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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति

मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

কর্ম না করে মানুষ কর্মহীনতায় পৌঁছায় না; অথবা সে নিছক ত্যাগের দ্বারা পরিপূর্ণতা অর্জন করে না।

KannadaIND

ಮನುಷ್ಯನು ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಮಾಡದಿರುವ ಮೂಲಕ ಕ್ರಿಯಾಹೀನತೆಯನ್ನು ತಲುಪುವುದಿಲ್ಲ; ಅಥವಾ ಕೇವಲ ಪರಿತ್ಯಾಗದಿಂದ ಅವನು ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ.

PunjabiIND

ਕਰਮ ਨਾ ਕਰਨ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਕਰਮਹੀਣਤਾ ਤੱਕ ਨਹੀਂ ਪਹੁੰਚਦਾ; ਨਾ ਹੀ ਉਹ ਕੇਵਲ ਤਿਆਗ ਦੁਆਰਾ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

عمل نه ڪرڻ سان انسان بي عمليءَ تائين نه ٿو پهچي. ۽ نه ئي هو صرف ڇڏي ڏيڻ سان ڪمال حاصل ڪري ٿو.

TeluguIND

క్రియలు చేయకపోవడం వల్ల మనిషి క్రియలేని స్థితికి చేరుకోడు; లేదా అతను కేవలం త్యజించడం ద్వారా పరిపూర్ణతను పొందలేడు.

MarathiIND

कृती न केल्याने मनुष्य कृतीशून्यतेपर्यंत पोहोचत नाही; किंवा नुसत्या त्यागाने त्याला पूर्णता प्राप्त होत नाही.

NepaliIND

कर्म नगरी मानिस कर्मविहीनतामा पुग्दैन; न त उसले केवल त्यागले पूर्णता प्राप्त गर्छ।

MalayalamIND

കർമ്മങ്ങൾ ചെയ്യാത്തതു കൊണ്ട് മനുഷ്യൻ കർമ്മമില്ലായ്മയിലെത്തുന്നില്ല; കേവലം പരിത്യാഗം കൊണ്ട് അവൻ പൂർണത കൈവരിക്കുകയുമില്ല.

GujaratiIND

ક્રિયાઓ ન કરવાથી માણસ નિષ્ક્રિયતા સુધી પહોંચતો નથી; કે તે માત્ર ત્યાગ દ્વારા પૂર્ણતા પ્રાપ્ત કરી શકતો નથી.

TamilIND

செயல்களைச் செய்யாததால் மனிதன் செயலற்ற நிலையை அடைவதில்லை; அல்லது வெறும் துறவினால் பூரணத்துவம் அடைவதில்லை.

OdiaIND

ମଣିଷ କାର୍ଯ୍ୟ ନକରି କାର୍ଯ୍ୟହୀନତାକୁ ପହଞ୍ଚେ ନାହିଁ; କିମ୍ବା ସେ କେବଳ ତ୍ୟାଗ ଦ୍ୱାରା ସିଦ୍ଧତା ହାସଲ କରନ୍ତି ନାହିଁ |

