Bhagavad Gita 7.5 — Commentary
20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्
apareyam itas tvanyāṁ prakṛitiṁ viddhi me parām jīva-bhūtāṁ mahā-bāho yayedaṁ dhāryate jagat
"O mighty-armed Arjuna, this is the inferior Prakriti; know it as distinct from My higher Prakriti, the very life-element, by which this world is upheld."
Scholar Commentaries (20)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
अपरा न परा निकृष्टा अशुद्धा अनर्थकरी संसारबन्धनात्मिका इयम्। इतः अस्याः यथोक्तायाः तु अन्यां विशुद्धां प्रकृतिं मम आत्मभूतां विद्धि मे परां प्रकृष्टां जीवभूतां क्षेत्रज्ञलक्षणां प्राणधारणनिमित्तभूतां हे महाबाहो यया प्रकृत्या इदं धार्यते जगत् अन्तः प्रविष्टया।।
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
इयं मम अपरा प्रकृतिः इतः तु अन्याम् इतः अचेतनायाः चेतनभोग्यभूतायाः प्रकृतेः विसजातीयाकारां जीवभूतां परं तस्याः भोक्तृत्वेन प्रधानभूतां चेतनरूपां मदीयां प्रकृतिं विद्धि यया इदम् अचेतनं कृत्स्नं जगद् धार्यते।
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
अपराऽनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य जीवभूता श्रीः जीवानां प्राणधारिणी चिद्रूपभूता सर्वदा सती एतन्महइदं महद्भूतम् बृ.उ.2।4।12 इति श्रुतेः। जगाद चप्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा। अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाष्टधा पुनः। महान्बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति ह। अवरा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तथा। चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा। यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः। नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि। ताभ्यामिदं जगत्सर्वं हरिः सुज्ञति भूतराड्। इति नारदीये।
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
अष्टधा प्रकृति अपरा जड़ है। उसे बताने के पश्चात् उससे भिन्न अपनी परा प्रकृति को भगवान् बताते हैं। वह परा प्रकृति जीवरूप अर्थात् चेतन रूप है जिसके कारण ही शरीर मन और बुद्धि अपनेअपने कार्य इस प्रकार करते हैं मानो वे स्वयं ही चेतन हों।इस चेतन की विद्यमानता में ही उपाधियाँ अपना व्यापार कर सकती हैं अन्यथा नहीं। चैतन्य के बिना हमें न बाह्य स्थूल जगत् का और न आन्तरिक सूक्ष्म विचार रूप जगत् का ही अनुभव और ज्ञान हो सकता है। वही जगत् को धारण किये हुए है। उसके अभाव में हमारी दशा एक पाषाण के समान हो जायेगी जिसमें न चेननता है और न बुद्धिमत्ता।भगवान् के इस कथन को कि परा प्रकृति जगत् का आधार है भौतिक विज्ञान की दृष्टि से विचार करके भी सिद्ध किया जा सकता है। हम अपने घर में रहते हैं जिसका आधार है भूमि। उस भूमिभाग का आधार है शहर शहर का राष्ट्र और राष्ट्र का आधार विश्व है विश्व घिरा हुआ है समुद्र के जल से जिसकी स्थिति वायुमण्डल पर निर्भर करती है। यह वायुमण्डल तो सौरमण्डल अथवा ग्रहमण्डल का एक भाग है। सम्पूर्ण विश्व आकाश में स्थित है और आकाश स्थित है मन में स्थित आकाश की कल्पना पर। मन का आधार है बुद्धि का निर्णय। और क्योंकि बुद्धिवृत्तियों का ज्ञान चैतन्य के कारण ही संभव है इसलिए यह चैतन्य ही सम्पूर्ण जगत् का आधार सिद्ध होता है। व्ाही जगत् का अधिष्ठान है।दर्शनशास्त्र में जगत् का अर्थ केवल इन्द्रियगोचर जगत् ही नहीं वरन् मन तथा बुद्धि के द्वारा अनुभूयमान जगत् भी उस शब्द की परिभाषा मे समाविष्ट है। इस प्रकार बाह्य विषय भावनाएं और विचार ये सब जगत् ही हैं। यह सम्पूर्ण जगत् चेतनस्वरूप परा प्रकृति के द्वारा धारण किया जाता है।
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
7.5 अपरा lower? इयम् this? इतः from this? तु but? अन्याम् different? प्रकृतिम् nature? विद्धि know? मे My? पराम् higher? जीवभूताम् the very lifeelement? महाबाहो O mightyarmed? यया by which? इदम् this? धार्यते is upheld? जगत् world.Commentary The eightfold Nature described in the previous verse is the inferior Nature. It constitutes the Kshetra or the field or matter. It is impure. It generates evil and causes bondage. But the superior Nature is pure. It is My very Self? Kshetrajna (knower of the field or Spirit) by which life is sustained? and that which enters within the whole world and upholds it. It is the very lifeelement or the principle of Selfconsciousness? by which this universe is sustained.
