Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 20
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः

जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

பிரம்மத்தில் தங்கியிருந்து, நிலையான புத்தியுடன், மாயையின்றி, பிரம்மத்தை அறிபவன், இன்பமானதைப் பெற்றதில் மகிழ்ச்சியடைவதுமில்லை, விரும்பத்தகாததைப் பெற்றால் வருத்தப்படுவதுமில்லை.

MalayalamIND

ബ്രഹ്മത്തിൽ വിശ്രമിക്കുന്ന, സ്ഥിരമായ ബുദ്ധിയോടെയും ഭ്രമിക്കാതെയും, ബ്രഹ്മത്തെ അറിയുന്നവൻ സുഖമുള്ളത് ലഭിക്കുന്നതിൽ സന്തോഷിക്കുകയോ അപ്രിയമായത് ലഭിക്കുമ്പോൾ ദുഃഖിക്കുകയോ ചെയ്യുന്നില്ല.

KannadaIND

ಸ್ಥಿರವಾದ ಬುದ್ಧಿಯಿಂದ ಮತ್ತು ಭ್ರಮೆಯಿಲ್ಲದ ಬ್ರಹ್ಮನಲ್ಲಿ ವಿಶ್ರಾಂತಿ ಪಡೆಯುತ್ತಾ, ಬ್ರಹ್ಮವನ್ನು ತಿಳಿದವನು ಹಿತವಾದದ್ದನ್ನು ಪಡೆದಾಗ ಸಂತೋಷಪಡುವುದಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ಅಹಿತಕರವಾದದ್ದನ್ನು ಪಡೆದಾಗ ದುಃಖಿಸುವುದಿಲ್ಲ.

BengaliIND

ব্রহ্মে বিশ্রাম, স্থির বুদ্ধি ও ভ্রমহীন, ব্রহ্মজ্ঞানকারী যা সুখকর তা পেয়ে আনন্দ করেন না এবং যা অপ্রীতিকর তা পেয়ে দুঃখিত হন না।

PunjabiIND

ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਵਿੱਚ ਅਡੋਲ ਬੁੱਧੀ ਅਤੇ ਅਡੋਲਤਾ ਨਾਲ ਟਿਕ ਕੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੂੰ ਜਾਣਨ ਵਾਲਾ ਨਾ ਤਾਂ ਸੁਖਦਾਈ ਚੀਜ਼ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਖੁਸ਼ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਦੁਖਦਾਈ ਚੀਜ਼ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਦੁਖੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

MarathiIND

ब्रह्मात विसावलेला, स्थिर बुद्धीने आणि मोहविरहीत, ब्रह्म जाणणारा, जे सुखदायक आहे ते मिळाल्यावर आनंदित होत नाही आणि अप्रिय गोष्टी मिळाल्यावर शोक करत नाही.

GujaratiIND

બ્રહ્મમાં વિશ્રામ કરીને, સ્થિર બુદ્ધિ અને અસ્પષ્ટતાથી, બ્રહ્મને જાણનાર ન તો જે સુખદ છે તે મેળવીને આનંદ કરે છે અને ન તો જે અપ્રિય છે તે મેળવીને દુઃખી થાય છે.

SindhiIND

برهمڻ ۾ آرام سان، ثابت قدمي ۽ بي پرواهيءَ سان، برهمڻ جو ڄاڻو نه ته خوشيءَ جي حاصل ڪرڻ تي خوش ٿيندو آهي ۽ نه ئي ناپسنديده شيءِ حاصل ڪرڻ تي غمگين ٿيندو آهي.

NepaliIND

ब्रह्ममा वास गर्दै स्थिर बुद्धि र मोहरहित ब्रह्म जान्नेले न सुखको प्राप्तिमा आनन्दित हुन्छ न अप्रिय कुरा प्राप्त गर्दा शोकित हुन्छ।

TeluguIND

స్థిరమైన బుద్ధితో మరియు భ్రాంతి లేని బ్రహ్మంలో విశ్రాంతి తీసుకుంటూ, బ్రహ్మాన్ని తెలిసినవాడు రమ్యమైనదాన్ని పొందినందుకు సంతోషించడు లేదా అసహ్యకరమైనదాన్ని పొందినందుకు దుఃఖపడడు.

