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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति

जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

ఎవరైతే నన్ను ప్రతిచోటా చూస్తారో మరియు నాలో ప్రతిదీ చూస్తారో, అతను నా నుండి మరియు నేను అతని నుండి ఎప్పటికీ విడిపోడు.

KannadaIND

ಎಲ್ಲೆಲ್ಲೂ ನನ್ನನ್ನು ಕಾಣುವ ಮತ್ತು ನನ್ನಲ್ಲಿ ಎಲ್ಲವನ್ನೂ ನೋಡುವವನು ಎಂದಿಗೂ ನನ್ನಿಂದ ಬೇರ್ಪಡುವುದಿಲ್ಲ, ನಾನು ಅವನಿಂದ ಬೇರ್ಪಡುವುದಿಲ್ಲ.

MalayalamIND

എന്നെ എല്ലായിടത്തും കാണുകയും എന്നിൽ എല്ലാം കാണുകയും ചെയ്യുന്നവൻ ഒരിക്കലും എന്നിൽ നിന്ന് വേർപെടുന്നില്ല, അവനിൽ നിന്ന് ഞാൻ വേർപെടുന്നില്ല.

TamilIND

எங்கும் என்னைக் காண்கிறாரோ, என்னில் அனைத்தையும் காண்கிறாரோ, அவர் என்னைவிட்டுப் பிரிவதில்லை, நான் அவரைவிட்டுப் பிரிவதுமில்லை.

BengaliIND

যিনি আমাকে সর্বত্র দেখেন এবং আমার মধ্যে সবকিছু দেখেন, তিনি কখনও আমার থেকে বিচ্ছিন্ন হন না এবং আমিও তাঁর থেকে বিচ্ছিন্ন হন না।

GujaratiIND

જે મને સર્વત્ર જુએ છે અને મારામાં બધું જુએ છે, તે ક્યારેય મારાથી વિખૂટા પડતો નથી અને હું પણ તેનાથી વિમુખ થતો નથી.

NepaliIND

जसले मलाई जताततै देख्छ र ममा सबै कुरा देख्छ, ऊ कहिल्यै मबाट अलग हुँदैन, न म उसबाट छुट्छ।

PunjabiIND

ਜੋ ਮੈਨੂੰ ਹਰ ਥਾਂ ਵੇਖਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਸਭ ਕੁਝ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਕਦੇ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਵਿਛੁੜਦਾ ਨਹੀਂ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਮੈਂ ਉਸ ਤੋਂ ਵਿਛੜਦਾ ਹਾਂ।

MarathiIND

जो मला सर्वत्र पाहतो आणि माझ्यामध्ये सर्व काही पाहतो, तो माझ्यापासून कधीही विभक्त होत नाही आणि मी त्याच्यापासून कधीही विभक्त होत नाही.

SindhiIND

جيڪو مون کي هر هنڌ ڏسي ٿو ۽ هر شيءِ مون ۾ ڏسي ٿو، اهو ڪڏهن به مون کان جدا نه ٿيندو آهي ۽ نه ئي مان ان کان جدا ٿيندس.

MaithiliIND

जे हमरा सब ठाम देखैत अछि आ हमरा मे सब किछु देखैत अछि, ओ हमरा सँ कहियो अलग नहि भ' जाइत अछि, आ ने हम ओकरा सँ।