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
व्याख्या--'भूमिरापोऽनलो वायुः ৷৷. विद्धि मे पराम्'--परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं । जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं, उसका नाम 'अपरा प्रकृति' है और अपना अंश जो जीव है, उसको भगवान् 'परा प्रकृति' कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तनशील है।प्रत्येक मनुष्यका भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते, ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतन्त्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है; इसलिये इसका नाम 'प्रकृति' है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि यह परमात्माका स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह परमात्मस्वरूप ही है; फिर इसकी जीव या प्रकृति संज्ञा नहीं रहती अर्थात् इसमें बन्धनकारक कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं रहता (गीता 18। 17)।
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
यह ( उपर्युक्त ) मेरी अपरा प्रकृति है अर्थात् परा नहीं किंतु निकृष्ट है अशुद्ध है और अनर्थ करनेवाली है एवं संसारबन्धनरूपा है। और हे महाबाहो इस उपर्युक्त प्रकृतिमें दूसरी जीवरूपा अर्थात् प्राणधारणकी निमित्त बनी हुई जो क्षेत्रज्ञरूपा प्रकृति है अन्तरमें प्रवृष्ट हुई जिस प्रकृतिद्वारा यह समस्त जगत् धारण किया जाता है उसको तू मेरी परा प्रकृति जान अर्थात् उसे मेरी आत्मरूपा उत्तम और शुद्ध प्रकृति जान।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
अचेतनवर्गमेकीकर्तुं प्रकृतेरष्टधा परिणाममभिधाय विकारावच्छिन्नकार्यकल्पं चेतनवर्गमेकीकर्तुं पुरुषस्य चैतन्यस्याविद्याशक्त्यवच्छिन्नस्यापि प्रकृतित्वमुक्तां प्रकृतिमनूद्य दर्शयति अपरेति। निकृष्टत्वं स्पष्टयति अनर्थकरीति। अनर्थकरत्वमेव स्फोरयति संसारेति। कथंचिदप्यनन्यत्वव्यावृत्त्यर्थस्तुशब्दः। अन्यामत्यन्तविलक्षणामिति यावत्। अन्यत्वमेव स्पष्टयति विशुद्धामिति। प्रकृतिशब्दस्यान्यप्रयुक्तस्यार्थान्तरमाह ममेति। प्रकृष्टत्वमेव भोक्तृत्वेन स्पष्टयति जीवभूतामिति। प्रकृत्यन्तरादस्याः प्रकृतेरवान्तरविशेषमाह ययेति। नहि जीवरहितं जगद्धारयितुं शक्यमित्याशयेनाह अन्तरिति।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
अचेतनवर्गस्य स्वस्मिन्कल्पितत्वं वक्तुं प्रकृतेरष्टधा परिणाममभिधाय विकारावच्छिन्नस्य कार्यकल्पस्य तथात्वं वक्तुं चैतन्यस्याविद्यावच्छिन्नस्य प्रकृतित्वमुक्तां प्रकृतिमनूद्य दर्शयति अपरेति। अपरा निकृष्टाऽशुद्धत्वात् अनर्थकत्वात् संसारस्वरुपत्वात् बन्धनात्मकत्वात् इयमष्टप्रकारा इतोऽस्या अन्याम्। कथमप्यनन्यत्वव्यावृत्त्यर्थस्तुशब्दः। विशुद्धत्वात् प्रकृतिं परामुत्कृष्टां जीवभूतां क्षेत्रलक्षणां प्राणधारणनिमित्तभूतां ममात्मभूतां विद्धि जानिहि। नहि जीवरहितं जगद्धारयितुं शक्यमित्याशयेन प्रकृत्यन्तरादस्याः प्रकृतेरवान्तविशेषमाह। यया जगदन्तप्रविष्टयाअनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरुपे व्याकरवाणि इति श्रुतेर्धार्यते स्वतो विशीर्यज्जगदचेतनवर्गो विष्टभ्यते यथा महाबाहुना त्वया स्वतो विनश्यत् राज्यं क्षेत्रधर्मं च धारयितुं शक्यते तथेति भूतानां यथा मृन्मयो घटो भृत्प्रकृतिक इति कार्यलिङ्गकमनुमानं प्रमाणयन् तद्द्वारा स्वस्य तत्पदार्थस्याभिन्ननिमित्तोपादानकारणत्वं द्रर्शयति एतदिति। एते परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे प्रकृती योनी कारणभूते येषां सर्वेषां भूतानां कारणभूते तस्मात्स्वप्रकृतिद्वयद्वाराहं सर्वज्ञ ईश्वरो वेदान्तप्रतिपाद्यः कृत्स्त्रस्य समग्रस्य जगतः प्रभवः उत्पत्तिः प्रलयो विनाशः। उत्पत्तिविनाशकारणमित्यर्थः। तथाच भगवतो व्यासस्य सूत्राणिजन्माद्यस्य यतःप्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुरोधात्अभिध्योपदेशाच्च साक्षाच्चोभयाम्रानात्आत्मकृतेः