Bhagavad Gita 5.1 — Commentary
20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्िचतम्
arjuna uvācha sannyāsaṁ karmaṇāṁ kṛiṣhṇa punar yogaṁ cha śhansasi yach chhreya etayor ekaṁ tan me brūhi su-niśhchitam
"O Krishna, you praise renunciation of actions and also yoga. Please tell me conclusively which is better of the two."
Scholar Commentaries (20)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
संन्यासं परित्यागं कर्मणां शास्त्रीयाणाम् अनुष्ठेयविशेषाणां शंससि प्रशंससि कथयसि इत्येतत्। पुनः योगं च तेषामेव अनुष्ठानम् अवश्यकर्तव्यंत्वं शंससि। अतः मे कतरत् श्रेयः इति संशयः किं कर्मानुष्ठानं श्रेयः किं वा तद्धानम् इति। प्रशस्यतरं च अनुष्ठेयम्। अतश्च यत् श्रेयः प्रशस्यतरम् एतयोः कर्मसंन्यासकर्मयोगयोः यदनुष्ठानात् श्रेयोऽवाप्तिः मम स्यादिति मन्यसे तत् एकम् अन्यतरत् सह एकपुरुषानुष्ठेयत्वासंभवात् मे ब्रूहि सुनिश्चितम् अभिप्रेतं तवेति।।स्वाभिप्रायम् आचक्षाणो निर्णयाय श्रीभगवानुवाच
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
अर्जुन उवाच कर्मणां सन्यासं ज्ञानयोगं पुनः कर्मयोगं च शंससि। एतद् उक्तं भवति द्वितीये अध्यायेमुमुक्षोः प्रथमं कर्मयोग एव कार्यः कर्मयोगेन मृदितान्तःकरणकषायस्य ज्ञानयोगेन आत्मदर्शनं कार्यम् इति प्रतिपाद्य पुनः तृतीयचतुर्थयोःज्ञानयोगाधिकारदशाम् आपन्नस्य अपि कर्मनिष्ठा एव ज्यायसी सा एव ज्ञाननिष्ठानिरपेक्षा आत्मप्राप्त्येकसाधनम् इति कर्मनिष्ठां प्रशंससि इति। तत्र एतयोः ज्ञानयोगकर्मयोगयोः आत्मप्राप्तिसाधनभावे यद् एकं सौकर्यात् शैघ्र्यात् च श्रेयः श्रेष्ठम् इति सुनिश्चितम् तत् मे ब्रूहि।
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेनयदृच्छालाभसन्तुष्टः 4।22 इत्यादिसन्न्यासंकुरु कर्मैव 4।15 इत्यादि कर्मयोगं च। नियमनादिना सकललोककर्षणात्कृष्णः। तच्चोक्तम् यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत्। अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः इति महाकौर्मे। सन्न्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति। अयं प्रश्नाशयः यदि सन्न्यासः श्रेयोऽधिकः स्यात् तर्हि सन्न्यासस्येषद्विरोधि युद्धमिति।
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
अर्जुन के इस प्रश्न से स्पष्ट होता है कि अनजाने में ही वह अपनी नैराश्य अवस्था से बहुत कुछ मुक्त हुआ भगवान् के उपदेश को ध्यानपूर्वक श्रवण करके विचार भी करने लगा था। स्वभाव से क्रियाशील होने के कारण अर्जुन को कर्मयोग रुचिकर तथा स्वीकार्य था। परन्तु अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण द्वारा अन्य यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान अथवा कर्मसंन्यास को अधिक श्रेष्ठ प्रतिपादित करने से अर्जुन के मन में सन्देह उत्पन्न हुआ और यही कारण था कि वह स्वयं के लिए किसी मार्ग का निश्चय नहीं कर सका। अत इसका निश्चय कराना ही अर्जुन के प्रश्न का प्रयोजन है।और एक बात यह भी है कि मानसिक उन्माद का रोगी उस रोग के प्रभाव से कुछ मुक्त होने पर भी शीघ्र ही पूर्ण आत्मविश्वास नहीं जुटा पाता। यह सबका अनुभव है कि भयंकर स्वप्न से जागे हुए व्यक्ति को पुन संयमित होकर निद्रा अवस्था में आने के उपक्रम में कुछ समय लग जाता है। अर्जुन की ठीक ऐसी ही स्थिति थी। मानसिक तनाव एवं उन्माद की स्थिति से बाहर आने पर भी अपने सारथी श्रीकृष्ण के उपदेश को पूर्णरूप से समझने तथा विचार करने में वह स्वयं को असमर्थ पा रहा था। अर्जुन इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि भगवान् उसके सामने कर्मयोग तथा कर्मसंन्यास के रूप में दो विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं। अत वह श्रीकृष्ण से यह जानना चाहता है कि उसके आत्मकल्याण के लिये इन दोनों में से कौन सा एक निश्चित मार्ग अनुकरणीय है। इस अध्याय का प्रयोजन यह बताने का है कि ये दो मार्ग विकल्प रूप नहीं है और न ही परस्पर पूरक होते हुये युगपत अनुष्ठेय हैं।कर्मयोग तथा कर्मसंन्यास इनका इसी क्रम में आचरण करना है और न कि एक साथ दोनों का। यही इस अध्याय का विषय है।
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
5.1 संन्यासम् renunciation? कर्मणाम् of actions? कृष्ण O Krishna? पुनः again? योगम् Yoga? च and? शंससि (Thou) praisest? यत् which? श्रेयः better? एतयोः of these two? एकम् one? तत् that? मे to me? ब्रूहि tell? सुनिश्चितम् conclusively.Commentary Thou teachest renunciation of actions and also their performance. This has confused me. Tell decisively now which is better. It is not possible for a man to resort to both of them at the same time. Yoga here means Karma Yoga. (Cf.III.2)
