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Bhagavad Gita · BG 6.7

Bhagavad Gita 6.7 — Commentary

20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः

jitātmanaḥ praśhāntasya paramātmā samāhitaḥ śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu tathā mānāpamānayoḥ

"The Supreme Self of him who is self-controlled and peaceful remains balanced in cold and heat, pleasure and pain, as well as in honor and dishonor."

Scholar Commentaries (20)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

जितात्मनः कार्यकरणसंघात आत्मा जितो येन सः जितात्मा तस्य जितात्मनः प्रशान्तस्य प्रसन्नान्तःकरणस्य सतः संन्यासिनः परमात्मा समाहितः साक्षादात्मभावेन वर्तते इत्यर्थः। किञ्च शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा माने अपमाने च मानापमानयोः पूजापरिभवयोः समः स्यात्।।

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

शीतोष्णसुखदुःखेषु मानापमानयोः च जितात्मनः जितमनसः विकाररहितमनसः प्रशान्तस्य मनसि परमात्मा समाहितः सम्यगाहितः। स्वरूपेण अवस्थितः प्रत्यगात्मा अत्र परमात्मा इत्युच्यते तस्य एव प्रकृतत्वात् तस्य अपि पूर्वपूर्वास्थापेक्षया परमात्मत्वात्। आत्मा परं समाहित इति वा सम्बन्धः।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

जितात्मनः फलमाह जितात्मन इति। जितात्मा हि प्रशान्तो भवति। न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति। तदा च परमात्मा सम्यगाहितः हृदि सन्निहितो भवति अपरोक्षज्ञानी भवतीत्यर्थः। अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति शीतोष्णेत्यादिना। शीतोष्णादिषु कूटस्थः ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा विजितेन्द्रिय इति कूटस्थत्वे हेतुः। विज्ञानं विशेषज्ञानं अपरोक्षज्ञानं वा। तच्चोक्तं सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः। देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम्। इति।श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते। तज्ज्ञानं दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत्। विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा इत्यादि। कूटस्थो निर्विकारः कूटवत्स्थित इति व्युत्पत्तेः। कूटमाकाशःकूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते। इत्यभिधानात्। योगी योगं कुर्वन्। युक्तो योगसम्पूर्णः। एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

जब योगारूढ़ पुरुष आत्मचिन्तन में स्थित हो जाता है तब उसमें वह क्षमता आ जाती है कि वह जीवन की सभीअनुकूल और प्रतिकूलपरिस्थितियों में ध्यानाभ्यास की निरन्तरता बनाये रख सकता है। यहाँ दूसरी पंक्ति में स्पष्ट दर्शाया है कि बाह्य जगत् में कोई ऐसा पर्याप्त कारण नहीं रह जाता जो उसे आत्मध्यान से विचलित कर सके।शीतउष्ण सुखदुख तथा मानअपमान इन तीन द्वन्द्वों के द्वारा भगवान् सभी संभाव्य विघ्नों को सूचित करते हैं जो मनुष्य के जीवन में आकर उसकी समता और शांति को भंग करने में समर्थ होते हैं।शीतउष्ण इसका अनुभव स्थूल शरीर के स्तर पर होता है। शीत या उष्ण में हमारे मन के विचारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे शीत में न सिकुड़ते हैं और न काँपते हैं उसी प्रकार उष्णता से न वे अधिक व्यापक होते हैं और न उन्हें स्वेद आता है ये सब लक्षण शरीर में ही दिखाई देते हैं और इसलिये शीतउष्ण इस द्वन्द्व के द्वारा वे सभी अनुभव बताये गये हैं जो शरीर को होते हैं जैसेरोग युवावस्था वृद्धावस्था आदि।सुखदुख मन के स्तर पर प्राप्त होने वाले सभी अनुभवों को सुखदुख रूप द्वन्द्व से दर्शाया गया है। स्पष्ट है कि इसका अनुभव मन को होता है शरीर को नहीं। प्रेम और घृणा स्नेह और ईर्ष्या करुणा और क्रूरता ऐसी ही असंख्य प्रकार की भावनाएँ मन में उठती रहती हैं जो मनुष्य को विचलित कर देती हैं परन्तु इनमें किसी में भी यह सार्मथ्य नहीं कि वह जितेन्द्रिय संयमित पुरुष को किसी प्रकार की हानि पहुँचा सके।मानअपमान के कारण यदि किसी साधक को विक्षेप होता है तो उसके प्रति सहानुभूति दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं। मानअपमान की कल्पना बुद्धि की होती है और फिर मनुष्य अपनी कल्पना के अनुसार प्राप्त परिस्थितियों में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।शरीर मन और बुद्धि ये तीन उपाधियाँ हैं जिनके द्वारा उपर्युक्त द्वन्द्वरूप विघ्न आने की संभावनायें रहती हैं। भगवान् कहते हैं कि प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय पुरुष के लिये परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहता है। इन परिस्थितियों का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितयाँ हों अच्छा या बुरा वातावरण हो अथवा मूर्ख या बुद्धिमान का साथ हो आत्मज्ञानी पुरुष सदा प्रशान्त और समभाव में स्थित रहता है।ऐसे ज्ञानी पुरुष की क्या विशेषता है क्यों कोई पुरुष इस कठिन साधना का अभ्यास करे भगवान् कहते हैं

