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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्

जो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

GujaratiIND

કોઈપણ ભક્ત ગમે તે સ્વરૂપે શ્રદ્ધાથી પૂજા કરવાની ઈચ્છા રાખતો હોય, હું તેની એવી જ શ્રદ્ધાને દૃઢ અને અચળ બનાવું છું.

MarathiIND

कोणत्याही भक्ताला श्रद्धेने पूजन करण्याची इच्छा कोणत्याही रूपात असली, तरी मी त्याची तीच श्रद्धा दृढ आणि अढळ करतो.

TeluguIND

ఏ భక్తుడైనా ఏ రూపంలో విశ్వాసంతో పూజించాలని కోరుకుంటాడో, అదే విశ్వాసాన్ని నేను అతని దృఢంగా మరియు నిశ్చలంగా ఉంచుతాను.

BengaliIND

যে কোন ভক্ত বিশ্বাস সহকারে পূজা করতে চান না কেন, আমি তার সেই বিশ্বাসকে দৃঢ় ও অটল করি।

KannadaIND

ಯಾವುದೇ ಭಕ್ತನು ಯಾವ ರೂಪದಲ್ಲಿ ನಂಬಿಕೆಯಿಂದ ಪೂಜಿಸಲು ಬಯಸುತ್ತಾನೋ, ನಾನು ಅದೇ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ಅವನ ದೃಢವಾಗಿ ಮತ್ತು ಅಚಲವಾಗಿ ಮಾಡುತ್ತೇನೆ.

NepaliIND

कुनै पनि भक्तले जसरी पनि आस्थाका साथ आराधना गर्न चाहन्छन्, म उसको त्यही आस्थालाई दृढ र अटल बनाउँछु।

TamilIND

எந்த ஒரு பக்தன் எந்த வடிவத்தில் நம்பிக்கையுடன் வழிபட விரும்புகிறானோ, அதே நம்பிக்கையை அவனுடைய உறுதியான மற்றும் அசையாததாக ஆக்குகிறேன்.

SindhiIND

ڪو به عقيدتمند جنهن به روپ ۾ عقيدت سان عبادت ڪرڻ چاهي ٿو، مان انهيءَ ئي عقيدت کي سندس مضبوط ۽ بيٺڪ بڻائيان ٿو.

OdiaIND

ଯେକ form ଣସି ଭକ୍ତ ବିଶ୍ faith ାସ ସହିତ ଉପାସନା କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ମୁଁ ତାଙ୍କର ଦୃ firm ଏବଂ ଅବିଶ୍ୱାସନୀୟ ବିଶ୍ୱାସ କରେ |

MalayalamIND

ഏതൊരു ഭക്തനും വിശ്വാസത്തോടെ ആരാധിക്കാൻ ആഗ്രഹിക്കുകയാണെങ്കിൽ, അതേ വിശ്വാസം ഞാൻ അവൻ്റെ ഉറച്ചതും അചഞ്ചലവുമാക്കുന്നു.

PunjabiIND

ਕੋਈ ਵੀ ਸ਼ਰਧਾਲੂ ਜਿਸ ਵੀ ਰੂਪ ਵਿਚ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਭਗਤੀ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਮੈਂ ਉਸ ਦਾ ਉਹੀ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਦ੍ਰਿੜ੍ਹ ਅਤੇ ਅਡੋਲ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹਾਂ।

DogriIND

कोई बी भक्त जिस रूप च विश्वास कन्नै पूजा करना चांह्दा ऐ, मैं उसी गै विश्वास उसी दृढ़ ते अटल बनाना ऐ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यो यो यां यां तनुं भक्तः ৷৷. तामेव विदधाम्यहम्'--जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताका भक्त होकर श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करना चाहता है ,उस-उस मनुष्यकी श्रद्धा उस-उस देवताके प्रति मैं अचल (दृढ़) कर देता हूँ। वे दूसरोंमें न लगकर मेरेमें ही लग जायँ--ऐसा मैं नहीं करता। यद्यपि उन-उन देवताओंमें लगनेसे कामनाके कारण उनका कल्याण नहीं होता, फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूँ, तो जो मेरेमें श्रद्धा-प्रेम रखते हैं, अपना कल्याण करना चाहते हैं, उनकी श्रद्धाको मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूँगा अर्थात् अवश्य करूँगा। कारण कि मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ--'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता 5। 29)।इसपर यह शङ्का होती है कि आप सबकी श्रद्धा अपनेमें ही दृढ़ क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् मानो यह कहते हैं कि अगर मैं सबकी श्रद्धाको अपने प्रति दृढ़ करूँ तो मनुष्यजन्मकी स्वतन्त्रता, सार्थकता ही कहाँ रही तथा मेरी स्वार्थपरताका त्याग कहाँ हुआ? अगर लोगोंको अपनेमें ही लगानेका मेरा आग्रह रहे, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि ऐसा बर्ताव तो दुनियाके सभी स्वार्थी जीवोंका स्वाभाविक होता है। अतः मैं इस स्वार्थपरताको मिटाकर ऐसा स्वभाव सिखाना चाहता हूँ कि कोई भी मनुष्य पक्षपात करके दूसरोंसे केवल अपनी पूजा-प्रतिष्ठा करवानेमें ही न लगा रहे और किसीको पराधीन न बनाये।अब दूसरी शङ्का यह होती है कि आप उनकी श्रद्धाको उन देवताओंके प्रति दृढ़ कर देते हैं, इससे आपकी साधुता तो सिद्ध हो गयी, पर उन जीवोंका तो आपसे विमुख होनेसे अहित ही हुआ? इसका समाधान यह है कि अगर मैं उनकी श्रद्धाको दूसरोंसे हटाकर अपनेमें लगानेका भाव रखूँगा तो उनकी मेरेमें अश्रद्धा हो जायगी। परन्तु अगर मैं अपनेमें लगानेका भाव नहीं रखूँगा और उनको स्वतन्त्रता दूँगा, तो उस स्वतन्त्रताको पानेवालोंमें जो बुद्धिमान् होंगे, वे मेरे इस बर्तावको देखकर मेरी तरफ ही आकृष्ट होंगे। अतः उनके उद्धारका यही तरीका बढ़िया है। अब तीसरी शङ्का यह होती है कि जब आप स्वयं उनकी श्रद्धाको दूसरोंमें दृढ़ कर देते हैं, तो फिर उस श्रद्धाको कोई मिटा ही नहीं सकता। फिर तो उसका पतन ही होता चला जायगा? इसका समाधान यह है कि मैं उनकी श्रद्धाको देवताओंके प्रति ही दृढ़ करता हूँ, दूसरोंके प्रति नहीं--ऐसी बात नहीं है। मैं तो उनकी इच्छाके अनुसार ही उनकी श्रद्धाको दृढ़ करता हूँ और अपनी इच्छाको बदलनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है, योग्य है। इच्छाको बदलनेमें वे परवश, निर्बल और अयोग्य नहीं हैं। अगर इच्छाको बदलनेमें वे परवश होते तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही कहाँ रही? और इच्छा (कामना-) का त्याग करनेकी आज्ञा भी मैं कैसे दे सकता था--'जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्' (गीता 3। 43)?