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
5.1।। व्याख्या--'संन्यासं कर्मणां कृष्ण'--कौटुम्बिक स्नेहके कारण अर्जुनके मनमें युद्ध न करनेका भाव पैदा हो गया था। इसके समर्थनमें अर्जुनने पहले अध्यायमें कई तर्क और युक्तियाँ भी सामने रखीं। उन्होंने युद्ध करनेको पाप बताया (गीता 1। 45)। वे युद्ध न करके भिक्षाके अन्नसे जीवन-निर्वाह करनेको श्रेष्ठ समझने लगे (2। 5) और उन्होंने निश्चय करके भगवान्से स्पष्ट कह भी दिया कि मैं किसी भी स्थितिमें युद्ध नहीं करूँगा (2। 9)।प्रायः वक्ताके शब्दोंका अर्थ श्रोता अपने विचारके अनुसार लगाया करते हैं। स्वजनोंको देखकर अर्जुनके हृदयमें जो मोह पैदा हुआ, उसके अनुसार उन्हें युद्धरूप कर्मके त्यागकी बात उचित प्रतीत होने लगी। अतः भगवान्के शब्दोंको वे अपने विचारके अनुसार समझ रहे हैं कि भगवान् कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके प्रचलित प्रणालीके अनुसार तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी ही प्रशंसा कर रहे हैं। 'पुनर्योगं च शंससि'--चौथे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगीको दूसरे किसी साधनके बिना अवश्यमेव तत्त्वज्ञान प्राप्त होनेकी बात कही है। उसीको लक्ष्य करके अर्जुन भगवान्से कह रहे हैं कि कभी तो आप ज्ञानयोगकी प्रशंसा (4। 33) करते हैं और कभी कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं (4। 41)।
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
केवल संन्यास करनेमात्रसे ही सिद्धिको प्राप्त नहीं होता है इस वचनसे ज्ञानसहित संन्यासको ही सिद्धिका साधन माना है साथ ही कर्मयोगका भी विधान किया है इसलिये ज्ञानरहित संन्यास कल्याणकर हैअथवा कर्मयोग इन दोनोंकी विशेषता जाननेकी इच्छासे अर्जुन बोला आप पहले तो शास्त्रोक्त बहुत प्रकारके अनुष्ठानरूप कर्मोंका त्याग करनेके लिये कहते हैं अर्थात् उपदेश करते हैं और फिर उनके अनुष्ठानकी अवश्यकर्तव्यतारूप योगको भी बतलाते हैं। इसलिये मुझे यह शङ्का होती है कि इनमेंसे कौनसा श्रेयस्कर है। कर्मोंका अनुष्ठान करना कल्याणकर है अथवा उनका त्याग करना जो श्रेष्ठतर हो उसीका अनुष्ठान करना चाहिये इसलिये इन कर्मसंन्यास और कर्मयोगमें जो श्रेष्ठ हो अर्थात् जिसका अनुष्ठान करनेसे आप यह मानते हैं कि मुझे कल्याणकी प्राप्ति होगी उस भलीभाँति निश्चय किये हुए एक ही अभिप्रायको अलग करके कहिये क्योंकि एक पुरुषद्वारा एक साथ दोनोंका अनुष्ठान होना असम्भव है।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
पूर्वोत्तराध्याययोः संबन्धमभिदधानो वृत्तानुवादपूर्वकमर्जुनप्रश्नस्याभिप्रायं प्रदर्शयितुं प्रक्रमते कर्मणीत्यादिना। इत्यारभ्य कर्मण्यकर्मदर्शनमुक्त्वा तत्प्रशंसा प्रसारितेत्याह स युक्त इति। ज्ञानवन्तं सर्वाणि कर्माणि लोकसंग्रहार्थं कुर्वन्तं ज्ञानलंक्षणेनाग्निना दग्धसर्वकर्माणं कर्मप्रयुक्तबन्धविधुरं विवेकवन्तो वदन्तीति ज्ञानवतो ज्ञानफलभूतं संन्यासं विवक्षन्विविदिषोः साधनरूपमपि संन्यासं भगवान्विवक्षितवानित्याह ज्ञानाग्नीति। निराशीरित्यारभ्य शरीरस्थितिमात्रकारणं कर्म शरीरस्थितावपि सङ्गरहितः सन्नाचरन्धर्माधर्मफलभागी न भवतीत्यपि पूर्वोत्तराभ्यामध्यायाभ्यां द्विविधं संन्यासं सूचितवानित्याह शारीरमिति। यदृच्छेत्यादावपि संन्यासः सूचितस्तद्धर्मफलायोपदेशादित्याह यदृच्छेति। ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनपूर्वकं प्रशंसावचनादपि कर्मसंन्यासो दर्शितो ज्ञाननिष्ठस्येत्याह ब्रह्मार्पणमिति। ज्ञानयज्ञस्तुत्यर्थं नानाविधान्यज्ञाननूद्य तेषां देहादिव्यापारजन्यत्ववचनेनात्मनो निर्व्यापारत्वविज्ञानफलाभिलाषादपि यथोक्तमात्मानं विविदिषोः सर्वकर्मसंन्यासेऽधिकारो ध्वनित इत्याह कर्मजानिति। समस्तस्यैवावशेषवर्जितस्य कर्मणो ज्ञाने पर्यवसानाभिधानाच्च जिज्ञासोः सर्वकर्मसंन्यासः सूचित इत्याह सर्वमिति। तद्विद्धीत्यादिना ज्ञानप्राप्त्युपायं प्रणिपातादि प्रदर्श्य प्राप्तेन ज्ञानेनातिशयमाहात्म्यवता सर्वकर्मणां निवृत्तिरेवेति वदता च ज्ञानार्थिनः संन्यासेऽधिकारो दर्शितो भगवतेत्याह ज्ञानाग्निरिति। ज्ञानेन समुच्छिन्नसंशयं तस्मादेव ज्ञानात्कर्माणि संन्यस्य व्यवस्थितमप्रमत्तं वशीकृतकार्यकरणसंघातवन्तं प्रातिभासिकानि कर्माणि न निबध्नन्तीत्यपि द्विविधः संन्यासो भगवतोक्त इत्याह योगेति। कर्मणीत्यारभ्य योगसंन्यस्तकर्माणमित्यन्तैरुदाहृतैर्वचनैरुक्तं संन्यासमुपसंहरति इत्यन्तैरिति। तर्हि कर्मसंन्यासस्यैव जिज्ञासुना ज्ञानवता चादरणीयत्वात्कर्मानुष्ठानमनादेयमापन्नमित्याशङ्क्योक्तमर्थान्तरमनुवदति छित्त्वैनमिति। कर्मतत्त्यागयोरुक्तयोरेकेनैव पुरुषेणानुष्ठेयत्वसंभवान्न विरोधोऽस्तीत्याशङ्क्य युगपद्वा क्रमेण वानुष्ठानमिति विकल्प्याद्यं