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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 14
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः

जिसका अन्तःकरण शान्त है, जो भय-रहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है, ऐसा सावधान योगी मनका संयम करके मेरेमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे। — VaniSagar

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TamilIND

அமைதியான மனம், அச்சமற்ற, பிரம்மச்சாரியின் சபதத்தில் உறுதியாக, தங்கள் மனதைக் கட்டுப்படுத்தி, என்னையே நினைத்து, மனதில் சமநிலையுடன், என்னையே உயர்ந்த குறிக்கோளாகக் கொண்டு அவர்கள் உட்காரட்டும்.

TeluguIND

నిర్మలమైన మనస్సుగల, నిర్భయమైన, బ్రహ్మచారి యొక్క ప్రతిజ్ఞలో దృఢంగా, వారి మనస్సును నియంత్రించి, నా గురించి ఆలోచించి మరియు మనస్సులో సమతుల్యతను కలిగి ఉండి, నన్ను తమ పరమ లక్ష్యంగా పెట్టుకుని కూర్చోనివ్వండి.

MalayalamIND

ശാന്തമനസ്സുള്ളവരും, ഭയമില്ലാത്തവരും, ബ്രഹ്മചാരിയുടെ പ്രതിജ്ഞയിൽ ഉറച്ചവരും, അവരുടെ മനസ്സിനെ നിയന്ത്രിച്ചും, എന്നെക്കുറിച്ച് ചിന്തിച്ചും, മനസ്സിൽ സമചിത്തതയോടെയും, എന്നെ പരമമായ ലക്ഷ്യമാക്കി അവർ ഇരിക്കട്ടെ.

MarathiIND

निर्मळ मनाचे, निर्भय, ब्रह्मचारी व्रतात दृढ असलेले, मनावर ताबा ठेवून, माझा विचार करून आणि चित्त संतुलित ठेवून, मलाच त्यांचे सर्वोच्च ध्येय मानून त्यांना बसू द्या.

KannadaIND

ಪ್ರಶಾಂತ ಮನಸ್ಸಿನವರು, ನಿರ್ಭೀತರು, ಬ್ರಹ್ಮಚಾರಿಯ ಪ್ರತಿಜ್ಞೆಯಲ್ಲಿ ದೃಢವಾಗಿ, ತಮ್ಮ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಹತೋಟಿಯಲ್ಲಿಟ್ಟುಕೊಂಡು, ನನ್ನ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸಿ ಮತ್ತು ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಸಮತೋಲನವನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದು, ನನ್ನನ್ನು ತಮ್ಮ ಪರಮೋಚ್ಚ ಗುರಿಯಾಗಿಟ್ಟುಕೊಂಡು ಕುಳಿತುಕೊಳ್ಳಲಿ.

SindhiIND

پرسڪون ذهن، بي خوف، برهمچاري جي واعدي ۾ پختو، پنهنجي ذهن تي قابو رکي، مون کي سوچڻ ۽ ذهن ۾ توازن رکي، انهن کي ويهڻ ڏيو، مون کي پنهنجو اعلي مقصد سمجهي.

PunjabiIND

ਸ਼ਾਂਤ-ਚਿੱਤ, ਨਿਰਭਉ, ਬ੍ਰਹਮਚਾਰੀ ਦੇ ਵਚਨ ਵਿੱਚ ਦ੍ਰਿੜ, ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਕਰਕੇ, ਮੇਰੇ ਬਾਰੇ ਸੋਚਣ ਅਤੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਸੰਤੁਲਿਤ ਹੋ ਕੇ, ਮੈਨੂੰ ਆਪਣਾ ਸਰਵਉੱਚ ਟੀਚਾ ਬਣਾ ਕੇ ਬੈਠਣ ਦਿਓ।

NepaliIND

निर्मल मन भएका, निर्भय, ब्रह्मचारीको व्रतमा दृढ भएर आफ्नो मनलाई नियन्त्रणमा राखेर, मेरो चिन्तन र सन्तुलित मनले मलाई नै आफ्नो परम लक्ष्य बनाएर बस्न दिनुहोस्।

MizoIND

Thinlung thlamuang, hlauhawm lo, Brahmachari thutiam nghet tak nei, an rilru thunun tawh, Keimah ngaihtuah leh rilru inthlauhna nei, an thil tum ber atan Kei hi neiin thu rawh se.