परिणामात्योनिश्च हि गीयते इति पूर्वाधिकरण ब्रह्म जिज्ञास्यमित्युक्तं किलक्षणं पुनस्तद्ब्रह्येत्यत आह भगवान्सूत्रकारः। जन्मोत्पत्तिरादिर्यस्य तदिदं जन्मास्थितिभङ्गं जन्मादि अस्य प्रत्यक्षादिसंनिधापितस्य वित्रित्रस्य जगतो यतो जन्मादि यस्मात्सर्वज्ञात्सर्वशक्तेः कारणद्भवति तद्ब्रह्म। तथाच श्रुतिःयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्तित्यभिसंविशन्ति। तद्ब्रह्म तद्विजिज्ञासस्व इति। तथाच जगज्जन्मादिकारणत्वं ब्रह्मणो लक्षणमुक्तम्। तच्च घटादीनां मृदातिवत्प्रकृतित्वे कुलालादिवन्निमित्वे समानमित्यतो भवति विमर्शः किमात्मकं पुनर्ब्रह्मणः कारणत्वं स्यादिति। तत्र निमित्तकारणत्वमेव केवलं स्यादिति प्रतिभाति। कस्मात् ईक्षापूर्वककर्तृत्वश्रवणात्स ईक्षांचक्रेस प्राणमसृजत् इत्यादिश्रुतिभ्यः। ईक्षापूर्वकं च कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव समानमित्यतो भवति विमर्शः किमात्मकं पुनर्ब्रह्मणः कारणत्वं स्यादिति। तत्र निमित्तकारणत्वमेव केवलं स्यादिति प्रतिभाति। कस्मात् ईक्षापूर्वककर्तृत्वश्रवणात्स ईक्षांचक्रेस प्राणमसृजत् इत्यादि श्रुतिभ्यः। ईक्षापूर्वकं च कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु दृष्टम्। अनेककारकपूर्विका च क्रियाफलसिद्धिर्लोके दृष्टा। सच न्याय आदिकर्तर्यापि युक्तः संक्रामयितुं ईश्वरत्वप्रसिद्धेश्च। ईश्वराणां हि राजवैवस्तवतादीनां निमित्तकारणत्वमेव केवलं प्रतीयते तद्वत्परमेश्वरस्यापि निमित्तकारणत्वमेव प्रतिपत्तुं युक्तम्। कार्य चेदं जगत्सावयममचेतनमशुद्धं च दृश्यते तस्य कारणेनापि तत्सदृशेनैव भाव्यम्। कार्यकारणयोर्मृद्धटादिरुपयोः सादृशयदर्शनात्। ब्रह्म चनिष्करं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् इत्यादिश्रुतिभ्यो नैवंविधमवगभ्यते पारिशेष्यात्ततोऽन्यदुपादानकारणमशुद्य्धादिगुणकं स्मृतिप्रसिद्धमभ्युपेयम्। ब्रह्मकारणत्वश्रुतेर्निमित्तमात्रे पर्यवसानादित्येवंप्राप्ते आह। प्रकृतिश्चोपादानकारणं ब्रह्माभ्युपेयं निमित्तकारणं च। न केवलं निमित्तकारणमेव तत्र हेतुमाह प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्। एवं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ श्रौतौ नोपरुध्येते। प्रतिज्ञा तावत्उततमादेशमप्राक्षो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञातम्। तत्रोपादानकारणे विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति। कार्यस्योपादातकारणाव्यतिरेकात्। तक्षादिनिमित्तकारणात्प्रासादादेः कार्यस्य लोकेऽव्यतिरेकानुपलब्धेर्नास्ति निमित्तकारणाव्यतिरेकः। कार्यस्य दृष्टान्तोऽपियता सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृतिकेत्येव सत्त्यम् इत्युपादानकारणगोचर एव आम्रायते। एवं यथासंभवं प्रतिवेदान्तं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ प्रकृतित्वप्रसाधनौ प्रत्येतव्यौयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इत्यत्र यत इतीयमपि पञ्चमी प्रकृतिलक्षणे एवापादाने द्रष्टव्या।जनिकर्तुः प्रकृतिः इति विशेषस्मरणात्। निमित्तत्वं तु अधिष्ठात्रन्तराभावादधिगन्तव्यम्। प्रागुत्पत्तेरेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणात्। अधिष्ठात्रन्तराभावादधिन्तव्यम्। प्रागुत्पत्तेरेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणात्। अधिष्टात्रन्तरत्वे एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्यासंभवेन प्रतिज्ञादृष्टान्तोपरोधस्यात्रापि प्रसङ्गाच्च तस्याधिष्ठात्रन्तराभावाद्ब्रह्मणः कर्तुत्वं उपादानान्तराभावात्प्रकृतित्वम्। ब्रह्मणः कर्तृत्वप्रकृतित्वे हेत्वन्तरमाह अभिध्येति।सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेतेतितदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति चाभिध्यापूर्विकायाः स्वातन्त्रयप्रवत्तेः कर्तेति गम्यते। बहु स्यामिति प्रत्यगात्मविषयत्वात्। बहुभवनाभिध्यानस्य प्रकृतिरिति ब्रह्मणः प्रकृतित्वे हेत्वन्तरमाह साक्षादिति।सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकाशदेव समुत्पद्यन्ते आकाशे प्रत्यस्तं यान्ति इति श्रुत्या साक्षाद्ब्रह्मैव कारणमुपादायोभयोः प्रभवप्रलययोराम्रानात्। यद्धि यस्मादुत्पद्यते यस्मिंश्च प्रलीयते तत्तस्योपादानं प्रसिद्धम्। यथा घटरुचकादेः मृत्सुवर्णादि। तत्रैव हेत्वन्तरमाह आत्मकृतेरिति।तदात्मानं स्वयमकुरुत इत्यामनः आत्मानमिति कर्मत्वस्य स्वयमकुरुतेति कर्तृत्वस्य च दर्शनात्। ननु पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वं कथमिति चेतत्राह परिणामादिति। घटादिरुपेण मृदातिवत्पूर्वसिद्धिस्यापि सत आत्मनो विशेषेणात्मना परिणआमात्स्वमिति विशेषणाच्च निमित्तान्तरानपेक्षत्वं च प्रतीयते परिणामादिति पृथक्सूत्रं वा। इतश्च ब्रह्म प्रकृतिःसच्च त्यच्चाभवन्निरुक्तं चानिरुक्तं च इत्यादिना ब्रह्मणएव विकारात्मना परिणामाभ्रानात्। तत्र हेत्वन्तरमाह योनिरिति।कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् इतियद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः इति च वेदान्तरेषु हि यस्माद्योनिश्च ब्रह्म गीयते योनिशब्दश्च प्रकृतिवचनो लोके समधिगतःपृथिवी योनिरोषधिनस्पतीनाम् इति। यत्पुरुक्तं ईक्षापूर्वकं कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु लोके दृष्टं नोपादानेषु इत्यादि तत्प्रत्युत्यते। न लोकवदिह भवितव्यम्। नह्ययमनुमान गम्योऽर्थः शब्दगम्यता चास्यार्थस्यातो यथाशब्दमिह भवितव्यं शब्देश्चेक्षितुरीश्वरस्य प्रकृतित्वं प्रतिपादयतीत्यवोचाम। तथायेन्शचरकारणत्ववादिश्रुत्यनुसारिणीनांअहं कृत्स्त्रस्य जगतः प्रभवः प्रलयसतथायत्तत्सुक्षममविज्ञेयंस ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते। तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम्। अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निर्गुणे संप्रलीयते।। अतश्च संक्षेपमिदं श्रृणुध्वं नारायणः सर्वमिदं पुराणः। स सर्गकाले च करोति सर्वं सैहारकाले च तदत्ति भूयः।।तस्मात्काद्याः प्रवन्ति सर्वे स मूलं शाश्वतिकः स नित्यः इत्याद्यनेकासामीश्वरस्याभिन्ननिमित्तोपादानकारणतायाः प्रतिपादकानां स्मृतीनामेवार्थ उपादेयो नत्वचेतनं प्रधानं स्वतन्त्रं जगतः कारणम्। अण्वादयो जगत उपादानकारणमीश्वरस्तु निमित्तकारणमिति प्रतिपादकानां सांख्यादिस्मृतीनां गीतादिस्मृतीनां वेदानुरोधिनीनामुपादेयत्वावश्यकत्वेन तद्विरोधिनीनामेव हेयत्वौचित्यात्। ननु जगत उपादानं ब्रह्म नोपपद्यते चेतनाादनन्दघनाच्छुद्धाद्ब्रह्मणोऽचोतनस्य सुखदुःखमोहात्मक्सय प्रीतिपरितापविषादादिहेतोः स्वर्गनरकाद्युच्चावचरुपस्याशुद्धस्यात्यन्तविलक्षणत्वाद्विलक्षणानां चोपादानोपादेयभावो लोके नैव दृश्यते। नहि घटादिकार्यं सुवर्णोपादानकं भवति न वा मुकुटादिकार्यं मृदुपादानकं तस्माज्जगत्सदृशमचेतनं प्रधानादिकमेव जगदुपादानमप्युपेयम्।तदैक्षत बहु स्याम् इत्यादिचेतनकारणवादास्तु युक्तिविरोधादचेतनप्रधानपरतया उपचारदीश्वरस्य निमित्त्वमात्रपरतया वा नेया अचेतनेतपि चेतनवदुपचारदर्शनात्। यथामृदब्रवीदापोऽब्रुवन् इतितत्तेज ऐक्षत ता आपः ऐक्षन्त ते हेमे प्राणा अहंश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुः इतिते ह वाचमूचुस्त्वन्न उद्गाय इत्यादिषु श्रुतिषु लोकेऽपि प्रत्यासन्नपतनतां कूलस्यालक्ष्य कूलं पिपतिषतीत्यचेतनेपि चेतनवदुपचारो दृष्ट इति चेदुच्यते। किं यत्किंचिद्वैलक्षण्याज्जगदीश्वरोपादानकं नोपपद्यते उत बहुवैलक्षण्यात्। नाद्यः। चैतनायतनाच्छरीरात्तदनायतनाद्रोमयाच्चतद्विधस्य केशादेः वृश्चिक्य चोत्पत्तिदर्शनात्। न द्वितीयः। उदाहृतप्रकृतिविकारयो रुपादिभेदेन बहुवैलक्षण्यस्योपलभ्यमानत्वात्। किंच ययोः प्रकृतिविकारभावस्तयोः सादृश्यं किमात्यन्तिकं उत यत्कंचिदाद्ये प्रकृतिविकारभाव एव प्रलीयते। द्वितीयेतु शरीरादीनां पार्थिकत्वादिस्वभावस्य केशादिष्वनुवृत्तिरिव ब्रह्मणोऽपि सत्तालक्षणस्य स्वभावस्याकाशादावनुवृप्रलीयते। द्वितीयतु शरीरादीनां