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Bhagavad Gita · BG 3.36

Bhagavad Gita 3.36 — Commentary

20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः

arjuna uvācha atha kena prayukto ’yaṁ pāpaṁ charati pūruṣhaḥ anichchhann api vārṣhṇeya balād iva niyojitaḥ

"But what compels man to commit sin, even against his wishes, O Varshneya (Krishna), as if constrained by force?"

Scholar Commentaries (20)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

अथ केन हेतुभूतेन प्रयुक्तः सन् राज्ञेव भृत्यः अयं पापं कर्म चरति आचरति पूरुषः पुरुषः स्वयम् अनिच्छन् अपि हे वार्ष्णेय वृष्णिकुलप्रसूत बलात् इव नियोजितः राज्ञेव इत्युक्तो दृष्टान्तः।।शृणु त्वं तं वैरिणं सर्वानर्थकरं यं त्वं पृच्छसि इति भगवान् उवाच

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

अर्जुन उवाच अथ अयं ज्ञानयोगाय प्रवृत्तः पूरुषः स्वयं विषयान् अनुभवितुम् अनिच्छन् अपि केन प्रयुक्तो विषयानुभवरूपं पापं बलात् नियोजित इव चरति।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

बहवः कर्मकारणाः सन्ति क्रोधादयः कामश्च। तत्र को बलवानिति पृच्छति अथेति। अथेत्यर्थान्तरंतयोर्न वशमागच्छेत् 3।34 इति प्रश्नप्रापकम्।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

धर्मशास्त्रों की परम्परा के अनुसार यहाँ अर्जुन विचाराधीन प्रकरण पर एक निश्चित प्रश्न पूछता है। इस प्रश्न से ही ज्ञात होता है कि अर्जुन अपनी प्रारम्भिक उन्माद् की स्थिति से बहुत कुछ बाहर आ गया था और अब उसने आत्मनिरीक्षण भी प्रारम्भ कर दिया था जिसके फलस्वरूप उसे अपने ही मन में कुछ ऐसे गुण अथवा शक्तियाँ कार्य कर रहीं अनुभव हुईं जो उसके उच्च गुणों की अभिव्यक्ति में बाधक बनकर उनके प्रभाव को ही नष्ट कर रहीं थीं। उसका प्रश्न ऐसे परिचित शब्दों में पूछा गया है कि लगता है मानो आज का कोई विद्यार्थी ही इस प्रश्न को पूछ रहा है।कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसे कुछ मात्रा में ही सही अच्छे और बुरे का पुण्य और पाप का ज्ञान न हो। बुद्धि से प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि पुण्य क्या है किन्तु जब कर्म करने का समय आता है तब पाप में ही उसकी प्रवृत्ति होती है। यह एक दुर्भाग्य पूर्ण विडम्बना है। स्वयं के आदर्श और वास्तविक आचरण में जो दूरी रहती है वह सभी आत्मनिरीक्षक विचारकों के लिये वास्तव में एक बड़ी समस्या बन जाती है।हमारे हृदय मे स्थित दैवी गुण व्यक्त होकर श्रेष्ठतर उपलब्धि प्राप्त करना चाहते हैं परन्तु पाशविक प्रवृत्तियां हमें प्रलोभित करके श्रेयमार्ग से दूर ले जाती हैं और हम निम्न स्तर के शारीरिक सुखों में ही रमण करते रहते हैं। अधिकांश समय यह सब हमारी अनिच्छा से ही होता रहता है। अर्जुन पूछता है मन में बैठे इस राक्षस का स्वरूप क्या है जो हममें स्थित दैवी गुणों को सुनियोजित ढंग से लूट ले जाता है वृष्णि वंश में जन्म होने से श्रीकृष्ण का नाम वार्ष्णेय था। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

3.36 अथ now? केन by which? प्रयुक्तः impelled? अयम् this? पापम् sin? चरति does? पूरुषः man? अनिच्छन् not wishing? अपि even? वार्ष्णेय O Varshneya? बलात् by force? इव as it were? नियोजितः constrained.Commentary Varshneya is one born in the family of the Vrishnis? a name of Krishna.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

