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Bhagavad Gita · BG 4.26

Bhagavad Gita 4.26 — Commentary

20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति

śhrotrādīnīndriyāṇyanye sanyamāgniṣhu juhvati śhabdādīn viṣhayānanya indriyāgniṣhu juhvati

"Some again offer the organ of hearing and other senses as a sacrifice in the fire of restraint; others offer sound and other objects of the senses as a sacrifice in the fire of the senses."

Scholar Commentaries (20)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि अन्ये योगिनः संयमाग्निषु। प्रतीन्द्रियं संयमो भिद्यते इति बहुवचनम्। संयमा एव अग्नयः तेषु जुह्वति इन्द्रियसंयममेव कुर्वन्ति इत्यर्थः। शब्दादीन् विषयान् अन्ये इन्द्रियाग्निषु इन्द्रियाण्येव अगन्यः तेषु इन्द्रियाग्निषु जुह्वति श्रोत्रादिभिरविरुद्धविषयग्रहणं होमं मन्यन्ते।।किञ्च

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

अन्ये श्रोत्रादीनाम् इन्द्रियाणां संयमने प्रयतन्ते। शब्दादीन् विषयान् अन्ये योगिनः इन्द्रियाणां शब्दादिविषयप्रवणतानिवारणे प्रयतन्ते।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

सुपरिचित वैदिक यज्ञ के रूपक के द्वारा यहां सब यज्ञों अर्थात् साधनाओं का निरूपण अर्जुन के लिये किया गया है। यज्ञ विधि में देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिये अग्नि में आहुतियाँ दी जाती थीं। इस रूपक के द्वारा यह दर्शाया गया है कि इस विधि में न केवल आहुति भस्म हो जाती है बल्कि उसके साथ ही देवता का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। आत्मज्ञानी पुरुष अथवा साधकगण श्रोत्रादि इन्द्रियों की आहुति संयमाग्नि में देते हैं अर्थात् वे आत्मसंयम का जीवन जीते हैं। इस प्रकार इन्द्रियों की बहिर्मुखी प्रवृत्ति भस्म हो जाती है और साधक को आन्तरिक स्वातन्त्र्य का आनन्द भी प्राप्त होता है। यह एक सुविदित तथ्य है कि इन्द्रियों को जितना अधिक सन्तुष्ट रखने का प्रयत्न हम करते हैं वे उतनी ही अधिक प्रमथनशील होकर हमारी शान्ति को लूट ले जाती हैं। आत्मसंयम की साधना के अभ्यास के द्वारा ही साधक को ध्यान की योग्यता प्राप्त होती हैं।इस श्लोक की प्रथम पंक्ति में इन्द्रिय संयम का उपदेश है तो दूसरी पंक्ति में मनसंयम का। इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों की संवेदनाएं प्राप्त करके ही मन का अस्तित्व बना रहता है। जहां शब्दस्पर्शादि पाँच विषयों का ग्रहण नहीं होता वहां मन कार्य कर ही नहीं सकता। इसलिये विषयों से मन को अप्रभावित रखने की साधना यहां बतायी गयी है जिसके अभ्यास से ध्यानाभ्यास के लिये आवश्यक मन की स्थिरता प्राप्त की जा सकती है। जिस पुरुष ने मन को पूर्ण रूप से संयमित कर लिया है उसके विषय में भगवान् कहते हैं अन्य (साधक) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियाग्नि में आहुति देते हैं।प्रथम विधि में विषयों की संवेदनाओं को इन्द्रियों के प्रवेश द्वार पर ही संयमित किया जाता है जबकि दूसरी विधि में (अभ्यांतर में ) मन के सूक्ष्मतर स्तर पर उन्हें नियन्त्रित करने की साधना है।और भी दूसरे प्रकार के यज्ञ बताते हुए भगवान् कहते हैं

