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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 23
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः

इस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है। — VaniSagar

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KannadaIND

ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಇನ್ನೂ ಇರುವಾಗ, ದೇಹದಿಂದ ವಿಮೋಚನೆಯ ಮೊದಲು ಆಸೆ ಮತ್ತು ಕೋಪದಿಂದ ಹುಟ್ಟಿದ ಪ್ರಚೋದನೆಯನ್ನು ತಡೆದುಕೊಳ್ಳಲು ಶಕ್ತನಾದವನು, ಅವನು ಯೋಗಿ ಮತ್ತು ಅವನು ಸಂತೋಷದ ವ್ಯಕ್ತಿ.

TamilIND

இவ்வுலகில் இருக்கும்போதே, உடலிலிருந்து விடுபடுவதற்கு முன், ஆசையினாலும் கோபத்தினாலும் பிறக்கும் உந்துதலைத் தாங்கிக் கொள்ள முடிகிறதோ, அவன் யோகி, அவன் மகிழ்ச்சியான மனிதன்.

MalayalamIND

ഈ ലോകത്തിൽ ആയിരിക്കുമ്പോൾ തന്നെ, ശരീരത്തിൽ നിന്ന് മോചനം നേടുന്നതിന് മുമ്പുള്ള ആഗ്രഹത്തിൽ നിന്നും ക്രോധത്തിൽ നിന്നും ജനിക്കുന്ന പ്രേരണയെ ചെറുക്കാൻ കഴിയുന്നവൻ ഒരു യോഗിയാണ്, അവൻ സന്തോഷവാനാണ്.

MarathiIND

जो मनुष्य या जगात असताना, शरीरापासून मुक्तीपूर्वी इच्छा आणि क्रोधातून निर्माण झालेल्या आवेगाचा सामना करण्यास सक्षम आहे, तो योगी आहे आणि तो आनंदी मनुष्य आहे.

TeluguIND

దేహం నుండి విముక్తికి ముందు కోరిక మరియు కోపం నుండి పుట్టిన ప్రేరణను ఈ ప్రపంచంలో ఉన్నప్పుడే తట్టుకోగలిగినవాడు, అతను యోగి మరియు అతను సంతోషకరమైన వ్యక్తి.

SindhiIND

جيڪو هن دنيا ۾ رهي، جسم کان آزاد ٿيڻ کان اڳ خواهش ۽ ڪاوڙ مان پيدا ٿيندڙ جذبي کي منهن ڏيڻ جي قابل آهي، هو يوگي آهي، ۽ هو خوش مزاج انسان آهي.

PunjabiIND

ਜੋ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦਿਆਂ, ਸਰੀਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤੀ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਇੱਛਾ ਅਤੇ ਕ੍ਰੋਧ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਈ ਭਾਵਨਾ ਦਾ ਟਾਕਰਾ ਕਰਨ ਦੇ ਯੋਗ ਹੈ, ਉਹ ਯੋਗੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਉਹ ਇੱਕ ਪ੍ਰਸੰਨ ਮਨੁੱਖ ਹੈ।

GujaratiIND

જે વ્યક્તિ આ જગતમાં રહીને પણ દેહમાંથી મુક્તિ પહેલાં ઈચ્છા અને ક્રોધમાંથી જન્મેલા આવેગનો સામનો કરવા સક્ષમ છે, તે યોગી છે અને તે સુખી માણસ છે.

BengaliIND

যিনি এই পৃথিবীতে থাকাকালীন দেহ থেকে মুক্তির আগে কামনা ও ক্রোধ থেকে জন্ম নেওয়া আবেগকে প্রতিরোধ করতে সক্ষম, তিনিই যোগী এবং তিনি সুখী মানুষ।

NepaliIND

जो यस संसारमा रहँदा शरीरबाट मुक्ति हुनुअघि कामना र क्रोधबाट उत्पन्न आवेगलाई सहन गर्न सक्षम छ, उहाँ योगी हुनुहुन्छ र उहाँ सुखी हुनुहुन्छ।

ManipuriIND

ꯍꯧꯖꯤꯛ ꯐꯥꯑꯣꯕꯥ ꯃꯐꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯃꯥꯂꯦꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯂꯩꯔꯤꯉꯩꯗꯥ ꯍꯀꯆꯥꯡꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯛꯂꯕꯥ ꯃꯇꯨꯡꯗꯥ ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯁꯥꯑꯣꯕꯗꯒꯤ ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯏꯝꯄꯂꯁ ꯑꯗꯨ ꯊꯦꯡꯅꯕꯥ ꯉꯝꯕꯥ ꯃꯍꯥꯛ ꯑꯗꯨ ꯌꯣꯒꯤꯅꯤ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯍꯥꯛ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯃꯤꯁꯛ ꯑꯃꯅꯤ |

