Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 24
अव्यक्तं व्यक्ितमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्

बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त (मन-इन्द्रियोंसे पर) मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर धारण करनेवाला मानते हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

NepaliIND

मुर्खहरूले मलाई, अव्यक्त, प्रकट भएको, मेरो उच्च, अपरिवर्तनीय र उत्कृष्ट प्रकृतिलाई नजान्ने ठान्छन्।

SindhiIND

بيوقوف مون کي، غير ظهور، مون کي ظاهر سمجهن ٿا، منهنجي اعلي، بي بدلي ۽ بهترين طبيعت کي نه ڄاڻڻ.

MarathiIND

मूर्ख लोक मला, अव्यक्त, प्रकट समजतात, माझा उच्च, अपरिवर्तनीय आणि उत्कृष्ट स्वभाव जाणत नाहीत.

MalayalamIND

അവ്യക്തനായ എന്നെ, എൻ്റെ ഉയർന്നതും മാറ്റമില്ലാത്തതും ഏറ്റവും മികച്ചതുമായ സ്വഭാവം അറിയാത്ത, പ്രകടനമുള്ളതായി മൂഢൻ കരുതുന്നു.

TeluguIND

అవ్యక్తుడైన నన్ను, నా ఉన్నతమైన, మార్పులేని మరియు అత్యంత శ్రేష్ఠమైన స్వభావాన్ని తెలుసుకోకుండా, అభివ్యక్తిని కలిగి ఉన్నట్లు మూర్ఖులు భావిస్తారు.

TamilIND

மூடனாகிய என்னை, வெளிப்படைத்தன்மை கொண்டவனாக, என்னுடைய உயர்ந்த, மாறாத, மிகச் சிறந்த இயல்பை அறியாதவனாக நினைக்கிறான்.

KannadaIND

ಅವ್ಯಕ್ತವಾದ ನನ್ನ ಬಗ್ಗೆ ಮೂರ್ಖರು ಭಾವಿಸುತ್ತಾರೆ, ನನ್ನ ಉನ್ನತ, ಬದಲಾಗದ ಮತ್ತು ಅತ್ಯುತ್ತಮ ಸ್ವಭಾವವನ್ನು ತಿಳಿದಿಲ್ಲ.

PunjabiIND

ਮੂਰਖ ਮੈਨੂੰ, ਅਪ੍ਰਗਟ, ਪ੍ਰਗਟ ਹੋਣ ਵਾਲਾ, ਮੇਰੇ ਉੱਚੇ, ਅਟੱਲ, ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਤਮ ਸੁਭਾਅ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਸਮਝਦੇ ਹਨ।

MaithiliIND

मूर्ख लोकनि हमरा अव्यक्त केँ प्रकटीकरण वाला बुझैत छथि, हमर उच्च, अपरिवर्तनीय आ उत्तम स्वभाव केँ नहि जनैत छथि |

MizoIND

Mi âte chuan Kei, Lang lo, Ka nihna sang zawk, danglam thei lo leh ṭha ber pawh hre lovin, lan chhuahna nei angin an ngai a.

BhojpuriIND

मूर्ख लोग हमरा, अप्रकट के, के प्रकटीकरण वाला समझेला, हमरा उच्च, अपरिवर्तनीय आ सबसे उत्कृष्ट स्वभाव के ना जानत।