दूषयति उभयोश्चेति। द्वितीयं प्रत्याह कालभेदेनेति। उक्तयोर्द्वयोरेकेन पुरुषेणानुष्ठेयत्वासंभवे कथं कर्तव्यत्वसिद्धिरित्याशङ्क्याह अर्थादिति। द्वयोरुक्तयोरेकेन युगपत्क्रमाभ्यामनुष्ठानानुपपत्तेरित्यर्थः। अन्यतरस्य कर्तव्यत्वे कतरस्येति कुतो निर्णयो द्वयोः संनिधानाविशेषादित्याशङ्क्याह यत्प्रशस्यतरमिति। भगवता कर्मणां संन्यासो योगश्चोक्तो नच तयोः समुच्चित्यानुष्ठानं तेनान्यतरस्य श्रेष्ठस्यानुष्ठेयत्वे तद्बुभुत्सया प्रश्नोपपत्तिरित्युपसंहरति इत्येवमिति। नायं प्रष्टुरभिप्रायः कर्मसंन्यासकर्मयोगयोर्भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वस्योक्तत्वादेकस्मिन्पुरुषे प्राप्त्यभावादिति शङ्कते नन्विति। चोद्यमङ्गीकृत्य परिहरति सत्यमेवेति। कीदृशस्तर्हि प्रष्टुरभिप्रायो येन प्रश्नप्रवृत्तिरिति पृच्छति कथमिति। एकस्मिन्पुरुषे कर्मतत्त्यागयोरस्ति प्राप्तिरिति प्रष्टुरभिप्रायं प्रतिनिर्देष्टुं प्रारभते पूर्वोदाहृतैरिति। यथास्वर्गकामो यजेत इति स्वर्गकामोद्देशेन यागो विधीयते नतु तस्यैवाधिकारो नान्यस्येत्यपि प्रतिपाद्यते वाक्यभेदप्रसङ्गात्तथानात्मवित्कर्ता संन्यासपक्षे प्राप्तोऽनूद्यते नचात्मवित्कर्तृकत्वमेव संन्यासस्य नियम्यते वैराग्यमात्रेणाज्ञस्यापि संन्यासविधिदर्शनात्। तस्मात्कर्मतत्त्यागयोरविद्वत्कर्तृकत्वमस्तीति मन्वानस्यार्जुनस्य प्रश्नः संभवतीति भावः। भवतु संन्यासस्य कर्तव्यत्वविवक्षा तथापि कथं प्रशस्यतरबुभुत्सया प्रश्नप्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह प्राधान्यमिति। तथापि कथमेकस्मिन्पुरुषे तयोरप्राप्तावुक्ताभिप्रायेण प्रश्नवचनं प्रकल्प्यते तत्राह अनात्मविदपीति। आत्मविदो विद्यासामर्थ्यात्कर्मत्यागध्रौव्यवदितरस्यापि सति वैराग्ये तत्त्यागस्यावश्यकत्वात्तत्र कर्तासौ प्राप्तोऽत्रानूद्यते। तथाच कर्मतत्त्यागयोरेकस्मिन्नविदुषि प्राप्तेर्व्यक्तत्वादुक्ताभिप्रायेण प्रश्नप्रवृत्तिरविरुद्धेत्यर्थः। संन्यासस्यात्मवित्कर्तृकत्वमेवात्र विवक्षितं किं न स्यादित्याशङ्क्य कर्त्रन्तरपर्युदासः संन्यासविधिश्चेत्यर्थभेदे वाक्यभेदप्रसङ्गान्मैवमित्याह इति न पुनरिति। इतिशब्दो वाक्यभेदप्रसङ्गहेतुद्योतनार्थः। ततः किमित्याशङ्क्य फलितमाह एवमिति। कर्मानुष्ठानकर्मसंन्यासयोरविद्वत्कर्तृकत्वमप्यस्तीत्येवं मन्वानस्यार्जुनस्य प्रशस्यतरविविदिषया प्रश्नो नानुपपन्न इति संबन्धः। तयोः समुच्चित्यानुष्ठानसंभवे कथं प्रशस्यतरविविदिषेत्याशङ्क्याह पूर्वोक्तेनेति।उभयोश्चेत्यादावुक्तप्रकारेण कर्मतत्त्यागयोर्मिथो विरोधान्न समुच्चित्यानुष्ठानं सावकाशमित्यर्थः। भवतु तर्हि यस्य कस्यचिदन्यतरस्यानुष्ठेयत्वमिति कुत उक्ताभिप्रायेण प्रश्नप्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह अन्यतरस्येति। उभयप्राप्तौ समुच्चयानुपपत्तावन्यतरपरिग्रहे विशेषस्यान्वेष्यत्वादुक्ताभिप्रायेण प्रश्नोपपत्तिरित्यर्थः। इतश्चाविद्वत्कर्तृकयोः संन्यासकर्मयोगयोः कतरः श्रेयानिति प्रष्टुरभिप्रायो भातीत्याह प्रतिवचनेति। किं तत्प्रतिवचनं कथं वा तन्निरूपणमिति पृच्छति कथमिति। तत्र प्रतिवचनं दर्शयति संन्यासेति। तन्निरूपणं कथयति एतदिति। तदुभयमिति निःश्रेयसकरत्वं कर्मयोगस्य श्रेष्ठत्वं चेत्यर्थः। गुणदोषविभागविवेकार्थं पृच्छति किंचेति। अतोऽस्मिन्नाद्ये पक्षे किं दूषणमस्मिन्वा द्वितीये पक्षे किं फलमिति प्रश्नार्थः। तत्र सिद्धान्ती प्रथमपक्षे दोषमादर्शयति अत्रेत्यादिना। तदेवानुपपन्नत्वं व्यतिरेकद्वारा विवृणोति यदीत्यादिना। निःश्रेयसकरत्वोक्तिरित्यत्र पारम्पर्येणेति द्रष्टव्यम् विशिष्टत्वाभिधानमिति प्रतियोगिनोऽसहायत्वादस्य च शुद्धिद्वारा ज्ञानार्थत्वादित्यर्थः। आत्मज्ञस्य कर्मसंन्यासकर्मयोगयोरसंभवे दर्शिते चोदयति अत्राहेति। चोदयिता निर्धारणार्थं विमृशति किमित्यादिना। अन्यतरासंभवेऽपि संदेहात्प्रश्नोऽवतरतीत्याह यदा चेति। यस्य कस्यचिदन्यतरस्यासंभवो भविष्यतीत्याशङ्क्य कारणमन्तरेणासंभवो भवन्नतिप्रसङ्गः स्यादिति मन्वानः सन्नाह असंभव इति। आत्मविदः सकारणं कर्मयोगासंभवं सिद्धान्ती दर्शयति अत्रेति। संग्रहवाक्यं विवृण्वन्नात्मवित्त्वं विवृणोति जन्मादीति। तस्य यदुक्तं निवृत्तमिथ्याज्ञानत्वं तदिदानीं व्यनक्ति सम्यगिति। विपर्ययज्ञानमूलस्येत्यादिनोक्तं प्रपञ्चयति निष्क्रियेति। यथोक्तसंन्यासमुक्त्वा ततो विपरीतस्य कर्मयोगस्याभावः प्रतिपाद्यत इति संबन्धः। वैपरीत्यं स्फोरयन्कर्मयोगमेव विशिनष्टि मिथ्याज्ञानेति। मिथ्या च तदज्ञानं चेत्यनाद्यनिर्वाच्यमज्ञानं तन्मूलोऽहं कर्तेत्यात्मनि कर्तृत्वाभिमानस्तज्जन्यस्तस्येति यावत्। यथोक्तं संन्यासमुक्त्वा यथोक्तकर्मयोगस्यासंभवप्रतिपादने हेतुमाह सम्यग्ज्ञानेति। कुत्र तदभावप्रतिपादनं तदाह इहेति। उक्तं हेतुं कृत्वात्मज्ञस्य कर्मयोगसंभवे फलितमाह यस्मादिति। इह शास्त्रे