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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 39
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति

जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

நம்பிக்கை நிரம்பியவர், அதில் அர்ப்பணிப்புடன், புலன்களை அடக்கியவர் இந்த அறிவைப் பெறுகிறார்; அறிவைப் பெற்றவுடன், அவர்கள் உடனடியாக உயர்ந்த அமைதியை அடைகிறார்கள்.

MalayalamIND

വിശ്വാസത്തിൽ മുഴുകിയവനും അതിൽ അർപ്പണമനോഭാവമുള്ളവനും ഇന്ദ്രിയങ്ങളെ കീഴടക്കിയവനും ഈ അറിവ് നേടുന്നു; അറിവ് ലഭിച്ചാൽ, അവർ പരമമായ സമാധാനം ഉടനടി പ്രാപിക്കുന്നു.

KannadaIND

ನಂಬಿಕೆಯಿಂದ ತುಂಬಿದವನು, ಅದಕ್ಕೆ ಸಮರ್ಪಿತ ಮತ್ತು ಇಂದ್ರಿಯಗಳನ್ನು ನಿಗ್ರಹಿಸಿದವನು ಈ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ; ಮತ್ತು ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಪಡೆದ ನಂತರ, ಅವರು ತಕ್ಷಣವೇ ಪರಮ ಶಾಂತಿಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾರೆ.

TeluguIND

విశ్వాసంతో నిండినవాడు, దానికి అంకితం చేసి, ఇంద్రియాలను నిగ్రహించుకున్నవాడు ఈ జ్ఞానాన్ని పొందుతాడు; మరియు జ్ఞానాన్ని పొందిన తరువాత, వారు వెంటనే పరమ శాంతిని పొందుతారు.

OdiaIND

ଯିଏ ବିଶ୍ୱାସରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ଏହାକୁ ସମର୍ପିତ, ଏବଂ ସେମାନଙ୍କର ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକୁ ବଶୀଭୂତ କରେ, ସେ ଏହି ଜ୍ଞାନ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ; ଏବଂ ଜ୍ଞାନ ପାଇବା ପରେ, ସେମାନେ ତୁରନ୍ତ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଶାନ୍ତି ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି |

ManipuriIND

ꯊꯥꯖꯕꯅꯥ ꯊꯜꯂꯕꯥ, ꯃꯁꯤꯗꯥ ꯀꯠꯊꯣꯛꯂꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯏꯟꯗ꯭ꯔꯤꯁꯤꯡꯕꯨ ꯃꯈꯥ ꯇꯥꯅꯥ ꯂꯧꯁꯤꯜꯂꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯖ꯭ꯅꯥꯟ ꯑꯁꯤ ꯐꯪꯏ; ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯐꯪꯂꯕꯥ ꯃꯇꯨꯡꯗꯥ ꯃꯈꯣꯌꯅꯥ ꯈꯨꯗꯛꯇꯥ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯁꯥꯟꯇꯤ ꯐꯪꯏ꯫

AssameseIND

যি বিশ্বাসেৰে পৰিপূৰ্ণ, ইয়াৰ প্ৰতি নিষ্ঠাৱান আৰু তেওঁলোকৰ ইন্দ্ৰিয়ক বশ কৰি ৰাখিছে, তেওঁ এই জ্ঞান লাভ কৰে; আৰু জ্ঞান লাভ কৰাৰ লগে লগে তেওঁলোকে পৰম শান্তি লাভ কৰে।

BhojpuriIND

जे आस्था से भरल बा, ओकरा में समर्पित बा आ ओह लोग के इंद्रियन के वश में कर लिहले बा, ओकरा ई ज्ञान मिल जाला; आ ज्ञान प्राप्त कइला पर तुरते परम शांति के प्राप्ति हो जाला।

BengaliIND

যে বিশ্বাসে পূর্ণ, ভক্তি করে এবং ইন্দ্রিয়কে বশীভূত করে সে এই জ্ঞান লাভ করে; এবং জ্ঞান লাভের সাথে সাথে তারা পরম শান্তি লাভ করে।

