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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्

हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

எப்பொழுதெல்லாம் தர்மம் குறைந்து அநியாயம் பெருகுகிறதோ, அப்போதெல்லாம் அர்ஜுனா, நான் என்னை வெளிப்படுத்துகிறேன்.

TeluguIND

ఎప్పుడైతే ధర్మం క్షీణించి, అధర్మం పెరుగుతుందో, ఓ అర్జునా, అప్పుడు నేను ప్రత్యక్షమవుతాను.

BengaliIND

হে অর্জুন, যখনই ধার্মিকতার অবক্ষয় এবং অধর্মের বৃদ্ধি ঘটে, তখনই আমি নিজেকে প্রকাশ করি।

GujaratiIND

હે અર્જુન, જ્યારે પણ સદાચારનો ઘટાડો અને અધર્મની વૃદ્ધિ થાય છે, ત્યારે હું મારી જાતને પ્રગટ કરું છું.

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਵੀ ਧਾਰਮਿਕਤਾ ਦਾ ਪਤਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਅਧਰਮ ਦਾ ਵਾਧਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਤਦ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦਾ ਹਾਂ।

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, എപ്പോഴൊക്കെ ധർമ്മം കുറയുകയും അനീതി വർദ്ധിക്കുകയും ചെയ്യുന്നുവോ അപ്പോഴെല്ലാം ഞാൻ സ്വയം പ്രത്യക്ഷപ്പെടുന്നു.

MarathiIND

हे अर्जुना, जेव्हा जेव्हा धर्माचा ऱ्हास होतो आणि अधर्माची वाढ होते, तेव्हा मी स्वतः प्रकट होतो.

NepaliIND

जब जब धर्मको पतन हुन्छ र अधर्मको वृद्धि हुन्छ, हे अर्जुन, तब म स्वयं प्रकट हुन्छु।

SindhiIND

اي ارجن، جڏهن به صداقت جي زوال ۽ بي انصافي جي واڌ ٿيندي آهي، تڏهن مان پاڻ کي ظاهر ڪريان ٿو.

KannadaIND

ಯಾವಾಗ ಸದಾಚಾರದ ಕ್ಷೀಣತೆ ಮತ್ತು ಅಧರ್ಮವು ಹೆಚ್ಚುತ್ತದೆಯೋ, ಓ ಅರ್ಜುನ, ಆಗ ನಾನು ನನ್ನನ್ನು ಪ್ರಕಟಪಡಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತೇನೆ.

BhojpuriIND

जब भी धर्म के पतन आ अधर्म के वृद्धि होला हे अर्जुन, तब हम प्रकट हो जानी।

KonkaniIND

जेन्ना जेन्ना धर्माचो उणाव आनी अधर्माची वाड जाता तेन्ना तेन्ना हांव स्वताक प्रगट करतां.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.7।। व्याख्या--'यदा यदा हि धर्मस्य ৷৷. अभ्युत्थानमधर्मस्य'-- धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धिका स्वरूप है--भगवत्प्रेमी, धर्मात्मा, सदाचारी, निरपराध और निर्बल मनुष्योंपर नास्तिक, पापी, दुराचारी और बलवान् मनुष्योंका अत्याचार बढ़ जाना तथा लोगोंमें सद्गुण-सदाचारोंकी अत्यधिक कमी और दुर्गुण-दुराचारोंकी अत्यधिक वृद्धि हो जाना।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

वह जन्म कब और किसलिये होता है सो कहते हैं हे भारत वर्णाश्रम आदि जिसके लक्षण हैं एवं प्राणियोंकी उन्नति और परम कल्याणका जो साधन है उस धर्मकी जबजब हानि होती है और अधर्मका अभ्युत्थान अर्थात् उन्नति होती है तबतब ही मैं मायासे अपने स्वरूपको रचता हूँ।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यदीश्वरस्य मायानिबन्धनं जन्मेत्युक्तं तस्य प्रश्नपूर्वकं कालं कथयति तच्चेत्यादिना। चातुर्वर्ण्ये चातुराश्रम्ये च यथावदनुष्ठीयमाने नास्ति धर्महानिरिति मन्वानो विशिनष्टि वर्णेति। वर्णैराश्रमैस्तदाचारैश्च लक्ष्यते ज्ञायते धर्मस्तस्येति यावत्। धर्महानौ समस्तपुरुषार्थभङ्गो भवतीत्यभिप्रेत्याह प्राणिनामिति। नच यथोक्तस्य धर्मस्य हानिं सोढुं शक्तो भवानित्याह भारतेति। न केवलं प्राणिनां धर्महानिरेव भगवतो मायाविग्रहस्य परिग्रहे हेतुरपि तु तेषामधर्मप्रवृत्तिरपीत्याह अभ्युत्थानमिति। यदा यदेति पूर्वेण संबन्धः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं सर्वज्ञः सर्वेश्वरोऽशरीरी त्वं कदा किमर्थं देहवानिव जात इव प्रतीयस इत्यत आह यदेति। ग्लानिर्हानिः। अभ्युत्थानं वृद्धिः। भरतवंशोद्भवत्वेन धर्महानिं कर्तुमयोग्योऽसीति सूचयन्नाह भारतेति। त्वमपि धर्मसंस्थापनायैभरतवंशेऽवतीर्णोऽसीति गूढाभिप्रायेण वा संबोधयति भारतेति। मायया आत्मानं स्वं सृजामि जन्मवन्तमिव प्रदर्शयामि। आत्मानं देहं सृजामि नित्यसिद्धमेव सृष्टमिव प्रदर्शयामीति केचित्। तन्न। परमेश्वरस्य देहः किं तस्मादन्य उतानन्यः। नाद्यः। तस्यासत्त्वाद्यापत्त्या सच्चिदादिरुपत्वस्वीकारविरोधात्। द्वितीयेऽपि स देहः किं परिच्छिन्न उतापरिच्छिन्नः। आद्ये ईश्वरस्य नित्यमेव परिच्छिन्नत्वं स्यात्। तथाच देहस्य नित्यसिद्धत्वं वदद्भिः परमेश्वरस्यासत्त्वसंपादनेन मूलोच्छेद एव संपादितः। न द्वितीयः। अपरिच्छिन्नः पुनरवयवसमूहः परिमिताकारो देह इति वदतो व्याघातात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yadā yadāwhenever
hicertainly
dharmasyaof righteousness
glāniḥdecline
bhavatiis
bhārataArjun, descendant of Bharat
abhyutthānamincrease
adharmasyaof unrighteousness
tadāat that time
ātmānamself
sṛijāmimanifest
ahamI
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.6
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया

मैं अजन्मा और अविनाशी-स्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे

साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 7
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्

हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 7?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 7 translates to: "Whenever there is a decline of righteousness and an increase of unrighteousness, O Arjuna, then I manifest Myself. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata" mean in English?

"yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 7. Whenever there is a decline of righteousness and an increase of unrighteousness, O Arjuna, then I manifest Myself. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.