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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप

हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप ! इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्व-मोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त हो रहे हैं। — VaniSagar

Global Translations

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NepaliIND

हे भरत, हे परन्तपा, इच्छा र घृणाबाट उत्पन्न विरोधी जोडीहरूको भ्रमले सबै प्राणीहरू जन्ममा भ्रममा परेका छन्।

PunjabiIND

ਹੇ ਪਰੰਤਪਾ, ਹੇ ਭਰਤ, ਕਾਮਨਾ ਅਤੇ ਵੈਰ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਦੇ ਜੋੜਿਆਂ ਦੇ ਭਰਮ ਕਾਰਨ ਸਾਰੇ ਜੀਵ ਜਨਮ ਸਮੇਂ ਭਰਮ ਦੇ ਅਧੀਨ ਹਨ।

MalayalamIND

ഹേ ഭരതാ, ഹേ പരന്തപാ, ആഗ്രഹത്തിൽ നിന്നും വിരക്തിയിൽ നിന്നും ഉണ്ടാകുന്ന വിരുദ്ധ ജോഡികളുടെ ഭ്രമത്താൽ എല്ലാ ജീവികളും ജന്മനാ തന്നെ മായയ്ക്ക് വിധേയമാകുന്നു.

TamilIND

ஓ பாரதா, ஆசை மற்றும் வெறுப்பின் காரணமாக எழும் எதிர் ஜோடிகளின் மாயையால் அனைத்து உயிரினங்களும் பிறப்பிலேயே மாயைக்கு ஆளாகின்றன, ஓ பரந்தபா.

TeluguIND

ఓ భరతా, కోరిక మరియు విరక్తి కారణంగా ఉత్పన్నమయ్యే వ్యతిరేక జంటల మాయ కారణంగా అన్ని జీవులు జన్మలో మాయకు గురవుతారు, ఓ పరంతపా.

BhojpuriIND

हे भरत, काम-विरक्ति से उत्पन्न विपरीत-युग्मन के मोह से सभ जीव जन्म में मोह के अधीन हो जालें हे परंतप।

DogriIND

हे भारत, कामना ते विरक्ति थमां पैदा होए दे विपरीत जोड़े दे मोह दे कारण जन्म दे समें सारे प्राणी मोह दे अधीन होंदे न हे परंतप।

KonkaniIND

हे भरत, कामना-विरहांतल्यान निर्माण जावपी विरुध्द जोड्यांच्या मोहाक लागून सगळे जीव जल्मावेळार मोहांत पडटात, हे परंतप.

KannadaIND

ಓ ಭರತ, ಓ ಪರಂತಪಾ, ಬಯಕೆ ಮತ್ತು ವಿರಕ್ತಿಯಿಂದ ಉದ್ಭವಿಸುವ ವಿರುದ್ಧ ಜೋಡಿಗಳ ಭ್ರಮೆಯಿಂದಾಗಿ ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳು ಜನ್ಮದಲ್ಲಿ ಭ್ರಮೆಗೆ ಒಳಗಾಗುತ್ತವೆ.

MarathiIND

हे भरता, हे परंतपा, इच्छा आणि तिरस्कारामुळे निर्माण झालेल्या विरुद्धच्या जोडीच्या भ्रांतीमुळे सर्व प्राणी जन्मतःच भ्रमात आहेत.

SindhiIND

اي پرانتپا، اي ڀارت، خواهش ۽ نفرت مان پيدا ٿيندڙ مخالفن جي جوڙن جي فريب جي ڪري، سڀ مخلوقات جنم وقت ئي فريب ۾ مبتلا آهن.