DogriIND

जो आस्था नाल भरा होवे, उस विच समर्पित होवे, ते उन्हां दे इंद्रियां नू वश विच कर गिआ है, उस नूं इह ज्ञान मिलदा है; ते ज्ञान हासल करने पर गै उनेंगी तुरत परम शांति हासल होई जंदी ऐ।

MaithiliIND

जे श्रद्धा सँ भरल अछि, ओहि मे समर्पित अछि, आ अपन इन्द्रिय केँ वश मे क' लेने अछि, ओकरा ई ज्ञान भेटैत छैक; आ ज्ञान प्राप्त भेला पर तुरन्त परम शान्ति प्राप्त करैत छथि |

MarathiIND

जो श्रद्धेने परिपूर्ण आहे, भक्ती करतो आणि आपल्या इंद्रियांना वश केला आहे त्याला हे ज्ञान प्राप्त होते; आणि ज्ञान मिळाल्यावर त्यांना परमशांतीची लगेच प्राप्ती होते.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.39।। व्याख्या--तत्परः संयतेन्द्रियः--इस श्लोकमें श्रद्धावान् पुरुषको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयीहै। अपनेमें श्रद्धा कम होनेपर भी मनुष्य भूलसे अपनेको अधिक श्रद्धावाला मान सकता है, इसलिये भगवान्ने श्रद्धाकी पहचानके लिये दो विशेषण दिये हैं 'संयतेन्द्रियः' और तत्परः।जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया वशमें हैं, वह 'संयतेन्द्रियः' है और जो अपने साधनमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ है वह 'तत्परः' है। साधनमें तत्परताकी कसौटी है--इन्द्रियोंका संयत होना। अगर इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और विषय-भोगोंकी तरफ जाती हैं, तो साधन-परायणतामें कमी समझनी चाहिये।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जिसके द्वारा निश्चय ही ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है वह उपाय बतलाया जाता है श्रद्धावान् श्रद्धालु मनुष्य ज्ञान प्राप्त किया करता है। श्रद्धालु होकर भी तो कोई मन्द प्रयत्नवाला हो सकता है इसलिये कहते हैं कि तत्पर अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके गुरुशुश्रूषादि उपायोंमें जो अच्छी प्रकार लगा हुआ हो। श्रद्धावान् और तत्पर होकर भी कोई अजितेन्द्रिय हो सकता है इसलिये कहते हैं कि संयतेन्द्रिय भी होनाचाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हों यानी विषयोंसे निवृत्त कर ली गयी हों वह संयतेन्द्रिय कहलाता है। जो इस प्रकार श्रद्धावान् तत्पर और संयतेन्द्रिय भी होता है वह अवश्य ही ज्ञानको प्राप्त कर लेता है। जो दण्डवत्प्रणामादि उपाय हैं वे तो बाह्य हैं और कपटी मनुष्यद्वारा भी किये जा सकते हैं इसलिये वे ( ज्ञानरूप फल उत्पन्न करनेमें ) अनिश्चित भी हो सकते हैं। परंतु श्रद्धालुता आदि उपायोंमें कपट नहीं चल सकता इसलिये ये निश्चयरूपसे ज्ञानप्राप्तिके उपाय हैं। ज्ञानप्राप्तिसे क्या होगा सो ( उत्तरार्धमें ) कहते हैं ज्ञानको प्राप्त होकर मनुष्य मोक्षरूप परम शान्तिको यानी उपरामताको बहुत शीघ्रतत्काल ही प्राप्त हो जाता है। यथार्थ ज्ञानसे तुरंत ही मोक्ष हो जाता है यह सब शास्त्रों और युक्तियोंसे सिद्ध सुनिश्चित बात है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

