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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः

तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

আপনার বাধ্যতামূলক দায়িত্ব পালন করুন, কারণ কর্ম নিষ্ক্রিয়তার চেয়ে উচ্চতর, এমনকি নিষ্ক্রিয়তার মাধ্যমে শরীরের রক্ষণাবেক্ষণও আপনার পক্ষে সম্ভব হবে না।

KannadaIND

ನಿಮ್ಮ ಬದ್ಧ ಕರ್ತವ್ಯವನ್ನು ನಿರ್ವಹಿಸಿ, ಏಕೆಂದರೆ ಕ್ರಿಯೆಯು ನಿಷ್ಕ್ರಿಯತೆಗಿಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠವಾಗಿದೆ ಮತ್ತು ನಿಷ್ಕ್ರಿಯತೆಯ ಮೂಲಕ ದೇಹದ ನಿರ್ವಹಣೆಯು ಸಹ ನಿಮಗೆ ಸಾಧ್ಯವಾಗುವುದಿಲ್ಲ.

TamilIND

உங்கள் எல்லைக்குட்பட்ட கடமையைச் செய்யுங்கள், ஏனென்றால் செயலற்ற தன்மையை விட செயல் சிறந்தது, மேலும் செயலற்ற தன்மையின் மூலம் உடலைப் பராமரிப்பது கூட உங்களுக்கு சாத்தியமில்லை.

MarathiIND

आपले बंधनकारक कर्तव्य पार पाडा, कारण कृती ही निष्क्रियतेपेक्षा श्रेष्ठ आहे आणि शरीराची देखभाल देखील निष्क्रियतेने तुम्हाला शक्य होणार नाही.

GujaratiIND

તમારી ફરજ બજાવો, કારણ કે નિષ્ક્રિયતા કરતાં ક્રિયા શ્રેષ્ઠ છે, અને નિષ્ક્રિયતા દ્વારા શરીરની જાળવણી પણ તમારા માટે શક્ય નથી.

TeluguIND

మీ నిర్బంధ కర్తవ్యాన్ని నిర్వర్తించండి, ఎందుకంటే చర్య నిష్క్రియాత్మకత కంటే గొప్పది మరియు నిష్క్రియాత్మకత ద్వారా శరీర నిర్వహణ కూడా మీకు సాధ్యం కాదు.

NepaliIND

आफ्नो बाध्यकारी कर्तव्य पूरा गर्नुहोस्, किनकि निष्क्रियता भन्दा कर्म श्रेष्ठ छ, र निष्क्रियताबाट शरीरको रेखदेख पनि सम्भव छैन।

MalayalamIND

നിങ്ങളുടെ നിർബന്ധിത കർത്തവ്യം നിർവ്വഹിക്കുക, കാരണം പ്രവൃത്തി നിഷ്ക്രിയത്വത്തേക്കാൾ ശ്രേഷ്ഠമാണ്, കൂടാതെ ശരീരത്തിൻ്റെ പരിപാലനം പോലും നിഷ്ക്രിയത്വത്തിലൂടെ നിങ്ങൾക്ക് സാധ്യമല്ല.

SindhiIND

پنهنجو فرض نڀايو، ڇو ته عمل بي عمليءَ کان افضل آهي، ۽ جسم جي نگهباني به بي عمليءَ جي ڪري ممڪن نه آهي.

PunjabiIND

ਆਪਣਾ ਸੀਮਿਤ ਕਰਤੱਵ ਨਿਭਾਓ, ਕਿਉਂਕਿ ਕਿਰਿਆ ਅਕਿਰਿਆਸ਼ੀਲਤਾ ਨਾਲੋਂ ਉੱਤਮ ਹੈ, ਅਤੇ ਸਰੀਰ ਦੀ ਸੰਭਾਲ ਵੀ ਅਕਿਰਿਆਸ਼ੀਲਤਾ ਦੁਆਰਾ ਤੁਹਾਡੇ ਲਈ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗੀ।

OdiaIND

ତୁମର ବନ୍ଧନ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପାଳନ କର, କାରଣ କାର୍ଯ୍ୟ ନିଷ୍କ୍ରିୟତାଠାରୁ ଉନ୍ନତ ଅଟେ, ଏବଂ ନିଷ୍କ୍ରିୟତା ଦ୍ୱାରା ଶରୀରର ରକ୍ଷଣାବେକ୍ଷଣ ମଧ୍ୟ ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ |

MaithiliIND

अपन बाउंडन कर्तव्य निभाउ, कारण कर्म निष्क्रियता सँ श्रेष्ठ अछि, आ निष्क्रियताक माध्यमे शरीरक रखरखाव सेहो अहाँक लेल संभव नहि होयत ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.8।। व्याख्या--'नियतं कुरु कर्म त्वम्'--शास्त्रोंमें विहित तथा नियत--दो प्रकारके कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी गयी है। विहित कर्मका तात्पर्य है--सामान्यरूपसे शास्त्रोंमें बताया हुआ आज्ञारूप कर्म; जैसे-- व्रत, उपवास, उपासना आदि। इन विहित कर्मोंको सम्पूर्णरूपसे करना एक व्यक्तिके लिये कठिन है। परन्तु निषिद्ध कर्मोंका त्याग करना सुगम है। विहित कर्मको न कर सकनेमें उतना दोष नहीं है जितना निषिद्ध कर्मका त्याग करनेमें लाभ है; जैसे झूठ न बोलना, चोरी न करना, हिंसा न करना इत्यादि। निषिद्ध कर्मोंका त्याग होनेसे विहित कर्म स्वतः होने लगते हैं। नियतकर्मका तात्पर्य है--वर्ण, आश्रम, स्वभाव एवं परिस्थितिके अनुसार प्राप्त कर्तव्य-कर्म; जैसे--भोजन करना, व्यापार करना, मकान बनवाना, मार्ग भूले हुए व्यक्तिको मार्ग दिखाना आदि। कर्मयोगकी दृष्टिसे जो वर्णधर्मानुकूल शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जाय, वह चाहे घोर हो या सौम्य, नियतकर्म ही है। यहाँ 'नियतं कुरु कर्म' पदोंसे भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं कि क्षत्रिय होनेके नाते अपने वर्णधर्मके अनुसार परिस्थितिसे प्राप्त युद्ध करना तेरा स्वाभाविक कर्म है (गीता 18। 43)। क्षत्रियके लिये युद्धरूप हिंसात्मक कर्म घोर दीखते हुए भी वस्तुतः घोर नहीं है, प्रत्युत उसके लिये वह नियतकर्म ही है। दूसरे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि स्वधर्म की दृष्टिसे भी युद्ध करना तेरे लिये नियतकर्म है-- 'स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि' (2। 31)। वास्तवमें तो स्वधर्म और नियतकर्म दोनों एक ही हैं। यद्यपि दुर्योधन आदिके लिये भी युद्ध वर्णधर्मके अनुसार प्राप्त कर्म है; तथापि वह अन्याययुक्त होनेके कारण नियतकर्मसे अलग है; क्योंकि वे युद्ध करके अन्यायपूर्वक राज्य छीनना चाहते हैं। अतः उनके लिये यह युद्ध नियत तथा धर्मयुक्त कर्म नहीं है। 'कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः'--इसी अध्यायके पहले श्लोकमें (अर्जुनके प्रश्नमें) आये हुए 'ज्यायसी' पदका उत्तर भगवान् यहाँ 'ज्यायः' पदसे ही दे रहे हैं। वहाँ अर्जुनका प्रश्न है कि यदि आपको कर्मकी अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? इसके उत्तरमें यहाँ भगवान् कहते हैं कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना ही मुझे श्रेष्ठ मान्य है। इस प्रकार अर्जुनका विचार युद्धरूप घोर कर्मसे निवृत्त होनेका है और भगवान्का विचार अर्जुनको युद्धरूप नियतकर्ममें प्रवृत्त करानेका है। इसीलिये आगे अठारहवें अध्यायमें भगवान् कहते हैं कि दोष-युक्त होनेपर भी सहज (नियत) कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये--'सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्'(18। 48)। कारण कि इसके त्यागसे दोष लगता है एवं कर्मोंके साथ अपना सम्बन्ध भी बना रहता है। अतः कर्मका त्याग करनेकी अपेक्षा नियतकर्म करना ही श्रेष्ठ है। फिर आसक्ति-रहित होकर कर्म करना तो और भी श्रेष्ठ माना गया है; क्योंकि इससे कर्मोंके साथ सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अतः भगवान् इस श्लोकके पूर्वार्धमें अर्जुनको अनासक्तभावसे नियतकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं और उत्तरार्धमें कहते हैं कि कर्म किये बिना तेरा जीवन-निर्वाह भी नहीं होगा। कर्मयोगमें 'कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः'--यह भगवान्का प्रधान सिद्धान्त है। इसीको भगवान्ने 'मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि' (गीता 2। 47) पदोंसे स्पष्ट किया है कि अर्जुन !तेरी कर्म न करनेमें आसक्ति न हो। कारण यह है कि कर्तव्य-कर्मोंसे जी चुरानेवाला मनुष्य प्रमाद, आलस्य और निद्रामें अपना अमूल्य समय नष्ट कर देगा अथवा शास्त्र-निषिद्ध कर्म करेगा, जिससे उसका पतन होगा।स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेकी अपेक्षा कर्म करते हुए ही कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करना श्रेष्ठ है। कारण कि कामना, वासना, फलासक्ति, पक्षपात आदि ही कर्मोंसे सम्बध जोड़ देते हैं, चाहे मनुष्य कर्म करे अथवा न करे। कामना आदिके त्यागका उद्देश्य रखकर कर्मयोगका आचरण करनेसे कामना आदिका त्याग बड़ी सुगमतासे हो जाता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

