Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः

अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

ஒருவரின் சொந்தக் கடமை, தகுதி இல்லாவிட்டாலும், நன்றாகச் செய்த மற்றொருவரின் கடமையை விடச் சிறந்தது. ஒருவரின் சொந்த கடமையில் மரணம் சிறந்தது; மற்றொருவரின் கடமை பயம் நிறைந்தது.

KannadaIND

ಒಬ್ಬರ ಸ್ವಂತ ಕರ್ತವ್ಯವು ಅರ್ಹತೆ ಇಲ್ಲದಿದ್ದರೂ, ಇನ್ನೊಬ್ಬರ ಕರ್ತವ್ಯಕ್ಕಿಂತ ಉತ್ತಮವಾಗಿದೆ. ಒಬ್ಬರ ಸ್ವಂತ ಕರ್ತವ್ಯದಲ್ಲಿ ಮರಣವು ಉತ್ತಮವಾಗಿದೆ; ಇನ್ನೊಬ್ಬರ ಕರ್ತವ್ಯವು ಭಯದಿಂದ ತುಂಬಿರುತ್ತದೆ.

TeluguIND

యోగ్యత లేకపోయినా, మరొకరి కర్తవ్యం బాగా నిర్వర్తించడం కంటే ఒకరి స్వంత కర్తవ్యం ఉత్తమం. ఒకరి స్వంత విధిలో మరణం ఉత్తమం; మరొకరి కర్తవ్యం భయంతో నిండి ఉంటుంది.

GujaratiIND

યોગ્યતાથી વંચિત હોવા છતાં પોતાની ફરજ એ સારી રીતે નિભાવેલ બીજાની ફરજ કરતાં વધુ સારી છે. પોતાના કર્તવ્યમાં મૃત્યુ બહેતર છે; બીજાની ફરજ ભયથી ભરેલી છે.

BengaliIND

অন্যের ভালোভাবে পালন করা কর্তব্যের চেয়ে যোগ্যতাহীন হলেও নিজের কর্তব্য করাই উত্তম। নিজের কর্তব্যে মৃত্যুই উত্তম; অন্যের কর্তব্য ভয়ে ভরা।

MalayalamIND

നന്നായി നിറവേറ്റിയ മറ്റൊരാളുടെ കർത്തവ്യത്തേക്കാൾ നല്ലത്, അർഹതയില്ലാത്തതാണെങ്കിലും സ്വന്തം കടമയാണ്. സ്വന്തം കർത്തവ്യത്തിൽ മരിക്കുന്നതാണ് നല്ലത്; മറ്റൊരാളുടെ കടമ ഭയം നിറഞ്ഞതാണ്.

NepaliIND

अर्काको राम्रोसँग निर्वाह गरेको कर्तव्यभन्दा आफ्नो कर्तब्य, योग्यता नभएको भए पनि राम्रो हो । आफ्नै कर्तव्यमा मृत्यु हुनु राम्रो हो। अर्कोको कर्तव्य डरले भरिएको छ।

PunjabiIND

ਕਿਸੇ ਦਾ ਆਪਣਾ ਫਰਜ਼, ਭਾਵੇਂ ਯੋਗਤਾ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਹੋਵੇ, ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਦੇ ਫਰਜ਼ ਨਿਭਾਉਣ ਨਾਲੋਂ ਚੰਗਾ ਹੈ। ਆਪਣੇ ਫਰਜ਼ ਵਿੱਚ ਮੌਤ ਬਿਹਤਰ ਹੈ; ਦੂਜੇ ਦਾ ਫਰਜ਼ ਡਰ ਨਾਲ ਭਰਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ।

SindhiIND

بهتر آهي ته هڪ پنهنجو فرض، جيتوڻيڪ قابليت کان خالي هجي، ڪنهن ٻئي جي فرض کان بهتر آهي. پنهنجي فرض ۾ موت بهتر آهي. ٻئي جو فرض خوف سان ڀريل آهي.

