकलापप्रेक्ष्यमाणं प्रत्याह -- मनसेति। योऽनुस्मरेत्स किमुपैति तत्राह -- स तमिति। मरणकाले क्लेशबाहुल्येऽपि प्राचीनाभ्यासप्रसादासादितबुद्धिवैभवो भगवन्तमनुस्मरन्यथास्मृतमेव देहाभिमानविगमानन्तरमुपागच्छतीत्यर्थः। भगवदनुस्मरणस्य साधनं मनसैवानुद्रष्टव्यमिति श्रुत्युपदिष्टमाचष्टे -- मनसेति। तस्य चञ्चलत्वान्न स्थैर्यमीश्वरे सिध्यति तत्कथं तेन तदनुस्मरणमित्याशङ्क्याह -- अचलेनेति। ईश्वरानुस्मरणे प्रयत्नेन प्रवर्तितं विषयविमुखं तस्मिन्नेवानुस्मरणयोग्यपौनःपुन्येन प्रवृत्त्या निश्चलीकृतं ततश्चलनविकलं तेनेति व्याचष्टे -- अचलेनेति। संप्रत्यनुस्मरणाधिकारिणं विशिनष्टि -- भक्त्येति। परमेश्वरे परेण प्रेम्णा सहितो विषयान्तरविमुखोऽनुस्मर्तव्य इत्यर्थः। योगबलमेव स्फोरयति -- समाधिजेति। योगः समाधिश्चित्तस्य विषयान्तरवृत्तिनिरोधेन परस्मिन्नेव स्थापनं तस्य बलं संस्कारप्रचयो ध्येयैकाग्र्यकरणं तेन तत्रैव स्थैर्यमित्यर्थः। चकारसूचितमन्वयमन्वाचष्टे -- तेन चेति। यत्तु कया नाड्योत्क्रामन्यातीति। तत्राह -- पूर्वमिति। चित्तं हि स्वभावतो विषयेषु व्यापृतं तेभ्यो विमुखीकृत्य हृदये पुण्डरीकाकारे परमात्मस्थाने यत्नतः स्थापनीयम्।अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे इत्यादिश्रुतेस्तत्र चित्तं वशीकृत्यादावनन्तरं कर्तव्यमुपदिशति -- तत इति। इडापिङ्गले दक्षिणोत्तरे नाड्यौ हृदयान्निःसृते निरुध्य तस्मादेव हृदयाग्रादूर्ध्वगमनशीलया सुषुम्नया नाड्या हार्दं प्राणमानीय कण्ठावलम्बितस्तनसदृशं मांसखण्डं प्रापय्य तेनाध्वना भ्रुवोर्मध्ये तमावेश्याप्रमादवान्ब्रह्मरन्ध्राद्विनिष्क्रम्य कविं पुराणमित्यादिविशेषणं परमपुरुषमुपगच्छतीत्यर्थः। भूमिजयक्रमेणेत्यत्र भूम्यादीनां पञ्चानां भूतानां जयो वशीकरणं तस्य तस्य भूतस्य स्वाधीनचेष्टावैशिष्ट्यं तद्द्वारेणेत्येतदुच्यते। स तमित्यादि व्याचष्टे -- स एवमिति।

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Sri Dhanpati

कदा तदाऽनुस्मरणे प्रयत्नातिरेकोऽभ्यर्थते तदाह -- प्रयाणकालेऽन्तकाले अचलेन एकाग्रेण मनसा तं पुरुषं योऽनुस्मरेदित्यनुवर्तते। कीदृशः। भक्त्या परमेस्वरविषयेण परमेण प्रेम्णा युक्तः। योगस्य साधिर्बलेन तज्जनितसंस्कारसमूहेन व्युत्थानसंस्कारविरोधिना च युक्तम्। एवं प्रथमं हृदयपुण्डरीके वशीकृत्य तत ऊर्ध्वगामिन्या सुषुम्नया नाङ्या गुरुपदिष्टमार्गेण भूमिजयक्रमेण भ्रुवोर्मध्ये आज्ञाचके प्राणमावेश्य स्थापयित्वा सभ्यगप्रमत्तो ब्रह्मरन्ध्रा समाधिजसंस्कारजनितं चित्तस्थैर्यलक्षणं तेन च युक्तः पूर्वं हृदयपुण्डरीके चित्तं वशीकृत्य तत ऊर्ध्वगामिन्या नाङ्या भूमिजय क्रमेण भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य स्थापयित्वा सभ्यगप्रमत्तः सन् स एवंविद्वान् यः कर्वि पुराणमित्यादिलक्षणः तं परं पुरुषमुपैति प्रतिपद्यते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
prayāṇakāle
manasāmind
achalenasteadily
bhaktyāremembering with great devotion
yuktaḥunited
yogabalena
chaand
evacertainly
bhruvoḥthe two eyebrows
madhyebetween
prāṇamlife airs
āveśhyafixing
samyakcompletely
saḥhe
tamhim
param puruṣhamthe Supreme Divine Lord
upaitiattains
divyamdivine
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 8.9
कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्

जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाशस्वरूप -- ऐसे अचिन्त्य स्वरूपका चिन्तन करता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.11
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये

वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 10
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्

वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 10 translates to: "At the time of death, with an unwavering mind, endowed with devotion, by the power of Yoga, fixing the whole life-breath in the middle of the two eyebrows, he reaches that resplendent Supreme Person. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "prayāṇa-kāle manasāchalena" mean in English?

"prayāṇa-kāle manasāchalena" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 10. At the time of death, with an unwavering mind, endowed with devotion, by the power of Yoga, fixing the whole life-breath in the middle of the two eyebrows, he reaches that resplendent Supreme Person. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.