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

4.26 श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि organ of hearing and other senses? अन्ये others? संयमाग्निषु in the fire of restraint? जुह्वति sacrifice? शब्दादीन् विषयान् senseobjects such as sound? etc.? अन्ये others? इन्द्रियाग्निषु in the fire of the senses? जुह्वति sacrifice.Commentary Some Yogis are constantly engaged in restraining the senses. They gather their senses under the guidance of the Self and do not allow them to come in contact with the sensual objects. This is also an act of sacficie. Others direct their senses only to the pure and unforbidden objects of the senses. This is also a kind of sacrifice.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या--'श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति'--यहाँ संयमरूप अग्नियोंमें इन्द्रियोंकी आहुति देनेको यज्ञ कहा गया है। तात्पर्य यह है कि एकान्तकालमें श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्रा--ये पाँचों इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों (क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) की ओर बिलकुल प्रवृत्त न हों। इन्द्रियाँ संयमरूप ही बन जायँ। पूरा संयम तभी समझना चाहिये, जब इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा अहम्--इन सबमेंसे रागआसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय (गीता 2। 58 59 68)। 'शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति'--शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँच विषय हैं। विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन करनेसे वह यज्ञ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि व्यवहारकालमें विषयोंका इन्द्रियोंसे संयोग होते रहनेपर भी इन्द्रियोंमें कोई विकार उत्पन्न न हो (गीता 2। 64 65)। इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित हो जायँ। इन्द्रियोंमें राग-द्वेष उत्पन्न करनेकी शक्ति विषयोंमें रहे ही नहीं।इस श्लोकमें कहे गये दोनों प्रकारके यज्ञोंमें राग-आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेपर ही सिद्धि (परमात्म-प्राप्ति) होती है। राग-आसक्तिको मिटानेके लिये ही दो प्रकारकी प्रक्रियाका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है--

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

अन्य योगीजन संयमरूप अग्नियोंमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं। संयम ही अग्नियाँ हैं उन्हींमें हवन करते हैं अर्थात् इन्द्रियोंका संयम करते हैं। प्रत्येक इन्द्रियका संयम भिन्नभिन्न है इसलिये यहाँ बहुवचनका प्रयोग किया गया है। अन्य ( साधकलोग ) इन्द्रियरूप अग्नियोंमें शब्दादि विषयोंका हवन करते हैं। इन्द्रियाँ ही अग्नियाँ हैं उन इन्द्रियाग्नियोंमें हवन करते हैं अर्थात् उन श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा शास्त्रसम्मत विषयोंके ग्रहण करनेको ही होम मानते हैं।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