MarathiIND

योग्यता नसलेले असले तरी स्वतःचे कर्तव्य पार पाडलेल्या दुसऱ्याच्या कर्तव्यापेक्षा चांगले आहे. स्वतःच्या कर्तुत्वात मरण बरे; दुसऱ्याचे कर्तव्य भयाने भरलेले आहे.

OdiaIND

ଅନ୍ୟର କୂଅରୁ ବଞ୍ଚିତ ହୋଇଥିବା କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଅପେକ୍ଷା ନିଜର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଭଲ, ଯଦିଓ ଯୋଗ୍ୟତା ଅଭାବରୁ | ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ମୃତ୍ୟୁ ଭଲ; ଅନ୍ୟର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଭୟରେ ଭରି ରହିଛି |

KonkaniIND

बऱ्या प्रमाणांत निर्वाह केल्ल्या दुसऱ्याच्या कर्तव्यापरस आपलें कर्तव्य जरी पुण्यहीन आसलें तरी बरें. स्वताच्या कर्तव्यांत मरण बरें; दुसऱ्याचें कर्तव्य भंयान भरिल्लें आसता.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.35।। व्याख्या--'श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्'--अन्य वर्ण, आश्रम आदिका धर्म (कर्तव्य) बाहरसे देखनेमें गुणसम्पन्न हो, उसके पालनमें भी सुगमता हो, पालन करनेमें मन भी लगता हो, धन-वैभव, सुख-सुविधा, मान-बड़ाई आदि भी मिलती हो और जीवनभर सुख-आरामसे भी रह सकते हों, तो भी उस परधर्मका पालन अपने लिये विहित न होनेसे परिणाममें भय-(दुःख-) को देनेवाला है।इसके विपरीत अपने वर्ण, आश्रम आदिका धर्म बाहरसे देखनेमें गुणोंकी कमीवाला हो उसके पालनमें भी कठिनाई हो, पालन करनेमें मन भी न लगता हो, धन-वैभव, सुख-सुविधा, मान-बड़ाई आदि भी न मिलती हो और उसका पालन करनेमें जीवन-भर कष्ट भी सहना पड़ता हो, तो भी उस स्वधर्मका निष्कामभावसे पालन करना परिणाममें कल्याण करनेवाला है। इसलिये मनुष्यको किसी भी स्थितिमें अपने धर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत निष्काम, निर्मम और अनासक्त होकर स्वधर्मका ही पालन करना चाहिये।मनुष्यके लिये स्वधर्मका पालन स्वाभाविक है, सहज है। मनुष्यका 'जन्म' कर्मोंके अनुसार होता है और जन्मके अनुसार भगवान्ने 'कर्म' नियत किये हैं, (गीता 18। 41)। अतः अपने-अपने नियत कर्मोंका पालन करनेसे मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है अर्थात् उसका कल्याण हो जाता है (गीता 18। 45)। अतः दोषयुक्त दीखनेपर भी नियत कर्म अर्थात् स्वधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये (गीता 18। 48)। अर्जुन युद्ध करनेकी अपेक्षा भिक्षाका अन्न खाकर जीवननिर्वाह करनेको श्रेष्ठ समझते हैं (गीता 2। 5)। परंतु यहाँ भगवान् अर्जुनको मानो यह समझाते हैं कि भिक्षाके अन्नसे जीवननिर्वाह करना भिक्षुकके लिये स्वधर्म होते हुए भी तेरे लिये परधर्म है; क्योंकि तू गृहस्थ क्षत्रिय है, भिक्षुक नहीं। पहले अध्यायमें भी जब अर्जुनने कहा कि युद्ध करनेसे पाप ही लगेगा--'पापमेवाश्रयेत्' (1। 36) तब भी भगवान्ने कहा कि धर्ममय युद्ध न करनेसे तू स्वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त होगा (2। 33)। फिर भगवान्ने बताया कि जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर युद्ध करनेसे अर्थात् राग-द्वेषसे रहित होकर अपने कर्तव्य-(स्वधर्म-) का पालन करनेसे पाप नहीं लगता। (2। 