3.36।। व्याख्या--'अथ केन प्रयुक्तोऽयं ৷৷. बलादिव नियोजितः-- यदुकुलमें 'वृष्णि' नामका एक वंश था। उसी वृष्णिवंशमें अवतार लेनेसे भगवान् श्रीकृष्णका एक नाम 'वार्ष्णेय' है। पूर्वश्लोकमें भगवान्ने स्वधर्म-पालनकी प्रशंसा की है। धर्म 'वर्ण' और 'कुल' का होता है; अतः अर्जुन भी कुल-(वंश-) के नामसे भगवान्को सम्बोधित करके प्रश्न करते हैं।विचारवान् पुरुष पाप नहीं करना चाहता; क्योंकि पापका परिणाम दुःख होता है और दुःखको कोई भी प्राणी नहीं चाहता।यहाँ अनिच्छन् पदका तात्पर्य भोग है संग्रहकी इच्छाका त्याग नहीं, प्रत्युत पाप करनेकी इच्छाका त्याग है। कारण कि भोग और संग्रहकी इच्छा ही समस्त पापोंका मूल है, जिसके न रहनेपर पाप होते ही नहीं।विचारशील मनुष्य पाप करना तो नहीं चाहता, पर भीतर सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छा रहनेसे वह करनेयोग्य कर्तव्य कर्म नहीं कर पाता और न करनेयोग्य पाप-कर्म कर बैठता है।अनिच्छन् पदकी प्रबलताको बतानेके लिये अर्जुन बलादिव नियोजितः पदोंको कहते हैं। तात्पर्य यह है कि पापवृत्तिके उत्पन्न होनेपर विचारशील पुरुष उस पापको जानता हुआ उससे सर्वथा दूर रहना चाहता है; फिर भी वह उस पापमें ऐसे लग जाता है, जैसे कोई उसको जबर्दस्ती पापमें लगा रहा हो। इससे ऐसा मालूम होता है कि पापमें लगानेवाला कोई बलवान् कारण है।पापोंमें प्रवृत्तिका मूल कारण है-- 'काम' अर्थात् सांसारिक सुख-भोग और संग्रहकी कामना। परन्तु इस कारणकी ओर दृष्टि न रहनेसे मनुष्यको यह पता नहीं चलता कि पाप करानेवाला कौन है वह यह समझता है कि मैं तो पापको जानता हुआ उससे निवृत्त होना चाहता हूँ पर मेरेको कोई बलपूर्वक पापमें प्रवृत्त करता है; जैसे दुर्योधनने कहा है-- जानामि धर्मं न च मे

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

अर्जुन बोला यद्यपि ध्यायतो विषयान् पुंसः रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ इत्यादि प्रकरणोंमें अनर्थका मूल कारणबतलाया गया पर वह भिन्नभिन्न प्रकरणोंमें और अनिश्चितरूपसे कहा गया है। इसलिये वह अनर्थोंका कारण ठीक यही है। इस प्रकार निश्चयपूर्वक और संक्षेपसे जाननेमें आ जाय तो मैं उसके उच्छेदके लिये प्रयत्न करूँ इस विचारसे उसके जाननेकी इच्छा करता हुआ अर्जुन बोला हे वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुए कृष्ण किस प्रधान कारणसे प्रयुक्त किया हुआ यह पुरुष स्वयं न चाहता हुआ भी राजासे प्रयुक्त किये हुए सेवककी तरह बलपूर्वक लगाया हुआसा पापकर्मका आचरण किया करता है। जिसको तू पूछता है सर्व अनर्थोंके कारणरूप उस वैरीके विषयमें सुन ( इस उद्देश्यसे ) भगवान् बोले आचार्य पहले भगवान् शब्दका अर्थ करते हैं। सम्पूर्ण ऐश्वर्य धर्म यश लक्ष्मी वैराग्य और मोक्ष इन छःका नाम भग है यह ऐश्वर्य आदि छहों गुण बिना प्रतिबन्धके सम्पूर्णतासे जिस वासुदेवमें सदा रहते हैं। तथा उत्पत्ति और प्रलयको भूतोंके आने और जानेको एवं विद्या और अविद्याको जो जानता है उसका नाम भगवान् है अतः उत्पत्ति आदि सब विषयोंको जो भलीभाँति जानते हैं वे वासुदेव भगवान् नामसे वाच्य हैं।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