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

6.7 जितात्मनः of the selfcontrolled? प्रशान्तस्य of the peaceful? परमात्मा the Supreem Self? समाहितः balanced? शीतोष्णसुखदुःखेषु in cold and heat? pleasure and pain? तथा as also? मानापमानयोः in honour and dishonour.Commentary The selfcontrolled Yogi who is rooted in the Self keeps poise amidst the pairs of opposites (Dvandvas) or the alternating waves of cold and heat? pleasure and pain? honour and dishonour. When the Yogi has subdued his senses? when his mind is balanced and peaceful under all conditions? when he is not in the least influenced by the pairts of opposites? when he has renounced all actions? then the Highest Self really becomes his own Self. He attains to Selfrealisation. As he rests in hiw own Self? he is ever serene or tranil he is not affected by the pairs of opposites? and he stands as adamant in the face of the changing conditions of Nature.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या--[छठे श्लोकमें'अनात्मनः' पद और यहाँ 'जितात्मनः' पद आया है। इसका तात्पर्य है कि जो 'अनात्मा' होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंके साथ 'मैं 'और 'मेरा'-पन करके अपने साथ शत्रुताका बर्ताव करता है और जो 'जितात्मा' होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध न मानकर अपने साथ मित्रताका बर्ताव करता है। इस तरह अनात्मा मनुष्य अपना पतन करता है और जितात्मा मनुष्य अपना उद्धार करता है।]'जितात्मनः' जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि किसी भी प्राकृत पदार्थकी अपने लिये सहायता नहीं मानता और उन प्राकृत पदार्थोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी अपनेपनका सम्बन्ध नहीं जोड़ता, उसका नाम 'जितात्मा' है। जितात्मा मनुष्य अपनी तो हित करता ही है, उसके द्वारा दुनियाका भी बड़ा भारी हित होता है।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

जिसने मन इन्द्रिय आदिके संघातरूप इस शरीरको अपने वशमें कर लिया है और जो प्रशान्त है जिसका अन्तःकरण सदा प्रसन्न रहता है उस संन्यासीको भली प्रकारसे सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे विद्यमान है। तथा वह सर्दीगर्मी और सुखदुःखमें एवं मान और अपमानमें यानी पूजा और तिरस्कारमें भी ( सम हो जाता है )।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

कथं संयतकार्यकरणस्य बन्धुरात्मेति तत्राह जितात्मन इति। जितकार्यकरणसंघातस्य प्रकर्षेणोपरतबाह्याभ्यन्तरकरणस्य परमात्मा विक्षेपेण पुनः पुनरनभिभूयमानो निरन्तरं चित्ते प्रथत इत्यर्थः। जितात्मानं संन्यस्तसमस्तकर्माणमधिकारिणं प्रदर्श्य योगाङ्गानि दर्शयति शीतेति। समः स्यादित्यध्याहारः। पूर्वार्धं व्याचष्टे जितेत्यादिना। न केवलं तस्य परमात्मा साक्षादात्मभावेन वर्तते किंतु शीतोष्णादिभिरपि नासौ चाल्यते तत्त्वज्ञानादित्युत्तरार्धं विभजते किञ्चेति। तेषु समः स्यादिति संबन्धः।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

