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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्

पहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है। — VaniSagar

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TamilIND

உண்மையில், இவை அனைத்தும் உன்னதமானவை; இருப்பினும், நான் ஞானியை என்னுடைய சுயமாகவே கருதுகிறேன்; ஏனெனில், அவர் மனதில் உறுதியானவர் மற்றும் உயர்ந்த இலக்காக என்னில் மட்டுமே நிலைநிறுத்தப்பட்டார்.

MarathiIND

खरंच, हे सर्व उदात्त आहेत; तथापि, मी ज्ञानी माणसाला माझा स्वतःचा समजतो; कारण, तो मनाने स्थिर आहे आणि केवळ माझ्यामध्ये सर्वोच्च ध्येय म्हणून स्थापित आहे.

BengaliIND

প্রকৃতপক্ষে, এই সব মহৎ; যাইহোক, আমি জ্ঞানী ব্যক্তিকে আমার আত্ম বলে মনে করি; কারণ, তিনি মনের মধ্যে অবিচল এবং একমাত্র আমার মধ্যেই সর্বোচ্চ লক্ষ্য হিসেবে প্রতিষ্ঠিত।

KannadaIND

ವಾಸ್ತವವಾಗಿ, ಇವೆಲ್ಲವೂ ಉದಾತ್ತವಾಗಿವೆ; ಆದಾಗ್ಯೂ, ನಾನು ಬುದ್ಧಿವಂತ ವ್ಯಕ್ತಿಯನ್ನು ನನ್ನ ಆತ್ಮ ಎಂದು ಪರಿಗಣಿಸುತ್ತೇನೆ; ಏಕೆಂದರೆ, ಅವನು ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಸ್ಥಿರನಾಗಿರುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಸರ್ವೋಚ್ಚ ಗುರಿಯಾಗಿ ನನ್ನಲ್ಲಿ ಮಾತ್ರ ಸ್ಥಾಪಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದ್ದಾನೆ.

GujaratiIND

ખરેખર, આ બધા ઉમદા છે; જો કે, હું જ્ઞાની માણસને મારો સ્વ માનું છું; કારણ કે, તે મનમાં અડગ છે અને એકલા મારામાં સર્વોચ્ચ ધ્યેય તરીકે સ્થાપિત છે.

SindhiIND

حقيقت ۾، اهي سڀئي عظيم آهن؛ تنهن هوندي به، مان سمجهان ٿو انسان کي پنهنجو پاڻ وانگر؛ ڇاڪاڻ ته، هو ذهن ۾ ثابت قدم آهي ۽ صرف مون ۾ اعليٰ مقصد طور قائم آهي.

MalayalamIND

തീർച്ചയായും, ഇവയെല്ലാം ശ്രേഷ്ഠമാണ്; എന്നിരുന്നാലും, ജ്ഞാനിയെ ഞാൻ എൻ്റെ തന്നെയായി കണക്കാക്കുന്നു; എന്തെന്നാൽ, അവൻ മനസ്സിൽ ഉറച്ചുനിൽക്കുകയും എന്നിൽ മാത്രം പരമോന്നത ലക്ഷ്യമായി സ്ഥാപിക്കുകയും ചെയ്യുന്നു.

PunjabiIND

ਦਰਅਸਲ, ਇਹ ਸਾਰੇ ਨੇਕ ਹਨ; ਹਾਲਾਂਕਿ, ਮੈਂ ਬੁੱਧੀਮਾਨ ਆਦਮੀ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਆਪ ਸਮਝਦਾ ਹਾਂ; ਕਿਉਂਕਿ, ਉਹ ਮਨ ਵਿੱਚ ਅਡੋਲ ਹੈ ਅਤੇ ਕੇਵਲ ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਹੀ ਪਰਮ ਟੀਚਾ ਹੈ।

TeluguIND

నిజానికి, ఇవన్నీ గొప్పవి; ఏది ఏమైనప్పటికీ, నేను తెలివైన వ్యక్తిని నా నేనేగా భావిస్తాను; ఎందుకంటే, అతను మనస్సులో దృఢంగా ఉన్నాడు మరియు సర్వోన్నత లక్ష్యంగా నాలో మాత్రమే స్థాపించబడ్డాడు.

