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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 2
श्री भगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते

श्रीभगवान् बोले -- संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास- (सांख्ययोग-) से कर्मयोग श्रेष्ठ है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

, "துறத்தல் மற்றும் செயலின் யோகம் இரண்டும் உயர்ந்த பேரின்பத்திற்கு இட்டுச் செல்கின்றன; ஆனால் இரண்டில், செயலின் யோகம் செயலைத் துறப்பதை விட மேலானது.

MarathiIND

, "त्याग आणि कर्मयोग या दोन्हींमुळे सर्वोच्च आनंद मिळतो; परंतु या दोघांपैकी कर्मयोग हा कर्मत्यागापेक्षा श्रेष्ठ आहे.

MizoIND

, "Inhnuhdawh leh thiltih Yoga hian hlimna sang ber a thlen ve ve a; mahse an pahnih zingah chuan thiltih Yoga chu thiltih bânsan aiin a chungnung zawk a ni."

AssameseIND

, "ত্যাগ আৰু কৰ্মৰ যোগ দুয়োটাই সৰ্বোচ্চ আনন্দলৈ লৈ যায়; কিন্তু দুয়োটাৰ ভিতৰত কৰ্মৰ যোগাসন কৰ্মৰ ত্যাগতকৈ শ্ৰেষ্ঠ।"

MaithiliIND

, "त्याग आ कर्म योग दुनू उच्चतम आनन्द दिस लऽ जाइत अछि; मुदा दुनू मे सँ कर्म योग कर्मत्याग सँ श्रेष्ठ अछि।"

KonkaniIND

, "त्याग आनी कर्मयोग हे दोगूय उंचेल्या आनंदाक पावयतात; पूण दोगांयमदीं कर्माचो योग कर्मत्यागापरस श्रेश्ठ आसा."

BengaliIND

, "ত্যাগ এবং কর্মের যোগ উভয়ই সর্বোচ্চ আনন্দের দিকে পরিচালিত করে; কিন্তু দুটির মধ্যে কর্মের যোগ কর্মত্যাগের চেয়েও উচ্চতর।

TeluguIND

, "త్యాగము మరియు కార్య యోగము రెండూ అత్యున్నతమైన ఆనందానికి దారితీస్తాయి; కానీ ఈ రెండింటిలో, క్రియ యొక్క యోగము క్రియ యొక్క త్యజించుట కంటే గొప్పది.

MalayalamIND

, "ത്യാഗവും കർമ്മയോഗവും രണ്ടും പരമോന്നതമായ ആനന്ദത്തിലേക്ക് നയിക്കുന്നു; എന്നാൽ രണ്ടിൽ കർമ്മയോഗം കർമ്മ ത്യാഗത്തേക്കാൾ ശ്രേഷ്ഠമാണ്.

GujaratiIND

, "ત્યાગ અને ક્રિયાનો યોગ બંને સર્વોચ્ચ આનંદ તરફ દોરી જાય છે; પરંતુ બેમાંથી, ક્રિયાનો યોગ ક્રિયાના ત્યાગ કરતાં શ્રેષ્ઠ છે.

PunjabiIND

, "ਤਿਆਗ ਅਤੇ ਕਰਮ ਯੋਗ ਦੋਵੇਂ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚੇ ਆਨੰਦ ਵੱਲ ਲੈ ਜਾਂਦੇ ਹਨ; ਪਰ ਦੋਵਾਂ ਵਿੱਚੋਂ, ਕਰਮ ਦਾ ਯੋਗ ਕਰਮ ਦੇ ਤਿਆਗ ਨਾਲੋਂ ਉੱਤਮ ਹੈ।