MizoIND

Mihring hian thiltih loh vangin thiltih lohna a thleng lo; bânsan mai mai hmangin famkimna pawh a thleng lo.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते'-- कर्मयोगमें कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है। कारण कि निष्कामभावसे कर्म करनेपर ही कर्मयोगकी सिद्धि होती है । यह सिद्धि मनुष्यको कर्म किये बिना नहीं मिल सकती।मनुष्यके अन्तःकरणमें कर्म करनेका जो वेग विद्यमान रहता है, उसे शान्त करनेके लिये कामनाका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है। कामना रखकर कर्म करनेपर यह वेग मिटता नहीं, प्रत्युत बढ़ता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यह बात स्पष्ट प्रकट करनेकी इच्छासे कि ज्ञाननिष्ठाकी प्राप्तिमें साधन होनेके कारण कर्मनिष्ठा मोक्षरूप पुरुषार्थमें हेतु है स्वतन्त्र नहीं है और कर्मनिष्ठारूप उपायसे सिद्ध होनेवाली ज्ञाननिष्ठा अन्यकी अपेक्षा न रखकर स्वतन्त्र ही मुक्तिमें हेतु है भगवान् बोले कर्मोंका आरम्भ किये बिना अर्थात् यज्ञादि कर्म जो कि इस जन्म या जन्मान्तरमें किये जाते हैं और सञ्चित पापोंका नाश करनेके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिमें कारण हैं एवं पापकर्मोंका नाश होनेपर मनुष्योंके ( अन्तःकरणमें ) ज्ञान प्रकट होता है इस स्मृतिके अनुसार जो अन्तःकरणकी शुद्धिमें कारण होनेसे ज्ञाननिष्ठाके भी हेतु हैं उन यज्ञादि कर्मोंका आरम्भ किये बिना मनुष्य निष्कर्मभावको कर्मशून्य स्थितिको अर्थात् जो निष्क्रिय आत्मस्वरूपमें स्थित होनारूप ज्ञानयोगसे प्राप्त होनेवाली निष्ठा है उसको नहीं पाता। पू0 कर्मोंका आरम्भ नहीं करनेसे निष्कर्मभावको प्राप्त नहीं होता इस कथनसे यह पाया जाता है कि इसके विपरीत करनेसे अर्थात् कर्मोंका आरम्भ करनेसे मनुष्य निष्कर्मभावको पाता है सो ( इसमें ) क्या कारण है कि कर्मोंका आरम्भ किये बिना मनुष्य निष्कर्मताको प्राप्त नहीं होता उ0 क्योंकि कर्मोंका आरम्भ ही निष्कर्मताकी प्राप्तिका उपाय है और उपायके बिना उपेयकी प्राप्ति हो नहीं सकती यह प्रसिद्ध ही है। निष्कर्मतारूप ज्ञानयोगका उपाय कर्मयोग है यह बात श्रुतिमें और यहाँ गीतामें भी प्रतिपादित है। श्रुतिमें प्रस्तुत ज्ञेयरूप आत्मलोकके जाननेका उपाय बतलाते हुए उस आत्माको बाह्मण वेदाध्ययन और यज्ञसे जाननेका इच्छा करते हैं इत्यादि वचनोंसे कर्मयोगको ज्ञानयोगका उपाय बतलाया है। तथा यहाँ ( गीताशास्त्रमें ) भी हे महाबाहो बिना कर्मयोगके संन्यास प्राप्त करना कठिन है योगी लोग आसक्ति छो़ड़कर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं यज्ञ दान और तप बुद्धिमानोंको पवित्र करनेवाले हैं इत्यादि वचनोंसे आगे प्रतिपादित करेंगे। यहाँ यह शंका होती है कि सब भूतोंको अभयदान देकर संन्यास ग्रहण करे इत्यादि वचनोंमें कर्तव्यकर्मोंके त्यागद्वारा भी निष्कर्मताकी प्राप्ति दिखलायी है और लोकमें भी कर्मोंका आरम्भ न करनेसे निष्कर्मताका प्राप्त होना अत्यन्त प्रसिद्ध है। फिर निष्कर्मता चाहनेवालेको कर्मोंके आरम्भसे क्या प्रयोजन इसपर कहते हैं केवल संन्याससे अर्थात् बिना ज्ञानके केवल कर्मपरित्यागमात्रसे मनुष्य निष्कर्मतारूप सिद्धिको अर्थात् ज्ञानयोगसे होनेंवाली स्थितको नहीं पाता।

