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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 29
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्

जरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं। — VaniSagar

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NepaliIND

ममा शरण लिएर वृद्धावस्था र मृत्युबाट मुक्तिको लागि प्रयास गर्नेहरूले ब्रह्म, आत्मको सम्पूर्ण ज्ञान र सम्पूर्ण कर्मलाई पूर्णरूपमा बुझ्छन्।

SindhiIND

جيڪي مون ۾ پناهه وٺي، پوڙھائپ ۽ موت کان ڇوٽڪارو حاصل ڪرڻ جي ڪوشش ڪن ٿا، تن کي پوريءَ طرح برهمڻ، نفس جو سمورو علم ۽ سڀ عمل معلوم ٿئي ٿو.

MalayalamIND

എന്നെ ശരണം പ്രാപിച്ച്, വാർദ്ധക്യത്തിൽ നിന്നും മരണത്തിൽ നിന്നും മോചനത്തിനായി പരിശ്രമിക്കുന്നവർ, ആ ബ്രഹ്മത്തെ, ആത്മജ്ഞാനത്തെ, എല്ലാ പ്രവർത്തനങ്ങളെയും പൂർണ്ണമായി മനസ്സിലാക്കുന്നു.

PunjabiIND

ਜੋ ਮੇਰੀ ਸ਼ਰਨ ਲੈ ਕੇ ਬੁਢਾਪੇ ਅਤੇ ਮੌਤ ਤੋਂ ਛੁਟਕਾਰਾ ਪਾਉਣ ਦਾ ਯਤਨ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਪੂਰਨ ਰੂਪ ਵਿਚ ਉਸ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੂੰ, ਆਤਮ ਦਾ ਸਾਰਾ ਗਿਆਨ, ਅਤੇ ਸਾਰੀ ਕਿਰਿਆ ਸਮਝ ਲੈਂਦੇ ਹਨ।

MarathiIND

जे म्हातारपण आणि मृत्यूपासून मुक्तीसाठी प्रयत्न करतात, माझा आश्रय घेतात, त्यांना ब्रह्म, आत्म्याचे संपूर्ण ज्ञान आणि सर्व कृतीची पूर्ण जाणीव होते.

KannadaIND

ನನ್ನಲ್ಲಿ ಆಶ್ರಯ ಪಡೆದು ವೃದ್ಧಾಪ್ಯ ಮತ್ತು ಮರಣದಿಂದ ವಿಮೋಚನೆಗಾಗಿ ಶ್ರಮಿಸುವವರು ಬ್ರಹ್ಮವನ್ನು, ಆತ್ಮದ ಸಂಪೂರ್ಣ ಜ್ಞಾನ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಕ್ರಿಯೆಯನ್ನು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಅರಿತುಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ.

TamilIND

முதுமை மற்றும் இறப்பு ஆகியவற்றிலிருந்து விடுதலை பெற முயல்பவர்கள், என்னிடம் அடைக்கலமாகி, பிரம்மம், முழு சுய அறிவு மற்றும் அனைத்து செயல்களையும் முழுமையாக உணர்கிறார்கள்.

BengaliIND

যারা বার্ধক্য ও মৃত্যু থেকে মুক্তির জন্য চেষ্টা করে, আমার শরণ করে, তারা পূর্ণরূপে উপলব্ধি করে যে ব্রহ্ম, আত্মার সমস্ত জ্ঞান এবং সমস্ত কর্ম।

TeluguIND

వృద్ధాప్యం మరియు మృత్యువు నుండి విముక్తి కోసం ప్రయత్నించేవారు, నన్ను ఆశ్రయించి, ఆ బ్రహ్మాన్ని, ఆత్మ యొక్క మొత్తం జ్ఞానాన్ని మరియు అన్ని చర్యలను పూర్తిగా తెలుసుకుంటారు.

MizoIND

Tar leh thihna ata chhuah zalenna beitu, Keimaha inhumhimna neitute chuan Brahman, Mahni hriatna zawng zawng leh thiltih zawng zawng chu an hre chiang hle a ni.