GujaratiIND

હે ભરત, હે પરંતપ, ઈચ્છા અને દ્વેષથી ઉદ્ભવતા વિરોધી જોડીના ભ્રમને કારણે જન્મ સમયે જ બધા જીવો ભ્રમને આધીન છે.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'इच्छाद्वेषसमुत्थेन ৷৷. सर्गे यान्ति परंतप'--इच्छा और द्वेषसे द्वन्द्वमोह पैदा होता है, जिससे मोहित होकर प्राणी भगवान्से बिलकुल विमुख हो जाते हैं और विमुख होनेसे बार-बार संसारमें जन्म लेते हैं।मनुष्यको संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्में लगनेकी आवश्यकता है। भगवान्में न लगनेमें बड़ी बाधा क्या है? यह मनुष्यशरीर विवेक-प्रधान है; अतः मनुष्यकी प्रवृत्ति और निवृत्ति पशु-पक्षियोंकी तरह न होकर अपने विवेकके अनुसार होनी चाहिये। परन्तु मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व न देकर राग और द्वेषको लेकर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है, जिससे उसका पतन होता है।मनुष्यकी दो मनोवृत्तियाँ हैं--एक तरफ लगाना और एक तरफसे हटाना। मनुष्यको परमात्मामें तो अपनी वृत्ति लगानी है और संसारसे अपनी वृत्ति हटानी है अर्थात् परमात्मासे तो प्रेम करना है और संसारसे वैराग्य करना है। परन्तु इन दोनों वृत्तियोंको जब मनुष्य केवल संसारमें ही लगा देता है तब वही प्रेम और वैराग्य क्रमशः राग और द्वेषका रूप धारण कर लेते हैं, जिससे मनुष्य संसारमें उलझ जाता है और भगवान्से सर्वथा विमुख हो जाता है। फिर भगवान्की तरफ चलनेका अवसर ही नहीं मिलता। कभी-कभी वह सत्संगकी बातें भी सुनता है, शास्त्र भी पढ़ता है, अच्छी बातोंपर विचार भी करता है, मनमें अच्छी बातें पैदा हो जाती हैं तो उनको ठीक भी समझता है। फिर भी उसके मनमें रागके कारण यह बात गहरी बैठी रहती है कि मुझे तो सांसारिक अनुकूलताको प्राप्त करना है और प्रतिकूलताको हटाना है, यह मेरा खास काम है; क्योंकि इसके बिना मेरा जीवननिर्वाह नहीं होगा। इस प्रकार वह हृदयमें दृढ़तासे रागद्वेषको पकड़े रखता है जिससे सुनने पढ़ने और विचार करनेपर भी उसकी वृत्ति रागद्वेषरूप द्वन्द्वको नहीं छोड़ती। इसीसे वह परमात्माकी तरफ चल नहीं सकता।द्वन्द्वोंमें भी अगर उसका राग मुख्यरूपसे एक ही विषयमें हो जाय तो भी ठीक है। जैसे भक्त बिल्वमंगलकी वृत्ति चिन्तामणि नामक वेश्यामें लग गयी तो उनकी वृत्ति संसारसे तो हट ही गयी। जब वेश्याने यह ताड़ना की ऐसे हाड़मांसके शरीरमें तू आकृष्ट हो गया अगर भगवान्में इतना आकृष्ट हो जाता तो तू निहाल हो जाता तब उनकी वृत्ति वेश्यासे हटकर भगवान्में लग गयी और उनका उद्धार हो गया। इसी तरहसे गोपियोंका भगवान्में राग हो गया तो वह राग भी कल्याण करनेवाला हो गया। शिशुपालका भगवान्के साथ वैर (द्वेष) रहा तो वैरपूर्वक भगवान्का चिन्तन करनेसे भी उसका कल्याण हो गया। कंसको भगवान्से भय हुआ तो भयवृत्तिसे भगवान्का चिन्तन करनेसे उसका भी कल्याण हो गया। हाँ यह बात जरूर है कि वैर और भयसे भगवान्का चिन्तन करनसे शिशुपाल और कंस भक्तिके आनन्दको नहीं ले सके। तात्पर्य यह है कि किसी भी तरहसे भगवान्की तरफ आकर्षण हो जाय तो मनुष्यका उद्धार हो जाता है। परन्तु संसारमें रागद्वेष कामक्रोध ठीकबेठीक अनुकूलप्रतिकूल आदि द्वन्द्व रहनेसे मूढ़ता दृढ़ होती है और मनुष्यका पतन हो जाता है।दूसरी रीतिसे यों समझें कि संसारका सम्बन्ध द्वन्द्वसे दृढ़ होता है। जब कामनाको लेकर मनोवृत्तिका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है तब सांसारिक अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर रागद्वेष हो जाते हैं अर्थात् एक ही पदार्थ कभी ठीक लगता है कभी बेठीक लगता है कभी उसमें राग होता है कभी द्वेष होता है जिनसे संसारका सम्बन्ध दृढ़ हो जाता है। इसलिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें 'निर्द्वन्द्वः'(2। 