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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 16
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन

हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

నిశ్చయంగా, ఎక్కువ తినేవాడికి, అస్సలు తిననివాడికి, ఎక్కువ నిద్రపోయేవాడికి, ఎప్పుడూ మెలకువగా ఉండేవాడికి యోగం సాధ్యం కాదు, ఓ అర్జునా.

TamilIND

உண்மையாகவே, அதிகமாகச் சாப்பிடுபவனுக்கும், சாப்பிடாதவனுக்கும், அதிகமாகத் தூங்குபவனுக்கும், எப்போதும் விழித்திருப்பவனுக்கும் யோகம் சாத்தியமில்லை, ஓ அர்ஜுனா.

NepaliIND

निस्सन्देह, हे अर्जुन, न धेरै खानेको लागि, न त धेरै खानेको लागि, न धेरै सुत्नेलाई, न सदा जाग्नेलाई योग सम्भव छ ।

SindhiIND

بيشڪ يوگا ان لاءِ ممڪن ناهي جيڪو گهڻو کائي، نه ان لاءِ جيڪو گهڻو کائي، نه ان لاءِ جيڪو گهڻو سمهي، ۽ نه ان لاءِ جيڪو هميشه جاڳي ٿو، اي ارجن.

MarathiIND

खरंच, हे अर्जुना, जो जास्त खातो त्याला, जो अजिबात खात नाही, किंवा खूप झोपतो त्याला किंवा जो सदैव जागृत असतो त्याला योग शक्य नाही.

MalayalamIND

തീർച്ചയായും, അമിതമായി ഭക്ഷണം കഴിക്കുന്നവനോ, ഒട്ടും കഴിക്കാത്തവനോ, അമിതമായി ഉറങ്ങുന്നവനോ, സദാ ഉണർന്നിരിക്കുന്നവനോ, ഹേ അർജുനാ, യോഗ സാദ്ധ്യമല്ല.

GujaratiIND

ખરેખર, હે અર્જુન, જે વધારે ખાય છે તેના માટે યોગ શક્ય નથી, કે જે બિલકુલ ખાતો નથી, કે જે વધારે ઊંઘે છે તેના માટે કે જે હંમેશા જાગે છે તેના માટે યોગ શક્ય નથી.

PunjabiIND

ਸੱਚਮੁੱਚ, ਯੋਗ ਉਸ ਲਈ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੈ ਜੋ ਬਹੁਤ ਜ਼ਿਆਦਾ ਖਾਂਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਉਸ ਲਈ ਜੋ ਬਿਲਕੁਲ ਨਹੀਂ ਖਾਂਦਾ, ਨਾ ਉਸ ਲਈ ਜੋ ਬਹੁਤ ਜ਼ਿਆਦਾ ਸੌਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਉਸ ਲਈ ਜੋ ਸਦਾ ਜਾਗਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ।

BengaliIND

সত্যই, যে খুব বেশি খায় তার পক্ষে, যে একেবারেই খায় না তার পক্ষে, যে খুব বেশি ঘুমায় তার পক্ষে এবং যে সর্বদা জাগ্রত থাকে তার পক্ষে যোগ সম্ভব নয়, হে অর্জুন।

KannadaIND

ಅತಿಯಾಗಿ ತಿನ್ನುವವನಿಗಾಗಲೀ, ಸ್ವಲ್ಪವೂ ತಿನ್ನದವನಿಗಾಗಲೀ, ಅತಿಯಾಗಿ ನಿದ್ದೆಮಾಡುವವನಿಗಾಗಲೀ, ಸದಾ ಎಚ್ಚರವಾಗಿರುವವನಿಗಾಗಲೀ ಯೋಗಸಾಧ್ಯವಲ್ಲ, ಓ ಅರ್ಜುನ.

AssameseIND

সঁচাকৈয়ে যিজনে বেছিকৈ খায়, তেওঁৰ বাবেও যোগ সম্ভৱ নহয়, যিজনে একেবাৰেই নাখায় তেওঁৰ বাবেও সম্ভৱ নহয়, অত্যধিক শুই থকাজনৰ বাবেও নহয়, অৰ্জুন, সদায় জাগ্ৰত থকাজনৰ বাবেও যোগ সম্ভৱ নহয়।