38) आगे अठारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने यही बात कही है कि स्वभावनियत स्वधर्मरूप कर्तव्यको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। (18। 47) तात्पर्य यह है कि स्वधर्मके पालनमें राग-द्वेष रहनेसे ही पाप लगता है, अन्यथा नहीं। राग-द्वेषसे रहित होकर स्वधर्मका भलीभाँति आचरण करनेसे 'समता'-(योग-) का अनुभव होता है और समताका अनुभव होनेपर दुःखोंका नाश हो जाता है (गीता 6। 23)। इसलिये भगवान् बार-बार अर्जुनको राग-द्वेषसे रहित होकर युद्धरूप स्वधर्मका पालन करनेपर जोर देते हैं।भगवान् अर्जुनको मानो यह समझाते हैं कि क्षत्रिय-कुलमें जन्म होनेके कारण क्षात्रधर्मके नाते युद्ध करना तुम्हारा स्वधर्म (कर्तव्य) है; अतः युद्धमें जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान देखना है; और युद्धरूप क्रियाका सम्बन्ध अपने साथ नहीं है-- ऐसा समझकर केवल कर्मोंकी आसक्ति मिटानेके लिये कर्म करना है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदि अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही हैं।वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार अपने-अपने कर्तव्यका निःस्वार्थभावसे पालन करना ही 'स्वधर्म' है। आस्तिकजन जिसे 'धर्म' कहते हैं, उसीका नाम कर्तव्य' है। स्वधर्मका पालन करना अथवा अपने कर्तव्यका पालन करना एक ही बात है। कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसको सुगमतापूर्वक कर सकते हैं, जो अवश्य करनेयोग्य है और जिसको करनेपर प्राप्तव्यकी प्राप्ति अवश्य होती है। धर्मका पालन करना सुगम होता है; क्योंकि वह कर्तव्य होता है। यह नियम है कि केवल अपने धर्मका ठीक-ठीक पालन करनेसे मनुष्यको वैराग्य हो जाता है--'धर्म तें बिरति' ৷৷. (मानस 3। 16। 1)। केवल कर्तव्यमात्र समझकर धर्मका पालन करनेसे कर्मोंका प्रवाह प्रकृतिमें चला जाता है और इस तरह अपने साथ कर्मोंका सम्बन्ध नहीं रहता।वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार सभी मनुष्योंका अपना-अपना कर्तव्य (स्वधर्म) कल्याणप्रद है। परन्तु दूसरे वर्ण, आश्रम आदिका कर्तव्य देखनेसे अपना कर्तव्य अपेक्षाकृत कम गुणोंवाला दीखता है; जैसे--ब्राह्मणके कर्तव्य--(शम, दम, तप, क्षमा आदि-) की अपेक्षा क्षत्रियके कर्तव्य-(युद्ध करना आदि-) में अहिंसादि गुणोंकी कमी दीखती है। इसलिये यहाँ 'विगुणः' पद देनेका भाव यह है कि दूसरोंके कर्तव्यसे अपने कर्तव्यमें गुणोंकीकमी दीखनेपर भी अपना कर्तव्य ही कल्याण करनेवाला है। अतः किसी भी अवस्थामें अपने कर्तव्यका त्यगा नहीं करना चाहिये।वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार बाहरसे तो कर्म अलग-अलग (घोर या सौम्य) प्रतीत होते हैं, पर परमात्मप्राप्तिरूप उद्देश्य एक ही होता है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य न रहनेसे तथा अन्तःकरणमें प्राकृत पदार्थोंका महत्त्व रहनेसे ही कर्म घोर या सौम्य प्रतीत होते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