NepaliIND

वास्तवमा, यी सबै महान छन्; यद्यपि, म ज्ञानी मानिसलाई मेरो स्वयं मान्छु; किनकि, उहाँ मनमा स्थिर हुनुहुन्छ र ममा मात्र सर्वोच्च लक्ष्यको रूपमा स्थापित हुनुहुन्छ।

MaithiliIND

सचमुच, ई सब कुलीन अछि; तथापि, हम ज्ञानी केँ अपन स्वयं मानैत छी; कारण, ओ मन मे अडिग छथि आ परम लक्ष्यक रूप मे मात्र हमरा मे स्थापित छथि |

MizoIND

Dik tak chuan heng zawng zawng hi ropui tak an ni; mahse, mi fing chu Ka Mahni ngeiah ka ngai a; a chhan chu, rilruah a nghet tlat a, Keimah chauh hi thil tum sang ber atan a din tlat a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--उदाराः सर्व एवैते ये सब-के-सब भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ भाववाले हैं। भगवान्ने यहाँ जो 'उदाराः'शब्दका प्रयोग किया है, उसमें कई विचित्र भाव हैं; जैसे-- (1) चौथे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि 'भक्त जिस प्रकार मेरे शरण होते हैं, उसी प्रकार मैं उनका भजन करता हूँ।' भक्त भगवान्को चाहते हैं और भगवान् भक्तको चाहते हैं। परन्तु इन दोनोंमें पहले भक्तने ही सम्बन्ध जोड़ा है और जो पहले सम्बन्ध जोड़ता है, वह उदार होता है। तात्पर्य यह है कि भगवान् सम्बन्ध जोड़ें या न जोड़ें, इसकी भक्त परवाह नहीं करता। वह तो अपनी तरफसे पहले सम्बन्ध जोड़ता है और अपनेको समर्पित करता है। इसलिये वह उदार है। (2) देवताओंके भक्त सकामभावसे विधिपूर्वक यज्ञ दान, तप आदि कर्म करते हैं तो देवताओंको उनकी कामनाके अनुसार वह चीज देनी ही पड़ती है; क्योंकि देवतालोग उनका हित-अहित नहीं देखते। परन्तु भगवान्का भक्त अगर भगवान्से कोई चीज माँगता है तो भगवान् अगर उचित समझें तो वह चीज दे देते हैं अर्थात् देनेसे उसकी भक्ति बढ़ती हो, तो दे देते हैं और भक्ति न बढ़ती हो संसारमें फँसावट होती हो तो नहीं देते। कारण कि भगवान् परम पिता हैं और परम हितैषी हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपनी कामनाकी पूर्ति हो अथवा न हो, तो भी वे भगवान्का ही भजन करते हैं, भगवान्के भजनको नहीं छोड़ते--यह उनकी उदारता ही है। (3) संसारके भोग और रुपये-पैसे प्रत्यक्ष सुखदायी दीखते हैं और भगवान्के भजनमें प्रत्यक्ष जल्दी सुख नहीं दीखता, फिर भी संसारके प्रत्यक्ष सुखको छोड़कर अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करनेकी लालसाको छोड़कर भगवान्का भजन करते हैं, यह उनकी उदारता ही है। (4) भगवान्के दरबारमें माँगनेवालोंको भी उदार कहा जाता है--यहि दरबार दीनको आदर रीति सदा चलि आई। (विनयपत्रिका 165। 5) अर्थात् कोई कुछ माँगता है, कोई धन चाहता है, कोई दुःख दूर करना चाहता है--ऐसे माँगनेवाले भक्तोंको भी भगवान् उदार कहते हैं, यह भगवान्की विशेष उदारता ही है। (5) भक्तोंका लौकिक-पारलौकिक कामनापूर्तिके लिये अन्यकी तरफ किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं जाता। वे केवल भगवान्से ही कामनापूर्ति चाहते हैं। भक्तोंका यह अनन्यभाव ही उनकी उदारता है।'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' यहाँ 'तु'पदसे ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी विलक्षणता बतायी है कि दूसरे भक्त तो उदार हैं ही, पर ज्ञानीको उदार क्या कहें, वह तो मेरा स्वरूप ही है। स्वरूपमें किसी निमित्तसे, किसी कारणविशेषसे प्रियता नहीं होती, प्रत्युत अपना स्वरूप होनेसे स्वतः-स्वाभाविक प्रियता होती है।