OdiaIND

ବ୍ରାହ୍ମଣରେ ବିଶ୍ରାମ, ସ୍ଥିର ବୁଦ୍ଧି ଏବଂ ଅଜ୍ଞାତ ସହିତ, ବ୍ରାହ୍ମଣର ଜ୍ଞାନୀ ଯାହା ଆନନ୍ଦଦାୟକ ତାହା ପାଇବାରେ ଆନନ୍ଦ କରେ ନାହିଁ କିମ୍ବା ଅପ୍ରୀତିକର ବିଷୟ ପାଇବାରେ ଦୁ ie ଖ କରେ ନାହିଁ |

ManipuriIND

ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯗꯥ ꯂꯦꯞꯇꯨꯅꯥ, ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯑꯃꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯤꯄꯥꯏꯕꯥ ꯄꯣꯀꯍꯟꯗꯅꯥ, ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯟ ꯈꯉꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯐꯪꯕꯗꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯐꯥꯑꯣꯗꯦ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯐꯪꯕꯗꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯐꯥꯑꯣꯗꯦ |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.20।। व्याख्या--'न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्' शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सिद्धान्त, सम्प्रदाय, शास्त्र आदिके अनुकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होना ही प्रिय को प्राप्त होना है।शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सिद्धान्त, सम्प्रदाय, शास्त्र आदिके प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, घटना परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होना ही 'अप्रिय' को प्राप्त होना है।प्रिय और अप्रियको प्राप्त होनेपर भी साधकके अन्तःकरणमें हर्ष और शोक नहीं होने चाहिये। यहाँ प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिका यह अर्थ नहीं है कि साधकके हृदयमें अनुकूल या प्रतिकूल प्राणी-पदार्थोंके प्रति राग या द्वेष है, प्रत्युत यहाँ उन प्राणी-पदार्थोंकी प्राप्तिके ज्ञानको ही प्रिय और अप्रियकी प्राप्ति कहा गया है। प्रिय या अप्रियकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिका ज्ञान होनेमें कोई दोष नहीं है। अन्तःकरणमें उनकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिका असर पड़ना अर्थात् हर्ष-शोकादि विकार होना ही दोष है। प्रियता और अप्रियताका ज्ञान तो अन्तःकरणमें होता है, पर हर्षित और उद्विग्न कर्ता होता है। अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला पुरुष प्रकृतिके करणोंद्वारा होनेवाली क्रियाओँको लेकर 'मैं कर्ता हूँ' --ऐसा मान लेता है तथा हर्षित और उद्विग्न होता रहता है। परन्तु जिसका मोह दूर हो गया है, जो तत्त्ववेत्ता है, वह 'गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं'--ऐसा जानकर अपनेमें (स्वरूपमें) वास्तविक अकर्तृत्वका अनुभव करता है (गीता 3। 28)। स्वरूपका हर्षित और उद्विग्न होना सम्भव ही नहीं है।स्थिरबुद्धिः-- स्वरूपका ज्ञान स्वयंके द्वारा ही स्वयंको होता है। इसमें ज्ञाता और ज्ञेयका भाव नहीं रहता। यह ज्ञान करण-निरपेक्ष होता है अर्थात् इसमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि किसी करणकी अपेक्षा नहीं होती। करणोंसे होनेवाला ज्ञान स्थिर तथा सन्देहरहित नहीं होता, इसलिये वह अल्पज्ञान है। परन्तु स्वयं-(अपने होनेपन-) का ज्ञान स्वयंको ही होनेसे उसमें कभी परिवर्तन या सन्देह नहीं होता। जिस महापुरुषको ऐसे करण-निरपेक्ष ज्ञानका अनुभव हो गया है, उसकी कही जानेवाली बुद्धिमें यह ज्ञान इतनी दृढ़तासे उतर आता है कि उसमें कभी विकल्प, सन्देह, विपरीत भावना, असम्भावना आदि होती ही नहीं। इसलिये उसे 'स्थिरबुद्धिः' कहा गया है।'