पार्थिवत्वादिस्वभावस्य केशादिष्वनुवृत्तिरिव ब्रह्मणोऽपि सत्तालक्षणस्य स्वभावस्याकाशादावनुवृत्तिर्दृश्यत इति नानुपपत्तिः। किं चेश्वरकारणत्वनिषेधकं वैलक्षण्यं किमशेषस्येश्वरस्वभावस्याननुवर्तनं उत यस्य कस्यचित् उत चैतन्यस्य आद्यपक्षद्वये उक्तमेव हेतुद्वयमनुसंधेयम्। न तृतीयः। समस्तस्य वस्तुजातस्येश्वरप्रकृतिकत्वादिनंप्रति यच्चैतन्येनानन्वितं नामीश्वर प्रकृतिकं दृष्टमिति वक्तुमशक्यत्वेन दृष्टान्ताभावात्। ननु यदि चेतनं शुद्धं शब्दादिहीनं ब्रह्म तद्विपरीतस्याचेतनस्याशुस्थूलत्वसावयवत्वपरिच्छिन्नत्वादिधर्मकस्य शब्दादिमतश्च कार्यस्य कारणमिष्टते तर्हि प्रागुत्पत्तेः कार्यासत्त्वप्रसङ्गस्य सत्कायवादिनस्तवानिष्टस्यापत्तिः। किंच प्रलये ईश्वरेणाविभागमापद्यमानं कार्यं स्वीयेन धर्मेण कारणमिति दूषयेदिति ब्रह्मणोऽप्यशुद्य्धादिमत्त्वप्रसङ्गः।अपिचास्मिन्नीश्वरकारणवादेऽपरमप्यसमंजसम्। सर्वस्य विभागस्याविभागगतस्य पुनरुद्भवे नियमकारणाभावाद्भोक्तृभोग्यादिविभागेनोत्पत्तिर्न प्राप्तोतीति। किंच सर्वेषां भोक्तृ़णां ब्रह्मणैक्यप्राप्तानां कर्मादिनिमित्तप्रलयेऽपि पुनरुत्पत्तिस्वीकारे मुक्तानामपि पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः। यदीदं जगत्प्रलये विभक्तमेव तिष्ठतीतिचेत्प्रलयस्यैवासंभवापत्तिरिति चेदुच्यते। यथेदानीं कार्यं कारणात्मना सत्तथा प्रागुत्पत्तेरपीति गम्यते। यत्तूक्तं प्रलय ईश्वरेणाविभागमापन्नमित्यादि तन्न। न दूषयतीत्यत्र दृष्टान्तस्य सत्त्वात्तद्यथा घटादयो मृदादिप्रकृतिका विकारा विभागावस्थायामु़च्चावचमध्यमप्रमेदाः सन्तः पुनः कारणाविभागमापन्ना न कारणं स्वधर्मेण दूषयन्ति कारणे कार्यस्य स्वधर्मेण स्थित्यभ्युपगमप्रसङ्गाच्च। किंच कार्यस्य कारणानन्यत्वं न प्रलये एवापितु त्रिष्वपि कालेषुआत्मैवेदं सर्वब्रह्मैवेदं सर्वं पुरस्तात्सर्वं खल्विदं ब्रह्म इत्येवमादिश्रुतिष्वविशेषेण कार्यस्य कारणानन्यत्वश्रवणात्। कार्यस्य कारणानन्यत्वेऽपि यथा स्वयं प्रसारितया मायया मायावी त्रिष्वपि कालेषु न संस्पृश्यते तस्या अवस्तुत्वात् तथा परमात्मापि संसारमायया न संस्पृश्यत इति कल्पितस्य गुणेन दोषेण वाधिष्टानस्यान्यथात्वायोगात्। यदपि सर्वस्य विभागस्येत्यादि तदपि न। यथा सुषुप्तिसमाध्यादावपि स्वाभाविक्यामविभागप्राप्तौ सत्यां मिथ्याज्ञानपोदितत्वात्। यदपि सर्वस्य पूर्ववद्विभागो भवत्येवमिहापि भविष्यतीत्यदोषात्। एतेन मुक्तानां पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः प्रत्युक्तः सम्यग्ज्ञानेन मिथ्याज्ञानस्यापोदितत्वात्। किंच शब्दादिहीनात्प्रधानादेः शब्दादिमतो जगतो वैलक्षण्यान्न जगत्प्रधादिप्रकृतिकमिति विलक्षणत्वान्नेदं जगत् ब्रह्मप्रकृतिकमित्याद्युक्तदोषाणां प्रधानादिकारणवादेऽपि तुल्यत्वादस्मिन्पक्षे न शङ्कितव्याः। तस्मादीश्वरकारणवाद एव यक्तियुक्तः श्रुतिस्मृतीकमित्याद्युक्तदोषाणां प्रधानादिकारणवादेऽपि तुल्यत्वादस्मिन्पक्षे न शङ्कितव्याः। तस्मादीश्वरकारणवाद एव युक्तयुक्तः श्रुतिस्मृतीहासपुराणतात्पर्यसिद्धः सर्वैर्मुमुक्षुभिरभ्युपेयः। एतेन चेतनकर्तृकमपीक्षणं प्रधानादावौपचारिकंमृदब्रवीत् इत्यादिवदिति प्रत्युक्तम्। मुख्यसंभवे औपचारिकाश्रयणानौचित्यात्।सेयं तैवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्त्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरुपे व्याकरवाणि इति ईक्षितुर्जीवात्मभावेन प्रवेशश्रवणाच्च। मृतब्रवीदित्येवंजातीयकया श्रुत्यापि मृदाद्यभिमानिन्यो वागाद्यभिमानिन्यश्च चेतना देवता वदनसंवदनादिषु चेतनोचितव्यवहारेषु व्यपदिश्यन्ते। कूलं पिपतिषतीत्यत्रापि कूलस्य पतनेच्छाचेतनरुपाधिष्ठानापेक्षाप्रकृतित्वं चेश्वरस्यप्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् इति सूत्रे साधितमेवेति स्पष्टं चेदमाकरे।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
