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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 22
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते

जो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

முயற்சியின்றி தனக்கு வருவதைப் பற்றிய உள்ளடக்கம், எதிரிகள் மற்றும் பொறாமைகளின் ஜோடிகளிலிருந்து விடுபட்டு, வெற்றி மற்றும் தோல்வியில் சமமான எண்ணத்துடன், அவர் இன்னும் செயல்படுகிறார்.

MarathiIND

कष्ट न करता जे त्याच्याकडे येते त्यात समाधानी, विरुद्ध आणि मत्सर यांच्या जोड्यांपासून मुक्त, यश-अपयशात समविचारी असलेला, तो कृती करतो तरीही त्याला बंधन नाही.

PunjabiIND

ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਦੇ ਉਸ ਨੂੰ ਜੋ ਵੀ ਮਿਲਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਵਿੱਚ ਸੰਤੁਸ਼ਟ, ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਅਤੇ ਈਰਖਾ ਦੇ ਜੋੜਿਆਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ, ਸਫਲਤਾ ਅਤੇ ਅਸਫਲਤਾ ਵਿੱਚ ਇੱਕ-ਸੁਰੱਖਿਅਤ, ਉਹ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਜੇ ਵੀ ਬੰਨ੍ਹਿਆ ਨਹੀਂ ਹੈ।

SindhiIND

بغير ڪنهن ڪوشش جي هن وٽ جيڪا شيءِ اچي ٿي، ان ۾ مواد، مخالفن ۽ حسد کان آزاد، ڪاميابي ۽ ناڪاميءَ ۾ هڪجهڙائي رکندڙ، هو عمل ڪري ٿو، اڃا به پابند نه آهي.

NepaliIND

प्रयास बिना उसलाई जे आउँछ त्यसमा सन्तुष्ट, विपरीत र ईर्ष्याको जोडीबाट मुक्त, सफलता र असफलतामा समान दिमागमा, उसले कार्य गर्दछ तर बाध्य छैन।

BengaliIND

পরিশ্রম ছাড়াই তার কাছে যা আসে তা নিয়ে তৃপ্তি, বিপরীত এবং ঈর্ষা থেকে মুক্ত, সাফল্য এবং ব্যর্থতায় সমমনা, সে কাজ করে তবুও আবদ্ধ নয়।

TeluguIND

ప్రయత్నం లేకుండా తనకు వచ్చిన దానితో కంటెంట్, వ్యతిరేకతలు మరియు అసూయల జోడి నుండి విముక్తి, విజయం మరియు అపజయాల గురించి కూడా ఆలోచించి, అతను ఇంకా కట్టుబడి ఉంటాడు.

KannadaIND

ಪ್ರಯತ್ನವಿಲ್ಲದೆ ತನಗೆ ಬಂದ ವಿಷಯದ ವಿಷಯವು, ವಿರೋಧಾಭಾಸಗಳು ಮತ್ತು ಅಸೂಯೆಗಳ ಜೋಡಿಗಳಿಂದ ಮುಕ್ತವಾಗಿ, ಯಶಸ್ಸು ಮತ್ತು ವೈಫಲ್ಯದಲ್ಲಿ ಸಹ-ಮನಸ್ಸಿನಿಂದ, ಅವನು ಇನ್ನೂ ವರ್ತಿಸುತ್ತಾನೆ.

MalayalamIND

അദ്ധ്വാനമില്ലാതെ അവനിലേക്ക് വരുന്ന കാര്യങ്ങളിൽ സംതൃപ്തനായി, എതിർപ്പുകളുടെയും അസൂയയുടെയും ജോഡികളിൽ നിന്ന് മുക്തനായി, വിജയത്തിലും പരാജയത്തിലും പോലും മനസ്സോടെ, അവൻ പ്രവർത്തിക്കുന്നു.

AssameseIND

অনায়াসে তেওঁৰ ওচৰলৈ যি আহে তাত সন্তুষ্ট হৈ, বিপৰীতমুখী আৰু ঈৰ্ষাৰ যোৰৰ পৰা মুক্ত, সফলতা আৰু বিফলতাত সমমনা, তেওঁ কাম কৰে তথাপিও বান্ধ খাই থকা নাই।

KonkaniIND

यत्न करिनासतना ताका जें येता ताचेर समाधान मानून, विरुद्ध आनी मत्सर हांच्या जोड्यां पासून मुक्त, येस आनी अपेसांत सम विचार आशिल्लो तो वागता तरी बांदून उरना.