MizoIND

He khawvela a la awm lai hian taksa atanga chhuah hmaa duhna leh thinrimna avanga lo piang rilru put hmang chu tuar thei chu Yogi a ni a, mi hlim tak a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.23।। व्याख्या--'शक्नोतीहैव यः ৷৷. कामक्रोधोद्भवं वेगम्'--प्राणिमात्रको एक अलौकिक विवेक प्राप्त है। यह विवेक पशु-पक्षी आदि योनियोंमें प्रसुप्त रहता है। उनमें केवल अपनी-अपनी योनिके अनुसार शरीर-निर्वाहमात्रका विवेक रहता है। देव आदि योनियोंमें यह विवेक ढका रहता है; क्योंकि वे योनियाँ भोगोंके लिये मिलती हैं; अतः उनमें भोगोंकी बहुलता तथा भोगोंका उद्देश्य रहता है। मनुष्ययोनिमें भी भोगी और संग्रही मनुष्यका विवेक ढका रहता है। ढके रहनेपर भी यह विवेक मनुष्यको समय-समयपर भोग और संग्रहमें दुःख एवं दोषका दर्शन कराता रहता है। परन्तु इसे महत्त्व न देनेके कारण मनुष्य भोग और संग्रहमें फँसा रहता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस विवेकको महत्त्व देकर इसे स्थायी बना ले। इसकी उसे पूर्ण स्वतन्त्रता है। विवेकको स्थायी बनाकर वह राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि विकारोंको सर्वथा समाप्त कर सकता है। इसलिये भगवान् 'इह' पदसे मनुष्यको सावधान करते हैं कि अभी उसे ऐसा दुर्लभ अवसर प्राप्त है, जिसमें वह काम-क्रोधपर विजय प्राप्त करके सदाके लिये सुखी हो सकता है।मनुष्य-शरीर मुक्त होनेके लिये ही मिला है। इसलिये मनुष्यमात्र काम-क्रोधका वेग सहन करनेमें योग्य, अधिकारी और समर्थ है। इसमें किसी वर्ण, आश्रम आदिकी उपेक्षा भी नहीं है।मृत्युका कुछ पता नहीं कि कब आ जाय; अतः सबसे पहले काम-क्रोधके वेगको सहन कर लेना चाहिये। काम-क्रोधके वशीभूत नहीं होना है--यह सावधानी जीवनभर रखनी है। यह कार्य मनुष्य स्वयं ही कर सकता है, कोई दूसरा नहीं। इस कार्यको करनेका अवसर मनुष्य-शरीरमें ही है, दूसरे शरीरोंमें नहीं। इसलिये शरीर छूटनेसे पहले-पहले ही यह कार्य जरूर कर लेना चाहिये--यही भाव इन पदोंमें है।उपर्युक्त पदोंसे एक भाव यह भी लिया जा सकता है कि काम-क्रोधके वशीभूत होकर शरीर क्रिया करने लगे--ऐसी स्थितिसे पहले ही उनके वेगको सह लेना चाहिये। कारण कि काम-क्रोधके अनुसार क्रिया आरम्भ होनेके बाद शरीर और वृत्तियाँ अपने वशमें नहीं रहतीं।भोगोंको पानेकी इच्छासे पहले उनका संकल्प होता है। वह संकल्प होते ही सावधान हो जाना चाहिये कि मैं तो साधक हूँ, मुझे भोगोंमें नहीं फँसना है; क्योंकि यह साधकका काम नहीं है। इस तरह संकल्प उत्पन्न होते ही उसका त्याग कर देना चाहिये।पदार्थोंके प्रति राग (काम) रहनेके कारण 'अमुक पदार्थ सुन्दर और सुखप्रद हैं' आदि संकल्प उत्पन्न होते हैं। संकल्प उत्पन्न होनेके बाद उन पदार्थोंको प्राप्त करनेकी कामना उत्पन्न हो जाती है, और उनकी प्राप्तिमें बाधा देनेवालोंके प्रति क्रोध उत्पन्न होता है। काम-क्रोधके वेगको सहन करनेका तात्पर्य है--काम-क्रोधके वेगको उत्पन्न ही न होने देना। काम-क्रोधका संकल्प उत्पन्न होनेके बाद वेग आता है और वेग आनेके बाद काम-क्रोधको रोकना कठिन हो जाता है, इसलिये काम-क्रोधके संकल्पको उत्पन्न न होने देनेमें ही उपर्युक्त पदोंका भाव प्रतीत होता है। कारण यह है कि काम-क्रोधका