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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 36
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि

अगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

எல்லாப் பாவிகளிலும் நீ மிகப் பாவம் செய்தவனாக இருந்தாலும், அறிவின் தோகையால் எல்லாப் பாவங்களையும் நிச்சயமாகக் கடப்பாய்.

GujaratiIND

જો તમે બધા પાપીઓમાં સૌથી વધુ પાપી છો, તો પણ તમે ચોક્કસપણે જ્ઞાનના તરાપા દ્વારા બધા પાપોને પાર કરી શકશો.

PunjabiIND

ਭਾਵੇਂ ਤੂੰ ਸਭਨਾਂ ਪਾਪੀਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਪਾਪੀ ਹੈਂ, ਫਿਰ ਵੀ ਤੂੰ ਗਿਆਨ ਦੇ ਬੇੜੇ ਦੁਆਰਾ ਸਾਰੇ ਪਾਪਾਂ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇਂਗਾ।

MalayalamIND

നീ എല്ലാ പാപികളിലും ഏറ്റവും പാപി ആണെങ്കിൽ പോലും, അറിവിൻ്റെ ചങ്ങാടത്താൽ നീ എല്ലാ പാപങ്ങളെയും മറികടക്കും.

TeluguIND

నీవు పాపాత్ములందరిలో అత్యంత పాపాత్ముడివి అయినప్పటికీ, జ్ఞానమనే తెప్ప ద్వారా మీరు ఖచ్చితంగా అన్ని పాపాలను దాటిపోతారు.

SindhiIND

جيتوڻيڪ تون سڀني گنھگارن کان وڌيڪ گنھگار آھين، پر توھان ضرور ضرور ڄاڻ جي راھ ذريعي سڀني گناھن کان پار ٿي ويندا.

MarathiIND

जरी तू सर्व पाप्यांपैकी सर्वात पापी असलास तरीही तू ज्ञानाच्या तराफेने सर्व पापांना नक्कीच ओलांडशील.

OdiaIND

ଯଦିଓ ତୁମେ ସମସ୍ତ ପାପୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ସବୁଠାରୁ ପାପୀ, ତଥାପି ତୁମେ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ସମସ୍ତ ପାପକୁ ଜ୍ଞାନର ଅତିକ୍ରମ କରିବ |

BengaliIND

আপনি যদি সমস্ত পাপীদের মধ্যে সবচেয়ে পাপী হন, তবুও আপনি অবশ্যই জ্ঞানের ভেলা দ্বারা সমস্ত পাপ অতিক্রম করবেন।

NepaliIND

तपाईं सबै पापीहरू भन्दा धेरै पापी भए पनि, तैपनि तपाईंले ज्ञानको तराफाद्वारा सबै पापहरू पार गर्नुहुनेछ।

KannadaIND

ನೀನು ಎಲ್ಲಾ ಪಾಪಿಗಳಲ್ಲಿ ಅತ್ಯಂತ ಪಾಪಿಯಾಗಿದ್ದರೂ ಸಹ, ಜ್ಞಾನದ ತೆಪ್ಪದಿಂದ ನೀವು ಖಂಡಿತವಾಗಿಯೂ ಎಲ್ಲಾ ಪಾಪಗಳನ್ನು ದಾಟುವಿರಿ.