प्रागेवानर्थमूलस्योक्तत्वात्पुनस्तज्जिज्ञासया प्रश्नानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह यद्यपीति। विक्षिप्तं विविधेषु प्रदेशेषु क्षिप्तं दर्शितमिति यावत् अनवधारितमनेकत्रोक्तत्वादनेकधा विवेककामादिभिर्विकल्पितत्वादित्यर्थः। नन्वनर्थमूलं परिहर्तव्यं तत्किमिति ज्ञातुमिष्यते तत्राह ज्ञाते हीति। कुर्यामिति। तज्ज्ञानमर्थवदिति शेषः। वाक्यारम्भार्थत्वमथशब्दस्य गृहीत्वा प्रश्नवाक्यं व्याकरोति अथेत्यादिना। अनिच्छतोऽपि बलादेव दुश्चरितप्रेरितत्वे दृष्टान्तमाचष्टे राज्ञेवेति। विनियोज्यत्वस्येच्छासापेक्षत्वात्तदभावे तदसिद्धिमाशङ्क्य प्रागुक्तं स्मारयति राज्ञेवेत्युक्त इति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

ध्यायतो विषयान् रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनाविति पूर्वग्रन्थेनि संसारपातहेतुभूतानि विस्तरेण भगवतोक्तानि तत्र संक्षिप्तं निश्चितमिदमेवेति ज्ञातुमिच्छन्नर्जुन उवाच। ज्ञाते हि तस्मिंस्तदुच्छेदाय प्रयत्नं कुर्यामित्यभिप्रायेण अथेति। केन हेतुभूतेन प्रयुक्तः प्रेरितः सन्ननिच्छन्नपि बलादिव नियोजितो राज्ञेव भृत्योऽयं पुरुषः पापमाचरति यथा त्वमजोऽपि केनचिदतिभक्तेन प्रार्थितः वृष्णिकुले जन्म लब्धवानसि तथेति सूचयन्नाह वार्ष्णेयेति। तं वैरिणं ब्रूहीत्यर्थः।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

ईश्वरो धर्माधर्मौ रागद्वेषौ वा पुरुषस्य प्रवर्तकौ भवत इत्यात्मनोऽस्वातन्त्र्यं मन्वानोऽर्जुन उवाच अथ केनेति। केन ईश्वरादीनामन्यतमेनान्येन वा प्रयुक्तः प्रवर्तितः सन् अयं पुरुषः पापमनिष्टं चरति करोति। अनिच्छन्नित्यनेन रागद्वेषयोः प्रवर्तकत्वं निरस्तम्। सति हि रागे इच्छा भवति। अत इच्छाया अभावाद्रागाभावः। रागस्याप्रवर्तकत्वे तन्मूलभूतसंस्कारहेत्वोर्धर्माधर्मयोरप्रवर्तकत्वं ततश्च तत्सापेक्षस्य ईश्वरस्यापीति सर्वेषामाक्षेपः। तस्मान्मुख्यं प्रवर्तकं यत्तद्वाच्यमित्यर्थः। बलादिव नियोजितः विष्टिगृहीत इवेत्यर्थः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

तयोर्न वशमागच्छेदित्युक्तं तदेतदशक्यं मन्वानोऽर्जुन उवाच अथ केनेति। वृष्णेर्वंशेऽवतीर्णो वार्ष्णेयः हे वार्ष्णेय अनर्थरूपं पापं कर्तुमनिच्छन्नपि केन प्रयुक्तः प्रेरितोऽयं पुरुषः पापं चरति। कामक्रोधौ विवेकबलेन निरुन्धतोऽपि पुरुषस्य पुनः पापे प्रवृत्तिदर्शनादन्योऽपि तयोर्मूलभूतः कश्चित्प्रवर्तको भवेदिति संभावनायां प्रश्नः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

ननुसदृशं चेष्टते 3।33 इत्यादिना वासनानुवर्तित्वमुक्तम् वासना च चेतनस्येच्छाद्वारेण प्रवर्तिका एवं च सति ज्ञानयोगमिच्छतस्तद्विरोधितया विषयानुभवमनिच्छतोऽपि कथं वासनाविषयानुभवे प्रवृत्तिहेतुः इति पृच्छति अथ केनेति। अत्रअनिच्छमानोऽपि बलादाताड्येव नियोजितः इतियादवप्रकाशपाठोऽपपाठः। अथशब्दोऽत्र प्रश्नार्थकः कात्स्न्र्यपरो वा। ज्ञानवानपीति ज्ञानवत्त्वेन निर्दिष्टपरामर्शकोऽयंशब्द इत्यभिप्रायेणोक्तंअयं ज्ञानयोगाय प्रवृत्त इति। न ह्ययं वासनयाऽप्यनिच्छापूर्वं प्रवर्तते चेतनत्वादिति पुरुषशब्दस्य भावः। अनिच्छन्तोऽपि वायूदकादिप्रेरिताः प्रवर्तन्ते तद्वदत्रापि केनचित्प्रेरकेण बलवता भवितव्यमिति मत्वोक्तंबलादित्यादि।बलादिव नियोजितः इत्यस्य केनेत्यादिप्रश्नविरुद्धावगतार्थतां परिहर्तुं क्रमभेदेनान्वय उक्तः। वायूदकादिबलान्नियोजितो यथाऽनिच्छिन्नप्याचरति तथाऽयमप्याचरति तत्र केन प्रयुक्त इति प्रश्नार्थः।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