असम्मूढः'-- जो परमात्मतत्त्व सदासर्वत्र विद्यमान है, उसका अनुभव न होना और जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, उस उत्पत्ति-विनाशशील संसारको सत्य मानना--ऐसी मूढ़ता साधारण मनुष्यमें रहती है। इस मूढ़ताका जिसमें सर्वथा अभाव हो गया है, उसे ही यहाँ 'असम्मूढः' कहा गया है। 'ब्रह्मवित्' परमात्मासे अलग होकर परमात्माका अनुभव नहीं होता। परमात्माका अनुभव होनेमें अनुभविता, अनुभव और अनुभाव्य--यह त्रिपुटी नहीं रहती, प्रत्युत त्रिपुटीरहित अनुभवमात्र (ज्ञानमात्र) रहता है। वास्तवमें ब्रह्मको जाननेवाला कौन है--यह बताया नहीं जा सकता। कारण कि ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मसे अभिन्न हो जाता है, इसलिये वह अपनेको ब्रह्मवित् मानता ही नहीं अर्थात् उसमें 'मैं ब्रह्मको जानता हूँ' ऐसा अभिमान नहीं रहता।'ब्रह्मणि स्थितः'-- वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणी तत्त्वसे नित्य-निरन्तर ब्रह्ममें ही स्थित हैं; परन्तु भूलसे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ही मानते रहनेके कारण मनुष्यको ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं होता। जिसे ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो गया है, ऐसे महापुरुषके लिये यहाँ 'ब्रह्मणि स्थितः' पदोंका प्रयोग हुआ है। ऐसे महापुरुषको प्रत्येक परिस्थितिमें नित्य-निरन्तर ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव होता रहता है।यद्यपि एक वस्तुकी दूसरी वस्तुमें स्थिति होती है, तथापि ब्रह्ममें स्थिति इस प्रकारकी नहीं है। कारण कि ब्रह्मका अनुभव होनेपर सर्वत्र एक ब्रह्म-ही-ब्रह्म रह जाता है। उसमें स्थिति माननेवाला दूसरा कोई रहता ही नहीं। जबतक कोई ब्रह्ममें अपनी स्थिति मानता है, तबतक ब्रह्मकी वास्तविक अनुभूतिमें कमी है, परिच्छिन्नता है। सम्बन्ध--ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव किस प्रकार होता है, इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि निर्दोष और सम ब्रह्म ही आत्मा है इसलिये प्रिय वस्तुको प्राप्त करके तो हर्षित न हो अर्थात् इष्टवस्तु पाकर तो हर्ष न माने और अप्रिय अनिष्ट पदार्थके मिलनेपर उद्वेग न करे। क्योंकि देहमात्रमें आत्मबुद्धिवाले पुरुषको ही प्रियकी प्राप्ति हर्ष देनेवाली और अप्रियकी प्राप्ति शोक उत्पन्न करनेवाली हुआ करती है केवल उपाधिरहित आत्माका साक्षात् करनेवाले पुरुषको नहीं। कारण उसके लिये ( वास्तवमें ) प्रिय और अप्रियकी प्राप्ति असम्भव है। सब भूतोंमें आत्मा एक है सम है और निर्दोष है ऐसी संशयरहित बुद्धि जिसकी स्थिर हो चुकी है और जो मोह अज्ञानसे रहित है वह स्थिरबुद्धि ब्रह्मज्ञानी ब्रह्ममें ही स्थित है। अर्थात् वह कर्म न करनेवाला सर्व कर्मोंका त्यागी ही है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