संप्रति यज्ञद्वयमुपन्यस्यति श्रोत्रादीनीति। बाह्यानां करणानां मनसि संयमस्यैकत्वात्कथं संयमाग्निष्विति बहुवचनमित्याशङ्क्याह प्रतीन्द्रियमिति। संयमानां प्रत्याहाराधिकरणत्वेन व्यवस्थितानां मनोरूपाणां होमाधारत्वादग्नित्वं व्यपदिशति संयमा इति। विषयेभ्योऽन्तर्बाह्यानीन्द्रियाणि प्रत्याहरन्तीति संयमयज्ञं संक्षिप्य दर्शयति इन्द्रियेति। श्रोत्रादीन्द्रियाग्निषु शब्दादिविषयहोमस्य तत्तदिन्द्रियैस्तत्तद्विषयोपभोगलक्षणस्य सर्वसाधारणत्वमाशङ्क्य प्रतिषिद्धान्वर्जयित्वा रागद्वेषरहितो भूत्वा प्राप्तान्विषयानुपभुञ्जते तैस्तैरिन्द्रियैरिति विवक्षितं होमं विशदयति श्रोत्रादिभिरिति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाण्यन्ये योगिनः प्रत्याहारपराः प्रतीन्द्रियं संयम्यप्रत्याहारस्य सत्त्वाद्बहुवचनम्। संयमा एवाग्नयस्तेषु जुह्वति। इन्द्रियसंयमनमेव कुर्वन्तीत्यर्थः। यत्तु धारणाध्यानसमाधित्रितयमेकविषयं संयमशब्देनोच्यते तत्र हृत्पुण्डरीकादौ मनसश्चिरकालस्थापनं धारणा। एवमेकत्र धृतस्य चित्तस्य भगवदाकारवृत्तिप्रवाहोऽन्तरान्तराऽन्याकारप्रत्ययव्यवहितो ध्यानम्। सर्वथा विजातीय प्रत्ययानन्तरितः सजातीयप्रत्ययप्रवाहः समाधिः अनेन रुपेण संयमानां भेदात् अग्निष्विति बहुवचनं तेष्विन्द्रियाणि जुह्वति धारणाध्यानसमाधिसिद्य्धर्थं सर्वाणीन्द्रियाणि स्वस्वविषयेभ्यः प्रत्याहरन्तीत्यर्थ इत्यादि तच्चिन्त्यम्। प्रत्याहाररुपेष्वग्निषु श्रोत्रादीन्द्रियाणां होमस्यात्र विवक्षितत्वादन्यथा होमाधिकरणस्यालाभात् ध्यानादीनां तु मनोहोमाधिकरणत्वादिति दिक्। एतेन तदनेन प्रत्याहारध्यानधारणासमाधिरुपं योगाङ्गचतुष्टयमुक्तमिति प्रत्युक्तम्। प्रत्याहारस्यैवात्राक्षरस्वारस्यात्प्रतीतेः। अतएव तत्र कंचित् बाह्यमाभ्यन्तरं वा विशेषमुपादाय तत्र चेतसो नियमनं क्रियते। ते च संयमा अनेकविषयत्वादनेके पृथक्फलाश्च। तथाच योगसूत्रकृता प्रोक्तंभुवनज्ञानं सूर्यें संयमात् चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानं कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः इत्यादीति परास्तम्। अन्ये तत्त्वविदः प्रारब्धवशादुपलब्धान् शब्दादीन् शास्त्राविरुद्धान्विषयान् इन्द्रियाग्निषु जुह्वति श्रोत्रादिभिरविरुद्धविषयग्रहणं होमं मन्यन्त इत्यर्थः। यत्तु तथान्ये विषयेभ्यः प्रत्याहृतकरणाः धारणाध्यानसमाध्यात्मकं मनसः संयममेकत्र मूलाधाराद्यन्यतमचक्रे कर्तुमशक्ताः समनस्केन्द्रियेषु विषयवियोगाद्दग्धेन्धनानलवत्स्वयं विलीनेषु येषां समाधिबुद्धिस्तैः समनस्केन्द्रियेषु विषया एवोपसंहृता इत्याद्यन्ये समनस्केन्द्रियेषु विषयवियोगाद्दग्धेन्धनानलवत्स्वयं विलीनेषु येषां समाधिबुद्धिस्तैः समनस्केन्द्रियेषु विषया एवोपसंहृता इत्याद्यन्ये वर्णयन्ति तदसत्। इन्द्रियप्रत्याहाररुपस्य यज्ञस्य श्रोत्रादीनीत्यादिनोक्तत्वेन यज्ञान्तरत्वाभावप्रसङ्गात्। उक्तरीत्या विषयासन्निकर्षाग्नौ इन्द्रियाणि जुह्वतीति वक्तव्यत्वापत्तेश्चेति दिक्।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

यज्ञान्तरमाह श्रोत्रादीनीति। तत्र कंचिद्बाह्यमाभ्यन्तरं वा विशेषमुपादाय तत्र चेतसो नियमनं क्रियते। ते च संयमा अनेकविषयत्वादनेके पृथक्फलाश्च। तथा च योगसूत्रकृता प्रोक्तम्भुवनज्ञानं सूर्ये संयमाच्चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानं कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्ति रित्यादि। त एवाग्नय इन्द्रियेन्धनसंहारहेतुत्वात् तेषु संयमाग्निषु श्रोत्रादीनि जुह्वति प्रक्षिपन्ति। तत्र श्रोत्रमनाहते ध्वनौ संनियम्य हंसोपनिषदुक्तरीत्या घण्टानादादीन्दशनादाननुभवन्ति। नहि तत्र सन्नियते चेतसि शब्दान्तरग्रहणं तदा भवति सोऽयं श्रोत्रस्य संयमाग्नौ होमो बोध्यः। एवमन्यत्रापि तद्वारा च निष्कलं तत्त्वं प्रतिपद्यन्ते। तथान्ये विषयेभ्यः प्रत्याहृतकरणाः धारणाध्यानसमाध्यात्मकं मनसः संयमं एकत्र मूलाधाराद्यन्यतमचक्रे कर्तुमशक्ताः समनस्केन्द्रियेषु विषयवियोगाद्दग्धेन्धनानलवत्स्वयं विलीनेषु येषां समाधिबुद्धिस्तैरिन्द्रियेषु विषया एवोपसंहृता न त्विन्द्रियादीनि मन आदिषु पूर्वोक्तरीत्या उपसंहृतानि। तानेतानिन्द्रियचिन्तकान्प्रकृत्योक्तं वायवीयेदशमन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः इति।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