एवं क्षेत्रात्मिकां प्रकृतिमुक्त्वा क्षेत्रज्ञात्मिकां तामाह अपरेयमिति। इयं प्रागुक्ता सा अपरा अश्रेष्ठा जडत्वात्। इतस्तु विलक्षणामन्यां परां चेतनत्वेन मदनन्यत्वादुत्कृष्टां मे मत्संबन्धिनीं प्रकृतिं जीवभूतां प्राणधारणनिमित्तभूतां क्षेत्रज्ञाख्यां विद्धि जानीहि। हे महाबाहो यया प्रकृत्या अन्तःप्रविष्टया इदं जगत्स्थावरजंगमशरीरात्मकं धार्यते।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
अपरामिमां प्रकृतिमुपसंहरन्परां प्रकृतिमाह अपरेति। अष्टधोक्ता या प्रकृतिरियमपरा निकृष्टा जडत्वात्परार्थत्वाच्च इतः सकाशात्परां प्रकृष्टामन्यां जीवस्वरूपां मे प्रकृतिं विद्धि जानीहि। परत्वे हेतुः यया चेतनया क्षेत्रज्ञरूपया स्वकर्मद्वारेणेदं जगद्धार्यते।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
एवमचिद्विलक्षणत्वं प्रतिपादितम् अतथाभूताज्जीवादपि विलक्षणत्वं प्रतिपाद्यतेअपरेयम् इति श्लोकेन। अपरा अनुत्कृष्टा अप्रधानभूतेत्यर्थः। तुशब्दोऽत्यन्तवैलक्षण्यपरः।इतः पराम् इत्येतावतैव स्वरूपभेदे सुवचेऽप्यन्यशब्दो वैजात्यद़ृढीकरणार्थ इत्यभिप्रायेणअचेतनाया इत्यादिकमुक्तम्। भोक्ता भोग्यम् श्वे.उ.1।12 इत्यादिश्रुत्यनुसारेण भोक्तृत्वभोग्यत्वाभ्यां परत्वापरत्वे दर्शिते।इदं जगत् इति प्रमाणसिद्धनिर्देशासङ्कोचात् कृत्स्नमित्युक्तम्। तत्रइदम् इति पराक्त्वनिर्देशेन सूचितमचेतनत्वम्। इदं च धारणं जागरादिषु सङ्कल्पत इति प्रत्यक्षादिसिद्धम् अन्यदाऽपि स्वरूपतो धारणमिति।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
अपरशब्दस्यानेकार्थत्वात् विवक्षितमर्थमाह अपरेति। अनुत्तमत्वस्य सापेक्षत्वात् किमपेक्षयेत्यत आह वक्ष्यमाणामिति। सन्निधानादिति भावः। जीवलक्षणां जीवत्वं प्राप्तमिति व्याख्याननिरासार्थमाह जीवभूतेति। कथं सा जीवभूता इत्यत आह जीवानामिति। प्राणधारिणीत्येवोक्ते स्वप्राणधारिणीतिप्रतीतिः स्यात् तन्निरासार्थमुक्तं जीवानामिति। सर्वजीवदेहेषु स्थित्वा तदीयान्प्राणांस्तत्र धारयतीत्यर्थः। स्वप्राणधारिणी कुतो न स्यात् इत्यत आह चिद्रूपेति। ज्ञानात्मकविग्रहवती। यद्वाजीव प्राणधारणे इत्यतो जीवशब्दस्य यौगिकार्थमुक्त्वा गौणीं वृत्तिमाश्रित्यार्थान्तरमनेनोक्तम्। भूतशब्दस्य सर्वदासत्त्ववाचित्वे प्रयोगं दर्शयति एतदिति। प्रकृतिमपेक्ष्य श्रियः परत्वोपपादनार्थमेतत्भूमिः इत्यादेरभिमतमर्थं पुराणवाक्येन स्थापयति जगाद चेति। देवस्यैव। सृज्यत इति सृष्टिः कार्यं कार्यरूपेणेत्यर्थः। अनेन भूम्यादिशब्दैः पञ्चतन्मात्राण्येवोच्यन्ते न स्थूलानि भूतानि। मन इति तत्कारणमहङ्कारः बुद्धिरिति महत्तत्त्वम् अहङ्कार इत्यविद्यासंयुक्तमव्यक्तंभिन्ना प्रकृतिरष्टधा इति वचनादिति व्याख्यानं निरस्तम्। कार्यरूपेणाष्टधा भिन्नेति व्याख्यानसम्भवेन प्रसिद्धार्थपरित्यागायोगान्महत्यहङ्कारस्यान्तर्भाव इत्येवेति सम्बन्धः। जडेत्यवरत्वोपपादनम्।श्रीः परा इत्यस्योपपादनमियं धार्यते तयेत्यादि। अनन्ता देशतः गुणतश्च। परा मुख्या। अनादिनिधना नत्वव्यक्तवद्विक्रियावती।
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
एवं क्षेत्रलक्षणायाः प्रकृतेरपरत्वं वदन्क्षेत्रज्ञलक्षणां परां प्रकृतिमाह या प्रागष्टधोक्ता प्रकृतिः सर्वाचेतनवर्गरूपा सेयमपरा निकृष्टा जडत्वात्परार्थत्वात्संसारबन्धरूपत्वाच्च। इतस्त्वचेतनवर्गरूपायाः क्षेत्रलक्षणायाः प्रकृतेरन्यां विलक्षणां तुशब्दाद्यथाकथंचिदप्यभेदायोग्यां जीवभूतां चेतनात्मिकां क्षेत्रलक्षणां मे ममात्मभूतां विशुद्धां परां प्रकृष्टां प्रकृतिं। हे महाबाहो यया क्षेत्रज्ञलक्षणया जीवभूतयाऽन्तरनुप्रविष्टया प्रकृत्येदं जगदचेतनजातं भाव्यते स्वतो विशीर्य उत्तभ्यतेअनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इति श्रुतेः। नहि जीवरहितं धारयितुं शक्यमित्यभिप्रायः।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
