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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि

राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है। — VaniSagar

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BengaliIND

জনক এবং অন্যান্যরা প্রকৃতপক্ষে শুধুমাত্র কর্মের মাধ্যমেই পূর্ণতা লাভ করেছিল; এমনকি জনসাধারণকে রক্ষা করার অভিপ্রায় নিয়েও, আপনার কাজ করা উচিত।

KannadaIND

ಜನಕ ಮತ್ತು ಇತರರು ಕೇವಲ ಕ್ರಿಯೆಯ ಮೂಲಕ ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆದರು; ಜನಸಾಮಾನ್ಯರನ್ನು ರಕ್ಷಿಸುವ ಉದ್ದೇಶದಿಂದ ಕೂಡ ನೀವು ಕಾರ್ಯವನ್ನು ಮಾಡಬೇಕು.

KonkaniIND

जनक आनी हेरांनी खरेंच फकत कर्मांतल्यान परिपूर्णताय मेळयली; भौसाची राखण करपाच्या हेतान लेगीत तुमी कृती करची.

ManipuriIND

ꯖꯅꯛ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯇꯣꯞꯄꯁꯤꯡꯅꯥ ꯇꯁꯦꯡꯅꯥ ꯊꯕꯛ ꯈꯛꯇꯒꯤ ꯈꯨꯠꯊꯥꯡꯗꯥ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯕꯥ ꯐꯪꯈꯤ; ꯃꯤꯌꯥꯃꯕꯨ ꯉꯥꯀꯊꯣꯛꯅꯕꯥ ꯋꯥꯈꯜꯂꯣꯅꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯐꯥꯑꯣꯕꯥ ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯊꯕꯛ ꯄꯥꯌꯈꯠꯀꯗꯕꯅꯤ꯫

BhojpuriIND

जनक आदि लोग वाकई में खाली कर्म से सिद्धि प्राप्त कइल; जनता के रक्षा के इरादा से भी रउआ कर्म करे के चाहीं।

MalayalamIND

ജനകനും മറ്റുള്ളവരും പൂർണ്ണത കൈവരിക്കുന്നത് പ്രവർത്തനത്തിലൂടെ മാത്രം; ബഹുജനങ്ങളെ സംരക്ഷിക്കുക എന്ന ഉദ്ദേശത്തോടെ പോലും നിങ്ങൾ കർമ്മം ചെയ്യണം.

TeluguIND

జనక మరియు ఇతరులు కేవలం చర్య ద్వారానే పరిపూర్ణతను సాధించారు; ప్రజానీకాన్ని రక్షించే ఉద్దేశ్యంతో కూడా, మీరు చర్య తీసుకోవాలి.

GujaratiIND

જનક અને અન્ય લોકોએ માત્ર ક્રિયા દ્વારા જ પૂર્ણતા પ્રાપ્ત કરી હતી; જનતાને બચાવવાના ઈરાદા સાથે પણ તમારે ક્રિયા કરવી જોઈએ.

AssameseIND

জনক আদিয়ে সঁচাকৈয়ে কেৱল কৰ্মৰ দ্বাৰাই সিদ্ধতা লাভ কৰিছিল; আনকি জনসাধাৰণক সুৰক্ষা দিয়াৰ উদ্দেশ্যেৰেও আপুনি কাৰ্য্য সম্পাদন কৰিব লাগে।

PunjabiIND

ਜਨਕ ਅਤੇ ਹੋਰਾਂ ਨੇ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਕੇਵਲ ਕਿਰਿਆ ਦੁਆਰਾ ਹੀ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ; ਜਨਤਾ ਦੀ ਰੱਖਿਆ ਦੇ ਇਰਾਦੇ ਨਾਲ ਵੀ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ।

TamilIND

ஜனகனும் மற்றவர்களும் செயலால் மட்டுமே முழுமை அடைந்தனர்; மக்களைப் பாதுகாக்கும் நோக்கத்துடன் கூட, நீங்கள் செயலைச் செய்ய வேண்டும்.