श्रोत्रादीनीति। अन्ये नैष्ठिकब्रह्मचारिणस्तत्तदिन्द्रियसंयमरूपेष्वग्निषु श्रोत्रादीनि जुह्वति प्रविलापयन्ति। इन्द्रियाणि निरुध्य संयमप्रधानास्तिष्ठन्तीत्यर्थः। इन्द्रियाण्येवाग्नयस्तेषु शब्दादीनन्ये गृहस्था जुह्वति विषयान्। भोगसमयेऽप्यनासक्ताः सन्तोऽग्नित्वेन भावितेष्विन्द्रियेषु हविष्ट्वेन भाविताञ्शब्दादीन्प्रक्षिपन्तीत्यर्थः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

श्रोत्रादीनि इत्यत्र संयमस्य साक्षादग्नित्वाभावाच्छ्रोत्रादेश्च होतव्यत्वाभावात्तात्पर्यमाह अन्य इति। संयमस्याग्नित्वं श्रोत्रादीनां निर्व्यापारत्वलक्षणभस्मसात्करणात्। नन्विन्द्रियनियमनमपि सर्वकर्मयोगिसाधारणं कथमत्र विशिष्योच्यते इत्यत्रोक्तंसंयमने प्रयतन्त इति एवमुत्तरत्रापिप्रयतन्ते इत्यनयोस्तात्पर्यं ग्राह्यम्। तथा निष्ठाशब्देऽपि। अत्र प्रतीन्द्रियं संयमभेदात्संयमाग्निषु इति बहुवचनम्।शब्दादीन् इत्यत्र इन्द्रियेषु शब्दादिविषयान् समर्पयन्तीति भ्रमव्युदासायाहइन्द्रियाणां शब्दादिविषयप्रवणतानिवारण इति। इन्द्रियाणां नियमनं हिश्रोत्रादीनि इत्यादिनोक्तम् अत्र तु इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः कठो.1।3।10 इतिवद्विषयमनसोर्हि नियमनं क्रमेणोच्यते। विषयस्य नियमनं नाम दूरीकरणम् तत्सन्निधिपरिहार इति यावत्। तत एवेन्द्रियाणां तत्प्रवणता निवर्तत इति भावः। कस्तर्हीन्द्रियाग्निषु शब्दादेर्होमो नाम उच्यते होमेन हविषो विनाशः क्रियते तद्वदत्र शब्दादेरिन्द्रियेषु विनाशो नाम तत्सम्बन्धविनाशो विवक्षित इति। यद्वाश्रोत्रादीनि इत्यत्र विषयसन्निधिपरिहारो विवक्षितः इह तु सन्निहितानामपि विषयाणामकिञ्चित्करत्वापादनमिति विभागः।विषयप्रवणतानिवारण इत्यनेनात्यन्तसमस्तविषयनिवृत्तेर्दुष्करत्वान्निषिद्धादिभ्योऽत्यन्तनिवारणं धर्माविरुद्धेष्वतिसङ्गनिवृत्तिश्च विवक्षिता।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