तदेवाह अपरेति। इयं अपरा नीचेत्यर्थः। तु पुनः। हे महाबाहो क्रियासमर्थ एतज्ज्ञानयोग्य इतः सकाशादन्यां परामुत्कृष्टां जीवभूतां में प्रकृतिं विद्धि जानीहि। परत्वमेवाह ययेदमिति। यया इदं परिदृश्यमानं जगद्धार्यते ध्रियते पोष्यते च।अत्रायं भावः भगवान् स्वक्रीडार्थं जगत् सृजति तत्र प्रकृत्या स्वशक्त्या क्रीडाधिकरणभूतजगत्सृष्टिं विधाय तद्भोगार्थं क्रीडार्थकया स्वशक्त्या तद्रूपजीवसृष्टिं कृतवान् तया इदं पूर्वकृतं भोगादिरूपेण धार्यते। तस्माल्लौकिकसृष्टौ जीवरूपेण भगवान् भोगं कुर्वन् क्रीडतीति ज्ञानेन तस्यां बन्धो न स्यात्। एतत्स्वरूपज्ञानाद्रसानुकरणज्ञानं स्यादिति भावः। यद्वा या पूर्वमष्टधोक्ता सा अपरा प्रकृतिः शक्तिः क्रीडार्थं शक्त्यंशभूतेति भावः। संयोगविलासे अनेकधा रसोत्पत्त्यर्थमाविर्भूतेत्यर्थः। अतएव भिन्नातद्विलासेच्छया जाता। इतः सकाशादन्या विप्रयोगे तदन्वेषणार्थ पुनर्दास्यरससिद्ध्यर्थमाविर्भूता जीवभूता दास्यरूपा सा मच्छक्तिस्तां परां केवलमदंशामुत्कृष्टां जानीहि। उत्कृष्टरूपतामेवाह यया इदं जडात्मकं जगद्धार्यते जीवप्राकट्यानन्तरं तद्भावेन सर्वं क्रीडौपयिकत्वेन पोष्यत इति भावः।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
अपरेति इतस्त्वन्यामजडां चित्स्वरूपां परां भोक्तृत्वेन प्रधानभूतां पुरुषत्वेन निर्दिष्टामत्र जीवभूतां मे प्रकृतिं चिदंशभूतां विद्धि। अत्र जीवः पूर्वमविद्यया क्रियत इत्ययुक्तम्। तथा सति जीवीभूतामिति स्यात्पुत्रीभूतइतिवत्। जीवत्वं च नाविद्याकृतं किन्तु भगवता सहजेच्छया कृतं विभागस्याविद्याकृतत्वे मानाभावात्।सच्चिदानन्दरूपो हि भगवान्पुरुषोत्तमः। एककोटिनिविष्टश्चिद्रूपश्चाक्षरतः परः।। तस्य माया द्विविधेति पूर्वं निरूपितम्। तत्र चिद्रूपस्य या माया सा व्यामोहिका स्वपुरुषं व्यामोहियत्वा जीवतामापादयति। जीवतीति जीवः केवलप्राणधारणप्रयत्नवान् तृतीयस्कन्धे अ.30 मायया जीवतापन्नतया तथानिरूपणात्। स हि मायया व्यामोहितः व्याकुलः सन् सदानन्दकृतसृष्टौ यः सूत्रात्मक आसन्यो दशविधप्राणरूपस्तमवलम्ब्य तिष्ठति तदा जीव इत्युच्यते।जीव प्राणधारणे इति धातोः कर्त्तरि अन्प्रत्ययः। बोधरूपोऽप्ययं आनन्दरूपस्य पृथग्भूतत्वादानन्दार्थं तया व्यामोहितस्तत्सम्बन्धादानन्दो भविष्यतीति बुद्ध्या तया सम्पद्यते।अयं च विभागः बहु स्यां प्रजायेय छां.उ.6।2।3 इतीच्छया। इच्छाऽपि तस्य सर्वभवनसमर्था स्वरूपमेवधर्मरूपेणाभवत् इच्छारूपेणापि भवति। तत्र सदंशस्य क्रियारूपा शक्तिः चिदंशस्य व्यामोहिका माया आनन्दरूपस्य जगत्कारणभूता एतत्ित्रतयरूपा शक्तिः सच्चिदानन्दरूपस्य भावः नत्वतलादिवाच्यः तथा भगवतो भावस्वरूपादेव निर्मितत्वात्। न च सर्वदा भवतीति शङ्कनीयम् आपादकहेतुभूतकालस्य अभावात्। जाते पुनः काले तस्यैव नियामकत्वात्। न सर्वदा भविष्यति पूर्वमेव जातत्वात्। तत्सङ्गे इच्छादीनामपि जातत्वादिच्छादयस्तदंशभूतांस्तान्सदैकरूपान् स्थापयन्ति। तथा च तस्या अंशं प्रतिगृह्णाति स भगवान्। इच्छारूपः स एव कामः सोऽकामयत बृ.उ.1।2।467 इत्युक्तः। तया कृत्वा भेदरूपया सच्चिदानन्दधर्माः स्वयं भिद्यमानाः स्वाश्रयमपि भिन्दन्ति तदा स भगवान् सर्वतः पाणिपादान्तो भवति साकारतां चापद्यते भिन्नोऽपि तथामिलितोऽभिन्न इवाखण्डो भवति तदपेक्षया कार्यरूपस्याल्पत्वात्। तानि त्रीण्यपि रूपाणि पूर्णशब्देनोच्यन्ते। अत एव सद्रूपस्य कार्ये प्रत्येकपर्यवसायित्वम्।प्रजायेय इतीच्छयोत्कर्षापकर्षरूपेण जातः तत्र आनन्द उत्कृष्टः तदेतरौ तं सेवमानौ जातौ ततश्च तयोर्धर्मौ ज्ञानक्रिये भगवच्छक्तिरूपे ज्ञाते तदा स आनन्दज्ञानक्रियाशक्तिमान् जातः तदा चिदंशस्य शक्तिः आनन्दे गतत्वात् ज्ञानधर्मस्य तं व्यामोहयति तदा तस्य जीवत्वम्। सदंशस्तु क्रियाशक्तेर्गतत्वादव्यक्ततामापद्यते। पश्चान्मूलभूतिक्रियांशाभिर्यथायथं अभिव्यज्यते। पश्चात्तस्यां तत्कृतधर्मे वा तिरोहिते स्वयमपि तिरोभवति तदा तस्यां मूलेच्छया जातः शब्दोऽभिव्यक्तस्तिष्ठति जीवभगवद्बुद्धिषु जीवे भगवति च। एवं चिद्रूपोऽपि ज्ञानशक्त्यंशभूतैर्ज्ञानैरभिव्यज्यते तिरोभवति च। प्रयत्नस्तु तस्यापराधीन इति स जीवग्रहणार्थं सर्वदा तिष्ठति। स चेद्भगवांस्तस्मै तां पूर्णां ज्ञानशक्तिं प्रयच्छेत् तदा तां व्यामोहिकां मायां त्यजति प्रयत्नं च स्वरूपे चावतिष्ठति अपराधीनश्च भवति। जगत्कर्तृत्वं तु न भवति तस्य सा मायाशक्तिर्न भवति यतः आनन्दस्यैवोत्कृष्टत्वात्। हीनता तु आपाततो वर्तते आनन्देन सह मिलितस्त्वानन्दोऽपि भवति। स चेत्स्वधर्मेण संगृह्णीयात्। यथोक्तं विष्णुपुराणे 6।