DogriIND

जो हर जगह मिगी दिक्खदा ऐ ते मेरे च सब किश दिक्खदा ऐ, ओह् कदें बी मेरे कोला बक्ख नेईं होंदा ते ना गै मैं उदे कोला।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यो मां पश्यति सर्वत्र'--जो भक्त सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, राक्षस, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिमें मेरेको देखता है। जैसे, ब्रह्माजी जब बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं, प्रत्युत उनके बेंत, सींग, बाँसुरी, वस्त्र, आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही बन गये । यह लीला एक वर्षतक चलती रही, पर किसीको इसका पता नहीं चला। बछड़ोंमेंसे कई बछ़ड़े तो केवल दूध ही पीनेवाले थे, इसलिये वे घरपर ही रहते थे और बड़े बछड़ोंको भगवान् श्रीकृष्ण अपने साथ वनमें ले जाते थे। एक दिन दाऊ दादा (बलरामजी) ने देखा कि छोटे बछड़ोंवाली गायें भी अपने पहलेके (बड़े) बछड़ोंको देखकर उनको दूध पिलानेके लिये हुंकार मारती हुई दौड़ पड़ीं। बड़े गोपोंने उन गायोंको बहुत रोका, पर वे रुकी नहीं। इससे गोपोंको उन गायोंपर बहुत गुस्सा आ गया। परन्तु जब उन्होंने अपने-अपने बालकोंको देखा, तब उनका गुस्सा शान्त हो गया और स्नेह उमड़ पड़ा। वे बालकोंको हृदयसे लगाने लगे, उनका माथा सूँघने लगे। इस लीलाको देखकर दाऊ दादाने सोचा कि यह क्या बात है; उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो उनको बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें भगवान् श्रीकृष्ण ही दिखायी दिये। ऐसे ही भगवान्का सिद्ध भक्त सब जगह भगवान्को ही देखता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें भगवत्सत्ताके सिवाय दूसरी किञ्चिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती। 'सर्वं च मयि पश्यति'--और जो भक्त देश, काल. वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिको मेरे ही अन्तर्गत देखता है। जैसे, गीताका उपदेश देते समय अर्जुनके द्वारा प्रार्थना करनेपर भगवान् अपना विश्वरूप दिखाते हुए कहते हैं कि चराचर सारे संसारको मेरे एक अंशमें स्थित देख--'इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्। मम देहे' ৷৷. (11। 7) तो अर्जुन भी कहते हैं कि मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको देख रहा हूँ--'पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्' (11। 15)। सञ्जयने भी कहा कि अर्जुनने भगवान्के शरीरमें सारे संसारको देखा--'तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा' (11। 13)। तात्पर्य है कि अर्जुनने भगवान्के शरीरमें सब कुछ भगवत्स्वरूप ही देखा। ऐसे ही भक्त देखने, सुनने, समझनेमें जो कुछ आता है, उसको भगवान्में ही देखता है और भगवत्स्वरूप ही देखता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस आत्माकी एकताके दर्शनका फल कहा जाता है जो सबके आत्मा मुझ वासुदेवको सब जगह अर्थात् सब भूतोंमें ( व्यापक ) देखता है और ब्रह्मा आदि समस्त प्राणियोंको मुझ सर्वात्मा ( परमेश्वर ) में देखता है इस प्रकार आत्माकी एकताको देखनेवाले उस ज्ञानीके लिये मैं ईश्वर कभी अदृश्य नहीं होता अर्थात् कभी अप्रत्यक्ष नहीं होता और वह ज्ञानी भी कभी मुझ वासुदेवसे अदृश्य परोक्ष नहीं होता क्योंकि उसका और मेरा स्वरूप एक ही है। निःसंदेह अपना आत्मा अपना प्रिय ही होता है और जो सर्वात्मभावसे एकताको देखनेवाला है वह मैं ही हूँ।

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Sri Anandgiri

उक्तस्यैकत्वज्ञानस्य फलविकल्पत्वशङ्कां शिथिलयति एतस्येति। तत्रैकत्वदर्शनमनुवदति यो मामिति। तत्फलमिदानीमुपन्यस्यति तस्येति। ज्ञानानुवादभागं विभजते यो मामिति। तत्फलोक्तिभागं व्याचष्टे तस्यैवमिति। अनेकत्वदर्शिनोऽपीश्वरो नित्यत्वान्न प्रणश्यतीत्याशङ्क्याह नेति। अहं परमानन्दो न तं प्रति परोक्षीभवामीत्यर्थः। स चेत्यादि व्याचष्टे विद्वानिति। विद्वानिवाविद्वानपीश्वरस्य न नश्यतीत्याशङ्क्योक्तं नेत्यादिना। अविदुषश्च स्वरूपेण सतोऽपि व्यवहितत्वादविद्यया नष्टप्रायतेत्यर्थः। ईश्वरस्य विदुषस्च परस्परमपरोक्षत्वे हेतुमाह तस्य चेति। आत्मैकत्वेऽपि कथं मिथोऽपरोक्षत्वं तत्राह स्वात्मेति। विद्वदीश्वरयोरेकत्वानुवादेन विद्याफलं विवृणोति यस्माच्चेति। तस्मादेकत्वदर्शनार्थं प्रयतितव्यमिति शेषः।