45) पदसे द्वन्द्वरहित होनेकी आज्ञा दी है। निर्द्वन्द्व पुरुष सुखपूर्वक मुक्त होता है--'निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते' (5। 3)। सुखदुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होकर भक्तजन अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं--'द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्' (15। 5)। भगवान्ने द्वन्द्वको मनुष्यका खास शत्रु बताया है (3। 34)। जो द्वन्द्वमोहसे रहित होते हैं वे दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं (7। 28) इत्यादि रूपसे गीतामें द्वन्द्वरहित होनेकी बात बहुत बार आयी है।जन्ममरणमें जानेका कारण क्या है शास्त्रोंकी दृष्टिसे तो जन्ममरणका कारण अज्ञान है परन्तु सन्तवाणीको देखा जाय तो जन्ममरणका खास कारण रागके कारण प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग है। फलेच्छापूर्वक शास्त्रविहित कर्म करनेसे और प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् भगवदाज्ञाविरुद्ध कर्म करनेसे सत्असत् योनियोंकी प्राप्ति होती है अर्थात् देवताओँकी योनि चौरासी लाख योनि और नरक प्राप्त होते हैं।प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करनेसे सम्मोह अर्थात् जन्ममरण मिट जाता है। उसका सदुपयोग कैसे करें हमारेको जो अवस्था परिस्थिति मिली है उसका दुरुपयोग न करनेका निर्णय किया जाय कि हम दुरुपयोग नहीं करेंगे अर्थात् शास्त्र और लोकमर्यादाके विरुद्ध काम नहीं करेंगे। इस प्रकार रागरहित होकर दुरुपयोग न करनेका निर्णय होनेपर सदुपयोग अपनेआप होने लगेगा अर्थात् शास्त्र और लोकमर्यादाके अनुकूल काम होने लगेगा। जब सदुपयोग होने लगेगा तो उसका हमें अभिमान नहीं होगा। कारण कि हमने तो दुरुपयोग न करनेका विचार किया है सदुपयोग करनेका विचार तो हमने किया ही नहीं फिर करनेका अभिमान कैसे इससे तो कर्तृत्वअभिमानका त्याग हो जायगा। जब हमने सदुपयोग किया ही नहीं तो उसका फल भी हम कैसे चाहेंगे क्योंकि सदुपयोग तो हुआ है किया नहीं। अतः इससे फलेच्छाका त्याग हो जायगा। कर्तृत्वअभिमान और फलेच्छाका होनेसे अर्थात् बन्धनका अभाव होनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध है।प्रायः साधकोंमें यह बात गहराईसे बैठी हुई है कि साधनभजन जपध्यान आदि करनेका विभाग अलग है और सांसारिक कामधंधा करनेका विभाग अलग है। इन दो विभागोंके कारण साधक भजनध्यान आदिको तो बढ़ावा देते हैं पर सांसारिक कामधंधा करते हुए रागद्वेष कामक्रोध आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते प्रत्युत ऐसी दृढ़ भावना बना लेते हैं कि कामधंधा करते हुए तो रागद्वेष होते ही हैं ये मिटनेवाले थोड़े ही हैं। इस भावनासे बड़ा भारी अनर्थ यह होता है कि साधकके रागद्वेष बने रहते हैं जिससे उसके साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। वास्तवमें साधक चाहे पारमार्थिक कार्य करे चाहे सांसारिक कार्य करे उसके अन्तःकरणमें रागद्वेष नहीं रहने चाहिये।पारमार्थिक और सांसारिक क्रियाओंमें भेद होनेपर भी साधकके भावमें भेद नहीं होना चाहिये अर्थात् पारमार्थिक और सांसारिक दोनों क्रियाएँ करते समय साधकका भाव एक ही रहना चाहिये कि मैं साधक हूँ और मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है। इस प्रकार क्रियाभेद तो रहेगा ही और रहना भी चाहिये पर भावभेद नहीं रहेगा। भावभेद न रहनेसे अर्थात् एक भगवत्प्राप्तिका ही भाव (उद्देश्य) रहनेसे पारमार्थिक और सांसारिक दोनों ही क्रियाएँ साधन बन जायँगी।