जितात्मनः स्वबन्धुत्वे फल माह जितात्मन इति। कार्यकारणसंगात आत्मा जितो येन स तस्य प्रशान्तस्य योगेन जितचित्तस्य योगारुढस्येतियावत्। परमात्मा शुद्धस्तत्पदार्थः समाहितः साक्षादात्मभावेन वर्तते। सत जीवन्मुक्तो भवतीत्याह शीतेत्यादिना। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोः समः स्यादित्यध्याहारः। सर्वं वाक्यं सावधारणमिति न्यायेन जितात्मनः प्रशान्तस्यैवेत्यर्थः। एतेन प्रशान्तस्यैव परं केवलमिति प्रत्युक्तम्। यत्तु शीतोष्णसुखदुःखेषु चित्तविक्षेपकरेषु सत्स्वपि तथा मानापमानयोः सतोरपि तेषु समत्वेनेति वा जितात्मन इति केचिद्वर्णयन्ति तत्रेन्द्रियेषु जाग्रत्सु शीतादेरस्तित्वं संभवत्येवेति सत्स्वपीत्याद्युक्तिररुचिग्रस्ता। एतेन शीतादिषु प्राप्तेषु जितात्मनो निर्विकारचित्तस्य परमुत्कर्षेणात्मा समाहितः समाधिं प्राप्तो भवत्यतः समाधिसिद्य्धर्थ मनो जेतव्यं भवतीत्यर्थ इति प्रत्युक्तम्। शीतादिष्वप्राप्तेषु किंचित्समाहितस्य प्राप्तेषूत्कर्षेणेत्यस्य विपर्ययरुपत्वात् येतव्यस्य मनसः स्थितौ शीतादयोऽपि संत्येवेति प्राप्तेष्वित्यस्य व्यर्थत्वाच्च। यदप्येवंविधस्यात्मान्तःकरणं शीतादिषु द्वन्द्वशब्दवाच्येषु परमत्यर्थ समाहितः सहिष्णुरविक्रियो भवतीत्यर्थ इति तदपि न। मुख्यार्थे संभवत्यमुख्यार्थस्यान्याय्यत्वात्। यद्वा भाष्यस्योपलक्षणार्थत्वमङ्गीकृत्योदाहृतव्याख्यानान्युपादेयानि।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

मनसो जये फलमाह जितात्मन इति। शीतोष्णादिषु प्राप्तेषु जितात्मनो निर्विकारचित्तस्य आत्मा चित्तं परमुत्कर्षेण समाहितः समाधिं प्राप्तो भवति। अतः समाधिसिद्ध्यर्थं मनो जेतव्यमेवेत्यर्थः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

जितात्मनः स्वस्मिन्बन्धुत्वं स्फुटयति जितात्मन इति। जित आत्मा येन तस्य प्रशान्तस्य रागादिरहितस्यैव परं केवलमात्मा शीतोष्णादिषु सत्स्वपि समाहितः स्वात्मनिष्ठो भवति नान्यस्य। यद्वा तस्य हृदि परमात्मा समाहितः स्थितो भवति।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

प्रतिष्ठितयोगत्वावस्था तदारोहणोपायश्चोक्तौ अथ योगप्रक्रियां वक्तुं तदारम्भदशा ज्ञाप्यत इत्याह योगारम्भेति। सप्तम्याःसमाहितः इत्यनेन अन्वयभ्रमव्युदासायान्वयं पदार्थांश्च व्यञ्जयति शीतोष्णेति। एतेनमानावमानयोः समस्य इति परोक्ताध्याहारोऽनपेक्षित इति दर्शितम्। शीतोष्णादिषु द्वन्द्वेष्वनुभूयमानेषु कथं मनसो विजयः इत्यत्राह विकाररहितमनस इति। विकारश्च हर्षोद्रेकादिरूपः प्रागुक्तः।प्रशान्तस्य इत्येतद्बाह्येन्द्रियव्यापारनिवृत्तिपरम् मनोविकारनिवृत्तेरुक्तत्वात् असन्निहितफलाभिसन्ध्यादिराहित्यपरं वा।समाहितः इत्यस्याकाङ्क्षितं प्रकृतमुचितं चाधिकरणमाह मनसीति।सम्यगाहित इति विशदानुसन्धानयोग्यो जात इत्यर्थः। जीवात्मप्रकरणे परमात्माकथमुच्यते इत्यत्राहस्वरूपेणेति।अत्रेति प्रकरणौचित्यसूचनम्। तदेव दर्शयति तस्यैवेति। एवकारेण प्रासङ्गिको हि पूर्वं परमात्मप्रसङ्ग इतिज्ञापितम्। अपरस्य जीवस्य परमात्मशब्दविषयत्वं कथं इत्यत्राह तस्यापीति। तथापि परमात्मशब्दस्य प्रसिद्धार्थः परित्यक्तः स्यात् परत्वं च सङ्कुचितम् परमशब्दनिर्वचनं च न घटते परो मा अस्मादिति हि तत्। नच पूर्वपूर्वावस्थापेक्षया परो मा अस्मादित्यन्वयः सिध्यतीत्यरुचेरन्वयान्तरमाह आत्मा परमिति। अत्र चाधिकं केवलमिति वा परशब्दार्थः।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