OdiaIND

ଜନାକା ଏବଂ ଅନ୍ୟମାନେ ପ୍ରକୃତରେ କେବଳ କାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ସିଦ୍ଧତା ହାସଲ କଲେ; ଜନତାଙ୍କୁ ସୁରକ୍ଷା ଦେବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ୍ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः'--'आदि' पद 'प्रभृति' (आरम्भ) तथा 'प्रकार' दोनोंका वाचक माना जाता है। यदि यहाँ आये 'आदि' पदको 'प्रभृति' का वाचक माना जाय तो 'जनकादयः' पदका अर्थ होगा--जिनके आदि-(आरम्भ-) में राजा जनक हैं अर्थात् राजा जनक तथा उनके बादमें होनेवाले महापुरुष। परन्तु यहाँ ऐसा अर्थ मानना ठीक नहीं प्रतीत होता; क्योंकि राजा जनकसे पहले भी अनेक महापुरुष कर्मोंके द्वारा परमसिद्धिको प्राप्त हो चुके थे; जैसे सूर्य, वैवस्वत मनु, राजा इक्ष्वाकु आदि (गीता 4। 12)। इसलिये यहाँ 'आदि' पदको 'प्रकार' का वाचक मानना ही उचित है, जिसके अनुसार 'जनकादयः'पदका अर्थ है--राजा जनक-जैसे गृहस्थाश्रममें रहकर निष्कामभावसे सब कर्म करते हुए परमसिद्धिको प्राप्त हुए महापुरुष, जो राजा जनकसे पहले तथा बादमें (आजतक) हो चुके हैं।कर्मयोग बहुत पुरातन योग है, जिसके द्वारा राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं। अतः वर्तमानमें तथा भविष्यमें भी यदि कोई कर्मयोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त करना चाहे तो उसे चाहिये कि वह मिली हुई प्राकृत वस्तुओं-(शरीरादि-) को कभी अपनी और अपने लिये न माने। कारण कि वास्तवमें वे अपनी और अपने लिये हैं ही नहीं, प्रत्युत संसारकी और संसारके लिये ही हैं। इस वास्तविकताको मानकर संसारसे मिली वस्तुओंको संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे सुगमतापूर्वक संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्मप्राप्ति हो जाती है। इसलिये कर्मयोग परमात्मप्राप्तिका सुगम, श्रेष्ठ और स्वतन्त्र साधन है--इसमें कोई सन्देह नहीं। यहाँ 'कर्मणा एव' पदोंका सम्बन्ध पूर्वश्लोकके 'असक्तो ह्याचरन्कर्म' पदोंसे अर्थात् आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे है; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त होता है, केवल कर्म करनेसे नहीं। केवल कर्म करनेसे तो प्राणी बँधता है--'कर्मणा बध्यते जन्तुः' (महा0 शान्ति0 241। 7)।गीताकी यह शैली है कि भगवान् पीछेके श्लोकमें वर्णित विषयकी मुख्य बातको (जो साधकोंके लिये विशेष उपयोगी होती है) संक्षेपसे आगेके श्लोकमें पुनः कह देते हैं, जैसे पीछेके (उन्नीसवें) श्लोकमें आसक्तिरहित होकर कर्म करनेकी आज्ञा देकर इस बीसवें श्लोकमें उसी बातको संक्षेपसे 'कर्मणा एव' पदोंसे कहते हैं। इसी प्रकार आगे बारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें वर्णित विषयकी मुख्य बातको सातवें श्लोकमें संक्षेपसे 'मय्यावेशितचेतसाम्' (मुझमें चित्त लगानेवाले भक्त) पदसे पुनः कहेंगे।यहाँ भगवान् 'कर्मणा एव' के स्थानपर 'योगेन एव' भी कह सकते थे। परन्तु अर्जुनका आग्रह कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेका होने तथा (आसक्तिरहित होकर किये जानेवाले) कर्मका ही प्रसङ्ग चलनेके कारण 'कर्मणा एव' पदोंका प्रयोग किया गया है। अतः यहाँ इन पदोंका अभिप्राय (पूर्वश्लोकके अनुसार) आसक्तिरहित होकर किये गये कर्मयोगसे ही है।वास्तवमें चिन्मय परमात्माकी प्राप्ति जड कर्मोंसे नहीं होती। नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव होनेमें जो बाधाएँ हैं, वे आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे दूर हो जाती हैं। फिर सर्वत्र परिपूर्ण स्वतःसिद्ध परमात्माका अनुभव हो जाता है। इस प्रकार परमात्मतत्त्वके अनुभवमें आनेवाली बाधाओंको दूर करनेके कारण यहाँ कर्मके द्वारा परमसिद्धि(परमात्मतत्त्व) की प्राप्तिकी बात कही गयी है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

एक और भी कारण है क्योंकि पहले जनकअश्वपति प्रभृति विद्वान् क्षत्रिय लोग कर्मोंद्वारा ही मोक्षप्राप्तिके लिये प्रवृत्त हुए थे। यहाँ इस श्लोककी व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिये कि यदि वे जनकादि यथार्थ ज्ञानको प्राप्त हो चुके थे तब तो वे प्रारब्धकर्मा होनेके कारण लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हुए ही अर्थात् संन्यास ग्रहण किये बिना ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए और यदि वे जनकादि यथार्थ ज्ञानको प्राप्त नहीं थे तो वे अन्तःकरणकी शुद्धिके साधनरूप कर्मोंसे क्रमशः परम सिद्धिको प्राप्त हुए। यदि तू यह मानता हो कि आत्मतत्त्वको न जाननेवाले जनकादि पूर्वजोंद्वारा कर्तव्यकर्म किये गये हैं इससे यह नहीं हो सकता कि दूसरे आत्मज्ञानी कृतार्थ पुरुषोंको भी कर्म अवश्य करने चाहिये। तो भी तू प्रारब्धकर्मके अधीन है इसलिये तुझे लोकसंग्रहकी तरफ देखकर भी अर्थात् लोगोंकी उलटे मार्गमें जानेवाली प्रवृत्तिको निवारण करनारूप जो लोकसंग्रह है उस लोकसंग्रहरूप प्रयोजनको देखते हुए भी कर्म करना चाहिये।