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Sri Anandgiri

किमिति भगवता बुद्धेर्ज्यायस्त्वं ज्यायसी चेदित्यत्रोक्तमुपेक्षितमिति तत्राह यदर्जुनेनेति। किंच ज्ञाननिष्ठायां संन्यासिनामेवाधिकारो भगवतोऽभिप्रेतोऽन्यथा तदीयविभागवचनविरोधादिति विभागवचनसामर्थ्यसिद्धमर्थमाह तस्याश्चेति। तर्हि विभागवचनानुरोधादर्जुनस्यापि संन्यासपूर्विकायां ज्ञाननिष्ठायामेवाधिकारो भविष्यति नेत्याह मां चेति। बुद्धेर्ज्यायस्त्वमुपेत्यापीति चकारार्थः। अर्जुनमालक्ष्यभगवानाहेति संबन्धः। अन्तरेणापि कर्माणि श्रवणादिभिर्ज्ञानावाप्तिर्भविष्यतीति परबुद्धिमनुरुध्य विशिनष्टि कर्मेति। विभागवचनवशादसमुच्चयश्चेदुभयोरपि ज्ञानकर्मणोः स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुत्वमन्यथा कर्मवज्ज्ञानमपि न स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थं साधयेदित्याशङ्क्य संबन्धान्तरमाह अथवेति। तर्हि ज्ञाननिष्ठापि कर्मनिष्ठावन्निष्ठात्वाविशेषान्न स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुरिति समुच्चयसिद्धिरित्याशङ्क्याह ज्ञाननिष्ठा त्विति। नहि रज्जुतत्त्वज्ञानमुत्पन्नं फलसिद्धौ सहकारिसापेक्षमालक्ष्यते। तथेदमपि चोत्पन्नं मोक्षाय नान्यदपेक्षते तदाह अन्येति।यस्य चैतत्कर्म इति श्रुताविव कर्मशब्दस्य क्रियमाणवस्तुविषयत्वमाशङ्क्य व्याचष्टे क्रियाणामिति। ताश्च नित्यनैमित्तिकत्वेन विभजते यज्ञादीनामिति। अस्मिन्नेव जन्मन्यनुष्ठितानां कर्मणां बुद्धिशुद्धिद्वारा ज्ञानकारणत्वे ब्रह्मचारिणां कुतो ज्ञानोत्पत्तिर्जन्मान्तरकृतानां कर्मणां वा तथात्वे गृहस्थादीनामैहिकानि कर्माणि न ज्ञानहेतवः स्युरित्याशङ्क्यानियमं दर्शयति इहेति। नेमानि सत्त्वशुद्धिकारणान्युपात्तदुरितप्रतिबन्धादित्याशङ्क्याह उपात्तेति। तर्हि तावतैव कृतार्थानां कुतो ज्ञाननिष्ठाहेतुत्वं तत्राह तत्कारणत्वेनेति। कर्मणां चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानहेतुत्वे मानमाह ज्ञानमिति। अनारम्भशब्दस्योपक्रमविपरीतविषयत्वं व्यावर्तयति अननुष्ठानादिति। निष्कर्मणः संन्यासिनः कर्मज्ञानं नैष्कर्म्यमिति व्याचष्टे निष्कर्मेति। कर्माभावावस्थां व्यवच्छिनत्ति ज्ञानयोगेनेति। तस्याः साधनपक्षपातित्वं व्यावर्तयति निष्क्रियेति। कर्मानुष्ठानोपायलब्धा ज्ञाननिष्ठा स्वतन्त्रा पुमर्थहेतुरिति प्रकृतार्थसमर्थनार्थं व्यतिरेकवचनस्यान्वये पर्यवसानं मत्वा व्याचष्टे कर्मणामिति। तद्विपर्ययमेव व्याचष्टे तेषामिति। उक्तेऽर्थे हेतुं पृच्छति कस्मादिति। जिज्ञासितं हेतुमाह उच्यत इति। उपायत्वेऽपि तदभावे कुतो नैष्कर्म्यासिद्धिरित्याशङ्क्याह नहीति। ज्ञानयोगं प्रति कर्मयोगस्योपायत्वे श्रुतिस्मृती प्रमाणयति कर्मयोगेति। श्रौतमुपायोपेयत्वप्रतिपादनं प्रकटयति श्रुताविति। यत्तु गीताशास्त्रे कर्मयोगस्य ज्ञानयोगं प्रत्युपायत्वोपपादनं तदिदानीमुदाहरति इहापि चेति। न कर्मणामित्यादिना पूर्वार्धं व्याख्यायोत्तरार्धं व्याख्यातुमाशङ्कयति नन्विति। आदिशब्देनशान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुःसंन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः इत्यादि गृह्यते। तत्रैव लोकप्रसिद्धिमनुकूलयति लोके चेति। प्रसिद्धतरंयतो यतो निवर्तते ततस्ततो विमुच्यते। निवर्तनाद्धि सर्वतो न वेत्ति दुःखमण्वपि इत्यादिदर्शनादिति शेषः। लौकिकवैदिकप्रसिद्धिभ्यां सिद्धमर्थमाह अतश्चेति। तत्रोत्तरत्वेनोत्तरार्धमवतार्य व्याकरोति अत आहेत्यादिना। एवकारार्थमाह केवलादिति। तदेव स्पष्टयति कर्मेति। उक्तमेव नञ्मनुकृष्य क्रियापदेन संगतिं दर्शयति न प्राप्नोतीति।

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Sri Dhanpati

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव इत्युक्तवन्तं खिन्नचित्तमर्जुनं कर्म न कर्तव्यमित्येवंभन्वानमालक्ष्याह नेति। यद्वा निष्ठेत्येकवचनेन सूचितं कर्मनिष्ठायाः ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिहेतुत्वेन पुरुषार्थसाधनत्वं ज्ञाननिष्ठायाः कर्मनिष्ठोपायलब्धस्वरुपायास्तु स्वातन्त्र्येणैव पुरुषार्थहेतुत्वं च स्फुटं वक्तुमारभते नेत्यादिना। कर्मणांतमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्याज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः। यथादर्शतलप्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि इति स्मृत्यासर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरि ति न्यायेन च चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानोपायत्वेन विहितानामकरणात् नैष्कर्म्यं कर्मशून्यत्वं ज्ञानयोगेन निष्ठां पुरुषो नाश्रुते न प्राप्नोति किंतु तेषामारम्भात्प्राप्नोतीत्यर्थः। ननुअभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् इत्यादौ कर्तव्यकर्मसंन्यासादपि नैष्कर्म्यप्राप्तिः श्रुयतेऽतस्तदर्थिनः किं कर्मारम्भेणेति चेत्तत्राह नेति। नच संन्यसनात्कर्मत्यागमात्रात् ज्ञानशून्यात्सिद्धिं नैष्कर्म्यलक्षणां प्राप्नोतीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
karmaṇāmof actions
anārambhātby abstaining from
naiṣhkarmyamfreedom from karmic reactions
puruṣhaḥa person
aśhnuteattains
nanot
chaand
sannyasanātby renunciation
evaonly
siddhimperfection
samadhigachchhatiattains
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.3
श्री भगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्

श्रीभगवान् बोले - हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.5
न हि कश्िचत्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः

कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 4
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति

मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ: "मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 4?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 4 translates to: "Man does not reach actionlessness by not performing actions; nor does he attain perfection by mere renunciation. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 4 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na karmaṇām anārambhān naiṣhkarmyaṁ puruṣho ’śhnute" mean in English?

"na karmaṇām anārambhān naiṣhkarmyaṁ puruṣho ’śhnute" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 4. Man does not reach actionlessness by not performing actions; nor does he attain perfection by mere renunciation. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.