BhojpuriIND

भले ही तू सब पापी में सबसे पापी होखब, लेकिन तू ज्ञान के बेड़ा से सब पाप के पार जरूर करब।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः'-- पाप करनेवालोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं (1) 'पापकृत्' अर्थात् पाप करनेवाला, (2) 'पापकृत्तर' अर्थात् दो पापियोंमें एकसे अधिक पाप करनेवाला और (3) 'पापकृत्तम' अर्थात् सम्पूर्ण पापियोंमें सबसे अधिक पाप करनेवाला। यहाँ 'पापकृत्तमः' पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि अगर तू सम्पूर्ण पापियोंमें भी अत्यन्त पाप करनेवाला है, तो भी तत्त्वज्ञानसे तू सम्पूर्ण पापोंसे तर सकता है।भगवान्का यह कथन बहुत आश्वासन देनेवाला है। तात्पर्य यह है कि जो पापोंका त्याग करके साधनमें लगा हुआ है, उसका तो कहना ही क्या है! पर जिसने पहले बहुत पाप किये हों, उसको भी जिज्ञासा जाग्रत् होनेके बाद अपने उद्धारके विषयमें कभी निराश नहीं होना चाहिये। कारण कि पापी-से-पापी मनुष्य भी यदि चाहे तो इसी जन्ममें अभी अपना कल्याण कर सकता है। पुराने पाप उतने बाधक नहीं होते, जितने वर्तमानके पाप बाधक होते हैं। अगर मनुष्य वर्तमानमें पाप करना छोड़ दे और निश्चय कर ले कि अब मैं कभी पाप नहीं करूँगा और केवल तत्त्वज्ञानको प्राप्त करूँगा, तो उसके पापोंका नाश होते देरी नहीं लगती।यदि कहीं सौ वर्षोंसे घना अँधेरा छाया हो और वहाँ दीपक जला दिया जाय, तो उस अँधेरेको दूर करके प्रकाश करनेमें दीपकको सौ वर्ष नहीं लगते, प्रत्युत दीपक जलाते ही तत्काल अँधेरा मिट जाता है। इसी तरह तत्त्वज्ञान होते ही पहले किये गये सम्पूर्ण पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।'चेत्'--(यदि) पद देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः ऐसे पापी मनुष्य परमात्मामें नहीं लगते; परन्तु वे परमात्मामें लग नहीं सकते--ऐसी बात नहीं है। किसी महापुरुषके सङ्गसे अथवा किसी घटना, परिस्थिति, वातावरण आदिके प्रभावसे यदि उनका ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय कि अब परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना ही है, तो वे भी सम्पूर्ण पापसमुद्रसे भलीभाँति तर जाते हैं।नवें अध्यायके तीसवें-इकतीसवें श्लोकोंमें भी भगवान् ऐसी ही बात अनन्यभावसे अपना भजन करनेवालेके लिये कही है कि महान् दुराचारी मनुष्य भी अगर यह निश्चय कर ले कि अब मैं भगवान्का भजन ही करूँगा, तो उसका भी बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस ज्ञान का माहात्म्य क्या है ( सो सुन ) यदि तू पाप करने वाले सब पापियों से अधिक पाप करनेवाला अति पापी भी है तो भी ज्ञानरूप नौका द्वारा अर्थात् ज्ञान को ही नौका बनाकर समस्त पापरूप समुद्रसे अच्छी तरह पार उतर जायगा। यहाँ मुमुक्षु के लिये धर्म भी पाप ही कहा जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

ज्ञानस्य प्रकारान्तरेण प्रशंसां प्रस्तौति किञ्चेति। पापकारिभ्यः सर्वेभ्यः सकाशादतिशयेन पापकारित्वमेकस्मिन्नसंभावितमपि ज्ञानमाहात्म्यप्रसिद्ध्यर्थमङ्गीकृत्य ब्रवीति अपिचेदिति। ब्रह्मात्मैक्यज्ञानस्य सर्वपापनिवर्तकत्वेन माहात्म्यमिदानीं प्रकटयति सर्वमिति। अधर्मे निवृत्तेऽपि धर्मप्रतिबन्धाज्ज्ञानवतोऽपि मोक्षः संभवतीत्याशङ्क्याह धर्मोऽपीति। इहेत्यध्यात्मशास्त्रं गृह्यते।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

किंच न केवलमेतावदेव किंत्वन्यज्ज्ञानमाहात्म्यमपि श्रृण्वित्याह अपिचेदिति। असंभाविताभ्युपगमार्थं निपातद्वयम्। यदिचेत्त्वं सर्वेभ्यः पापकृद्यभोऽतिशयेन पापकृदसि तथापि ज्ञानमेव प्लवं पोतं तरणसाधनं कृत्वा वृजिनार्णवं धर्माधर्मरुपदुःखसमुद्रं तरिष्यसि। मुमुक्षुं प्रति पुण्यस्यापि वृजिनरुपत्वात्। तथाच श्रुतिःतथा सयोऽहमां वेद न ह वै तस्य केनच न कर्मणा लोको मीयते न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया न साधुना कर्मणा भूयान् भवति नो एवासाधुना कनीयान् त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्सालावृकेभ्यः प्रायच्छम् इत्याद्या।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
apieven
chetif
asiyou are
pāpebhyaḥsinners
sarvebhyaḥof all
pāpakṛit
sarvamall
jñānaplavena
evacertainly
vṛijinamsin
santariṣhyasiyou shall cross over
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हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सर्वथा भस्म कर देती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 36
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अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि

अगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 36 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 36 का हिंदी अर्थ: "अगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36 translates to: "Even if thou art the most sinful of all sinners, yet thou shalt surely cross over all sins by the raft of knowledge. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 36 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। अगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "api ched asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛit-tamaḥ" mean in English?

"api ched asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛit-tamaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36. Even if thou art the most sinful of all sinners, yet thou shalt surely cross over all sins by the raft of knowledge. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.