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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 22
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते

जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

దానిని పొందిన తరువాత, దానికంటే గొప్ప లాభం మరొకటి లేదని అతను భావిస్తాడు; దానిలో స్థిరపడి, అతను భారీ దుఃఖంతో కూడా చలించలేదు.

SindhiIND

حاصل ڪرڻ کان پوءِ، هو سمجهي ٿو ته ان کان وڌيڪ ٻيو ڪو به فائدو نه آهي. ان ۾ قائم آهي، هو سخت غم کان به نه هٽندو آهي.

TamilIND

அதைப் பெற்று, அதைவிட மேலான ஆதாயம் வேறு இல்லை என்று நினைக்கிறான்; அதில் நிலைநிறுத்தப்பட்டு, கடும் துக்கத்தால் கூட அவன் அசையவில்லை.

GujaratiIND

તે પ્રાપ્ત કર્યા પછી, તે વિચારે છે કે તેનાથી શ્રેષ્ઠ બીજું કોઈ લાભ નથી; તેમાં સ્થાપિત થઈને તે ભારે દુ:ખથી પણ હલતો નથી.

BengaliIND

এটা পাওয়ার পর সে মনে করে এর চেয়ে বড় কোনো লাভ নেই; তাতে প্রতিষ্ঠিত, ভারী দুঃখেও সে বিচলিত হয় না।

PunjabiIND

ਇਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਕੇ, ਉਹ ਸਮਝਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਤੋਂ ਉੱਤਮ ਹੋਰ ਕੋਈ ਲਾਭ ਨਹੀਂ ਹੈ; ਇਸ ਵਿੱਚ ਟਿਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਉਹ ਭਾਰੀ ਉਦਾਸ ਦੁਆਰਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹਿੱਲਦਾ।

MalayalamIND

അത് നേടിയ ശേഷം, അതിനെക്കാൾ ശ്രേഷ്ഠമായ മറ്റൊരു നേട്ടമില്ലെന്ന് അവൻ കരുതുന്നു; അതിൽ ഉറച്ചുനിൽക്കുന്നു, കനത്ത ദുഃഖത്താൽ പോലും അവൻ കുലുങ്ങുന്നില്ല.

NepaliIND

यो प्राप्त गरेपछि, उसले सोच्दछ कि यो भन्दा ठूलो अरू कुनै लाभ छैन। त्यसमा स्थापित भई भारी दु:खले पनि उनी हट्दैनन्।

KannadaIND

ಅದನ್ನು ಪಡೆದು, ಅದಕ್ಕಿಂತ ಮಿಗಿಲಾದ ಲಾಭ ಮತ್ತೊಂದಿಲ್ಲ ಎಂದು ಭಾವಿಸುತ್ತಾನೆ; ಅದರಲ್ಲಿ ಸ್ಥಾಪಿತವಾಗಿದೆ, ಅವರು ಭಾರೀ ದುಃಖದಿಂದ ಕೂಡ ಕದಲುವುದಿಲ್ಲ.

MarathiIND

ते प्राप्त केल्यावर, त्याला वाटते की यापेक्षा श्रेष्ठ दुसरे कोणतेही लाभ नाही; त्यामध्ये प्रस्थापित, तो प्रचंड दु:खानेही हलत नाही.

MaithiliIND

एकरा प्राप्त क' क' ओकरा लगैत छैक जे एहि सँ श्रेष्ठ कोनो आन लाभ नहि छैक; ओहि मे स्थापित, भारी शोक सँ सेहो नहि हिलैत अछि ।