ManipuriIND

ꯍꯣꯠꯅꯗꯅꯥ ꯃꯍꯥꯛꯀꯤ ꯃꯐꯃꯗꯥ ꯂꯥꯀꯄꯥ ꯑꯗꯨꯗꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯐꯥꯑꯣꯗꯨꯅꯥ, ꯑꯣꯄꯣꯖꯤꯁꯟ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯏꯀꯥꯏ ꯈꯨꯝꯅꯕꯒꯤ ꯄꯦꯔꯥꯁꯤꯡꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯛꯇꯨꯅꯥ, ꯃꯥꯌ ꯄꯥꯀꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯥꯌ ꯄꯥꯀꯄꯗꯥ ꯏꯚꯦꯟꯇ-ꯃꯥꯏꯟꯗ ꯇꯧꯗꯨꯅꯥ, ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯊꯕꯛ ꯇꯧꯏ ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯂꯩꯇꯅꯥ ꯊꯕꯛ ꯇꯧꯏ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.22।। व्याख्या--'यदृच्छालाभसंतुष्टः'--कर्मयोगी निष्कामभावपूर्वक साङ्गोपाङ्ग रीतिसे सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है। फल-प्राप्तिका उद्देश्य न रखकर कर्म करनेपर फलके रूपमें उसे अनुकूलता या प्रतिकूलता, लाभ या हानि, मान या अपमान, स्तुति या निन्दा आदि जो कुछ मिलता है, उससे उसके अन्तःकरणमें कोई असन्तोष पैदा नहीं होता। जैसे, वह व्यापार करता है तो उसे व्यापारमें लाभ हो अथवा हानि उसके अन्तःकरणपर उसका कोई असर नहीं पड़ता। वह हरेक परिस्थितिमें समानरूपसे सन्तुष्ट रहता है; क्योंकि उसके मनमें फलकी इच्छा नहीं होती। तात्पर्य यह है कि व्यापारमें उसे लाभ-हानिका ज्ञान तो होता है तथा वह उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी करता है, पर परिणाममें वह सुखी-दुःखी नहीं होता। यदि साधकके अन्तःकरणपर अनुकूलता-प्रतिकूलताका थोड़ा असर पड़ भी जाय, तो भी उसे घबराना नहीं चाहिये; क्योंकि साधकके अन्तःकरणमें वह प्रभाव स्थायी नहीं रहता, शीघ्र मिट जाता है।उपर्युक्त पदोंमें आया 'लाभ' शब्द प्राप्तिके अर्थमें है, जिसके अनुसार केवल लाभ या अनुकूलताका मिलना ही 'लाभ' नहीं है, प्रत्युत लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि जो कुछ प्राप्त हो जाय, वह सब 'लाभ' ही है। 'विमत्सरः'--कर्मयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी एकता मानता है--'सर्वभूतात्मभूतात्मा' (गीता 5। 7)। इसलिये उसका किसी भी प्राणीसे किञ्चिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव नहीं रहता।'विमत्सरः' पद अलगसे देनेका भाव यह है कि अपनेमें किसी प्राणीके प्रति किञ्चिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव न आ जाय, इस विषयमें कर्मयोगी बहुत सावधान रहता है। कारण कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं; अतः यदि उसमें किञ्चिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव होगा, तो उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ दूसरोंके हितके लिये नहीं हो सकेंगी।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिसने समस्त संग्रहका त्याग कर दिया है ऐसे संन्यासीके पास शरीरनिर्वाहके कारणरूप अन्नादिका संग्रह नहीं होता इसलिये उसको याचनादिद्वारा शरीरनिर्वाह करनेकी योग्यता प्राप्त हुई। इसपर बिना याचना किये बिना संकल्पके अथवा बिना इच्छा किये प्राप्त हुए इत्यादि वचनोंसे जो शास्त्रमें संन्यासीके शरीरनिर्वाहके लिये अन्नादिकी प्राप्तिके द्वार बतलाये गये हैं उनको प्रकट करते हुए कहते हैं जो बिना माँगे अपनेआप मिले हुए पदार्थसे संतुष्ट है अर्थात् उसीमें जिसके मनका यह भाव हो जाता है कियही पर्याप्त है जो द्वन्द्वोंसे अतीत है अर्थात् शीतउष्ण आदि द्वन्द्वोंसे सताये जानेपर भी जिसके चित्तमें विषाद नहीं होता जो ईर्ष्यासे रहित अर्थात् निर्वैरबुद्धिवाला है और जो अपनेआप प्राप्त हुए लाभकी सिद्धिअसिद्धिमें भी सम रहता है जो ऐसा शरीरस्थितिके हेतुरूप अन्नादिके प्राप्त होने या न होनेमें भी हर्षशोकसे रहित समदर्शी है और कर्मादिमें अकर्मादि देखनेवाला यथार्थ आत्मदर्शननिष्ठ एवं शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले और शरीरादिद्वारा होनेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंमें भी मैं कुछ नहीं करता गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं इस प्रकार सदा देखनेवाला है वह यति अपनेमें कर्तापनका अभाव देखनेसे अर्थात् आत्माको अकर्ता समझ लेनेसे वास्तवमें भिक्षाटनादि कुछ भी कर्म नहीं करता है। ऐसा पुरुष लोकव्यवहारकी साधारण दृष्टिसे तो सांसारिक पुरुषोंद्वारा आरोपित किये हुए कर्तापनके कारण भिक्षाटनादि कर्मोंका कर्ता होता है। परंतु शास्त्रप्रमाण आदिसे उत्पन्न अपने अनुभवसे ( वस्तुतः ) वह अकर्ता ही रहता है। इस प्रकार दूसरोंद्वारा जिसपर कर्तापनका अध्यारोप किया गया है ऐसा वह पुरुष शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंको करता हुआ भी नहीं बँधता क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके ( समस्त ) बन्धनकारक कर्म हेतुसहित भस्म हो चुके हैं। यह पहले कहे हुएका ही अनुवादमात्र है।