तत्र जितमनस इदं रूपम् जितेति। प्रशान्तो निरहंकारः। परेषु आत्मनि च शीतोष्णादिषु च अभेदधीः न रागद्वेषौ।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

योगो विहितः तत्किं जितात्मन इत्यनेन इत्यत आह जितात्मन इति। उपकारी हि बन्धुरुच्यते। तत्र जितं मनः कमुपकारं करोति येन बन्धुः स्यात् आत्मोद्धारं करोतीति चेत् स एव च कः इत्याशङ्क्येति शेषः। जितात्मनः फले वक्तव्ये प्रशान्तस्येत्यनुवादः किमर्थः इत्यत आह जितात्मा हीति। वाक्यभेदेनेदमेव फलकथनमिति भावः। ननु जितात्मत्वमेव प्रशान्तत्वं तत्कथं तत्फलं स्यात् इत्यत आह नेति। तस्य जितात्मनः स्वत एवेति शेषः। तर्हि निराकाङ्क्षत्वादुत्तरं वाक्यं व्यर्थमित्यतः परमफलं दर्शयितुं तदिति भावेन न्यूनमध्याहारेण पूरयन्व्याचष्टे तदा चेति। प्रशान्तत्वे सति परमात्मा सर्वेषां हृदि सन्निहित एव तत्कुतः प्रशान्तस्य विशेषः इत्यतः सम्यक्पदसूचितार्थं विवृणोति अपरोक्षेति। योगारूढ इत्यर्थः।यदा हि 6।5 इति योगारूढस्य लक्षणमुक्तं तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यत आह अपरोक्षेति। सार्धश्लोकद्वयग्रहणायादिपदं अत्र सप्तम्या अन्वयो न दृश्यतेऽत आह शीतेति। अत्र भास्करोऽन्वयमपश्यन्परमात्मा समाहितः इति सम्प्रदायागतं पाठं विसृज्यपरात्मसु समा मतिः इति पाठान्तरं प्रकल्प्यसमा मतिः इति तु आवर्त्य सप्तम्या अन्वयमुक्त्वा पूर्वपाठेऽन्वयाभाव इत्यवादीत् तदनेन नापहसितं भवति। कृत्रिमेऽपि पाठेसुहृत् इत्यादिकंआत्मौपम्येन 6।32 इत्यादिकं च पुनरुक्तं स्यात्। ननु यः शीतोष्णादिषु कूटस्थः तस्य ज्ञानविज्ञानतृप्तमनस्त्वं विजितेन्द्रियत्वं चार्थात्सिद्धमेव तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यत आह ज्ञानेति। प्रत्येकमन्वयादेकवचनम्। ननु शिल्पादिविषया बुद्धिर्विज्ञानम्मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः अमरः1।5।6 इत्यभिधानात् तत्कथं विज्ञानेन तृप्तात्माऽयं स्यात् इत्यत आह विज्ञानमिति। अनेन सामान्यज्ञानं परोक्षज्ञानं वा ज्ञानमिति सूचितम्। कुत एतत् इत्यत आह तच्चेति। प्रसिद्धाभिधानार्थोऽप्यङ्गीक्रियत इति चशब्दः। सामान्यैः साधारणैः पुरुषैः। सामान्यविषयं तु ज्ञानमित्यपि द्रष्टव्यम्। तदेव ज्ञानमिति सम्बन्धः। अङ्गादेर्व्याकरणादेः शिल्पस्य च। विशिष्टं दर्शनं वैष्णवशास्त्रम्। कूटस्थशब्दो नित्यादिपर्यायः तेन कथमन्वयः सप्तम्याः इत्यत आह कूटस्थ इति। तत्कथं इत्यत आह कूटवदिति।सुपि स्थः अष्टा.3।2।4 कूटशब्दोऽनृतवाद्यादिवाची तत्परिग्रहे निर्विकारत्वं न लभ्यत इत्यत आह कूटमिति। एतैः शब्दैराकाश उच्यत इत्यर्थः।युक्तो योगी इति पुनरुक्तिरिति मन्दाशङ्कानिरासार्थमाह योगीति। इनेरस्त्यर्थत्वात् कुर्वन्नित्युक्तम्। निष्ठाया भूतार्थत्वात् सम्पूर्ण इति। वक्ष्यमाणान्वयापेक्षया क्रमोल्लङ्घनम्। तर्हि विरुद्धार्थयोः कथं सामानाधिकरण्यं इत्यत आह एवम्भूत इति।धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः इति ह्युक्तम्।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