श्रोत्रादीनीति। अन्ये तु संयमाग्निष्विन्द्रियाणीति। संयमः मनः तस्य ये अग्नयः प्रतिपन्नभावभावनारूपा अभिलाषप्लोषका विस्फुलिङ्गाः तेषु इन्द्रियाणि अर्पयन्ति। अत एव ते तपोयज्ञाः। इतरे ज्ञानपरिदीपितेषु फलदाहकेषु इन्द्रियाग्निषु विषयानर्पयन्ति भेदवासनानिरासायैव (K भोगवासना) भोगानभिलषन्ति इत्युपनिषत्। तथाच मयैव लघ्व्यां प्रक्रियायामुक्तम् न भोग्यं व्यतिरिक्तं हि भोक्तुस्त्वत्तो विभाव्यते।एष एव ही भोगो यत् तादात्म्यं भोक्तृभोग्ययोः।।4. इति स्पन्देऽपि ( omits स्पन्देऽपि and the succeeding hemistitch. ) भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः।इति।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

तदनेन मुख्यगौणौ द्वौ यज्ञौ दर्शितौ यावद्धि किंचिद्वैदिकं श्रेयःसाधनं तत्सर्वं यज्ञत्वेन संपाद्यते तत्र श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि तानि शब्दादिविषयेभ्यः प्रत्याहृत्यान्ये प्रत्याहारपराः संयमाग्निषु धारणा ध्यानं समाधिरिति त्रयमेकविषयं संयमशब्देनोच्यते। तथाचाह भगवान्तपतञ्जलिःत्रयमेकत्र संयमः इति। तत्र हृत्पुण्डरीकादौ मनसश्चिरकालस्थापनं धारणा। एवमेकत्र धृतस्य चित्तस्य भगवदाकारवृत्तिप्रवाहोऽन्तराऽन्याकारप्रत्ययव्यवहितो ध्यानम्। सर्वथा विजातीयप्रत्ययानन्तरितः सजातीयप्रत्ययप्रवाहः समाधिः। सतु चित्तभूमिभेदेन द्विविधः संप्रज्ञातोऽसंप्रज्ञातश्च। चित्तस्य हि पञ्च भूमयो भवन्ति क्षिप्तं मूढं विक्षिप्तमेकाग्रं निरुद्धमिति। तत्र रागद्वेषादिवशाद्विषयेष्वभिनिविष्टं क्षिप्तं तन्द्रादिग्रस्तं मूढं सर्वदा विषयासक्तमपि कदाचिद्ध्याननिष्ठं क्षिप्ताद्विशिष्टतया विक्षिप्तं तत्र क्षिप्तमूढयोः समाधिशङ्कैव नास्ति। विक्षिप्ते तु चेतसि कादाचित्कः समाधिर्विक्षेपप्राधान्याद्योगपक्षे न वर्तते किंतु तीव्रपवनविक्षिप्तप्रदीपवत्स्यमेव नश्यति। एकाग्रं तु एकविषयकधारावाहिकवृत्तिसमर्थं सत्त्वोद्रेकेण तमोगुणकृततन्द्रादिरूपलयाभावादात्माकारवृत्तिः। साच रजोगुणकृतचाञ्चल्यरूपविक्षेपाभावादेकविषयैवेति शुद्धे सत्त्वे भवति चित्तमेकाग्रम् अस्यां भूमौ संप्रज्ञातः समाधिः। तत्र ध्येयाकारा वृत्तिरपि भासते। तस्या अपि निरोधे निरुद्धं चित्तमसंप्रज्ञातसमाधिभूमिः। तदुक्तंतस्या अपि निरोधे सर्ववृत्तिनिरोधान्निर्बीजः समाधिः इति। अयमेव सर्वतो विरक्तस्य समाधिफलमपि सुखमनपेक्षमाणस्य योगिनो दृढभूमिः सन् धर्ममेघ इत्युच्यते। तदुक्तंप्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः इति। अनेन रूपेण संयमानां भेदादग्निष्विति बहुवचनम्। तेषु इन्द्रियाणि जुह्वति धारणाध्यानसमाधिसिद्ध्यर्थं सर्वाणीन्द्रियाणि स्वस्वविषयेभ्यः प्रत्याहरन्तीतत्यर्थः। तदुक्तं स्वस्वविषयासंप्रयोगे चित्तरूपानुकार एवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः इति। विषयेभ्यो निगृहीतानीन्द्रियाणि चित्तरूपाण्येव भवन्ति। ततश्च विक्षेपाभावाच्चित्तं धारणादिकं निर्वहतीत्यर्थः। तदनेन प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिरूपं योगाङ्गचतुष्टमुक्तम्। तदेवं समाध्यवस्थायां सर्वेन्द्रियवृत्तिनिरोधो यज्ञत्वेनोक्तः। इदानीं व्युत्थानावस्थायां रागद्वेषराहित्येन विषयभोगो यः सोऽप्यपरो यज्ञ इत्याह शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति। अन्ये व्युत्थितावस्थाः श्रोत्रादिभिरविरुद्धविषयग्रहणं स्पृहाशून्यत्वेनान्यसाधारणं कुर्वन्ति स एव तेषां होमः।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