तत्र तत्रेत्यादावुक्तमेव व्यक्तीकर्तुं पृच्छति केषु केष्विति। तानेव प्रदेशान्दर्शयति अत्रेति। आत्मस्वरूपनिरूपणप्रदेशेषु संन्यासप्रतिपादनादात्मविदः संन्यासो विवक्षितश्चेत्तर्हि कर्मयोगोऽपि तस्य कस्मान्न भवति प्रकरणाविशेषादिति शङ्कते ननु चेति। आत्मविद्याप्रकरणे कर्मयोगप्रतिपादनमुदाहरति तद्यथेति। प्रकरणादात्मविदोऽपि कर्मयोगस्य संभवे फलितमाह अतश्चेति। आत्मज्ञानोपायत्वेनापि प्रकरणपाठसिद्धौ ज्ञानादूर्ध्वं न्यायविरुद्धं कर्म कल्पयितुमशक्यमिति परिहरति अत्रोच्यत इति। सम्यग्ज्ञानमिथ्याज्ञानयोस्तत्कार्ययोश्च भ्रमनिवृत्तिभ्रमसद्भावयोर्मिथो विरोधात्कर्तृत्वादिभ्रममूलं कर्म सम्यग्ज्ञानादूर्ध्वं न संभवतीत्यर्थः। आत्मज्ञस्य कर्मयोगासंभवे हेत्वन्तरमाह ज्ञानयोगेनेति। इतश्चात्मविदो ज्ञानादूर्ध्वं कर्मयोगो न युक्तिमानित्याह कृतकृत्यत्वेनेति। ज्ञानवतो नास्ति कर्मेत्यत्र कारणान्तरमाह तस्येति। तर्हि ज्ञानवता कर्मयोगस्य हेयत्ववज्जिज्ञासुनापि तस्य त्याज्यत्वं ज्ञानप्राप्त्या तस्यापि पुरुषार्थसिद्धेरित्याशङ्क्य जिज्ञासोरस्ति कर्मयोगापेक्षेत्याह न कर्मणामिति। स्वरूपोपकार्यङ्गमन्तरेणाङ्गिस्वरूपानिष्पत्तेर्ज्ञानार्थिना कर्मयोगस्य शुद्ध्यादिद्वारा ज्ञानहेतोरादेयत्वमित्यर्थः। तर्हि ज्ञानवतामपि ज्ञानफलोपकारित्वेन कर्मयोगो मृग्यतामित्याशङ्क्याह योगारूढस्येति। उत्पन्नसम्यग्ज्ञानस्य कर्माभावे शरीरस्थितिहेतोरपि कर्मणोऽसंभवान्न तस्य शरीरस्थितिस्तदस्थितौ च कुतो जीवन्मुक्तिस्तदभावे च कस्योपदेष्ट्टत्वमुपदेशाभावे च कुतो ज्ञानोदयः स्यादित्याशङ्क्याह शारीरमिति। विदुषोऽपि शरीरस्थितिरास्थिता चेत्तन्मात्रप्रयुक्तेषु दर्शनश्रवणादिषु कर्तृत्वाभिमानोऽपि स्यादित्याशङ्क्याह नैवेति। तत्त्वविदित्यनेन च समाहितचेतस्तया करोमीति प्रत्ययस्य सदैवाकर्तव्यत्वोपदेशादिति संबन्धः। यत्तु विदुषः शरीरस्थितिनिमित्तकर्माभ्यनुज्ञाने तस्मिन्कर्तृत्वाभिमानोऽपि स्यादिति तत्राह शरीरेति। आत्मयाथात्म्यविदस्तेष्वपि नाहं करोमीति प्रत्ययस्य नैव किंचित्करोमीत्यादावकर्तृत्वोपदेशान्न कर्तृत्वाभिमानसंभावनेत्यर्थः। यथोक्तोपदेशानुसंधानाभावे विदुषोऽपि करोमीति स्वाभाविकप्रत्ययद्वारा कर्मयोगः स्यादित्याशङ्क्याह आत्मतत्त्वेति। यद्यपि विद्वान्यथोक्तमुपदेशं कदाचिन्नानुसंधत्ते तथापि तत्त्वविद्याविरोधान्मिथ्याज्ञानं तन्निमित्तं कर्म वा तस्य संभावयितुमशक्यमित्यर्थः। आत्मवित्कर्तृकयोः संन्यासकर्मयोगयोरयोगात्तयोर्निःश्रेयसकरत्वमन्यतरस्य विशिष्टत्वमित्येतदयुक्तमिति सिद्धत्वाद्द्वितीयं पक्षमङ्गीकरोति यस्मादित्यादिना। तदीयाच्च कर्मसंन्यासात्कर्मयोगस्य विशिष्टत्वाभिधानमिति संबन्धः। ननु कर्मयोगेन शुद्धबुद्धेः संन्यासो जायमानस्तस्मादुत्कृष्यते कथं तस्मात्कर्मयोगस्योत्कृष्टत्ववाचोयुक्तिर्युक्तेति तत्राह पूर्वोक्तेति। वैलक्षण्यमेव स्पष्टयति सत्येवेति। स्वाश्रमविहितश्रवणादौ कर्तृत्वविज्ञाने सत्येव पूर्वाश्रमोपात्तकर्मैकदेशविषयसंन्यासात्कर्मयोगस्य श्रेयस्त्ववचनंनैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तम् इत्यादिस्मृतिविरुद्धमित्याशङ्क्याह यमनियमादीति।आनृशंस्यं क्षमा सत्यमहिंसा दम आर्जवम्। प्रीतिः प्रसादो माधुर्यमक्रोधश्च यमा दश।।दानमिज्या तपो ध्यानं स्वाध्यायोपस्थनिग्रहौ। व्रतोपवासौ मौनं च स्नानं च नियमा दश।। इत्युक्तैर्यमनियमैरन्यैश्चाश्रमधर्मैर्विशिष्टत्वेनानुष्ठातुमशक्यत्वादुक्तसंन्यासात्कर्मयोगस्य विशिष्टत्वोक्तिर्युक्तेत्यर्थः। नहि कश्चिदिति न्यायेन कर्मयोगस्येतरापेक्षया सुकरत्वाच्च तस्य विशिष्टत्ववचनं श्लिष्टमित्याह सुकरत्वेन चेति। प्रतिवचनवाक्यार्थालोचनात्सिद्धमर्थमुपसंहरति इत्येवमिति। संन्यासकर्मयोगयोर्मिथोविरुद्धयोः समुच्चित्यानुष्ठातुमशक्ययोरन्यतरस्य कर्तव्यत्वे प्रशस्यतरस्य तद्भावात्तद्भावस्य चानिर्धारितत्वात्तन्निर्दिधारयिषया प्रश्नः स्यादिति प्रश्नवाक्यार्थपर्यालोचनया प्रष्टुरभिप्रायो यथा पूर्वमुपदिष्टस्तथा प्रतिवचनार्थनिरूपणेनापि तस्य निश्चितत्वात्प्रश्नोपपत्तिः सिद्धेत्यर्थः। ननु तृतीये यथोक्तप्रश्नस्य भगवता निर्णीतत्वान्नात्र प्रश्नप्रतिवचनयोः सावकाशत्वमित्याशङ्क्य विस्तरेणोक्तमेव संबन्धं पुनः संक्षेपतो दर्शयति ज्यायसी चेदिति। सांख्ययोगयोर्भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वेन निर्णीतत्वान्न पुनः प्रश्नयोग्यत्वमित्यर्थः। इतोऽपि न तयोः प्रश्नविषयत्वमित्याह नचेति। एवकारविशेषणाज्ज्ञानसहितसंन्यासस्य सिद्धसाधनत्वं भगवतोऽभिमतंछित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठ इति च कर्मयोगस्य विधानात्तस्यापि सिद्धसाधनत्वमिष्टं ततश्च निर्णीतत्वान्न प्रश्नस्तद्विषयः सिध्यतीत्यर्थः। केनाभिप्रायेण तर्हि प्रश्नः स्यादित्याशङ्क्य ज्ञानरहितसंन्यासात्कर्मयोगस्य