ऐसा होनेके कारण हे अर्जुन जो कर्म श्रुतिमें किसी फलके लिये नहीं बताया गया है ऐसे जिस कर्मका जो अधिकारी है उसके लिये वह नियत कर्म है उस नियत अर्थात् नित्य कर्मका तू आचरण कर क्योंकि कर्मोंके न करनेकी अपेक्षा कर्म करना परिणाममें बहुत श्रेष्ठ है। क्योंकि कुछ भी न करनेसे तो तेरी शरीरयात्रा भी नहीं चलेगी अर्थात् तेरे शरीरका निर्वाह भी नहीं होगा। इसलिये कर्म करने और न करनेमें जो अन्तर है वह संसारमें प्रत्यक्ष है।

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Sri Anandgiri

कर्मानुष्ठायिनो वैशिष्ट्यमुपदिष्टमनूद्य तदनुष्ठानमधिकृतेन कर्तव्यमिति निगमयति यत इति। उक्तमेव हेतुं भगवदनुमतिकथनेन स्फुटयति कर्मेति। इतश्च त्वया कर्तव्यं कर्मेत्याह शरीरेति। तन्नियतं तस्याधिकृतस्येति संबन्धः। स्वर्गादिफले दर्शपूर्णमासादावधिकृतस्य तस्य तदपि नित्यं स्यादित्याशङ्क्य विशिनष्टि फलायेति। नित्यं कर्मेति नियमेन कर्तव्यमित्यत्र हेतुमाह यत इति। हिशब्दोपात्तमुक्तमेव हेतुमनुवदति यस्मादिति। करणस्याकरणाज्ज्यायस्त्वं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति कथमित्यादिना। सत्येव कर्मणि देहादिचेष्टाद्वारा शरीरं स्थातुं पारयति तदभावे जीवनमेव दुर्लभं भवेदिति फलितमाह अत इति।

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Sri Dhanpati

यतएवमतो नियतं स्ववर्णा श्रमोचितं नित्यं कर्म त्वं फलाभिसंधिरहितः कुरु। हि यस्मादकरणात् चित्तशोधकं कर्म श्रेष्ठं न केवलमकरणाच्चित्तशुद्य्धभाव एव किंतु शरीरयात्रापि शरीरस्थितिरपि च ते प्रकर्षेण स्वधर्मवृत्त्या न सिध्येदकर्मणः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
niyatamconstantly
kuruperform
karmaVedic duties
tvamyou
karmaaction
jyāyaḥsuperior
hicertainly
akarmaṇaḥthan inaction
śharīrabodily
yātrāmaintenance
apieven
chaand
teyour
na prasiddhyetwould not be possible
akarmaṇaḥinaction
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.7
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते

हे अर्जुन! जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर (निष्काम भावसे) समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.9
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर

यज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन ! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः

तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 8 translates to: "Perform your bounden duty, for action is superior to inaction, and even the maintenance of the body would not be possible for you through inaction. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्म" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ" mean in English?

"niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 8. Perform your bounden duty, for action is superior to inaction, and even the maintenance of the body would not be possible for you through inaction. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.