SindhiIND

”ترڪي ۽ عمل جو يوگا ٻئي اعليٰ خوشين ڏانهن وٺي وڃن ٿا؛ پر ٻنهي مان، عمل جو يوگا عمل جي ورتاءَ کان اعليٰ آهي.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.2।। व्याख्या--[भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार सांख्ययोग और कर्मयोगका पालन प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके मनुष्य कर सकते हैं। कारण कि उनका सिद्धान्त किसी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिको लेकर नहीं है। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका त्याग करके विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीको 'कर्मसंन्यास' नामसे कहा है। परन्तु भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार ज्ञान-प्राप्तिके लिये सांख्ययोगका पालन प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्रतासे कर सकता है और उसका पालन करनेमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता भी नहीं है। इसलिये भगवान् प्रचलित मतका भी आदर करते हुए अपने सिद्धान्तके अनुसार अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।]'संन्यासः'--यहाँ 'संन्यासः' पदका अर्थ 'सांख्य-योग' है, कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं। अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् कर्मोंके त्यागपूर्वक संन्यासका विवेचन न करके कर्म करते हुए ज्ञानको प्राप्त करनेका जो सांख्ययोगका मार्ग है, उसका विवेचन करते हैं। उस सांख्ययोगके द्वारा मनुष्य प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिमें रहते हुए प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक ज्ञान प्राप्त कर सकता है अर्थात् अपना कल्याण कर सकता है। सांख्ययोगकी साधनामें विवेक-विचारकी मुख्यता रहती है। विवेकपूर्वक तीव्र वैराग्यके बिना यह साधना सफल नहीं होती। इस साधनामें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वपर दृष्टि रहती है। राग मिटे बिना संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन है। इसलिये भगवान्ने देहाभिमानियोंके लिये यह साधन क्लेशयुक्त बताया है (गीता 12। 5)। इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि कर्मयोगका साधन किये बिना संन्यासका साधन होना कठिन है; क्योंकि संसारसे राग हटानेके लिये कर्मयोग ही सुगम उपाय है। 'कर्मयोगश्च'--मानवमात्रमें कर्म करनेका राग अनादिकालसे चला आ रहा है, जिसे मिटानेके लिये कर्म करना आवश्यक है (गीता 5। 3)। परन्तु वे कर्म किस भाव और उद्देश्यसे कैसे किये जायँ कि करनेका राग सर्वथा मिट जाय, उस कर्तव्य-कर्मको करनेकी कलाको 'कर्मयोग' कहते हैं। कर्मयोगमें कार्य छोटा है या बड़ा, इसपर दृष्टि नहीं रहती। जो भी कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उसीको निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये करना है। कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये यह आवश्यक है कि कर्म अपने लिये न किये जायँ। अपने लिये कर्म न करनेका अर्थ है--कर्मोंके बदलेमें अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा न होना। जबतक अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा रहती है, तबतक कर्मोंके साथ सम्बन्ध बना रहता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अर्जुनके प्रश्नका निर्णय करनेके लिये भगवान् अपना अभिप्राय बतलाते हुए बोले संन्यास कर्मोंका परित्याग और कर्मयोग उनका अनुष्ठान करना ये दोनों ही कल्याणकारक अर्थात् मुक्तिके देनेवाले हैं। यद्यपि ज्ञानकी उत्पत्तिमें हेतु होनेसे ये दोनोंही कल्याणकारक हैं तथापि कल्याणके उन दोनों कारणोंमें ज्ञानरहित केवल संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है। इस प्रकार भगवान् कर्मयोगकी स्तुति करते हैं।

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Sri Anandgiri

प्रश्नमेवमुत्थाप्य प्रतिवचनमुत्थापयति स्वाभिप्रायमिति। निर्णयाय तद्द्वारेण परस्य संशयनिवृत्त्यर्थमित्यर्थः। एवं प्रश्ने प्रवृत्ते कर्मयोगस्य सौकर्यमभिप्रेत्य प्रशस्यतरत्वमभिधित्सुर्भगवान्प्रतिवचनं किमुक्तवानित्याशङ्क्याह संन्यास इति। उभयोरपि तुल्यत्वशङ्कां वारयति तयोस्त्विति। कथं तर्हि ज्ञानस्यैव मोक्षोपायत्वं विवक्ष्यते तत्राह ज्ञानोत्पत्तीति। तर्हि द्वयोरपि प्रशस्यत्वमप्रशस्यत्वं वा तुल्यमित्याशङ्क्याह उभाविति। ज्ञानसहायस्य कर्मसंन्यासस्य कर्मयोगापेक्षया विशिष्टत्वविवक्षया विशिनष्टि केवलादिति।

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Sri Dhanpati

अर्जुनसंशयनिर्वतकमुत्तरं श्रीभगवानुवाच संन्यास इति। उभो यद्यपि निःश्रेयसकरौ ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन मोक्षोपयोगिनौ तथापि तयोस्तु कर्मसंन्यासादशुद्धचित्तेनाविरक्तेन कृतात्कर्मयोगश्चित्तशुद्य्धा वैराग्यादिजनको विशिष्यत उत्कृष्टो भवतीति कर्मयोगं स्तौति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
sanyāsaḥrenunciation
karmayogaḥ
chaand
niḥśhreyasakarau
ubhauboth
tayoḥof the two
tubut
karmasanyāsāt
karmayogaḥ
viśhiṣhyateis superior
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.1
अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्िचतम्

हे कृष्ण ! आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। अतः इन दोनों साधनोंमें जो एक निश्चितरूपसे कल्याणकारक हो, उसको मेरे लिये कहिये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते

हे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 2
श्री भगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते

श्रीभगवान् बोले -- संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास- (सांख्ययोग-) से कर्मयोग श्रेष्ठ है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास- (सांख्ययोग-) से कर्मयोग श्रेष्ठ है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 2 translates to: ", "Renunciation and the Yoga of action both lead to the highest bliss; but of the two, the Yoga of action is superior to the renunciation of action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मय" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास- (सांख्ययोग-) से कर्मयोग श्रेष्ठ है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 2. , "Renunciation and the Yoga of action both lead to the highest bliss; but of the two, the Yoga of action is superior to the renunciation of action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.