प्रशस्यतरत्वबुभुत्सयेत्याह ज्ञानरहित इति। प्रष्टुरभिप्रायमेवं प्रदर्श्य प्रश्नोपपत्तिमुक्त्वा प्रश्नमुत्थापयति संन्यासमिति। तर्हि द्वयं त्वयानुष्ठेयमित्याशङ्क्य तदशक्तेरुक्तत्वात्प्रशस्यतरस्यानुष्ठानार्थं तदिदमिति निश्चित्य वक्तव्यमित्याह यच्छ्रेय इति। काम्यानां प्रतिषिद्धानां च कर्मणां परित्यागो मयोच्यते न सर्वेषामित्याशङ्क्य कर्मण्यकर्मेत्यादौ विशेषदर्शनान्मैवमित्याह शास्त्रीयाणामिति। अस्तु तर्हि शास्त्रीयाशास्त्रीययोरशेषयोरपि कर्मणोस्त्यागो नेत्याह पुनरिति। तर्हि कर्मत्यागस्तद्योगश्चेत्युभयमाहर्तव्यमित्याशङ्क्य विरोधान्मैवमित्यभिप्रेत्याह अत इति। द्वयोरेकेनानुष्ठानायोगस्योक्तत्वात्कर्तव्यत्वोक्तेश्च संशयो जायते तमेव संशयं विशदयति किं कर्मेति। प्रशस्यतरबुभुत्सा किमर्थेत्याशङ्क्याह प्रशस्यतरं चेति। तस्यैवानुष्ठेयत्वे प्रश्नस्य सावकाशत्वमाह अतश्चेति। तदेव प्रशस्यतरं विशिनष्टि यदनुष्ठानादिति। तदेकमन्यतरन्मे ब्रूहीति संबन्धः। उभयोरुक्तत्वे सति किमित्येकं वक्तव्यमिति नियुज्यते तत्राह सहेति। कर्मतत्त्यागयोर्मिथो विरोधादित्यर्थः।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्। यदृच्छालाभसंतुष्टः इत्यादिना सर्वकर्मसन्यासंछित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोतिष्ठ भारत इति कर्मयोगं च श्रुत्वोभयोश्च स्थितिगतिवत्परस्परविरोधादेकेन सह कर्तुमशक्यत्वात् कालभेदेन विधानाभावादर्थात्तयोरन्यतरस्य कर्तव्यताप्राप्तौ सत्यामज्ञस्याशुद्धचेतस एतयोः संन्यासकर्मयोग्योः किं श्रेयस्करमिति बुभुत्सयार्जुन उवाच संन्यासमिति। संन्यासं परित्यागं कर्मणां शास्त्रीयाणामनुष्ठानविशेषाणां पुनस्तेषामनुष्ठानं च।एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रवजन्तितमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इत्यादि वेदमूलकैः पूर्वोक्तैर्वचनैः शंससि कथयसि। कृष्णेति संबोधयन् मया त्यागः कर्तव्य उत कर्मानुष्ठेयमिति तत्रतत्र मच्चित्ताकर्षणं करोषीति सूचयति। अतो मे कतरच्छ्रेय इति संशयो भवति तस्माद्यदेतयोरेकं प्रशस्यतरं सुनिश्चितं तन्मे ब्रूहि निःसंशयाय।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
तृतीयेऽध्यायेलोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा इति विभिन्नाधिकारिकं निष्ठाद्वयं प्रस्तुत्यन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते इत्यादिना कर्मनिष्ठाया ज्ञाननिष्ठाङ्गत्वेन भूयसा निर्बन्धेनानुष्ठेयत्वमुक्तम्कर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यादिना। चतुर्थे तूत्पन्नसम्यग्दर्शनैः कृतमपि कर्माकृतमेव भवति ज्ञानेन कर्तृत्वादिबाधात्। अतस्तैर्वृथाचेष्टावत्कर्म वा कर्तव्यं संन्यासो वा कर्तव्य इत्यनास्थया प्रोक्तम्। अथेदानीं पञ्चमषष्ठयोरज्ञानिना ज्ञानार्थिना वैराग्योत्पत्तेः प्राक्कर्मैवानुष्ठेयम्। संपन्ने तु वैराग्ये दृष्टविक्षेपनिवृत्त्यर्थं कर्मसंन्यासं कृत्वा ज्ञानोत्पत्त्यर्थं योगोऽनुष्ठेय इत्युच्यते। तत्र चतुर्थेत्यक्तसर्वपरिग्रहः इति संन्यासोयोगमातिष्ठ इति कर्मयोगश्चैकं मां प्रति विहितः। न चैतयोः स्थितिगतिवद्युगपदेकेन मयानुष्ठानं कर्तुं शक्यते परस्परविरुद्धत्वादिति मन्वानोऽर्जुन उवाच संन्यासमिति। हे कृष्ण पापकर्षण मे मह्यं ज्ञानार्थिने संन्यासं कर्मयोगं चेति द्वयं परस्परविरुद्धं कथं शंससि कथयसि। पुनरित्यनेन प्रागपि त्वया वेदकर्त्रा इदं द्वयं विहितमस्तीति गम्यते। तथाच श्रुतिस्मृति भवतःएतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्तिसंसारमेवं निःसारं दृष्ट्वा सारदिदृक्षया। प्रव्रजन्त्यकृतोद्वाहाः परं वैराग्यमास्थिताः। इति च। तथातमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इतिमहायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः इति च। ब्राह्मी ब्रह्मदर्शनयोग्या। अत एतयोः श्रुतिविहितत्वेन प्रशस्यतयोर्मध्ये एकं श्रेयः प्रशस्तरं यत्तन्मे सुनिश्चितं ब्रूहीति प्रश्नः।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
निर्वाय संशयं जिष्णोः कर्मसंन्यासयोगयोः। जितेन्द्रियस्य च यतेः पञ्चमे मुक्तिमब्रवीत्अज्ञानसंभूतं संशयं ज्ञानासिना छित्त्वा कर्मयोगमातिष्ठेत्युक्तं तत्र पूर्वापरविरोधं मन्वानोऽर्जुन उवाच संन्यासमिति।यस्त्वात्मरतिरेव स्यात् इत्यादिनासर्वं कर्माखिलं पार्थ इत्यादिना च ज्ञानिनः कर्मसंन्यासं कथयसि। ज्ञानासिना संशयं छित्त्वा योगमातिष्ठेति पुनर्योगं च कथयसि। न च कर्मसंन्यासः कर्मयोगश्चैकस्यैकदैव संभवतः विरुद्धस्वरूपत्वात्। तस्मादेतयोर्मध्ये एकस्मिन्ननुष्ठातव्ये सति मम यच्छ्रेयः श्रेष्ठं सुनिश्चितं तदेकं ब्रूहि।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