कर्मयोगेन समाधियोगेन च संपन्नस्य ज्ञानोत्पत्तावन्तरङ्गं साधनमुपदिशति येनेति। ज्ञानलाभप्रयोजनमाह ज्ञानमिति। न केवलं श्रद्धालुत्वमेवासहायं ज्ञानलाभे हेतुरपि तु तात्पर्यमपीत्याह श्रद्धालुत्वेऽपीति। मन्दप्रस्थानत्वं तात्पर्यविधुरत्वं नच तस्योपदिष्टमपि ज्ञानमुत्पत्तुमीष्टे तेन तात्पर्यमपि तत्र कारणं भवतीत्याह अत आहेति। अभियुक्तो निष्ठावान् उपासनादावित्यादिशब्देन श्रवणादि गृह्यते। नच श्रद्धा तात्पर्यं चेत्युभयमेव ज्ञानकारणं किंतु संयतेन्द्रियत्वमपि तदभावे श्रद्धादेरकिंचित्करत्वादित्याशयेनाह श्रद्धावानिति। उक्तसाधनानां ज्ञानेन सहैकान्तिकत्वमाह य एवंभूत इति।तद्विद्धि प्रणिपातेन इत्यादौ प्रागेव प्रणिपातादेर्ज्ञानहेतोरुक्तत्वात्किमितीदानीं हेत्वन्तरमुच्यते तत्राह प्रणिपातादिस्त्विति। तद्धि बहिरङ्गमिदं पुनरन्तरङ्गं नच तत्र ज्ञाने प्रतिनियमो मनस्यन्यथा कृत्वा बहिरन्यथाप्रदर्शनात्मनो मायावित्वस्य संभवाद्विप्रलम्भकत्वादेरपि संभावनोपनीतत्वादित्यर्थः। मायावित्वादेः श्रद्धावत्त्वतात्पर्यादावपि संभवादनैकान्तिकत्वमविशिष्टमित्याशङ्क्याह नत्विति। नहि मायया विप्रलम्भेन वा श्रद्धातात्पर्यसंयमाभियोगतोऽनुष्ठातुमर्हन्तीत्यर्थः। उत्तरार्धं प्रश्नपूर्वकमवतार्य व्याकरोति किंपुनरित्यादिना। सम्यग्ज्ञानादभ्यासादिसाधनानपेक्षान्मोक्षो भवतीत्यत्र प्रमाणमाह सम्यग्दर्शनादिति। शास्त्रशब्देनतमेव विदित्वाज्ञानादेव तु कैवल्यम् इत्यादि विवक्षितम् न्यायस्तु ज्ञानादज्ञानविवृत्ते रज्ज्वादौप्रसिद्धत्वादात्मज्ञानादपि निरपेक्षादज्ञानतत्कार्यप्रक्षयलक्षणो मोक्षः स्यादित्येवंलक्षणः।

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Sri Dhanpati

योगेन योग्यतामापन्नस्य येनैकान्तेन तत्त्वज्ञानं भवति तमुपायमाह श्रद्धावानिति। गुरुवेदान्तवाक्येष्विदमित्थमित्यास्तिक्यं श्रद्धा तद्वान्। तत्रापि तत्परः गुरुपासनादावभियुक्तः। तत्रापि संयतानि विषयेभ्यो निवर्तितानि इन्द्रियाणि येन सः। एवं विशेषणत्रयविशिष्टश्चेदवश्यं ज्ञानं लभते। प्रणिपातादेर्माययापि संभवेन नैकान्तिकत्वमेतेषां न तथात्वमत एकान्तिकं ज्ञानं लब्धवा किं स्यादत आह। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिं मोक्षाभिधामचिरेण जन्मान्तरं लोकान्तरगमनं च विनैवाधिगच्छति प्राप्नोति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhraddhāvān
labhateachieves
jñānamdivine knowledge
tatparaḥ
sanyatacontrolled
indriyaḥsenses
jñānamtranscendental knowledge
labdhvāhaving achieved
parāmsupreme
śhāntimpeace
achireṇawithout delay
adhigachchhatiattains
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.38
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति

इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.40
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 39
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 39
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति

जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 39 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 39 का हिंदी अर्थ: "जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39 translates to: "The one who is full of faith, devoted to it, and has subdued their senses obtains this knowledge; and upon obtaining the knowledge, they attain the supreme peace immediately. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाध" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 39 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhraddhāvān labhate jñānaṁ tat-paraḥ sanyatendriyaḥ" mean in English?

"śhraddhāvān labhate jñānaṁ tat-paraḥ sanyatendriyaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39. The one who is full of faith, devoted to it, and has subdued their senses obtains this knowledge; and upon obtaining the knowledge, they attain the supreme peace immediately. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.