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Sri Anandgiri

पूर्वश्लोकेन संगतिं दर्शयन्नुत्तरश्लोकमुत्थापयति त्यक्तेति। अन्नादेरित्यादिशब्देन पादुकाच्छादनादि गृह्यते याचनादिनेत्यादिपदेन सेवाकृष्याद्युपादीयते भिक्षाटनार्थमुद्योगात्प्राक्काले केनापि योग्येन निवेदितं भैक्ष्यमयाचितमभिशस्तं पतितं च वर्जयित्वा संकल्पमन्तरेण पञ्चभ्यः सप्तभ्यो वा गृहेभ्यः समानीतं भैक्ष्यमसंक्लृप्तसिद्धमन्नं भक्तजनैः स्वसमीपमुपानीतमुपपन्नं यदृच्छया। स्वकीयप्रयत्नव्यतिरेकेणेति यावत्। आदिशब्देनमाधूकरमसंक्लृप्तं प्राक्प्रणीतमयाचितम्। तत्तत्कालोपपन्नं च भैक्ष्यं पञ्चविधं स्मृतम् इत्यादि गृह्यते। आविष्कुर्वन्निदं वाक्यमाहेति योजनीयम्। परोत्कर्षामर्षपूर्विका स्वस्योत्कर्षाभिवाञ्छा विगता यस्मादिति व्युत्पत्तिमाश्रित्य विवक्षितमर्थमाह निर्वैरेति। संक्षेपतो दर्शितमर्थं विशदयति य एवंभूत इति। तथापि प्रकृतस्य यतेर्भिक्षाटनादौ कर्तृत्वं प्रतिभाति तदभावे भिक्षाटनाद्यभावेन जीवनाभावप्रसङ्गादित्याशङ्क्याह लोकेति। लौकिकैरविवेकिभिः सह व्यवहारस्य स्नानाचमनभोजनादिलक्षणस्य विदुषापि सामान्येन दर्शनात्तदनुसारेण लौकिकैरध्यारोपितकर्तृत्वभोक्तृत्वाद्विद्वानपि लोकदृष्ट्या भिक्षाटनादौ कर्तृत्वमनुभवतीत्यर्थः। कथं तर्हि तस्याकर्तृत्वं तत्राह स्वानुभवेनेति। यदृच्छेत्यादिपादत्रयं व्याख्याय कृत्वापीत्यादिचतुर्थपादं व्याचष्टे स एवमिति। भिक्षाटनादिना प्रातिभासिकेन कर्मणा विदुषो बद्धत्वाभावेऽपि कर्मान्तरेण निबद्धत्वं भविष्यतीत्याशङ्क्याह बन्धेति। ज्ञानाग्निदग्धत्वादित्येवं शारीरं केवलमित्यादावुक्तस्यायमनुवाद इति योजना। यथोक्तस्य कर्मणो युक्त्या महाविरोधाभ्युपगमसूचनार्थोऽपिशब्दः।