KonkaniIND

निश्चल मनाचे, निर्भय, ब्रह्मचारीच्या व्रतांत घट्ट, मन नियंत्रीत करून, म्हजें विचार करून आनी मनांत समतोल दवरून, म्हाका आपलें परम ध्येय दवरून बसूंक दिवचें.

ManipuriIND

ꯅꯤꯡꯊꯤꯖꯅꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯋꯥꯕꯥ, ꯑꯀꯤꯕꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ, ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯆꯥꯔꯤ ꯑꯃꯒꯤ ꯋꯥꯁꯛꯇꯥ ꯑꯆꯦꯠꯄꯥ, ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯋꯥꯈꯜ ꯀꯟꯠꯔꯣꯜ ꯇꯧꯔꯕꯥ, ꯑꯩꯕꯨ ꯈꯟꯗꯨꯅꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯋꯥꯈꯂꯗꯥ ꯕꯦꯂꯦꯟꯁ ꯂꯩꯗꯨꯅꯥ, ꯃꯈꯣꯌꯅꯥ ꯐꯃꯗꯨꯅꯥ ꯂꯩꯌꯨ, ꯑꯩꯕꯨ ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯄꯥꯟꯗꯝ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯂꯧꯗꯨꯅꯥ |

GujaratiIND

શાંત ચિત્તવાળા, નિર્ભય, બ્રહ્મચારીના વ્રતમાં મક્કમ, તેમના મનને કાબૂમાં રાખીને, મારા વિશે વિચારીને અને મનમાં સંતુલિત થઈને, મને તેમનું સર્વોચ્ચ ધ્યેય માનીને તેમને બેસવા દો.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'प्रशान्तात्मा'--जिसका अन्तःकरण राग-द्वेषसे रहित है, वह 'प्रशान्तात्मा' है। जिसका सांसारिक विशेषता प्राप्त करनेका, ऋद्धि-सिद्धि आदि प्राप्त करनेका उद्देश्य न होकर केवल परमात्मप्राप्तिका ही दृढ़ उद्देश्य होता है, उसके राग-द्वेष शिथिल होकर मिट जाते हैं। राग-द्वेष मिटनेपर स्वतः शान्ति आ जाती है, जो कि स्वतःसिद्ध है। तात्पर्य है कि संसारके सम्बन्धके कारण ही हर्ष, शोक, राग-द्वेष आदि द्वन्द्व होते हैं और इन्हीं द्वन्द्वोंके कारण शान्ति भङ्ग होती है। जब ये द्वन्द्व मिट जाते हैं, तब स्वतःसिद्ध शान्ति प्रकट हो जाती है। उस स्वतःसिद्ध शान्तिको प्राप्त करनेवालेका नाम ही 'प्रशान्तात्मा' है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा प्रशान्तात्मा अच्छी प्रकारसे शान्त हुए अन्तःकरणवाला विगतभी निर्भय और ब्रह्मचारियोंके व्रतमें स्थित हुआ अर्थात् ब्रह्मचर्य गुरुसेवा भिक्षाभोजन आदि जो ब्रह्मचारीके व्रत हैं उनमें स्थित हुआ उनका अनुष्ठान करनेवाला होकर और मनका संयम करके अर्थात् मनकी वृत्तियोंका उपसंहार करके तथा मुझमें चित्तवाला अर्थात् मुझ परमेश्वरमें ही जिसका चित्त लग गया है ऐसा मच्चित्त होकर तथा समाहितचित्त होकर और मुझे ही सर्वश्रेष्ठ माननेवाला अर्थात् मैं ही जिसके मतमें सबसे श्रेष्ठ हूँ ऐसा होकर बैठे। कोई स्त्रीप्रेमी स्त्रीमें चित्तवाला हो सकता है परंतु वह स्त्रीको सबसे श्रेष्ठ नहीं समझता। तो किसको समझता है वह राजाको या महादेवको स्त्रीकी अपेक्षा श्रेष्ठ समझता है परंतु यह साधक तो चित्त भी मुझमें ही रखता है और मुझे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ भी समझता है।