रागद्वेषयुक्त मनुष्य तो शास्त्रके अर्थको भी उलटा मान लेता है और परधर्मको भी धर्म होनेके नाते अनुष्ठान करनेयोग्य मान बैठता है। परंतु उसका ऐसा मानना भूल है अच्छी प्रकार अनुष्ठान किये गये अर्थात् अंगप्रत्यंगोंसहित सम्पादन किये गये भी परधर्मकी अपेक्षा गुणरहित भी अनुष्ठान किया हुआ अपना धर्म कल्याणकर है अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है। परधर्ममें स्थित पुरुषके जीवनकी अपेक्षा स्वधर्ममें स्थित पुरुषका मरण भी श्रेष्ठ है क्योंकि दूसरेका धर्म भयदायक है नरक आदि रूप भयका देनेवाला है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

रागद्वेषयोः श्रेयोमार्गप्रतिपक्षत्वं प्रकटयितुं परमतोपन्यासद्वारा समनन्तरश्लोकमवतारयति तत्रेत्यादिना। व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। शास्त्रार्थस्यान्यथा प्रतिपत्तिमेव प्रत्याययति परधर्मोऽपीति। स्वधर्मवदित्यपेरर्थः। अनुमानं दूषयन्नुत्तरत्वेन श्लोकमुत्थापयति सदसदिति। क्षत्रधर्माद् युद्धाद् दुरनुष्ठानात्परिव्राड्धर्मस्य भिक्षाशनादिलक्षणस्य स्वानुष्ठेयतयापि कर्तव्यत्वं प्राप्तमित्याशङ्क्य व्याचष्टे श्रेयानिति। उक्तेऽर्थे प्रश्नपूर्वकं हेतुमाह कस्मादित्यादिना। स्वधर्ममवधूय परधर्ममनुतिष्ठतः स्वधर्मातिक्रमकृतदोषस्य दुष्परिहरत्वान्न तत्त्यागः साधीयानित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

ननु शास्त्रीयमेव कर्म कर्तव्यं चेत्तर्हि परधर्मोऽपि सुकरो धर्मत्वात् कुतो नानुष्ठेय इति चेत्तत्राह श्रेयानिति। परधर्मात्साद्गुण्येन संपादितादपि स्वकीयो धर्मो विगतगुणोऽप्यनुष्ठीयमानः प्रशस्यतरः। स्वधर्मे स्थितस्य मरणमपि श्रेयः। इह लोके कीर्त्यावहममुत्र स्वर्गप्रापकम्। परधर्मस्तु तद्विपर्ययेण भयप्रदः। यद्वा तत्तदिन्द्रियविषये स्थितयो रागद्वेषयोरात्मप्रापक आत्मधर्मे विघ्नकर्तृत्वेऽपीन्द्रियधर्मे प्रावृत्तिके विषयसुखजनके तयोस्तत्त्वाभावादिन्द्रियधर्म एवानुष्ठेयः। किमात्मधर्मानुष्ठानेन विघ्नकर्तृयुक्तेनेतिचेत्तत्राह श्रेयानिति। परेषामिन्द्रियाणां धर्मात्प्रावृत्तिकात्स्वनुष्ठितात्सुगमत्वेनानुष्ठातुं शक्यादपि स्वधर्म आत्मधर्म अध्यात्मावगतिरुपः विगुणः प्राकृतगुणवियुक्तः मुक्तिहेतुत्वात्प्रशस्यतरः। तत्र निधनं श्रेयः अपुनर्भवत्वात्। परधर्मोभयावहः अविद्यारुपतया संसारपातहेतुत्वात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhreyānbetter
swadharmaḥ
viguṇaḥtinged with faults
paradharmāt
suanuṣhṭhitāt
swadharme
nidhanamdeath
śhreyaḥbetter
paradharmaḥ
bhayaāvahaḥ
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.34
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ

इन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.36
अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः

हे वार्ष्णेय ! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुएकी तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 35
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः

अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ: "अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 35?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 35 translates to: "Better is one's own duty, though devoid of merit, than the duty of another well discharged. Better is death in one's own duty; the duty of another is fraught with fear. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भय" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 35 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt" mean in English?

"śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 35. Better is one's own duty, though devoid of merit, than the duty of another well discharged. Better is death in one's own duty; the duty of another is fraught with fear. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.