MaithiliIND

निश्चय, योग नहि ओहि लेल संभव अछि जे बेसी खाइत अछि, आ नहि जे एकदम नहि खाइत अछि, आ नहि जे बेसी सुतैत अछि, आ ने ओहि लेल जे सदिखन जागल रहैत अछि, हे अर्जुन।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति'--अधिक खानेवालेका योग सिद्ध नहीं होता । कारण कि अन्न अधिक खानेसे अर्थात् भूखके बिना खानेसे अथवा भूखसे अधिक खानेसे प्यास ज्यादा लगती है, जिससे पानी ज्यादा पीना पड़ता है। ज्यादा अन्न खाने और पानी पीनेसे पेट भारी हो जाता है। पेट भारी होनेसे शरीर भी बोझिल मालूम देता है। शरीरमें आलस्य छा जाता है। बार-बार पेट याद आताहै। कुछ भी काम करनेका अथवा साधन, भजन, जप, ध्यान आदि करनेका मन नहीं करता। न तो सुखपूर्वक बैठा जाता है और न सुखपूर्वक लेटा ही जाता है तथा न चलने-फिरनेका ही मन करता है। अजीर्ण आदि होनेसे शरीरमें रोग पैदा हो जाते हैं। इसलिये अधिक खानेवाले पुरुषका योग कैसे सिद्ध हो सकता है? नहीं हो सकता।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अब योगीके आहार आदिके नियम कहे जाते हैं अधिक खानेवालेका अर्थात् अपनी शक्तिका उल्लङ्घन करके शक्तिसे अधिक भोजन करनेवालाका योग सिद्ध नहीं होता और बिल्कुल न खानेवालेका भी योग सिद्ध नहीं होता क्योंकि यह श्रुति है कि जो अपने शरीरकी शक्तिके अनुसार अन्न खाया जाता है वह रक्षा करता है वह कष्ट नहीं देता ( बिगाड़ नहीं करता ) जो उससे अधिक होता है वह कष्ट देता है और जो प्रमाणसे कम होता है वह रक्षा नहीं करता। इसलिये योगीको चाहिये कि अपने लिये जितना उपयुक्त हो उससे कम या ज्यादा अन्न न खाय। अथवा यह अर्थ समझो कि योगीके लिये योगशास्त्रमें बतलाया हुआ जो अन्नका परिमाण है उससे अधिक खानेवालेका योग सिद्ध नहीं होता। वहाँ यह परिमाण बतलाया है कि पेटका आधा भाग अर्थात् दो हिस्से तो शाकपात आदि व्यञ्जनोंसहित भोजनसे और तीसरा हिस्सा जलसे पूर्ण करना चाहिये तथा चौथा वायुके आनेजानेके लिये खाली रखना चाहिये इत्यादि। तथा हे अर्जुन न तो बहुत सोनेवालेका ही योग सिद्ध होता है और न अधिक जागनेवालेको ही योगसिद्धि प्राप्त होती है।

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Sri Anandgiri

आहारादीत्यादिशब्देन विहारजागरितादि चोच्यते आत्मसंमितमन्नपरिमाणमष्टग्रासादि। आहारनियमे शतपथश्रुतिं प्रमाणयति यदु ह वा इति। तदन्नं भुज्यमानं यदु ह वा इति प्रसिद्ध्यानूदितमवति अनुष्ठानयोग्यतामापाद्यानुष्ठानद्वारेण भोक्तारं रक्षति न पुनस्तदन्नमस्यानर्थाय भवतीत्यर्थः। यत्पुनरात्मसंमिताद्भूयोऽधिकतरं शास्त्रमतिक्रम्य भुज्यते तदात्मानं हिनस्ति भोक्तुरनर्थाय भवति। यच्चान्नं कनीयोऽल्पतरं शास्त्रनिश्चयाभावादद्यते तदन्नमनुष्ठानयोग्यतादिद्वारा न रक्षितुं क्षमते। तस्मादत्यधिकमत्यल्पं चान्नं योगमारुरुक्षता त्याज्यमित्यर्थः। श्रुतिसिद्धमर्थं निगमयति तस्मादिति। नेत्यादेर्व्याख्यानान्तरमाह अथवेति। किं तदन्नपरिमाणं योगशास्त्रोक्तं यदधिकं न्यूनं वाभ्यवहरतो योगानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह उक्तं हीति।पूरयेदशनेनार्धं तृतीयमुदकेन तु। वायोः संचरणार्थं तु चतुर्थमवशेषयेत्।। इति वाक्यमादिशब्दार्थः। यथा अत्यन्तमश्नतोऽनश्नतश्च योगो न संभवति तथात्यन्तं स्वपतो जाग्रतश्च न योगः संभवतीत्याह तथेति।

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Sri Dhanpati

योगिन आहारादिनियमं वक्तुं प्रथमं व्यतिरेकमाह नेति। अत्यश्रतः आत्मसंमितादन्नादधिकमश्रतः योगो नास्ति। नचैकान्तमात्मसंमितमप्यनश्रतो योगोऽस्ति। उभयथापि व्याध्यादिना नाशप्रसङ्गात्। तथाच शतपथश्रुतिःयदु ह वा आत्मसंमितमन्नं तदवति तन्न हिनस्ति यद्भूयो हिनस्ति तद्यत्कनीयो न तदवति इति तस्माद्योगी नात्मसंमितादन्नादधिकं न्यूनं वाश्रीयात्। योगशास्त्रे परिपठितादन्नपरिणादतिमात्रं न्यूनं वाश्रतो योगिनो योगो नास्तीति वा व्याख्येयम्। तदुक्तम्पूरयेदशनेनार्धं तृतीयमुदकेन तु। वायोः संचरणार्थं तु चतुर्थमवशेषयेत्।। इति। एतादृशस्य योग एव न सिध्यति। तेन दुःखरुपसमूलसंसारपङ्कहान्या शुद्धत्वाविर्भावस्तु दूरनिरस्त इति सूचयन्संबोधयति हे अर्जुनेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
atitoo much
aśhnataḥof one who eats
tuhowever
yogaḥYog
astithere is
nanot
chaand
ekāntamat all
anaśhnataḥabstaining from eating
nanot
chaand
atitoo much
svapnaśhīlasya
jāgrataḥof one who does not sleep enough
nanot
evacertainly
chaand
arjunaArjun
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Bhagavad Gita · 6.15
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति

नियत मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा

दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 16
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन

हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 16 translates to: "Verily, Yoga is not possible for him who eats too much, nor for him who does not eat at all, nor for him who sleeps too much, nor for him who is always awake, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ" mean in English?

"nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 16. Verily, Yoga is not possible for him who eats too much, nor for him who does not eat at all, nor for him who sleeps too much, nor for him who is always awake, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.