अथेति। पापं पापतया विदन्नपि जनः कथं तत्र प्रवर्तते इति प्रशनः। अस्य प्रश्नस्योत्थापने अयमाशयः। स्वधर्मो यदि स्वहृदयादनपायि (S हृदयानपायि ) त्वादत्याज्यः कथं तर्ह्यधर्माचरणमेषाम् (S omits तर्हि) इति कोऽयं स्वधर्मो नाम येनारिक्तो (S येन न रिक्तो N येनानतिरिक्तो) जन्तुः इत्युक्तं भवति।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

अथ केन इत्युर्जनप्रश्नोऽनुपपन्नः।तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ 3।34 इति रागद्वेषयोः परिपन्थित्वस्योक्तत्वात् न हि पापप्रयोजकत्वात्। अन्यद्रागादेः पुरुषपरिपन्थित्वमित्यतः प्रश्नाभिप्रायमाह बहव इति। कारणशब्दः करोतेर्ण्यन्तात्करणे ल्युडंतः स च त्रिलिङ्गः। अयमनुमान इति भाष्ये प्रयोगात्। अथवा ण्यासश्रंथो युच् अष्टा.3।3।107 इति करणे युच्। अयं च स्त्रीलिङ्गः। बहव इत्यपि स्त्रीलिङ्ग एव।वोतो गुणवचनात् अष्टा.4।1।44 इति विकल्पविधानात्। कर्मेति पापं विवक्षितम् द्वयोरेवोक्तत्वात् कथं बहव इत्यनुवादः इत्यत आह क्रोधादय इति। पूर्वं भगवता द्वेषशब्देन मदमत्सरादयोऽप्युपलक्षिताः अरिषड्वर्गप्रसिद्धेः। तदेतद्विदित्वैवमनुवदतीति भावः। रागशब्देन कामः द्वेषशब्देन क्रोधादयश्च त्वयोक्ता इत्यर्थः। अस्य प्रश्नस्य प्रकृते क उपयोगः इत्यत आह अथेति। नास्य प्रकृतेन हेतुहेतुमद्भावादिलक्षणासङ्गतिरिति स्वयमेव सूचितमित्यर्थः। अथेति शब्देनार्थान्तरमेतदिति सूच्यते। तर्ह्यसङ्गतं न प्रष्टव्यमित्यतः सङ्गत्यन्तराभावेऽपि प्रासङ्गिकी सङ्गतिरस्तीत्याशयवान् प्रसङ्गं दर्शयति तयोरिति। अत्रापि यो बलवांस्तं प्रति महान्तं प्रयत्नं करिष्यामीति भावेन प्रश्नो युक्त एवेति भावः।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

तत्र काम्यप्रतिषिद्धकर्मप्रवृत्तिकारणमपनुद्य भगवन्मतमनुवर्तितं तत्कारणावधारणाय ध्यायतो विषयान्पुंस इत्यादिना पूर्वमनर्थमूलमुक्तम्। सांप्रतं च प्रकृतेर्गुणसंमूढा इत्यादिना बहुविस्तरं कथितम्। तत्र किं सर्वाण्यपि समप्राधान्येन कारणानि अथवैकमेव मुख्यं कारणमितराणि तु तत्सहकारीणि केवलम्। तत्राद्ये सर्वेषां पृथक्पृथङ्निवारणे महान्प्रयासः स्यात्। अन्त्ये त्वेकस्मिन्नेव निराकृते कृतकृत्यता स्यादित्यतो ब्रूहि मे केन हेतुना प्रयुक्तः प्रेरितोऽयं त्वन्मताननुवर्ती सर्वज्ञानविमूढः पुरुषः पापमनर्थानुबन्धि सर्वं फलाभिसंधिपुरःसरं काम्यं चित्रादि शत्रुवधसाधनं च श्येनादि प्रतिषिद्धं च कलञ्जभक्षणादि बहुविधं कर्माचरति स्वयं कर्तुमनिच्छन्नपि। नतु निवृत्तिलक्षणं परमपुरुषार्थानुबन्धि त्वदुपदिष्टं कर्मेच्छन्नपि करोति। नच पारतन्त्र्यं विनेत्थं संभवति। अतो येन बलादिव नियोजितो राज्ञेव भृत्यस्त्वन्मतविरुद्धं सर्वानर्थानुबन्धित्वं जानन्नपि तादृशं कर्माचरति तमनर्थमार्गप्रवर्तकं मां प्रति ब्रूहि ज्ञात्वा समुच्छेदायेत्यर्थः। हे वार्ष्णेय वृष्णिवंशे मन्मातामहकुले कृपयावतीर्णेतिसंबोधनेन वार्ष्णेयीसुतोऽहं त्वया नोपेक्षणीय इति सूचयति।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