प्रेममें प्रेमी अपने-आपको प्रेमास्पदपर न्योछावर कर देता है अर्थात् प्रेमी अपनी सत्ता अलग नहीं मानता। ऐसे ही प्रेमास्पद भी स्वयं प्रेमीपर न्योछावर हो जाते हैं। उनको इस प्रेमाद्वैतकी विलक्षण अनुभूति होती है। ज्ञानमार्गका जो अद्वैतभाव है, वह नित्य-निरन्तर अखण्डरूपसे शान्त, सम रहता है। परन्तु प्रेमका जो अद्वैतभाव है, वह एक-दूसरेकी अभिन्नताका अनुभव कराता हुआ प्रतिक्षण वर्धमान रहता है। प्रेमका अद्वैतभाव एक होते हुए भी दो हैं और दो होते हुए भी एक है। इसलिये प्रेम-तत्त्व अनिर्वचनीय है। शरीरके साथ सर्वथाअभिन्नता (एकता) मानते हुए भी निरन्तर भिन्नता बनी रहती है और भिन्नताका अनुभव होनेपर भी भिन्नता बनी रहती है। इसी तरह प्रेमतत्त्वमें भिन्नता रहते हुए भी अभिन्नता बनी रहती है और अभिन्नताका अनुभव होनेपर भी अभिन्नता बनी रहती है।जैसे, नदी समुद्रमें प्रविष्ट होती है तो प्रविष्ट होते ही नदी और समद्रके जलकी एकता हो जाती है। एकता होनेपर भी दोनों तरफसे जलका एक प्रवाह चलता रहता है अर्थात् कभी नदीका समुद्रकी तरफ और कभी समुद्रका नदीकी तरफ एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। ऐसे ही प्रेमीका प्रेमास्पदकी तरफ और प्रेमास्पदका प्रेमीकी तरफ प्रेमका एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। उनका नित्ययोगमें वियोग और वियोगमें नित्ययोग--इस प्रकार प्रेमकी एक विलक्षण लीला अनन्तरूपसे अनन्तकालतक चलती रहती है। उसमें कौन प्रेमास्पद है और कौन प्रेमी है--इसका खयाल नहीं रहता। वहाँ दोनों ही प्रेमास्पद हैं और दोनों ही प्रेमी हैं। यही 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्'पदोंका तात्पर्य है।'आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्' क्योंकि जिससे उत्तम गति कोई हो ही नहीं सकती, ऐसे सर्वोपरि मेरेमें ही उसकी श्रद्धा, विश्वास और दृढ़ आस्था है। तात्पर्य है कि उसकी वृत्ति किसी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर मेरेसे हटती नहीं, प्रत्युत एक मेरेमें ही लगी रहती है।'केवल भगवान् ही मेरे हैं'--इस प्रकार मेरेमें उसका जो अपनापन है, उसमें अनुकूलता-प्रतिकूलताको लेकर किञ्चिन्मात्र भी फरक नहीं पड़ता, प्रत्युत वह अपनापन दृढ़ होता और बढ़ता ही चला जाता है।वह युक्तात्मा है अर्थात् वह किसी भी अवस्थामें मेरेसे अलग नहीं होता, प्रत्युत सदा मेरेसे अभिन्न रहता है। सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें कहे हुए ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी वास्तविकता और उसके भजनका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तो फिर क्या आर्त आदि तीन प्रकारके भक्त आप वासुदेवके प्रिय नहीं हैं यह बात नहीं तो क्या बात है ये सभी भक्त उदार हैं श्रेष्ठ हैं। अर्थात् वे तीनों भी मेरे प्रिय ही हैं। क्योंकि मुझ वासुदेवको अपना कोई भी भक्त अप्रिय नहीं होता परंतु ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय होता है इतनी विशेषता है। ऐसा क्यों है सो कहते हैं ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है वह मुझसे अन्य नहीं है यह मेरा निश्चय है क्योंकि वह योगारूढ़ होनेके लिये प्रवृत्त हुआ ज्ञानी स्वयं मैं ही भगवान् वासुदेव हूँ दूसरा नहीं ऐसा युक्तात्मा समाहितचित्त होकर मुझ परम प्राप्तव्य गतिस्वरूप परब्रह्ममें ही आनेके लिये प्रवृत्त है।