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Sri Harikrishnadas Goenka

आपका तत्त्व जाननेमें ऐसा कौन प्रतिबन्धक है जिससे मोहित हुए सभी उत्पत्तिशील प्राणी आपको नहीं जान पाते यह जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं इच्छा और द्वेष इन दोनोंसे जो उत्पन्न होता है उसका नाम इच्छाद्वेषसमुत्थ है उससे ( प्राणी मोहित होते हैं। ) वह कौन है ऐसी विशेष जिज्ञासा होनेपर यह कहते हैं द्वन्द्वोंके निमित्तसे होनेवाला जो मोह है उस द्वन्द्वमोहसे ( सब मोहित होते हैं )। शीत और उष्णकी भाँति परस्परविरुद्ध ( स्वभाववाले ) और सुखदुःख तथा उनके कारणोंमें रहनेवाले वे इच्छा और द्वेष ही यथासमय सब भूतप्राणियोंसे सम्बन्धयुक्त होकर द्वन्द्व नामसे कहे जाते हैं। सो ये इच्छा और द्वेष जब इस प्रकार सुखदुःख और उनके कारणकी प्राप्ति होनेपर प्रकट होते हैं तब वे सब भूतोंकी बुद्धिको अपने वशमें करके परमार्थतत्त्वविषयक ज्ञानकी उत्पत्तिका प्रतिबन्ध करनेवाले मोहको उत्पन्न करते हैं। जिसका चित्त इच्छाद्वेषरूप दोषोंके वशमें फँस रहा है उसको बाहरी विषयोंके भी यथार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त नहीं होता फिर उन दोनोंसे जिसकी बुद्धि आच्छादित हो रही है ऐसे मूढ़ पुरुषको अनेकों प्रतिबन्धोंवाले अन्तरात्माके सम्बन्धमें ज्ञान नहीं होता इसमें तो कहना ही क्या है इसलिये हे भारत अर्थात् भरतवंशमें उत्पन्न अर्जुन उस इच्छाद्वेषजन्य द्वन्द्वनिमित्तक मोहके द्वारा मोहित हुए समस्त प्राणी हे परंतप जन्मकालमें उत्पन्न होते ही मूढ़भावमें फँस जाते हैं। अभिप्राय यह है कि उत्पत्तिशील समस्त प्राणी मोहके वशीभूत हुए ही उत्पन्न होते हैं। ऐसा होनेके कारण द्वन्द्वमोहसे जिनका ज्ञान प्रतिबद्ध हो गया है वे मोहित हुए समस्त प्राणी अपने आत्मारूप मुझ ( परमात्मा ) को नहीं जानते और इसीलिये वे आत्मभावसे मुझे नहीं भजते।

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Sri Anandgiri

भगवत्तत्त्वविज्ञानप्रतिबन्धकं मूलाज्ञानातिरिक्तं प्रश्नद्वारेणोदाहरति केनेत्यादिना। पुनःशब्दात्प्रतिबन्धकान्तरविवक्षा गम्यते। अपरोक्षमवान्तरप्रतिबन्धकमिदमा गृह्यते। विशेषमाकाङ्क्षापूर्वकं निक्षिपति केनेति। विशेषापेक्षायामिति। द्वन्द्वशब्देन गृहीतयोरपीच्छाद्वेषयोर्ग्रहणं द्वन्द्वशब्दार्थोपलक्षणार्थमित्यभिप्रेत्याह तावेवेति। तयोरपर्यायमेकत्रानुपपत्तिं गृहीत्वा विशिनष्टि यथाकालमिति। नच तयोरनधिकरणं किंचिदपि भूतं संसारमण्डले संभवतीत्याह सर्वभूतैरिति। तथापि कथं तयोर्मोहहेतुत्वमित्याशङ्क्याह तत्रेति। तयोराश्रयः सप्तम्यर्थः। उक्तमेवार्थं कैमुतिकन्यायेन प्रपञ्चयति नहीति। पूर्वभागानुवादपूर्वकमुत्तरभागेन फलितमाह अत इति। प्रत्यगात्मन्यहंकारादिप्रतिबन्धप्रभावतो ज्ञानोत्पत्तेरसंभवोऽतःशब्दार्थः। कुलप्रसूत्यभिमानेन स्वरूपशक्त्या च युक्तस्यैव यथोक्तप्रतिबन्धप्रतिविधानसामर्थ्यमिति द्योतनार्थं भारत परंतपेति संबोधनद्वयम्। तत्त्वज्ञानप्रतिबन्धे प्रकृतभवान्तरकारणमुपसंहरति मोहेति। जायमानभूतानां मोहपरतन्त्रत्वे फलितमाह यत इति। भगवत्तत्त्ववेदनाभावे तन्निष्ठत्ववैधुर्यं फलतीत्याह अतएवेति।