अथ पञ्चमस्यांशतस्तृतीयचतुर्थाभ्यां सङ्गतिप्रदर्शनायोक्तानुक्तांशविवेकेन पञ्चमस्यानुक्तांशे तात्पर्यप्रदर्शनाय चाह चतुर्थेऽध्याय इति।कर्मयोगस्य ज्ञानाकारतेत्यादिकं चतुर्थाध्यायप्रधानार्थोऽयमिति द्योतनार्थं सङ्गतिप्रदेशप्रदर्शनार्थं च।तृतीय एवेति कर्तव्यतोपदेशलक्षण एवेत्यर्थः। पञ्चमार्थमाह इदानीमिति। अत्रैवं सङ्ग्रहश्लोकः कर्मयोगस्य सौकर्यं शैघ्र्यं काश्चन तद्विधाः। ब्रह्मज्ञानप्रकारश्च पञ्चमाध्याय उच्यते गी.सं.9 इति। अत्रसौकर्यं शैघ्र्यं इति सङ्गृहीतत्वेऽपि भाष्ये शैघ्र्यमात्रवचनं सौकर्यस्य तृतीयाध्यायोक्तस्यैवानुवादः पञ्चमे शैघ्र्यौपयिकतया क्रियत इति ज्ञापनार्थम् शैघ्र्यं तु तत्रानुक्तत्वादत्र साक्षात्प्रतिपाद्यम्।काश्चन तद्विधाःब्रह्मज्ञानप्रकारश्च इत्युभयोर्व्याख्यानरूपेणकर्मयोगेत्यादिना तृतीयचतुर्थाभ्यामंशतः सङ्गतिरुक्ता भवति।ज्ञाननिष्ठाया इति पञ्चमी। तत्रप्रकारशब्देनविशोध्यत इति वचनाच्चानुक्तांशतात्पर्येणापौनरुक्त्यं दर्शितम्।तन्मूलं ज्ञानमिति विपाकदशापन्नज्ञानं विवक्षितम्।अथतद्विद्धि प्रणिपातेन 4।34 इत्येतदनुसन्दधानोऽनुक्तमपेक्षितमंशं सञ्चिज्ञासुरुक्तमेवार्थं परिपृच्छन्नर्जुन उवाचसन्न्यासं इति। सन्न्यासयोगशब्दावत्र प्रकृतवक्ष्यमाणसाङ्ख्ययोगविषयतया नाथान्तरपरावित्यभिप्रायेणाह कर्मणां सन्न्यासं ज्ञानयोगमिति। कर्मणामित्येतदुभयान्वितम्। ननु कर्मयोगस्य त्याज्यत्वं क्वचिदपि नोक्तम् प्रत्युत तदेवोपादेयतया प्रपञ्चितम् न च ज्ञानयोगस्य प्रशंसा क्वापि कृता येनसन्न्यासं৷৷.योगं च शंससि इत्युच्यते उभयोः प्रशंसने कृतेऽपि विकल्प इत्येव मन्तव्यं न पुनरन्यतराधिक्यप्रश्नावकाश इत्यत्राह एतदुक्तमिति।प्रतिपाद्येत्यन्तेनसन्न्यासं कर्मणाम् इत्यस्याभिप्रायो विवृतः। कषायनिवृत्त्यर्थः कर्मयोगः तन्निवृत्तौ कर्मयोगं परित्यज्य ज्ञानयोग उपादेयः अतो ज्ञानयोग एवात्मदर्शने साक्षात्साधनमिति द्वितीये प्रतिपादितमिति भावः। पूर्वं सन्न्यस्तस्य पुनर्योगं शंससीति भ्रमव्युदासायशंससि इत्यनेन पुनःशब्दान्वयमाह तृतीयचतुर्थयोरिति।द्वितीये इत्येतत्तृतीयचतुर्थयोः इत्येतच्च भाष्यकारैः स्वानुसन्धानेनोक्तम् न पुनरर्जुनवाक्यानुकारः। अत्र मृदितकषायस्य कर्मयोगस्त्याज्यश्चेत्कथमुपादेयः ज्ञानयोगस्य दर्शनसाधनत्वे कथमव्यवधानेन तत्सम्भव इति भावः।कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः 3।8 इति ज्यायस्त्वेन शंसनमित्यभिप्रायेणाहप्रशंससीति।तत्रेति द्वयोरप्यव्यवहितसाधनत्वे विवक्षिते इत्यर्थः।एतयोरित्यत्र निर्धारितान्यतरविषय एकशब्दः। तत्र सामान्याकारविवक्षया नपुंसकत्वं श्रेयश्शब्दविशेषणतया वा।सौकर्याच्छैघ्र्याच्चेति फलस्यैकत्वात्तन्निबन्धनं श्रैष्ठ्यमिहायुक्तमिति भावः। श्रेयः सुनिश्चितमित्यन्वयः। श्रेयस्त्वेन सुनिश्चितमित्यर्थः। क्रियाविशेषणत्वं तु निरर्थकमित्यभिप्रायेणाहश्रेष्ठमिति।सुनिश्चितमिति श्रेयश्शब्दस्य फलादिष्वपि प्रयोगप्राचुर्यात्तद्व्युदासाय तारतम्यप्रश्नानुगुण्येन प्रकृतिप्रत्ययार्थव्यञ्जनाय श्रेष्ठशब्देन व्याख्यातम्। अत्रैकफलसाधनत्वाद्विकल्पे प्राप्ते सौकर्यादिगुणयोगाच्छ्रेयस्त्वोक्तिः।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
पूर्वसङ्गतत्वेनैतदध्यायप्रतिपादनमर्थमाह तृतीयेति। कर्मयोगो नाम कर्माणि कृत्वा तेषां ब्रह्मात्मकत्वज्ञानमिति कश्चित् तद्व्यावर्तयितुमेवशब्दः। फलकामनादित्यागेनेश्वरार्पणबुद्ध्या वर्णाश्रमविहितकर्मानुष्ठानमेव कर्मयोगोऽत्र प्रपञ्च्यते तस्यैव पूर्वमुक्तत्वात् नान्यः तस्याप्रकृत्वात्। द्व्यंशश्चायं कर्मयोगः कामादिवर्जनमीश्वरार्पणबुद्ध्या कर्मानुष्ठानं चेति। तत्राद्यं सन्न्यासशब्दोक्तम् द्वितीयमुपचारेण कर्मयोगशब्दोक्तम् तदभिप्रायेण योगसन्न्यासयोर्लक्षणं स्पष्टयतीत्यन्यत्रोक्तमिति सन्न्यासमित्यादिना। कुत्रोक्तमर्जुनोऽनुवदति इत्यत आह यदृच्छेति।कर्मयोगं इति वदताकर्मणां इत्येतद्योगशब्देन सम्बध्यत इत्युक्तं भवति। तथा चकर्मणां सन्न्यासं त्यागं इति व्याख्यानमसदिति सूचितम्।शंससि इत्यनेनान्वयः। चतुर्थाध्यायोक्तस्यार्थस्यतदध्यायोत्थानबीजत्वात्तृतीयाध्यायार्थप्रपञ्चनात्मकस्याप्यस्य चतुर्थानन्तर्यं युक्तमित्यप्यनेन ज्ञापितम्। कृष्णशब्दो वर्णविशेषमात्रवचन इति प्रतीतिनिरासायाह नियमनादिनेति।नित्यनैमित्तिककाम्यनिषिद्धरूपसर्वकर्मत्यागः सन्न्यासशब्दार्थः इति व्याख्यानं दूषयति सन्न्यासेति।ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी 5।3 इति सन्न्यासशब्दस्य भगवतैवान्यथा व्याख्यातत्वात् तद्विरुद्धं परव्याख्यानमित्यर्थः। यदि सर्वकर्मपरित्यागो न सन्न्यासशब्दार्थः किन्तु द्वेषादिवर्जनमेव तर्हि तस्य योगेन विरोधाभावात्सन्न्यासयोगयोर्विरोधाभिप्रायेण श्रेयःप्रश्नोऽनुपपन्नः स्यादित्यत आह अयमिति। अत्र श्रेय इति यथास्थितं गीतापदमनूद्य सन्न्यासपदानुगुण्येनाधिक इति व्याख्यातम्। नन्वेतत्घोरः इति चोदितंश्रेयान् इति च परिहृतं च सत्यम् अतएवात्रेषदित्युक्तमिति अतस्तत्यक्त्वा सन्न्यास एव कर्तव्ये किं वैगुण्यमङ्गीकृत्यापि विधीयते युद्धमित्याशयशेषः।