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Sri Dhanpati

एकत्वदर्शनस्य फलमाह य इति। यो मां वासुदेवं प्रत्यगभिन्नं सर्वत्र तस्मन्नधिष्ठानरुपं पश्यत्यपरोक्षीकरोति स सर्वं च ब्रह्मादिभूतजातं मयि प्रत्यगभिन्ने वासुदेवे कल्पितं पश्यति तस्य ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारवतः। अहं प्रत्यगभिन्नपरमात्मा न प्रणश्यामि अदृश्यः परोक्षो न भवामि। स च विद्वानात्मैकत्वदर्शी मम प्रत्यगभिन्नस्य वासुदेवस्य न प्रणश्यति परोक्षो न भवति। यद्यपि विद्वानिवाविद्वानपि ईश्वरस्य न प्रणश्यति तथाप्यविदुशोऽविद्यया व्यवहितत्वात्परोक्षप्रायता। यत्तु एवं शुद्धं त्वंपदार्थे निरुप्य शुद्धं तत्पदार्थं निरुपयति। यो योगी मामीश्वरं तत्पदार्थ्रपञ्चकारणं मायोपाधिविवेकेन सर्वत्र प्रपञ्चे सद्रूपेण स्फुरणरुपेण चानुस्यूतं सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं परमार्थसत्यमानन्दघनमनन्तं पश्यति योगजेन प्रत्यक्षेणापरोक्षीकरोति तथा सर्वप्रपञ्चजाते मायया मय्योरोपितं मद्भिन्नतया मृषात्वेनैव पश्यति तस्यैव विवेकदर्शिनः अहं तत्पदार्थो भगवान्न प्रणशयामि ईश्वरः कश्चिन्मदभिन्नोऽस्तीति परोक्षज्ञानविषयो न भवामि कुंतु योगजापरोक्षज्ञानविषयो भवामि। यद्यपि वाक्यजापरोक्षज्ञानविषयत्वं पदार्थाभेदेनैव तथापि केवलस्यापि तत्पदार्थस्य योगजापरोक्षज्ञानविषयत्वमुपपद्यत एव। योगजेन प्रत्यक्षेण मामपरोक्षीकुर्वन्स च मे न प्रणश्यति परोक्षो न भवति। स्वात्मा हि मम स विद्वानिति प्रियत्वात्सर्वदा मदपरोक्षज्ञानगोचरो भवति।ये ता मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् इत्त्युक्तेरिति केचित्। तत्र मूलतद्भाष्यस्वव्याख्यानविरुद्धापातनिकातं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामिनावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् इत्यादिश्रुतिविरुद्धा। योगजाखण्डापरोक्षज्ञानकल्पना न नादर्तव्या। तस्यैत्यादेः संकोचकपदाद्यभावेन कदाप्यहं तस्य परोक्षी न भवामीत्यर्थं विहाय कदाचित्समाध्यादिकारे योगजप्रत्यक्षेणेति कल्पनाया अयोगाच्चेति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yaḥwho
māmme
paśhyatisee
sarvatraeverywhere
sarvameverything
chaand
mayiin me
paśhyatisee
tasyafor him
ahamI
nanot
praṇaśhyāmilost
saḥthat person
chaand
meto me
nanor
praṇaśhyatilost
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः

सब जगह अपने स्वरूपको देखनेवाला और ध्यानयोगसे युक्त अन्तःकरणवाला योगा अपने स्वरूपको सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित देखता है और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने स्वरूपमें देखता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते

मेरेमें एकीभावसे स्थित हुआ जो योगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरेमें ही बर्ताव कर रहा है अर्थात् वह सर्वथा मेरेमें ही स्थित है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 30
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति

जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ: "जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 30?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 30 translates to: "He who sees Me everywhere and sees everything in Me, never becomes separated from Me, nor do I from him. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 30 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yo māṁ paśhyati sarvatra sarvaṁ cha mayi paśhyati" mean in English?

"yo māṁ paśhyati sarvatra sarvaṁ cha mayi paśhyati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 30. He who sees Me everywhere and sees everything in Me, never becomes separated from Me, nor do I from him. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.