संकल्प उत्पन्न होनेपर अन्तःकरणमें अशान्ति, उत्तेजना, संघर्ष आदि होने लग जाते हैं, जिनके रहते हुए मनुष्य सुखी नहीं कहा जा सकता। परन्तु इसी श्लोकमें 'स सुखी' पदोंसे काम-क्रोधका वेग सहनेवाले मनुष्यको 'सुखी' बताया गया है। दूसरी बात यह है कि काम-क्रोधके वेगको मनुष्य अपनेसे शक्तिशाली पुरुषके सामने भयसे भी रोक सकता है अथवा व्यापारमें आमदनी होती देखकर लोभसे भी रोक सकता है। परन्तु इस प्रकार भय और लोभके कारण काम-क्रोधका वेग सहनेसे वह सुखी नहीं हो जाता; क्योंकि वह जैसे क्रोधमें फँसा था, ऐसे ही भय और लोभमें फँस गया। तीसरी बात यह है कि इस श्लोकमें 'युक्तः' पदसे काम-क्रोधका वेग सहनेवाले व्यक्तिको योगी कहा गया है; परन्तु संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं होता (गीता 6। 2)। इसलिये काम-क्रोधके वेगको रोकना अच्छा होते हुए भी साधकके लिये इनके संकल्पको उत्पन्न न होने देना ही उचित है। काम-क्रोधके संकल्पको रोकनेका उपाय है अपनेमें काम-क्रोधको न मानना। कारण कि हम (स्वयं) रहनेवाले हैं और काम-क्रोध आने-जानेवाले हैं। इसलिये वे हमारे साथ रहनेवाले नहीं हैं। दूसरी बात, हम काम-क्रोधको अपनेसे अलगरूपसे भी जानते हैं। जिस वस्तुको हम अलगरूपसे जानते हैं, वह वस्तु अपनेमें नहीं होती। तीसरी बात, काम-क्रोधसे रहित हुआ जा सकता है--'कामक्रोधवियुक्तानाम्'(गीता 5। 26) 'एतैर्विमुक्तः' (गीता 16। 22)। इनसे रहित वही हो सकता है, जो वास्तवमें पहलेसे ही इनसे रहित होता है। चौथी बात, भगवान्ने काम-क्रोधको (जो राग-द्वेषके ही स्थूलरूप हैं) क्षेत्र अर्थात् प्रकृतिके विकार बताया है (गीता 13। 6)। अतः ये प्रकृतिमें ही होते हैं, अपनेमें नहीं; क्योंकि स्वरूप निर्विकार है। इससे सिद्ध होता है कि काम-क्रोध अपनेमें नहीं हैं। इनको अपनेमें मानना मानो इनको निमन्त्रण देना है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो मनुष्य यहाँजीवितावस्थामें ही शरीर छूटनेसे पहलेपहले अर्थात् मरणपर्यन्त ( कामक्रोधसे उत्पन्न हुए वेगको ) सहन कर सकता है अर्थात् सहन करनेका उत्साह रखता है ( वही युक्त और सुखी है )। जीवित पुरुषके अन्तःकरणमें कामक्रोधका वेग अवश्य ही होता है इसलिये मरणपर्यन्तकी सीमा की गयी है क्योंकि वह कामक्रोधजनित वेग अनेक निमित्तोंसे प्रकट होनेवाला है अतः मरनेतक उसका विश्वास न करे। ( सदैव उससे सावधान रहे ) यह अभिप्राय है। किसी अनुभव किये हुए सुखदायक इष्टविषयके इन्द्रियगोचर हो जानेपर यानी सुन जानेपर या स्मरण हो जानेपर उसको पानेकी जो लालसा तृष्णा होती है उसका नाम काम है। वैसे ही अपने प्रतिकूल दुःखदायक विषयोंके दीखने सुनायी देने या स्मरण होनेपर उनमें जो द्वेष होता है उसका नाम क्रोध है। वे काम और क्रोध जिस वेगके उत्पादक होते हैं वह कामक्रोधसे उत्पन्न हुआ वेग कहलाता है। रोमाञ्च होना मुख और नेत्रोंका प्रफुल्लित होना इत्यादि चिह्नोंवाला जो अन्तःकरणका क्षोभ है वह कामसे उत्पन्न हुआ वेग है। तथा शरीरका काँपना पसीना आ जाना होठोंको चबाने लगना नेत्रोंका लाल हो जाना इत्यादि चिह्नोंवाला वेग क्रोधसे उत्पन्न हुआ वेग है। ऐसे काम और क्रोधके वेगको जो सहन कर सकता है उसको सहन करनेका उत्साह रखता है वह मनुष्य इस संसारमें योगी है और वही सुखी है।