GujaratiIND

મૂર્ખ મને, અવ્યક્ત, અભિવ્યક્તિ ધરાવતો, મારા ઉચ્ચ, અપરિવર્તનશીલ અને શ્રેષ્ઠ સ્વભાવને જાણતો નથી એમ માને છે.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं ৷৷. ममाव्ययमनुत्तमम्--जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरेमें श्रद्धा-भक्ति नहीं है, वे अल्पमेधाके कारण अर्थात् समझकी कमीके कारण मेरेको साधारण मनुष्यकी तरह अव्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् जन्मने-मरनेवाला मानते हैं। मेरा जो अविनाशी अव्ययभाव है अर्थात् जिससे बढ़कर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता और जो देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत, सदा एकरूप रहनेवाला, निर्मल और असम्बद्ध है--ऐसे मेरे अविनाशी भावको वे नहीं जानते और मेरा अवतार लेनेका जो तत्त्व है, उसको नहीं जानते। इसलिये वे मेरेको साधरण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नहीं करते, प्रत्युत देवताओंकी उपासना करते हैं।'अबुद्धयः' पदका यह अर्थ नहीं है कि उनमें बुद्धिका अभाव है प्रत्युत बुद्धिमें विवेक रहते हुए भी अर्थात् संसारको उत्पत्ति-विनाशशील जानते हुए भी इसे मानते नहीं--यही उनमें बुद्धिरहितपना है, मूढ़ता है।दूसरा भाव यह है कि कामनाको कोई रख नहीं सकता, कामना रह नहीं सकती; क्योंकि कामना पहले नहीं थी और कामनापूर्तिके बाद भी कामना नहीं रहेगी। वास्तवमें कामनाकी सत्ता ही नहीं है, फिर भी उसका त्याग नहीं कर सकते --यही अबुद्धिपना है।मेरे स्वरूपको न जाननेसे वे अन्य देवताओंकी उपासनामें लग गये और उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामनामें लग जानेसे वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरेसे विमुख हो गये। यद्यपि वे मेरेसे अलग नहीं हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नहीं हो सकता, तथापि कामनाके कारण ज्ञान ढक जानेसे वे देवताओंकी तरफ खिंच जाते हैं। अगर वे मेरेको जान जाते, तो फिर केवल मेरा ही भजन करते।(1) बुद्धिमान् मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्के शरण होते हैं। वे भगवान्को ही सर्वोपरि मानते हैं। (2) अल्पमेधावाले मनुष्य वे होते हैं, जो देवताओंके शरण होते हैं। वे देवताओंको अपनेसे बड़ा मानते हैं जिससे उनमें थोड़ी नम्रता, सरलता रहती है। (3) अबुद्धिवाले मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्को देवता-जैसा भी नहीं मानते; किन्तु साधारण मनुष्य-जैसा ही मानते हैं। वे अपनेको ही सर्वोपरि, सबसे बड़ा मानते हैं ,(गीता 16। 14 15)। यही तीनोंमें अन्तर है।'परं भावमजानन्तः' का तात्पर्य है कि मैं अज रहता हुआ, अविनाशी होता हुआ और लोकोंका ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृतिको वशमें करके योगमायासे प्रकट होता हूँ--इस मेरे परमभावको बुद्धिहीन मनुष्य नहीं जानते।'अनुत्तमम्'कहनेका तात्पर्य है कि पन्द्रहवें अध्यायमें जिसको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम बताया है अर्थात् जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नहीं, ऐसे मेरे अनुत्तम भावको वे नहीं जानते। विशेष बात इस (चौबीसवें) श्लोकका अर्थ कोई ऐसा करते हैं कि '(ये) अव्यक्तं मां व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः' अर्थात् जो सदा निराकार रहनेवाले मेरेको केवल साकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे अव्यक्त, निर्विकार और निराकार स्वरूपको नहीं जानते। दूसरे कोई ऐसा अर्थ करते हैं कि '(ये) व्यक्तिमापन्नं माम् अव्यक्तं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः'अर्थात् मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हुआ हूँ--ऐसे मेरेको केवल निराकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भावको नहीं जानते।उपर्युक्त दोनों अर्थोंमेंसे कोई भी अर्थ ठीक नहीं है। कारण कि ऐसा अर्थ माननेपर केवल निराकारको माननेवाले साकाररूपकी और साकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे और केवल साकार माननेवाले निराकाररूपकी और निराकार-रूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे। यह सब एकदेशीयपना ही है। पृथ्वी, जल, तेज आदि जो महाभूत हैं, जो कि विनाशी और विकारी हैं, वे भी दो-दो तरहके होते हैं--स्थूल और सूक्ष्म। जैसे, स्थूलरूपसे पृथ्वी साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है ;जल बर्फ, बूँदें, बादल और भापरूपसे साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है; तेज (अग्नितत्त्व) काठ और दियासलाईमें रहता हुआ निराकार है और प्रज्वलित होनेसे साकार है, इत्यादि। इस तरहसे भौतिक सृष्टिके भी दोनों रूप होते हैं और दोनों होते हुए भी वास्तवमें वह दो नहीं होती। साकार होनेपर निराकारमें कोई बाधा नहीं लगती और निराकार होनेपर साकारमें कोई बाधा नहीं लगती। फिर परमात्माके साकार और निराकार दोनों होनेमें क्या बाधा है? अर्थात् कोई बाधा नहीं। वे साकार भी हैं, और निराकार भी हैं सगुण भी हैं और निर्गुण भी हैं।गीता साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण--दोनोंको मानती है। नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने अपनेको 'अव्यक्तमूर्ति' कहा है। चौथे अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मैं अज होता हुआ भी प्रकट होता हूँ, अविनाशी होता हुआ भी अन्तर्धान हो जाता हूँ और सबका ईश्वर होता हुआ भी आज्ञापालक (पुत्र और शिष्य) बन जाता हूँ। अतः निराकार होते हुए साकार होनेमें और साकार होते हुए निराकार होनेमें भगवान्में किञ्चिन्मात्र भी अन्तर नहीं आता। ऐसे भगवान्के स्वरूपको न जाननेके कारण लोग उनके विषयमें तरह-तरहकी कल्पनाएँ किया करते हैं। सम्बन्ध--भगवान्को साधारण मनुष्य माननेमें क्या कारण है? इसपर आगेका श्लोक कहते हैं