जितात्मनः स्वबन्धुत्वं विवृणोति शीतोष्णसुखदुःखेषु चित्तविक्षेपकरेषु सत्स्वपि तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोश्चित्तविक्षेपहेत्वोः सतोरपि तेषु समत्वेनेति वा जितात्मनः प्रागुक्तस्य जितेन्द्रियस्य प्रशान्तस्य सर्वत्र समबुद्ध्या रागद्वेषशून्यस्य परमात्मा स्वप्रकाशज्ञानस्वभाव आत्मा समाहितः समाधिविषयो योगारूढो भवति। परमिति वा छेदः। जितात्मनः प्रशान्तस्यैव परं केवलमात्मा समाहितो भवति नान्यस्य। तस्माज्जितात्मा प्रशान्तश्च भवेदित्यर्थः।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

ननु बन्धुत्वे कथं हितकृद्भवेत् इत्यत आह जितात्मन इति। जितात्मनः वशीकृतभावात्मनः। शीतोष्णसुखदुःखेषु संयोगविप्रयोगेषु प्रशान्तस्य संयोगे स्वसौभाग्यादिमदरहितस्य विप्रयोगे क्लेशेन प्रिये दोषारोपरहितस्य। तथा भगवतः सकाशान्मानापमानयोः समस्य। परमात्मा पुरुषोत्तमः समाहितस्तदर्थं दास्यदाने सावधानस्तिष्ठति। तद्धृदय एव समाहितस्तिष्ठतीति भावः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

जितात्मनो बन्धुत्वं स्फुटयति जितात्मन इति। कालधर्मेषु शीतोष्णादिषु सत्स्वपि तस्य परं केवलमात्मा समाहितो भवतीति परमात्माऽन्तर्यामीव समाधिगतो भवति।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

6.7 Parama-atma, the supreme Self; jita-atmanah, of one who has control over the aggregate of his body and organs; prasantasya, who is tranil, who is a monk with his internal organ placid; samahitah, becomes manifest, i.e. becomes directly manifest as his own Self. Moreover, (he should be eipoised) sita-usna-sukha-duhkhesu, in the midst of cold and heat, happiness and sorrow; tatha, as also; mana-apamanayoh in honour and dishonour, adoration and despise.

Dr. S. Sankaranarayan

20th century CE · Academic / Shaiva

Shaiva

Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.

6.7 Jita-etc. A person with complete calmness : a person without ego. [The thinking etc.] ; A thinking that entertains no difference in the case of others and of himself, and of cold and heat etc., i.e., [entertains] no like and dislike [for them].

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

6.7 Of him whose self is conered, i.e., whose mind is conered, whose mind is free from fluctuations and who is very calm, 'the great self' becomes well secured, i.e., exceedingly well secured in connection with heat and cold, pleasure and pain, and honour and dishonour. Here the individual self (Pratyagatman) is called 'the great self' (Paramatman), as the context justifies this only. It can also be called 'great', because it is at a higher stage relatively to previous successive stages. Or the word may be construed as follows: The self is secured greatly - Atma parma samahitah. [In any case it should not be taken as the Supreme Being].

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 6.7?

जितात्मनः कार्यकरणसंघात आत्मा जितो येन सः जितात्मा तस्य जितात्मनः प्रशान्तस्य प्रसन्नान्तःकरणस्य सतः संन्यासिनः परमात्मा समाहितः साक्षादात्मभावेन वर्तते इत्यर्थः। किञ्च शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा माने अपमाने च मानापमानयोः पूजापरिभवयोः समः स्यात्।।

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 6.7, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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