नन्विष्टानिष्टप्राप्तिभ्यां हर्षविषादौ विद्वानपि कुर्वन्निर्दोषे ब्रह्मणि कथं स्थितिं लभेतेत्याशङ्क्याकाङ्क्षितं पूरयन्नुत्तरश्लोकमुत्थापयति यस्मादिति। आत्मज्ञाननिष्ठावतो विदुषो हर्षविषादनिमित्ताभावान्न तावुचितावित्याह स्थिरबुद्धिरिति। ननु हर्षविषादनिमित्तत्वं प्रियाप्रिययोः सिद्धमिति कथं तत्प्राप्त्या हर्षोद्वेगौ न कर्तव्याविति नियुज्यते तत्राह देहेति। विदुषोऽपि प्रियाप्रियप्राप्तिसामर्थ्यादेव हर्षविषादौ दुर्वारावित्याशङ्क्याह न केवलेति। अद्वितीयात्मदर्शनशीलस्य व्यतिरिक्तप्रियाप्रियप्राप्त्ययोगान्न तन्निमित्तौ हर्षविषादावित्यर्थः। इत्यपि विदुषो हर्षविषादावसंभावितावित्याह किंचेति। निर्दोषे ब्रह्मणि प्रागुक्ते दृढप्रतिपत्तिः संमोहेन हर्षादिहेतुना रहितो यथोक्ते सर्वदोषरहिते ब्रह्मण्यहमस्मीति विद्यावानशेषदोषशून्ये तस्मिन्नेव ब्रह्मणि स्थितस्तदनुरोधात्कर्माण्यमृष्यमाणो नैव हर्षविषादभागी भवितुमलमित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

समे निर्दोषे ब्रह्मणि स्थितो जीवन्मुक्तिसुखार्थं कीदृशः स्यादित्याकाङ्क्षायामाह नेति। स्थिरा संशयवर्जिता सर्वभूतेष्वेकः समो निर्दोष आत्मेति बुद्धिर्यस्य। यतोऽसंमूढः संशयमूलभूतेन संमोहेन रहितः। यतस्तत्त्ववित् मोहनिवर्तकतत्तसाक्षात्कारवान्। तदपि कुतः। यतो ब्रह्मणि स्थितः सर्वं विक्षेपकारणं परित्यज्य श्रवणादिना तत्रैव स्थितः। तन्निष्ठ इतियावत्। एतादृशः प्रियः प्राप्य हर्षं न कुर्यात्। अप्रियं प्राप्योद्वेगं न कुर्यात्। एतादृशेनापि मनोनाशवासनाक्षयप्रयत्नेन हर्षविषादाभावत्वे यतितव्यं षष्ठ्यादिभूमिकायै इति सूचनार्थमुभयत्र लिङ्प्रयोगः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
naneither
prahṛiṣhyetrejoice
priyamthe pleasant
prāpyaobtaining
nanor
udvijetbecome disturbed
prāpyaattaining
chaalso
apriyamthe unpleasant
sthirabuddhiḥ
asammūḍhaḥfirmly situated
brahmavit
brahmaṇiestablished in God
sthitaḥsituated
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.19
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः

जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.21
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते

बाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित अन्तःकरणवाला साधक आत्मामें जो सुख है, उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 20
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः

जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 20 translates to: "Resting in Brahman, with a steady intellect and undeluded, the knower of Brahman neither rejoices upon obtaining what is pleasant nor grieves upon obtaining what is unpleasant. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्र" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na prahṛiṣhyet priyaṁ prāpya nodvijet prāpya chāpriyam" mean in English?

"na prahṛiṣhyet priyaṁ prāpya nodvijet prāpya chāpriyam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 20. Resting in Brahman, with a steady intellect and undeluded, the knower of Brahman neither rejoices upon obtaining what is pleasant nor grieves upon obtaining what is unpleasant. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.