अथ पुरुषांशानामधिष्ठाता तु भगवान् स चैवमुपदिशति। माया केषाञ्चन मोहयितुं प्रोक्ता तदा केनचिन्नियुक्तः सन्नयं पापाचरणे प्रवर्तत इत्यर्जुनो जिज्ञासुर्विज्ञापयति।अर्जुन उवाच अथ केनेति। अथ पुरुषः पुरुषसम्बन्धित्वादनिच्छन्नपि हे वार्ष्णेय भक्तिधर्मप्रवृत्यर्थं सत्कुलाविर्भूत बलान्नियोजित इव अधिष्ठात्रा प्रेरित इव केन प्रयुक्तः पापं चरति पापगतियुक्तो भवति तत्फलभोगं च करोति।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

परधर्मकृतेः पापं पुण्यं च निजधर्मतः। इति ज्ञात्वा मतं पार्थः। सन्दिहानोऽथ पृच्छति अथ केनेति।तयोर्न वशमागच्छेत् 3।37 इत्यत्यशक्यं अस्वतन्त्रत्वात् रोगिवत्। परधर्मस्वधर्मानुष्ठाने वैपरीत्यमिति पापाचरणे तु केनचित्प्रवर्त्तकेन प्राकृतेनापि भाव्यमिति अतःकेन इति प्रश्नः।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

3.36 Atha, now then; varsneya, O scion of the Vrsni dynasty; being prayuktah, impelled; kena, by what acting as the cause; as a servant is by a king, does ayam, this; purusah, man; carati, commit; papam, sin, a sinful act; api, even; anicchan, against his wish, though not himself willing; niyojitah, being constrained; balat, by force; iva, as it were-as if by a king, which illustration has already been given? The Lord (Bhaga-van) said: 'You hear about that enemy, the source of all evil, of which you ask-.' 'Bhaga is said to consist of all kinds of majesty, virtue, fame, beauty, detachment as well as Liberation [Liberation stands for its cause, Illumination.], (V.P.6.5.74). That Vasudeva, in whom reside for ever, unimpeded and in their fullness, the six alities of majesty etc. and who has the knowledge of such subjects as creation etc., is called Bhaga-van. 'He is spoken of as Bhaga-van who is aware of creation and dissolution, gain and loss, [Gain and loss stand for future prosperity and adversity.] ignorance and Illumination of all beings' (ibid. 78).

Dr. S. Sankaranarayan

20th century CE · Academic / Shaiva

Shaiva

Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.

3.36 Atha etc. The estion is this : Eventhough a man knows a sin to be a sin, why does he proceed on it ? The idea in raising this estion is this : If one's own duty cannot be (or should not be) given up, because it does not vanish from one's own heart, then how to account for the sinful acts of these men [of the world] ? This amounts to say : What is one's own duty by which the creature is never deserted ? Eventhough one's own duty rests in one's heart, the confusion (or evil) is created by the interruption (or covering) of an intruder, and it is not created by the absence of that duty-with this purport in mind, an answer to the above estion-

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

3.36 Arjuna said Impelled by what does a man practising Jnana Yoga commit sin in the form of experiencing the objects of the senses, as if constrained by force, even against his own will not to experience the objects of the senses.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 3.36?

अथ केन हेतुभूतेन प्रयुक्तः सन् राज्ञेव भृत्यः अयं पापं कर्म चरति आचरति पूरुषः पुरुषः स्वयम् अनिच्छन् अपि हे वार्ष्णेय वृष्णिकुलप्रसूत बलात् इव नियोजितः राज्ञेव इत्युक्तो दृष्टान्तः।।शृणु त्वं तं वैरिणं सर्वानर्थकरं यं त्वं पृच्छसि इति भगवान् उवाच

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 3.36, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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