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Sri Anandgiri

ज्ञानी चेदत्यर्थमीश्वरस्य प्रियो भवति तर्हि विशेषणसामर्थ्यादितरेषामप्रियत्वं प्राप्तमिति शङ्कते न तर्हीति। तेषां भगवन्तं प्रति प्रियत्वमत्र विवक्षितमित्याह नेति। अत्यर्थमिति विशेषणस्य तर्हि किं प्रयोजनमिति पृच्छति किं तर्हीति। सर्वेषां भगवदभिमुखत्वादुत्कर्षेऽपि ज्ञानिनि तदतिरेकमङ्गीकृत्य विशेषणमित्याह उदारा इति। किं तत्र प्रमाणमित्याशङ्क्येश्वरज्ञानमित्याह मे मतमिति। ज्ञानी त्वात्मैवेत्यत्र हेतुमाह आस्थित इति। सर्वशब्दस्य ज्ञानिव्यतिरिक्तविषयत्वमाह त्रयोऽपीति। ज्ञानिव्यतिरिक्तानां भगवदभिमुखत्वेऽपि ज्ञानाभावापराधान्न भगवत्प्रीतिविषयतेत्याशङ्क्याह नहीति। कस्तर्हि ज्ञानवति विशेषस्तत्राह ज्ञानी त्विति। तमेव विशेषं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति तत्कस्मादित्यादिना। सर्वमात्मानं पश्यतोऽपि तस्य तव कथं यथोक्तो निश्चयः स्यादित्याशङ्क्यास्थित इत्येतद्व्याकरोति आरोढुमिति। आरोहे हेतुं सूचयति स ज्ञानीति। आरोढुं प्रवृत्तत्वमेव स्फुटयति मामेवेति।

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Sri Dhanpati

तर्हि किमार्तादयस्तवाप्रियाः न आत्मत्वेनात्यर्थमिति विशेषणादित्याह उदारा इति। उदाराः सर्व एते त्रयोऽप्यन्यभ्य आर्तादिभ्यः। आर्त्यादिनिवृत्त्यर्थमितरदेवतादिभक्तेभ्य उत्कृष्टाः मम प्रिया एवेत्यर्थः। नहि कश्चिदार्तो वा जिज्ञासुर्वाऽर्थार्थी आर्तादिभ्यः। आर्त्यादिनिवृत्त्यर्थमितरदेवतादिभक्तेभ्य उत्कृष्टाः मम प्रिया एवेत्यर्थः। नहि कश्चिदार्थो वा जिज्ञासुर्वाऽर्थार्थी वा मद्भक्तो मम वासुदेवस्याप्रियो भवति। परंतुये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाभ्यहम् इत्युक्तत्वात् यो यदर्थ मां भजति तमहमपि तत्फलदानेन भजामि। यस्तु निष्कामी प्रेमातिशयेन मां भजति तमहमपि तथैव भजाम्यतो ज्ञानी इत्यर्थं प्रियो भवतीति विशेषः। तत्कुत इति तत्राह। ज्ञानी तु ममात्मैव नान्यो यत इति मे मतं निश्चयः।ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। तुशब्दस्तेभ्यो विशेषद्योतनार्थः। ज्ञानी त्वात्मैवेत्यत्र हेतुमाह आस्थित इति। हि यस्मात्स ज्ञानी अहमेव भगवान्वासुदेवो नान्योऽहमस्मीत्येवं युक्तः समाहित आत्मा चित्तं यस्य सः मामेव परं ब्रह्मानुत्तमां गतिं निरतिशयं गन्तव्यं गन्तुं प्रवृत्त इत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
udārāḥnoble
sarveall
evaindeed
etethese
jñānīthose in knowledge
tubut
ātmā evamy very self
memy
matamopinion
āsthitaḥsituated
saḥhe
hicertainly
yuktaātmā
māmin me
evacertainly
anuttamāmthe supreme
gatimgoal
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ितर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः

उन चार भक्तोंमें मेरेमें निरन्तर लगा हुआ, अनन्यभक्तिवाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानी भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह भी मेरेको अत्यन्त प्रिय है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः

बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें 'सब कुछ परमात्मा ही है', ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्

पहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "पहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 18 translates to: "Indeed, all these are noble; however, I consider the wise man as My very Self; for, he is steadfast in mind and established in Me alone as the supreme goal. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। पहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam" mean in English?

"udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 18. Indeed, all these are noble; however, I consider the wise man as My very Self; for, he is steadfast in mind and established in Me alone as the supreme goal. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.