ManipuriIND

ꯃꯁꯤ ꯐꯪꯂꯕꯥ ꯃꯇꯨꯡꯗꯥ ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯃꯁꯤꯗꯒꯤ ꯍꯦꯟꯅꯥ ꯐꯕꯥ ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯀꯥꯟꯅꯕꯥ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯂꯩꯇꯦ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯈꯜꯂꯤ; ꯃꯗꯨꯗꯥ ꯂꯤꯡꯈꯠꯈꯤꯕꯥ, ꯃꯍꯥꯛ ꯑꯀꯅꯕꯥ ꯑꯋꯥꯕꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯐꯥꯑꯣꯕꯥ ꯊꯧꯅꯥ ꯍꯥꯞꯄꯤꯗꯦ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः'-- मनुष्यको जो सुख प्राप्त है, उससे अधिक सुख दीखता है तो वह उसके लोभमें आकर विचलित हो जाता है। जैसे, किसीको एक घंटेके सौ रुपये मिलते हैं। अगर उतने ही समयमें दूसरी जगह हजार रुपये मिलते हों, तो वह सौ रुपयोंकी स्थितिसे विचलित हो जायगा और हजार रूपयोंकी स्थितिमें चला जायगा। निद्रा, आलस्य और प्रमादका तामस सुख प्राप्त होनेपर भी जब विषयजन्य सुख ज्यादा अच्छा लगता है, उसमें अधिक सुख मालूम देता है, तब मनुष्य तामस सुखको छोड़कर विषयजन्य सुखकी तरफ लपककर चला जाता है। ऐसे ही जब वह विषयजन्य सुखसे ऊँचा उठता है, तब वह सात्त्विक सुखके लिये विचलित हो जाता है और जब सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठता है, तब वह आत्यन्तिक सुखके लिये विचलित हो जाता है। परन्तु जब आत्यन्तिक सुख प्राप्त हो जाता है, तो फिर वह उससे विचलित नहीं होता; क्योंकि आत्यन्तिक सुखसे बढ़कर दूसरा कोई सुख, कोई लाभ है ही नहीं। आत्यन्तिक सुखमें सुखकी हद हो जाती है। ध्यानयोगीको जब ऐसा सुख मिल जाता है, तो फिर वह इस सुखसे विचलित हो ही कैसे सकता है?

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा जिस आत्मप्राप्तिरूप लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ है ऐसा नहीं मानता दूसरे लाभको स्मरण भी नहीं करता। एवं जिस आत्मतत्त्वमें स्थित हुआ योगी शस्त्राघात आदि बड़े भारी दुःखोंद्वारा भी विचलित नहीं किया जा सकता।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रकारान्तरेण प्रकृतं योगं विशिनष्टि किञ्चेति। आत्मलाभान्न परं विद्यत इति स्मृत्वा व्याचष्टे यमात्मलाभमिति। लाभान्तरं पुरुषार्थभूतं ततस्तस्मादात्मलाभादिति यावत्। तं विद्यादित्युत्तरत्र संबन्धः। यस्मिन्नित्याद्यवतारयति किञ्चेति। अपरिपक्वयोगो यथा दर्शितेन दुःखेन प्रच्याव्यते न चैवं विचाल्यते यस्मिन्स्थितो योगी तं योगं विद्यादिति पूर्ववत्।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

किंच यमात्मलाभं लब्ध्वा च ततोऽधिकमन्यल्लाभान्तरमस्तीति न मन्यते। किंच यस्मिन्नात्मत्त्वे स्थितो गुरुणापि दुःखेन शस्त्रनिपातादिलक्षणेन न विचाल्यते। यत्तु गुरुणा बृहस्पतिनापि दुःखेनातिप्रयासेनापि न विचाल्यते न ततः परिभ्रष्टः क्रियत इति तदुपेक्ष्यम्। क्लिष्ट कल्पनयाऽप्रसक्तप्रतिषेधस्यानुचितत्वात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yamwhich
labdhvāhaving gained
chaand
aparamany other
lābhamgain
manyateconsiders
nanot
adhikamgreater
tataḥthan that
yasminin which
sthitaḥbeing situated
nanever
duḥkhenaby sorrow
guruṇā(by) the greatest
apieven
vichālyateis shaken
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.21
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः

जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे विचलित नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.23
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा

जिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये। (वह योग जिस ध्यानयोगका लक्ष्य है,) उस ध्यानयोगका अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 22
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 22
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते

जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ: "जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 22?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 22 translates to: "Having obtained it, he thinks there is no other gain superior to it; established in it, he is not moved even by heavy sorrow. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 22 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yaṁ labdhvā chāparaṁ lābhaṁ manyate nādhikaṁ tataḥ" mean in English?

"yaṁ labdhvā chāparaṁ lābhaṁ manyate nādhikaṁ tataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 22. Having obtained it, he thinks there is no other gain superior to it; established in it, he is not moved even by heavy sorrow. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.