MaithiliIND

जे लोकनि वृद्धावस्था आ मृत्यु सँ मुक्तिक लेल प्रयासरत छथि, हमरा शरण मे बैसल छथि, हुनका लोकनि केँ पूर्ण रूप सँ बोध होइत छनि जे ब्रह्म, आत्मक समस्त ज्ञान आ समस्त कर्म केँ।

ManipuriIND

ꯑꯍꯜ ꯑꯣꯏꯔꯀꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯁꯤꯕꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯛꯅꯕꯥ ꯍꯣꯠꯅꯔꯤꯕꯥ ꯃꯤꯁꯤꯡꯅꯥ ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯉꯥꯀꯄꯤꯗꯨꯅꯥ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯝ, ꯑꯥꯠꯃꯥꯒꯤ ꯖ꯭ꯅꯥꯟ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯊꯕꯛ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯅꯥ ꯈꯉꯏ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये'--यहाँ जरा (वृद्धावस्था) और मरणसे मुक्ति पानेका तात्पर्य यह नहीं है कि ब्रह्म अध्यात्म और कर्मका ज्ञान होनेपर वृद्धावस्था नहीं होगी शरीरकी मृत्यु नहीं होगी। इसका तात्पर्य यह है कि बोध होनेके बाद शरीरमें आनेवाली वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही पर ये दोनों अवस्थाएँ उसको दुःखी नहीं कर सकेंगी। जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें 'भूतप्रकृतिमोक्षम्' कहनेका तात्पर्य भूत और प्रकृति अर्थात् कार्य और कारणसे सम्बन्धविच्छेद होनेमें है ऐसे ही यहाँ 'जरामरणमोक्षाय' कहनेका तात्पर्य जरा मृत्यु आदि शरीरके विकारोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेमें है।जैसे कोई युवा पुरुष है तो उसकी अभी न वृद्धावस्था है और न मृत्यु है अतः वह जरामरणसे अभी मुक्त है। परन्तु वास्तवमें वह जरामरणसे मुक्त नहीं है क्योंकि जरामरणके कारण शरीरके साथ जबतक सम्बन्ध है तबतक जरामरणसे रहित होते हुए भी वह इनसे मुक्त नहीं है। परन्तु जो जीवन्मुक्त महापुरुष हैं उनके शरीरमें जरा और मरण होनेपर भी वे इनसे मुक्त हैं। अतः जरामरणसे मुक्त होनेका तात्पर्य है जिसमें जरा और मरण होते हैं ऐसे प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होना। जब मनुष्य शरीरके साथ तादात्म्य (मैं यही हूँ) मान लेता है तब शरीरके वृद्ध होनेपर मैं वृद्ध हो गया और शरीरके मरनेको लेकर मैं मर जाऊँगा ऐसा मानता है। यह मान्यता शरीर मैं हूँ और शरीर मेरा है इसीपर टिकी हुई है। इसलिये तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आया है 'जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्' अर्थात् जन्म मृत्यु जरा और व्याधिमें दुःखरूप दोषोंको देखना इसका तात्पर्य है कि शरीरके साथ मैं और मेरापन का सम्बन्ध न रहे। जब मनुष्य मैं और मेरापन से मुक्त हो जायगा तब वह जरा मरण आदिसे भी मुक्त हो जायगा क्योंकि शरीरके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही वास्तवमें जन्मका कारण है-- 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता 13। 21)। वास्तवमें इसका शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं है तभी सम्बन्ध मिटता है। मिटता वही है जो वास्तवमें नहीं होता।यहाँ 'मामाश्रित्य यतन्ति ये' पदोंमें आश्रय लेना और यत्न करना इन दो बातोंको कहनेका तात्पर्य है कि मनुष्य अगर स्वयं यत्न करता है तो अभिमान आता है कि मैंने ऐसा कर लिया जिससे ऐसा हो गया और अगर स्वयं यत्न न करके भगवान्के आश्रयसे सब कुछ हो जायगा ऐसा मानता है तो वह आलस्य और प्रमादमें तथा संग्रह और भोगमें लग जाता है। इसलिये यहाँ दो बातें बतायीं कि शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार स्वयं तत्परतासे उद्योग करे और उस उद्योगके होनेमें तथा उद्योगकी सफलतामें कारण भगवान्को माने।जो नित्यनिरन्तर वियुक्त हो रहा है ऐसे शरीरसंसारको मनुष्य प्राप्त और स्थायी मान लेता है। जबतक वह शरीर और संसारको स्थायी मानकर उसे महत्ता देता रहता है तबतक साधन करनेपर भी उसको भगवत्प्राप्ति नहीं होती। अगर वह शरीरसंसारको स्थायी न माने और उसको महत्त्व न दे तो भगवत्प्राप्तिमें देरी नहीं लगेगी। अतः इन दोनों बाधाओँको अर्थात् शरीरसंसारकी स्वतन्त्र सत्ताको और महत्ताको विचारपूर्वक हटाना ही यत्न करना है। परन्तु जो भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं वे श्रेष्ठ हैं। उनका तो यही भाव रहता है कि उस प्रभुकी कृपासे ही साधनभजन हो रहा है। भगवान्की कृपाका आश्रय लेनेसे और अपने बलका अभिमान न करनेसे वे भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं।जो भगवान्का आश्रय न लेकर अपना कल्याण चाहते हुए उद्योग करते हैं उनको अपनेअपने साधनके अनुसार भगवत्स्वरूपका बोध तो हो जाता है पर भगवान्के समग्ररूपका बोध उनको नहीं होता। जैसे कोई प्राणायाम आदिके द्वारा योगका अभ्यास करता है तो उसको अणिमा महिमा आदि सिद्धियाँ मिलती हैं और उनसे ऊँचा उठनेपर परमात्माके निराकारस्वरूपका बोध होता है अथवा अपने स्वरूपमें स्थिति होती है। ऐसे ही बौद्ध जैन आदि सम्प्रदायोंमें चलनेवाले जितने मनुष्य हैं जो कि ईश्वरको नहीं मानते वे भी अपनेअपने सम्प्रदायके सिद्धान्तोंके अनुसार साधन करके असत्जडरूप संसारसे सम्बन्धविच्छेद करके मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो संसारसे विमुख होकर भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं उनको भगवान्के समग्ररूपका बोध होकर भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है यह विलक्षणता बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ 'मामाश्रित्य यतन्ति ये' कहा है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वे किसलिये भजते हैं सो कहते हैं जो पुरुष जरा और मृत्युसे छूटनेके लिये मुझ परमेश्वरका आश्रय लेकर अर्थात् मुझमें चित्तको समाहित करके प्रयत्न करते हैं वे जो परब्रह्म है उसको जानते हैं एवं समस्त अध्यात्म अर्थात् अन्तरात्मविषयकवस्तुको और अखिल समस्त कर्मको भी जानते हैं।