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Sri Dhanpati

भगवत्तत्वापरिज्ञाने मूलज्ञानं निमित्तमुक्त्वा तत्र प्रतिबन्धकान्तरमाह। इच्छाद्वेषाभ्यां रागद्वेषाभ्यासमनुकूलप्रतिकूलविषयाभ्यामुत्थितेन शीतोष्णसुखदुःखनिमित्तेन मोहेन चित्त्व्याकुलतापादकेन सर्वाणि भूतानि सर्गे उत्पत्ति काले प्राप्ते संमोहमतिमूढतां यान्ति गच्छन्ति। इत्छाद्वेषवशीकृतचित्तस्य बाह्यपदार्थोष्वपि यथा भूतार्थविषयं ज्ञानं नोत्पद्यते ताभ्यामाविष्टुबद्धेः संमूढस्य प्रत्गात्मनि बहुप्रतिबन्धे सति तन्नेत्पद्यत इति किमु वक्तव्यमिति भारत परंतपेति संबोधनद्वेयेनोत्तमवंशोद्भवत्वात् स्वतः शत्रुतापनत्वेनोत्कृष्टशक्तिमत्वाच्च उक्तप्रतिबन्धेन संमोहं गन्तुमयोग्योऽसीत सूचयति। यत्तु केन पुनर्निमित्तेनातीतादीनिं भूतानि न जानन्तीत्याशङ्क्याह इच्छेति। इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन शोभनाशोभनसत्यासत्यनित्यानित्यात्मानात्मसु विपर्यय स्तेन सर्वभूतानि सर्गे सृष्टिविषये संमोहमविवेकं यान्ति। अयं भावः यो हि सृष्टे रुपमानन्दस्वरुपं च तत्त्वतो जानाति स ब्रह्मवित् सर्वज्ञत्वादतीतादीञ्जानाति। सृष्टौ च सर्वेषां मोहोऽस्ति अशोभने स्त्र्यादौ शोभनाध्यासादसत्ये प्रप़ञ्चे सत्यत्वाध्यासात् सत्ये चात्मनोऽसङ्गत्वेऽसत्यत्वाध्यासात् अनित्ये स्वर्गादौ नित्यत्वाध्यासादनात्मनि देहादावात्मत्वाध्यासात्। अतो विपर्ययेण सृष्टिज्ञानं प्रतिबद्धम्। तेन च सार्वज्ञ्यं न जायतेऽस्मदादीनामिति तच्चिन्त्यम्। मां तु वेद न कश्चनेत्युक्त्या त्वदवेदनं केन प्रतिबन्धेनेति प्रश्नेनैवेतच्छ्लोकावतरणस्यौचित्येन तदनुसारिव्याख्यानस्यैव न्याय्यत्वात्। उत्तरश्लोके भजन्ते मां दृढव्रता इतिवाक्यशेषविरोधाच्च। विष्णुतत्त्वज्ञानाज्ज्ञातव्यान्तरानवशेषेऽपि ईश्वरवत्रैकालिकखिलज्ञानस्यालाभाच्चेति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ichchhādesire
dveṣhaaversion
samutthenaarise from
dvandvaof duality
mohenafrom the illusion
bhārataArjun, descendant of Bharat
sarvaall
bhūtāniliving beings
sammohaminto delusion
sargesince birth
yāntienter
parantapaArjun, conqueror of enemies
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.26
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन

हे अर्जुन ! जो प्राणी भूतकालमें हो चुके हैं, तथा जो वर्तमानमें हैं और जो भविष्यमें होंगे, उन सब प्राणियोंको तो मैं जानता हूँ; परन्तु मेरेको कोई (मूढ़ मनुष्य) नहीं जानता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.28
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः

परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्योंके पाप नष्ट गये हैं, वे द्वन्द्वमोहसे रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप

हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप ! इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्व-मोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त हो रहे हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप ! इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्व-मोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त हो रहे हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 27 translates to: "O Bharata, all beings are subject to delusion at birth due to the delusion of the pairs of opposites arising from desire and aversion, O Parantapa. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप ! इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्व-मोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त हो रहे हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ichchhā-dveṣha-samutthena dvandva-mohena bhārata" mean in English?

"ichchhā-dveṣha-samutthena dvandva-mohena bhārata" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 27. O Bharata, all beings are subject to delusion at birth due to the delusion of the pairs of opposites arising from desire and aversion, O Parantapa. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.