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
अध्यायाभ्यां कृतो द्वाभ्यां निर्णयः कर्मबोधयोः। कर्मतत्त्यागयोर्द्वाभ्यां निर्णयः क्रियतेऽधुना।।तृतीयेऽध्यायेज्यायसी चेत्कर्मणस्ते इत्यादिनाऽर्जुनेन पृष्टो भगवाञ्ज्ञानकर्मणोर्विकल्पसमुच्चयासंभवेनाधिकारिभेदव्यवस्थयालोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया इत्यादिना निर्णयं कृतवान्। तथाचाज्ञाधिकारिकं कर्म न ज्ञानेन सह समुच्चीयते तेजस्तिमिरयोरिव युगपदसंभवात् कर्माधिकारहेतुभेदबुद्ध्यपनोदकत्वेन ज्ञानस्य तद्विरोधित्वात्। नापि विकल्प्यते एकार्थत्वाभावात् ज्ञानकार्यस्याज्ञाननाशस्य कर्मणा कर्तुमशक्यत्वात्।तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति श्रुतेः। ज्ञाने जाते तु कर्मकार्यं नापेक्ष्यत एवेत्युक्तंयावानर्थ उदपाने इत्यत्र। तथाच ज्ञानिनः कर्मानधिकारे निश्चिते प्रारब्धकर्मवशाद्वृथाचेष्टारूपेण तदनुष्ठानं वा सर्वकर्मसंन्यासो वेति निर्विवादं चतुर्थे निर्णीतम्। अज्ञेन त्वन्तःकरणशुद्धिद्वारा ज्ञानोत्पत्तये कर्माण्यनुष्ठेयानितमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुतेःसर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते इति भगवद्वचनाच्च। एवं सर्वाणि कर्माणि ज्ञानार्थानि तथा सर्वकर्मसंन्यासोऽपि ज्ञानार्थः श्रूयतेएतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्तिशान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्त्यजतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक् परं पदम्सत्यानृते सुखदुःखे वेदानिमं लोकममुं च परित्यज्यात्मानमन्विच्छेत् इत्यादौ। तत्र कर्मतत्त्यागयोरारादुपकारकसन्निपत्योपकारकयोः प्रयाजावघातयोरिव न समुच्चयः संभवति विरुद्धत्वेन यौगपद्याभावात्। नापि कर्मतत्त्यागयोरात्मज्ञानमात्रफलत्वेनैकार्थत्वादतिरात्रार्थयोः षोडशिग्रहणाग्रहणयोरिव विकल्पः स्यात् द्वारभेदेनैकार्थत्वाभावात्। कर्मणो हि पाक्षयरूपमदृष्टमेव द्वारम् संन्यासस्य तु सर्वविक्षेपाभावेन विचारावसरदानरूपं दृष्टमेव द्वारम् नियमापूर्वं तु दृष्टसमवायित्वादवघातादाविव न प्रयोजकम्। तथा चादृष्टार्थयोरारादुपकारकसन्निपत्योपकारकयोरेकप्रधानार्थत्वेऽपि विकल्पो नास्त्येव। प्रयाजावघातादीनामपि तत्प्रसङ्गात्। तस्मात्क्रमेणोभयमप्यनुष्ठेयम्। तत्रापि संन्यासानन्तरं कर्मानुष्ठानं चेत्तदा परित्यक्तपूर्वाश्रमस्वीकारेणारूढपतित्वात्कर्मानधिकारित्वं प्राक्तनसंन्यासवैयर्थ्यं च तस्यादृष्टार्थत्वाभावात्। प्रथमकृतसंन्यासेनैव ज्ञानाधिकारलाभे तदुत्तरकाले कर्मानुष्ठानवैयर्थ्यं च। तस्मादादौ भगवदर्पणबुद्ध्या निष्कामकर्मानुष्ठानादन्तःकरणशुद्धौ तीव्रेण वैराग्येण विविदिषायां दृढायां सर्वकर्मसंन्यासः श्रवणमननादिरूपवेदान्तवाक्यविचाराय कर्तव्य इति भगवतो मतम्। तथाचोक्तंन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते इति। वक्ष्यते चआरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।। इति। योगोऽत्र तीव्रवैराग्यपूर्विका विविदिषा। तदुक्तं वार्तिककारैःप्रत्यग्विविदिषासिद्ध्यै वेदानुवचनादयः। ब्रह्मावाप्त्यै तु तत्त्यागमीप्सन्तीति श्रुतेर्बलात्।। इति। स्मृतिश्चकषायपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते।। इति। मोक्षधर्मे चकषायं पाचयित्वा च श्रेणीस्थानेषु च त्रिषु। प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम्।।भावितैः करणैश्चायं बहुसंसारयोनिषु। आसादयति शुद्धात्मा मोक्षं वै प्रथमाश्रमे।।तमासाद्य तु मुक्तस्य दृष्टार्थस्य विपश्चितः। त्रिष्वाश्रमेषु कोन्वर्थो भवेत्परमभीप्सितः।। इति। मोक्षं वैराग्यम्। एतेन क्रमाक्रमसंन्यासौ द्वावपि दर्शितौ। तथाच श्रुतिःब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्गृहाद्वनीभूत्वा प्रव्रजेद्यदिवेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् इति। तस्मादज्ञस्याविरक्ततादशायां कर्मानुष्ठानमेव। तस्यैव विरक्ततादशायां संन्यासः श्रवणाद्यवसरदानेन ज्ञानार्थ इति दशाभेदेनाज्ञमधिकृत्यैव कर्मतत्त्यागौ व्याख्यातुं पञ्चमषष्ठावध्यायावारभ्येते। विद्वत्संन्यासस्तु ज्ञानबलादर्थसिद्धि एवेति संदेहाभावान्नात्र विचार्यते। तत्रैकमेव जिज्ञासुमज्ञं प्रति ज्ञानार्थत्वेन कर्मतत्त्यागयोर्विधानात्तयोश्च विरुद्धयोर्युगपदनुष्ठानासंभवान्मया जिज्ञासुना किमिदानीमनुष्ठेयमिति संदिहानः अर्जुन उवाच हे कृष्ण सदानन्दरूप भक्तदुःखकर्षणेति वा। कर्मणां यावज्जीवादिश्रुतिविहितानां नित्यानां नैमित्तिकानां च संन्यासं त्यागं जिज्ञासुमज्ञं प्रति कथयसि वेदमुखेन पुनस्तद्विरुद्धं योगं च कर्मानुष्ठानरूपं शंससि।एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्तितमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन इत्यादिवाक्यद्वयेन।निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत इति गीतावाक्यद्वयेन वा। तत्रैकमज्ञं प्रति कर्मतत्त्यागयोर्विधानाद्युगपदुभयानुष्ठानासंभवादेतयोः कर्मतत्त्यागयोर्मध्ये यदेकं श्रेयः प्रशस्यतरं मन्यसे कर्म वा तत्त्यागं वा तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं तव मतमनुष्ठानाय।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
