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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 33
अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्

हे मधुसूदन ! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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NepaliIND

हे कृष्ण, तपाईंले मलाई सिकाउनुभएको यो समताको योगलाई मनको चंचलताले गर्दा कसरी स्थिरतापूर्वक कायम राख्न सकिन्छ, मैले देख्दिनँ।

MarathiIND

हे कृष्णा, तू मला शिकवलेला हा समभावाचा योग मनाच्या चंचलतेमुळे स्थिर कसा राहील हे मला दिसत नाही.

GujaratiIND

હે કૃષ્ણ, મનની ચંચળતાના કારણે તમે મને શીખવ્યો છે તે આ સમતાનો યોગ કેવી રીતે સ્થિર રહી શકે તે હું જોતો નથી.

PunjabiIND

ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਮੈਂ ਇਹ ਨਹੀਂ ਦੇਖਦਾ ਕਿ ਇਹ ਸਮਰੂਪਤਾ ਦਾ ਯੋਗ, ਜੋ ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਸਿਖਾਇਆ ਹੈ, ਮਨ ਦੀ ਬੇਚੈਨੀ ਦੇ ਕਾਰਨ, ਕਿਵੇਂ ਸਥਿਰਤਾ ਨਾਲ ਕਾਇਮ ਰੱਖਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।

KannadaIND

ಓ ಕೃಷ್ಣ, ನೀನು ನನಗೆ ಕಲಿಸಿದ ಈ ಸಮಚಿತ್ತದ ಯೋಗವು ಮನಸ್ಸಿನ ಚಂಚಲತೆಯಿಂದ ಹೇಗೆ ಸ್ಥಿರವಾಗಿ ಉಳಿಯುತ್ತದೆ ಎಂದು ನಾನು ನೋಡುತ್ತಿಲ್ಲ.

SindhiIND

اي ڪرشن، مون کي نظر نه ٿو اچي ته هي برابريءَ جو يوگا، جيڪو تو مون کي سيکاريو آهي، ذهن جي بي آراميءَ سبب، ڪيئن ثابت قدمي سان قائم رهي سگهي ٿو.

BengaliIND

হে কৃষ্ণ, মনের অস্থিরতার কারণে এই সাম্যের যোগ, যা আপনি আমাকে শিখিয়েছেন, তা কীভাবে স্থিরভাবে বজায় রাখা যায় তা আমি দেখতে পাচ্ছি না।

TeluguIND

ఓ కృష్ణా, నీవు నాకు బోధించిన ఈ సమస్థితి యోగం మనస్సు యొక్క అశాంతి కారణంగా ఎలా స్థిరంగా నిర్వహించబడుతుందో నాకు కనిపించడం లేదు.

MalayalamIND

ഹേ കൃഷ്ണാ, അങ്ങ് എന്നെ പഠിപ്പിച്ച സമചിത്തതയുടെ ഈ യോഗ മനസ്സിൻ്റെ അസ്വസ്ഥതയാൽ എങ്ങനെ സ്ഥിരമായി നിലനിറുത്തുമെന്ന് ഞാൻ കാണുന്നില്ല.

KonkaniIND

हे कृष्ण, तुवें म्हाका शिकयल्लो हो समता योग, मनाच्या अस्वस्थतायेक लागून, स्थिरपणान कसो तिगोवन दवरूं येता तें म्हाका दिसना.

MizoIND

Aw Krishna, he Yoga of equanimity min zirtir hi engtin nge nghet taka vawn theih a nih ka hmu lo, rilru hahdam lohna avang hian.

DogriIND

हे कृष्ण, मैं नेईं दिक्खदा जे इस समता दा योग, जेह्ड़ा तुसें मिगी सिखाया ऐ, मन दी बेचैनी दे कारण, स्थिरता कन्नै किस चाल्ली बनाई रक्खेआ जाई सकदा ऐ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[मनुष्यके कल्याणके लिये भगवान्ने गीतामें खास बात बतायी कि सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिको लेकर चित्तमें समता रहनी चाहिये। इस समतासे मनुष्यका कल्याण होता है। अर्जुन पापोंसे डरते थे तो उनके लिये भगवान्ने कहा कि 'जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर तुम युद्ध करो, फिर तुम्हारेको पाप नहीं लगेगा' (गीता 2। 38)। जैसे दुनियामें बहुत-से पाप होते रहते हैं, पर वे पाप हमें नहीं लगते; क्योंकि उन पापोंमें हमारी विषम-बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत समबुद्धि रहती है। ऐसे ही समबुद्धिपूर्वक सांसारिक काम करनेसे कर्मोंसे बन्धन नहीं होता। इसी भावसे भगवान्ने इस अध्यायके आरम्भमें कहा है कि जो कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है। इसी कर्म-फलत्यागकी सिद्धि भगवान्ने 'समता' बतायी (6। 9)। इस समताकी प्राप्तिके लिये भगवान्ने दसवें श्लोकसे बत्तीसवें श्लोकतक ध्यानयोगका वर्णन किया। इसी ध्यानयोगके वर्णनका लक्ष्य करके अर्जुन यहाँ अपनी मान्यता प्रकट करते हैं।]

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस उपर्युक्त पूर्णज्ञानरूप योगको कठिनतासे सम्पादन किया जानेयोग्य समझकर उसकीप्राप्तिके निश्चित उपायको सुननेकी इच्छावाला अर्जुन बोला हे मधुसूदन आपने जो यह समत्वभावरूप योग कहा है मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी अचल स्थिति नहीं देखता हैँ यह बात प्रसिद्ध है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

मनश्चञ्चलमस्थिरमित्युपश्रुत्य निर्विशेषे चित्तस्थैर्यं दुःशकमिति मन्वानस्तदुपायबुभुत्सया पृच्छतीति प्रश्नमुत्थापयति एतस्येति। तत्प्राप्त्युपायं शुश्रूषुरिति संबन्धः। मनसश्चञ्चलत्वेऽपि तन्निग्रहद्वारा योगस्थैर्यं संपाद्यतामित्याशङ्क्याह प्रसिद्धमिति।

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Sri Dhanpati

एतादृशं योगमशक्यं मन्यमानस्तदुपायं ध्रुवं जिज्ञासुरर्जुन उवाच। योऽयं साम्येन समत्वलक्षणो योगस्त्वया प्रोक्तएतस्य स्थिरां निश्चलां स्थितिमहं न पश्यामि नोपलमे। चञ्चलत्वान्मनस इति शेषः। मधुसूदनेति संबोधयन् तमोरजसो सूदनेन मम चित्तं त्वमचञ्चलं संपादयितुं समर्थोऽसीति सूचयति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
yaḥwhich
ayamthis
yogaḥsystem of Yog
tvayāby you
proktaḥdescribed
sāmyenaby equanimity
madhusūdana
etasyaof this
ahamI
nado not
paśhyāmisee
chañchalatvātdue to restlessness
sthitimsituation
sthirāmsteady
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः

हे अर्जुन ! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.34
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्

क्योंकि हे कृष्ण ! मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 33
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 33
अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्

हे मधुसूदन ! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ: "हे मधुसूदन ! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 33?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 33 translates to: "O Krishna, I do not see how this Yoga of equanimity, which you have taught me, can be maintained steadily, due to the restlessness of the mind. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 33 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। हे मधुसूदन ! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 33. O Krishna, I do not see how this Yoga of equanimity, which you have taught me, can be maintained steadily, due to the restlessness of the mind. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.