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Sri Harikrishnadas Goenka

उन कामी पुरुषोंमेंसे जोजो सकाम भक्त जिसजिस देवताके स्वरूपका श्रद्धा और भक्तियुक्त होकर अर्चनपूजन करना चाहता है उसउस भक्तकी देवताविषयक उस श्रद्धाको मैं अचल स्थिर कर देता हूँ। अभिप्राय यह कि जो पुरुष पहले स्वभावसे ही प्रवृत्त हुआ जिस श्रद्धाद्वारा जिस देवताके स्वरूपका पूजन करना चाहता है (उस पुरुषकी उसी श्रद्धाको मैं स्थिर कर देता हूँ )।

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Sri Anandgiri

तत्तद्देवताप्रसादात्कामिनामपि सर्वेश्वरे सर्वात्मके वासुदेवे क्रमेण भक्तिर्भविष्यतीत्याशङ्क्याह तेषां चेति। स्वभावतो जन्मान्तरीयसंस्कारवशादित्यर्थः। भगवद्विहितया स्थिरया श्रद्धया संस्काराधीनया देवताविशेषमाराधयतोऽपि भगवदनुग्रहादेव फलप्राप्तिरित्याह यो यो यां यामिति।

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Sri Dhanpati

ननु तत्तत्कामैर्हृतज्ञानानामपि तेषां तत्तद्देवतानुग्रहात्क्रमेण विवेके लब्धे त्वयि वासुदेवे भक्तिर्मविष्यतीति चेत्तत्राह य इति। यः कामी यां यां देवतातनुं श्रद्धया संयुक्तो भक्तः सन्नर्चितुं पूजयितुमिच्छति तस्य तस्य कामिनः श्रद्धां यया भक्तः सन्नर्चितुमिच्छति तामेवाचलां स्थिरां विदधामि करोमि। यां यां तनुमिति यच्छब्धान्वयस्तु यो यां देवतातनुमर्चितुमिच्छतीत्यादिवदद्भिराचार्यौरुत्तरश्लोकस्थ तस्या इत्यनेन दर्शितः। एतेन यां देवतातनुं प्रति श्रद्धां विदधामि तामेव श्रद्धामिति व्याख्याने यच्छब्दान्वयः स्पष्टस्तस्मात्प्रतिशब्दमध्याहृत्य व्याख्यातमिति प्रत्युक्तम्। तामेव श्रद्धामिति भाष्यकृद्य्धाख्याने प्रतिशब्दाध्याहारं विनैव उक्तरीत्या यच्छब्दान्वयस्य स्पष्टत्वेननैवंवदतामज्ञताया अतिस्फटत्वात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yaḥ yaḥwhoever
yām yāmwhichever
tanumform
bhaktaḥdevotee
śhraddhayāwith faith
architumto worship
ichchhatidesires
tasya tasyato him
achalāmsteady
śhraddhāmfaith
tāmin that
evacertainly
vidadhāmibestow
ahamI
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया

उन-उन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, ऐसे वे मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर (देवताओंके) उन-उन नियमोंको धारण करते हुए उन-उन देवताओंके शरण हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान्

उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धासे युक्त होकर वह मनुष्य (सकामभावपूर्वक) उस देवताकी उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है; परन्तु वह कामना-पूर्ति मेरे द्वारा विहित की हुई होती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 21
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्

जो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ: "जो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 21?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 21 translates to: "Whatever form any devotee desires to worship with faith, I make that same faith of his firm and unflinching. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव वि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 21 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। जो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati" mean in English?

"yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 21. Whatever form any devotee desires to worship with faith, I make that same faith of his firm and unflinching. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.