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Sri Dhanpati

ननु त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः अन्नादेः शरीरस्थितिहेतोः परिग्रहाभावात् याचनादिना शरीरस्थितिः कर्तव्येत्याशङ्क्यअयाचितमसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया इति वचनानुरोधेनोत्तरमाह यदृच्छेति। अप्रार्थितोऽप्रयत्नो लाभो यदृच्छालाभः तेन संतुष्टः संजातालंप्रत्ययः। द्वन्द्वैः शीतोष्णादिभिः स्वप्रयत्नमन्तरेण वस्त्राद्यलाभे पीड्यमानोऽप्यखिन्नचित्तः द्वन्द्वातीतः अतएव परस्य कौपीनाच्छादनलाभेन परोत्कर्षासहनरुपमंत्सरशून्यः। निर्वैर इत्यर्थः। समस्तुल्यो यदृच्छालाभस्य सिद्धावसिद्धौ च हर्षविषादरहित इत्यर्थः। यतयो भिक्षार्थं ग्रामं प्रविशन्तिविधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने। अतीत पात्रसंचारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः। कौपीनयुगुलं वासः कन्थां शीतनिवारिणीम्। पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम्।। इत्यादिशास्त्राल्लोकदृष्ट्या भिक्षाटनादिकं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं कर्म कृत्वापि कर्मादावकर्मादिदर्शी यथा भूतात्मज्ञाननिष्ठः कृत्वापि न निबध्यते बन्धहेतोः सहेतुकस्य कर्मणः ज्ञानाग्निना दग्धत्वादित्युक्तानुवादः। यत्त्वन्ये ननु सपरिग्रहः कुटुम्बभरणव्यग्रचित्ततया कथं व्ययायासमाध्याग्निहोत्रादीन्यनुतिष्ठेदित्याशङ्क्याह। यदृच्छालाभसंतुष्टः द्वन्द्वातीतो बहुलाभेऽलाभे वा सुखदुःखाद्यतीतः परस्य लाभं दृष्टवा संतापहीनः समः यदृच्छालाभेनैव इष्टिपशुचातुर्मास्यादेर्नित्यात्कर्मणः सिद्धावसिद्धौ च समः निर्विकारः एवंभूत इष्ट्यादीनि कृत्वापि तन्मूलेन स्वर्गादिना न निबध्यते। अपिशब्दात्तज्जेन प्रत्यवायेन न निबध्यते। बन्धहेतोः कर्मणस्तत्त्वज्ञानेनैव दाहात्। तथाच स्मृतिःन्यायागतधनस्तत्त्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिप्रियः। श्राद्धकृत्सत्यवादी च गृहस्थोऽपि विमुच्यते।। इति व्याचख्युः तदसंगतम्। उक्तरीत्या त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः पूर्वश्लोकेन वर्णनौचित्येनैवमुत्थापनस्यानौचित्यात्। शङ्कानुरुपस्य श्लोकाक्षरैरुत्तरस्याप्रतीतेश्च। तस्मादनेन श्लोकेन परिग्रहरहितस्यैव वर्णनं न्याय्यमिति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yadṛichchhāwhich comes of its own accord
lābhagain
santuṣhṭaḥcontented
dvandvaduality
atītaḥsurpassed
vimatsaraḥfree from envy
samaḥequipoised
siddhauin success
asiddhaufailure
chaand
kṛitvāperforming
apieven
nanever
nibadhyateis bound
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.21
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.23
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते

जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 22
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 22
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते

जो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ: "जो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 22?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 22 translates to: "Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, he acts yet is not bound. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 22 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। जो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ" mean in English?

"yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 22. Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, he acts yet is not bound. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.