7।61विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा। अविद्या कर्मसंज्ञाऽन्या तृतीया शक्तिरिष्यते। इति। इयं प्रक्रिया सर्वश्रुतिवाक्यानुरोधेन श्रुतार्थापत्तिसिद्धा सर्वत्रैवोपयुज्यते अन्यथा प्रक्रियावाक्यानि बाधते इति श्रीमदाचार्योक्तपदव्याख्या। जीवभूतो भगवदंशः ययेदं जगत् शरीरं जडं सदसन्मिश्रितं विराड्रूपं धार्यते तां मे परां प्रकृतिं विद्धि।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
7.5 O mighty-armed one, iyam, this; is apara, the inferior (Prakrti)-not the higher, (but)-the impure, the source of evil and having the nature of worldly bondage. Viddhi, know; anyam, the other, pure; prakrtim, Prakrti; me, of Mine, which is essentially Myself; which, tu, however;is param, higher, more exalted; itah, than this (Prakrti) already spoken of; Jiva-bhutam, which has taken the form of the individual souls, which is characterized as 'the Knower of the body (field)', and which is the cause of sustenance of life; and yaya, by which Prakriti; idam, this; jagat, world; dharyate, is upheld, by permeating it.
Dr. S. Sankaranarayan
20th century CE · Academic / Shaiva
Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.
7.4-5 Bhumih etc. Apard etc. [The demonstrative] 'this' denotes what is being perceived [as objects] through sense-organs by all men at the stage of mundane life. This is only one and at the same time is divided eigth-fold. Therefore the universe is one and unitary, because it is made of one single material cause. By this statement, monism is demonstrated even while following the Prakrti theory. The selfsame Prakrti has become the living one i.e., the personal Soul. Hence it is superior [to what has become eight-fold]. It also belongs to Me alone and not to anybody else. This Prakrti is [thus] two-fold and varied in the form of the universe consisting of the knowables and the knower. That is why this Prakrti (the basic material nature), being the substratum of all beings reflected on the surface of the clean mirror, viz., the Self , is nothing but Self's own nature and [hence] never leaves Him. This world : the Earth etc. [mentioned in the 4th verse].
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
7.5 This is My lower Prakrti. But know My higher Prakrti which is different from this, i.e., whose nature is different from this inanimate Prakrti constituting the objects of enjoyment to animate beings. It is 'higher', i.e., is more pre-eminent compared to the lower Prakrti which is constituted only of inanimate substances. This higher Nature of Mine is the individual self. Know this as My higher Prakrti through which the whole inanimate universe is sustained.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 7.5?
अपरा न परा निकृष्टा अशुद्धा अनर्थकरी संसारबन्धनात्मिका इयम्। इतः अस्याः यथोक्तायाः तु अन्यां विशुद्धां प्रकृतिं मम आत्मभूतां विद्धि मे परां प्रकृष्टां जीवभूतां क्षेत्रज्ञलक्षणां प्राणधारणनिमित्तभूतां हे महाबाहो यया प्रकृत्या इदं धार्यते जगत् अन्तः प्रविष्टया।।
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 7.5, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.