सन्न्यासं कर्मयोगं च श्रीकृष्णोक्तं धनञ्जयः। श्रुत्वा संशयमापन्नः पुनः प्रश्नं चकार ह।।अर्जुन उवाच सन्न्यासमिति। हे कृष्ण सदानन्द आनन्दैकदानयोग्य कर्मणां सन्न्यासं त्यागंन मां कर्माणि 4।14 इत्यारभ्यकृत्वाऽपि न निबध्यते 4।22 इत्यन्तं शंससि पुनःयोगमातिष्ठ 4।42 इत्यनेन योगं च शंससि। एतयोरुभयोर्मध्ये एकं सुनिश्चितं निर्धारितं ब्रूहि। च पुनरेतयोरुभयोः सकाशादेकमन्यद्यच्छ्रेयः श्रेयोरूपं भक्तिरूपं भवेत् तन्मे मम त्वदीयस्य सुनिश्चितं संशयरूपं ब्रूहि।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
साङ्ख्ययोगैकार्थमतं स्वकर्मकरणं बहिः। इत्यबुद्ध्वा निजश्रेयोनिश्चये पृच्छति क्षमम्अर्जुन उवाच सन्न्यासमिति। साङ्ख्यानामेव कर्मणां सन्न्यासं त्यागं कथयसि योगं च। तत्र कर्मणां पुनर्योगे सम्बन्धं वा कथयसि। नहि कर्मसन्न्यासः कर्मयोगश्चैकस्यैकदैव सम्भवतः विरुद्धस्वरूपत्वात्। तस्मादेकं सुनिश्चितं मम श्रेयो वद।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
5.1 (O Krsna,) samsasi, You praise, i.e. speak of; sannyasam, renunciation; karmanam, of actions, of performance of various kinds of rites enjoined by the scriptures; punah ca, and again; You praise yogam, yoga, the obligatory performance of those very rites! Therefore I have a doubt as to which is better-Is the performance of actions better, or their rejection? And that which is better should be undertaken. And hence, bruhi, tell; mam, me; suniscitam, for certain, as the one intended by You; tat ekam, that one-one of the two, since performance of the two together by the same person is impossible; yat, which; is sreyah, better, more commendable; etayoh, between these two, between the renunciation of actions and the performance of actions [Ast. reads karma-yoga-anusthana (performance of Karma-yoga) in place of karma-anusthana (performance of actions).-Tr.], by undertaking which you think I shall acire what is beneficial. While stating His own opinion in order to arrive at a conclusion-
Dr. S. Sankaranarayan
20th century CE · Academic / Shaiva
Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.
5.1 Samnyasam etc. Is renunciation superior or Yoga ? this is the estion of the doubting person (Arjuna).
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
5.1 Arjuna said 'You praise the renunciation of actions, i.e., Jnana Yoga at one time, and next Karma Yoga'. This is what is objected to: In the second chapter, you have said that Karma Yoga alone should be practised first by an aspirant for release; and that the vision of the self should be achieved by means of Jnana Yoga by one whose mind has its blemishes washed away by Karma Yoga. Again, in the third and fourth chapters, you have praised Karma Yoga or devotion to Karma as better than Jnana Yoga even for one who has attained the stage of Jnana Yoga, and that, as a means of attaining the self, it (Karma Yoga) is independent of Jnana Yoga. Therefore, of these two, Jnana Yoga and Karma Yoga - tell me precisely which by itself is superior, i.e., most excellent, being more easy to practise, and icker to confer the vision of the self.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 5.1?
संन्यासं परित्यागं कर्मणां शास्त्रीयाणाम् अनुष्ठेयविशेषाणां शंससि प्रशंससि कथयसि इत्येतत्। पुनः योगं च तेषामेव अनुष्ठानम् अवश्यकर्तव्यंत्वं शंससि। अतः मे कतरत् श्रेयः इति संशयः किं कर्मानुष्ठानं श्रेयः किं वा तद्धानम् इति। प्रशस्यतरं च अनुष्ठेयम्। अतश्च यत् श्रेयः प्रशस्यतरम् एतयोः कर्मसंन्यासकर्मयोगयोः यदनुष्ठानात् श्रेयोऽवाप्तिः मम स्यादिति मन्यसे तत् एकम् अन्यतरत् सह एकपुरुषानुष्ठेयत्वासंभवात्
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 5.1, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.