अन्ये योगिनः श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि संयमाग्निषु जुह्वति।अयमर्थः योगेन मत्प्राप्तीच्छया प्राप्तिप्रतिबन्धकानीन्द्रियाणि निरोधात्मकक्लेशाग्नौ भस्मीकुर्वन्ति। अन्ये भक्तियुतयोगिनः शब्दादीन् विषयान् मत्कथाश्रवणादिरूपान् इन्द्रियाग्निषु भगवत्साक्षात्कारसाधकतयाऽऽत्मभावेनेन्द्रियेषु जुह्वति।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

श्रोत्रादीनिति। अन्ये नैष्ठिकाः संयमरूपेष्वग्निषु प्रविलापयन्ति। अन्ये उपकुर्वाणाः।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

4.26 Anye, others, other yogis; juhvati, offer; indriyani, the organs; viz srotradini, car etc.; samyama-agnisu, in the fires of self-control. The plural (in fires) is used because self-control is possible in respect of each of the organs. Self-control itself is the fire. In that they make the offering, i.e. they practise control of the organs. anye, others; juhvati, offer; visayan, the objects; sabdadin, viz sound etc.; indriyagnisu, in the fires of the organs. The organs themselves are the fires. They make offerings in those fires with the organs of hearing etc. They consider the perception of objects not prohibited by the scriputures to be a sacrifice.

Dr. S. Sankaranarayan

20th century CE · Academic / Shaiva

Shaiva

Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.

4.26 Srotradini etc. But others [offer] the sense-organs into the fires of the restrainer. Restrainer : the mind. Its fires are the tongues of flame that are in the form of subdued views of objects and are capable of burning up desires. Into them they offer the sense-organs. Hence, they are the performers of penance-sacrifices. Still others offer objects into the fires of sense-organs that are fully set-blaze by wisdom and that are capable of burning up the fruits [of actions]. I.e., they seek enjoyment only for destroying the [past] mental impression of differences [between the enjoyer and the objects of enjoyment]. This is the secret and sacred truth. Hence I (Ag.) have myself stated in the laghvi Prakriya (the Little Process) as : 'The object of enjoyment does not manifest as different from you, the enjoyer. Because, it is the [process of] enjoyment that itself is the identification (or unity) of hte enjoyer and the object of enjoyment'. In the [work] Spanda also [it has been said] : 'It is the enjoyer himself who remains in all the instances and at all times, in the form of the object of enjoyment'.

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

4.26 Others endeavour towards the restraint of the senses like ear and the rest, i.e., keep themselves away from the objects pleasing to the senses. Other Yogins endeavour to prevent the attachment of the senses to sound and other objects of the senses, i.e., they abstain from the sense objects even when they are allowed to be near, by the discriminative process of belittling their valure and enjoyable nature.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 4.26?

श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि अन्ये योगिनः संयमाग्निषु। प्रतीन्द्रियं संयमो भिद्यते इति बहुवचनम्। संयमा एव अग्नयः तेषु जुह्वति इन्द्रियसंयममेव कुर्वन्ति इत्यर्थः। शब्दादीन् विषयान् अन्ये इन्द्रियाग्निषु इन्द्रियाण्येव अगन्यः तेषु इन्द्रियाग्निषु जुह्वति श्रोत्रादिभिरविरुद्धविषयग्रहणं होमं मन्यन्ते।।किञ्च

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 4.26, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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