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

वे मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें क्यों नहीं आते सो बतलाते हैं मेरे अविनाशी निरतिशय परम भावको अर्थात् परमात्मस्वरूपको न जाननेवाले बुद्धिरहित विवेकहीन मनुष्य मुझको यद्यपि मैं नित्यप्रसिद्ध सबका ईश्वर हूँ तो भी ऐसा समझते हैं कि यह पहले प्रकट नहीं थे अब प्रकट हुए हैं। अभिप्राय यह कि मेरे वास्तविक प्रभावको न समझनेके कारण वे ऐसा मानते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

भगवद्भजनस्योत्तमफलत्वेऽपि प्राणिनां प्रायेण तन्निष्ठत्वाभावे प्रश्नपूर्वकं निमित्तं निवेदयति किंनिमित्तमित्यादिना। अप्रकाशं शरीरग्रहणात्पूर्वमिति शेषः। इदानीं लीलाविग्रहपरिग्रहावस्थायामित्यर्थः। प्रकाशस्य तर्हि कादाचित्कत्वं भगवति प्राप्तं नेत्याह नित्येति। कथं तर्हि भगवन्तमागन्तुकप्रकाशं मन्यन्ते तत्राबुद्धय इत्युत्तरम्। तद्विवृणोति परमिति। परमनुत्तममिति विशेषणद्वयं सोपाधिकनिरुपाधिकभावार्थम्।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

तर्हि सर्वेऽपि देवतान्तरभजनं विहाय त्वामेव कुतो न प्रतिपद्यन्त इत्याशङ्क्य मदप्रतिपत्तौ मत्परमेश्वरभावाज्ञानमेव निमित्तमित्याह। अव्यक्तमप्रकाशं लीलाविग्रहग्रहणात्पूर्वं इदानीं तद्ग्रहणावस्थायां व्यक्तिमापन्नं प्रकाशमागतं मां मन्यन्ते अबुद्धयो विवेकहीनाः। अबुद्धय इत्येतदुक्तं विवृणोति। ममाव्ययं व्ययरहितमनुत्तमं निरतिशयं परं भावं परमात्मस्वरुपं सोपाधिनिरुपाध्यात्मकमजानन्तोऽविवेकिनो नित्यसिद्धमीश्वरमपि सन्तं मां पूर्वमसन्तमधुनैवोत्पन्नं मन्यन्ते इत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
avyaktamformless
vyaktimpossessing a personality
āpannamto have assumed
manyantethink
māmme
abuddhayaḥless intelligent
paramSupreme
bhāvamnature
ajānantaḥnot understanding
mamamy
avyayamimperishable
anuttamamexcellent
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.23
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि

परन्तु उन अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको उन देवताओंकी आराधनाका फल अन्तवाला (नाशवान्) ही मिलता है। देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्

जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते (मानते), उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 24
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 24
अव्यक्तं व्यक्ितमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्

बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त (मन-इन्द्रियोंसे पर) मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर धारण करनेवाला मानते हैं। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ: "बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त (मन-इन्द्रियोंसे पर) मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर धारण करनेवाला मानते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 24?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 24 translates to: "The foolish think of Me, the Unmanifest, as having manifestation, not knowing My higher, immutable, and most excellent nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अव्यक्तं व्यक्ितमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 24 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त (मन-इन्द्रियोंसे पर) मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर धारण करनेवाला मानते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "avyaktaṁ vyaktim āpannaṁ manyante mām abuddhayaḥ" mean in English?

"avyaktaṁ vyaktim āpannaṁ manyante mām abuddhayaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 24. The foolish think of Me, the Unmanifest, as having manifestation, not knowing My higher, immutable, and most excellent nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.