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Sri Anandgiri

योगं युञ्जानस्य विशेषणान्तराणि दर्शयति किञ्चेति। अन्तःकरणस्य प्रशान्ती रागद्वेषादिदोषराहित्यं तस्याश्च प्रकर्षो रागादिहेतोरपि निवृत्तिः विगतभयत्वं सर्वकर्मपरित्यागे शास्त्रीयनिश्चयवशान्निःसंदिग्धबुद्धित्वम्। भिक्षाभुक्त्यादीत्यादिशब्देन त्रिषवणस्नानशौचाचमनादि गृह्यते। विशेषणान्तरमाह किञ्चेति। उपसंहृत्य योगनिष्ठो भवेदिति शेषः। मनोवृत्त्युपसंहारे ध्यानमपि न सिध्येत्तस्य तद्वृत्त्यावृत्तिरूपत्वादित्याशङ्क्याह मच्चित्त इति। विषयान्तरविषयमनोवृत्त्युपसंहारेणात्मन्येव तन्नियमनान्न ध्यानानुपपत्तिरित्यर्थः। मच्चित्तत्वेनैव मत्परत्वस्य सिद्धत्वान्मत्पर इति पृथग्विशेषणमनर्थकमित्याशङ्क्याह भवतीति। अन्तःकरणशुद्धिर्योगस्यावान्तरफलम्।

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Sri Dhanpati

प्रशान्तात्मा प्रकर्षेण शान्तः आत्मान्तःकरणं यस्य सः। अनेन रम्यशब्दश्रवणादीना शान्तचित्तस्य क्षोभाभावाद्दिगव लोकनं वारितम्। व्याघ्रादिभयप्रयुक्तमपि तद्वारयति। विशेषेण गता भीर्भयं यस्मात्सः। व्याघ्रादिप्रयुक्तभयाभावेऽपि क्षुधादिजन्यभयं संभाव्याह। मनः संयम्य स्वादिष्ठान्नादौ प्रवृत्ता मनोवृत्तीरुपसंहृत्येत्यर्थः। एवंभूतः किं कुर्यादिति तत्राह। युक्तः समाहितः सन् मच्चितः मत्परश्चासीतेति मयि परमेश्वरे चित्तं यस्य सः। कश्चिद्रागी स्त्रीचित्तो नतु स्त्रियमेव परत्वेन गृह्णाति किं तर्हि राजानं वाराध्यत्वेन देवं वाराध्यत्वेन परमपुरुषार्थत्वेन च। अयं तु मच्चित्तो मत्परश्च अहमेव पर आराध्यः परमपुरुषार्थश्च यस्य सः। यत्तु तत्किं द्वितीयाद्यवस्थास्य संभवति ओमित्याह अयुक्त इति। अयुक्तो मत्परः अहं परोऽन्तर्यामी प्रेरको यस्येत्येवंरुपः। आस्ते तस्यां दशायामैक्यभावानाभावादिति तथाचायुक्तावस्थायां भिक्षाद्याचरतीति तात्पर्यमिति तन्न। वाक्यभेदप्रसङ्गात्। यथाश्रुतार्थसंभवे आसीतेत्यस्यास्त इत्यर्थकरणानुचितत्वाच्च।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
praśhāntaserene
ātmāmind
vigatabhīḥ
brahmachārivrate
sthitaḥsituated
manaḥmind
sanyamyahaving controlled
matchittaḥ
yuktaḥengaged
āsītashould sit
matparaḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.13
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्

काया, शिर और ग्रीवाको सीधे अचल धारण करके तथा दिशाओंको न देखकर केवल अपनी नासिकाके अग्रभागको देखते हुए स्थिर होकर बैठे। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.15
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति

नियत मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 14
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 14
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः

जिसका अन्तःकरण शान्त है, जो भय-रहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है, ऐसा सावधान योगी मनका संयम करके मेरेमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ: "जिसका अन्तःकरण शान्त है, जो भय-रहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है, ऐसा सावधान योगी मनका संयम करके मेरेमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 14?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 14 translates to: "Serene-minded, fearless, firm in the vow of a Brahmachari, having controlled their mind, thinking of Me and balanced in mind, let them sit, having Me as their supreme goal. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 14 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। जिसका अन्तःकरण शान्त है, जो भय-रहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है, ऐसा सावधान योगी मनका संयम करके मेरेमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "praśhāntātmā vigata-bhīr brahmachāri-vrate sthitaḥ" mean in English?

"praśhāntātmā vigata-bhīr brahmachāri-vrate sthitaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 14. Serene-minded, fearless, firm in the vow of a Brahmachari, having controlled their mind, thinking of Me and balanced in mind, let them sit, having Me as their supreme goal. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.