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Sri Anandgiri

यद्यपि जितेन्द्रियोऽपि विवेकी श्रवणादिभिरजस्रं ब्रह्मणि निष्ठातुं शक्नोति तथापि क्षत्रियेण त्वया विहितं कर्म न त्याज्यमित्याह यस्माच्चेति। तस्मात्त्वमपि कर्म कर्तुमर्हसीति संबन्धः। इतोऽपि त्वया विहितं कर्म कर्तव्यमित्याह लोकेति। पूर्वार्धं विभजते कर्मणैवेति। कथं जनकादीनां कर्मणा संसिद्धिप्राप्तिरुच्यते कर्मत्यजां हि सम्यग्दर्शनवतां प्रसिद्धा संसिद्धिरिति। तत्र किं जनकादयोऽपि प्राप्तसम्यग्दर्शनाः स्युरुताप्राप्तसम्यग्दर्शना भवेयुरिति विकल्प्य प्रथमं प्रत्याह यदीति। लोकसंग्रहार्थं कर्मणा सहैव संसिद्धिमास्थिता इति संबन्धः। कर्मणा सहैवेत्येतद्व्याकरोति असंन्यस्यैव कर्मेति। तत्र हेतुमाह प्रारब्धेति। जनकादीनां सत्यपि ज्ञानित्वे प्रारब्धकर्मवशात्कर्मापरित्यज्यैव लोकसंग्रहार्थं प्रवर्तमानानां ज्ञानमाहात्म्यादुपपन्ना संसिद्धिरित्यर्थः। द्वितीयमनूद्य पूर्वार्धेनैवोत्तरमाह अथेत्यादिना। द्वितीयार्धव्यावर्त्यामाशङ्कामुत्थापयति अथेति। अज्ञेनाकृतार्थेन कृतं कर्मेत्येतावता ज्ञानवता कृतकृत्येन न तत्कर्तव्यमित्युक्तमङ्गीकरोति तथापीति। तर्हि मयापि ज्ञानवता कृतार्थेन कर्म न कर्तव्यमित्याशङ्क्यार्जुनस्य कर्तव्यमेव कर्मेत्युत्तरार्धव्याख्यानेन कथयति प्रारब्धेति।

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Sri Dhanpati

हि यस्माच्च जनकादयो जनकाश्चपतिप्रभृतयः पूर्वेणैव शुद्धसत्त्वाः सन्तः संसिद्धिं सम्यग्ज्ञानं प्राप्ता इत्यर्थः। यद्यपि त्वं सभ्यग्ज्ञानिनमेवात्मानं मन्यसे तथापि कर्माचरणं भद्रमेवेत्याह क्षत्रियाः कर्मणैव संसिद्धिं मोक्षं गन्तुमास्थिताः प्रवृत्ताः श्रवणादिसाध्यां ज्ञाननिष्ठां प्राप्ता इति वा। इदं व्याख्यानं परमाप्नोति पूरुष इति पूर्वोक्तानुगुणमत आचार्यैः परित्यक्तम्। यदि प्राप्तसम्यग्दर्शनास्तर्हि लोकसंग्रहार्थं प्रारब्धकर्मत्वात्कर्मणा सहैवासंन्यस्यैवाथाप्राप्तसम्यगदर्शनास्तदा कर्मणा चित्तशुद्धिसाधनभूतेन कर्मणेत्यर्थः। पूर्वैरप्यज्ञानद्भिरेव कर्तव्यं कर्मं कृतमतो नावश्यमन्येन तत्त्वज्ञेन कृतार्थेन कर्तव्यमिति चेत्तथापि प्रारब्धकर्माधीनस्त्वं लोकस्योन्मार्गप्रवृत्तिनिवारणं लोकसंग्रहस्तमेवापि प्रयोजनं संपश्यन कर्तुमर्हसीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
karmaṇāby the performance of prescribed duties
evaonly
hicertainly
sansiddhimperfection
āsthitāḥattained
janakaādayaḥ
lokasaṅgraham
eva apionly
sampaśhyanconsidering
kartumto perform
arhasiyou should
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.19
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः

इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते

श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि

राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 20 translates to: "Janaka and others attained perfection indeed through action alone; even with the intention of protecting the masses, you should perform action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "karmaṇaiva hi sansiddhim āsthitā janakādayaḥ" mean in English?

"karmaṇaiva hi sansiddhim āsthitā janakādayaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 20. Janaka and others attained perfection indeed through action alone; even with the intention of protecting the masses, you should perform action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.