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Sri Anandgiri

उत्तरश्लोकस्य तात्पर्यमाह अयं चेति। श्रेयोमार्गप्रतिपक्षत्वं कष्टतमत्वे हेतुस्तत्रैव हेत्वन्तरमाह सर्वेति। प्रयत्नाधिक्यस्य कर्तव्यत्वे हेतुं सूचयति दुर्निवार्य इति। प्रसिद्धं हि कामक्रोधोद्भवस्य वेगस्य दुर्निवारत्वं येन मातरमपि चाधिरोहति पितरमपि हन्ति तमवश्यं परिहर्तव्यं दर्शयति शक्नोतीति। यथोक्तं वेगं बहिरनर्थरूपेण परिणामात्प्रागेव देहान्तरुत्पन्नं यः सोढुं क्षमते तं स्तौति स युक्त इति। मरणसीमाकरणस्य तात्पर्यमाह मरणेति। प्रसिद्धौ हिशब्दः। तत्र हेतुमाह अनन्तेति। व्याध्युपहतानां वृद्धानां च कामादिवेगो न भवतीत्याशङ्क्याह यावदिति। कामक्रोधोद्भवं वेगं व्याख्यातुमादौ कामं मनोविकारविशेषत्वेन व्याचष्टे काम इति। कथमस्य मनोविकारविशेषत्वं तदाह इन्द्रियेति। कामो गर्धिस्तृष्णेति पर्यायाः सन्तः शब्दा मनोविकारविशेषे पर्यवस्यन्तीत्यर्थः। क्रोधश्च मनोविकारविशेषस्तद्वदित्याह क्रोधश्चेति। तमेव क्रोधं स्पष्टयति आत्मन इति। एवं कामक्रोधौ व्याख्याय तयोरुत्कटत्वावस्थात्मनो वेगस्य ताभ्यामुत्पत्तिमुपन्यस्यति ताविति। यथोक्तवेगावगमोपायमुपदिशति रोमाञ्चनहृष्टनेत्रेत्यादिना। उभयविधवेगं यो जीवन्नेव सोढुं शक्नोति तं पुरुषधौरेयत्वेन स्तौति तमित्यादिना।

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Sri Dhanpati

अयं च श्रयोमार्गप्रतिपक्षी कष्टतमो दोषः सर्वानर्थप्राप्तिहेतुः दुर्निवार्यश्चेति तत्परिहारे यत्नाधिक्यविधानायाह शक्नोतीति। यः इहैव जीवन्नेव इन्द्रियगोचरे प्राप्ते इष्टे विषये श्रुयमाणे स्मर्यमाणे वा सुखहेतौ या तृष्णा स कामः। क्रोधश्चैवंभूतेऽनिष्टे विषये द्वेषः। तौ कामक्रोधावुद्भवो यस्य स रोमाञ्चनहृष्टनेत्रवदनलिङ्गोऽन्तःकरणप्रक्षोभरुपः कामोद्भवो वेगः। गात्रप्रकम्पप्रस्वेदसंदष्टौष्ठपुटरक्तनेत्रवक्ततादिलिङग चित्तप्रक्षोभरुपः क्रोधोद्भवो वेगः। तं कामक्रोधोद्भवं शरीरविमोक्षणात्प्रागामरणात् सोढुं प्रसहितुं शक्नोति। मरणसीमाकरणं तु निमित्तानामनन्तत्वात् कामक्रोधोद्भवस्य वेगस्य जीवतोऽवश्यंभावित्वात् यावन्मरणं न विश्वसनीय इति कथनार्थं यः सोढुं श्कनोति स युक्तो योगी सुखी चेह लोके नरः स एव नर इति सूचनार्थ नरपदम्। यत्तु परे मरणादूर्ध्वंविलपन्तीभिर्युवतिभिरालिङ्ग्यमानोऽपि पुत्रादिभिर्दह्यमानोऽपि यथा प्राणाशून्यः कामक्रोधवेगं सहते तथा मरणात्प्राक् जीवन्नेव यः सहते स एव युक्तः सुखी चेत्यर्थः। तदुक्तं वसिष्ठेनप्राणे गते यथा देहः सुखं दुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणायुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् इति तन्मन्दम्। प्राणशून्ये कामक्रोधोद्भववेगस्याभावादत्र तद्दृष्टान्तीकरणस्यानुचितत्वात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhaknotiis able
iha evain the present body
yaḥwho
soḍhumto withstand
prākbefore
śharīrathe body
vimokṣhaṇātgiving up
kāmadesire
krodhaanger
udbhavamgenerated from
vegamforces
saḥthat person
yuktaḥyogi
saḥthat person
sukhīhappy
naraḥperson
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.22
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः

क्योंकि हे कुन्तीनन्दन ! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.24
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति

जो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला है और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है, वह ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करनेवाला सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 23
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 23
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः

इस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ: "इस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 23?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 23 translates to: "He who is able, while still here in this world, to withstand the impulse born out of desire and anger before the liberation from the body, he is a Yogi, and he is a happy man. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी न" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 23 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। इस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt" mean in English?

"śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 23. He who is able, while still here in this world, to withstand the impulse born out of desire and anger before the liberation from the body, he is a Yogi, and he is a happy man. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.