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Sri Anandgiri

यथोक्तानामधिकारिणां भगवद्भजनफलं प्रश्नद्वारा दर्शयति ते किमर्थमिति। जरामरणादिलक्षणो यो बन्धस्तद्विश्लेषार्थं भगवद्भजनमित्यर्थः। संप्रति सगुणस्य सप्रपञ्चस्य मध्यमानुग्रहार्थं ध्येयत्वमाह मामाश्रित्येति। जरादिसंसारनिवृत्त्यर्थं निर्गुणं निष्प्रपञ्चं मामुत्तमाधिकारिणो जानन्तीत्युक्तंमामेव ये प्रपद्यन्ते इत्यादावित्याह जरेति। मध्यमाधिकारिणः प्रत्याह मामेति। परमेश्वराश्रयणं नाम विषयविमुखत्वेन भगवदेकनिष्ठत्वमित्याह मत्समाहितेति। प्रयतनं भगवन्निष्ठासिद्ध्यर्थं बहिरङ्गाणां यज्ञादीनामन्तरङ्गाणां च श्रवणादीनामनुष्ठानम्। प्रागुक्तं जगदुपादानं परं ब्रह्म। कथं ब्रह्म विदुरित्यपेक्षायां समस्ताध्यात्मवस्तुत्वेन सकलकर्मत्वेन च तद्विदुरित्याह कृत्स्नमिति।

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Sri Dhanpati

किमर्थ भजन्तीत्यत आह जरामरणमोक्षाय मां परमेश्वरं सगुणमाश्रित्य ये पापहिताः पुण्यकर्माणो द्वन्द्वमोहविनिर्मुक्ताः दृढव्रताः सन्तो यतन्ति यतन्ते ते यत्परं ब्रह्म तद्विदुः। तथा कृत्स्त्रमध्यात्मं प्रत्यगात्मविषयं वस्तु कर्म च वक्ष्यमाणम्। यत्तु कर्म च तदुभयवेदनसाधनं गुरुपसदश्रवणमननाद्यखिलं निरवशेषं फलाव्यभिचारीति केचित्। तन्न।भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः इति मूलतद्भाष्यस्य यागदानहोमात्मकं वैदिकं कर्मेत्यादिस्वोक्तेश्च विरोधस्य स्पष्टत्वादखिलं प्रपञ्चं ब्रह्मानन्यं सर्वं विदुः। तथा चैवंज्ञानिनो जरामरणादिलक्षणात्संसारान्मुच्यन्त इति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
jarāfrom old age
maraṇaand death
mokṣhāyafor liberation
māmme
āśhrityatake shelter in
yatantistrive
yewho
tethey
brahmaBrahman
tatthat
viduḥknow
kṛitsnameverything
adhyātmamthe individual self
karmakarmic action
chaand
akhilamentire
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Bhagavad Gita · 7.28
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः

परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्योंके पाप नष्ट गये हैं, वे द्वन्द्वमोहसे रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं। — VaniSagar

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साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः

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Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 29
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्

जरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ: "जरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 29?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 29 translates to: "Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realize in full that Brahman, the whole knowledge of the Self, and all action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 29 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। जरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye" mean in English?

"jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 29. Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realize in full that Brahman, the whole knowledge of the Self, and all action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.