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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 2
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्िचत्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्

अर्जुन बोले -- हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि- (ज्ञान-) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ। — VaniSagar

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MalayalamIND

ആശയക്കുഴപ്പമുണ്ടാക്കുന്ന ഈ പ്രസംഗം കൊണ്ട്, നിങ്ങൾ എൻ്റെ ധാരണയെ ആശയക്കുഴപ്പത്തിലാക്കുന്നതായി തോന്നുന്നു; അതിനാൽ, എനിക്ക് പരമാനന്ദം നേടാനുള്ള ഒരു മാർഗം പറഞ്ഞുതരിക.

PunjabiIND

ਇਸ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਬੋਲੀ ਨਾਲ, ਤੁਸੀਂ ਮੇਰੀ ਸਮਝ ਨੂੰ ਉਲਝਾ ਰਹੇ ਹੋ; ਇਸ ਲਈ, ਮੈਨੂੰ ਕੋਈ ਅਜਿਹਾ ਤਰੀਕਾ ਦੱਸੋ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਮੈਂ ਅਨੰਦ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਾਂ।

GujaratiIND

આ દેખીતી રીતે મૂંઝવણભરી વાણીથી, તમે મારી સમજણને મૂંઝવણમાં મૂકતા જણાય છે; તેથી, મને એક ચોક્કસ માર્ગ જણાવો જેના દ્વારા હું આનંદ પ્રાપ્ત કરી શકું.

TamilIND

இந்த குழப்பமான பேச்சு மூலம், நீங்கள் என் புரிதலை குழப்புவது போல் தெரிகிறது; எனவே, நான் பேரின்பத்தை அடைய ஒரு குறிப்பிட்ட வழியைச் சொல்லுங்கள்.

BengaliIND

এই আপাতদৃষ্টিতে বিভ্রান্তিকর বক্তৃতা দিয়ে, আপনি আমার বোঝার বিভ্রান্তি করছেন বলে মনে হচ্ছে; অতএব, আমাকে একটি নির্দিষ্ট উপায় বলুন যার দ্বারা আমি পরমানন্দ লাভ করতে পারি।

KannadaIND

ಈ ತೋರಿಕೆಯಲ್ಲಿ ಗೊಂದಲದ ಭಾಷಣದಿಂದ, ನೀವು ನನ್ನ ತಿಳುವಳಿಕೆಯನ್ನು ಗೊಂದಲಗೊಳಿಸುತ್ತಿರುವಂತೆ ತೋರುತ್ತಿದೆ; ಆದ್ದರಿಂದ, ನಾನು ಆನಂದವನ್ನು ಪಡೆಯುವ ಒಂದು ನಿರ್ದಿಷ್ಟ ಮಾರ್ಗವನ್ನು ನನಗೆ ತಿಳಿಸಿ.

OdiaIND

ଏହି ଜଟିଳ ମନେହେଉଥିବା ବକ୍ତବ୍ୟ ସହିତ, ତୁମେ ମୋର ବୁ understanding ାମଣାକୁ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱରେ ପକାଉଛ; ତେଣୁ, ମୋତେ ଏକ ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ଉପାୟ କୁହ ଯାହା ଦ୍ I ାରା ମୁଁ ସୁଖ ପ୍ରାପ୍ତ କରିପାରିବି |

MaithiliIND

एहि भ्रमित करय बला भाषण सँ अहाँ हमर समझ केँ भ्रमित क' रहल छी; तेँ एकटा निश्चित तरीका बताउ जाहि सँ हम आनंद प्राप्त क' सकब।

NepaliIND

यो अचम्मलाग्दो बोलीको साथ, तपाईं मेरो बुझाइलाई भ्रमित गर्दै हुनुहुन्छ जस्तो लाग्छ; तसर्थ, मलाई एक निश्चित उपाय बताउनुहोस् जसद्वारा म परमानन्द प्राप्त गर्न सकूँ।

TeluguIND

ఈ అస్పష్టమైన ప్రసంగంతో, మీరు నా అవగాహనను గందరగోళానికి గురిచేస్తున్నట్లున్నారు; కాబట్టి, నేను పరమానందాన్ని పొందేందుకు ఒక నిర్దిష్ట మార్గం చెప్పండి.

BhojpuriIND

एह भ्रमित करे वाला लागत भाषण से रउरा हमरा समझ के भ्रमित करत लउकत बानी; एह से एगो खास तरीका बताईं जवना से हम आनंद के प्राप्ति कर सकीले।

KonkaniIND

ह्या भ्रमित दिसपी उलोवपान तुमी म्हजी समजूत गोंदळ घालतात अशें दिसता; देखून म्हाका आनंद मेळपाचो एक खाशेलो मार्ग सांगात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'जनार्दन'-- इस पदसे अर्जुन मानो यह भाव प्रकट करते हैं कि हे श्री कृष्ण! आप सभीकी याचना पूरी करनेवाले हैं; अतः मेरी याचना तो अवश्य ही पूरी करेंगे।'ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ৷৷. नियोजयसि केशव'-- मनुष्यके अन्तःकरणमें एक कमजोरी रहती है कि वह प्रश्न करके उत्तरके रूपमें भी वक्तासे अपनी बात अथवा सिद्धान्तका ही समर्थन चाहता है। इसे कमजोरी इसलिये कहा गया है कि वक्ताके निर्देशका चाहे वह मनोऽनुकूल हो या सर्वथा प्रतिकूल, पालन करनेका निश्चय ही शूरवीरता है, शेष सब कमजोरी या कायरता ही कही जायगी। इस कमजोरीके कारण ही मनुष्यको प्रतिकूलता सहनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। जब वह प्रतिकूलताको सह नहीं सकता, तब वह अच्छाईका चोला पहन लेता है अर्थात् तब भलाईकी वेशमें बुराई आती है। जो बुराई भलाईके वशमें आती है, उसका त्याग करना बड़ा कठिन होता है। यहाँ अर्जुनमें भी हिंसा-त्यागरूप भलाईके वशेमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। अतः वे कर्तव्य-कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मान रहे हैं। इसी कारण वे यहाँ प्रश्न करते हैं कि यदि आप कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे युद्धरूप घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा यद्यपि भगवान् स्पष्ट कहनेवाले हैं तो भी मुझ मन्दबुद्धिको भगवान्के वाक्य मिले हुएसे प्रतीत होते हैं उन मिले हुएसे वचनोंसे आप मानो मेरी बुद्धिको मोहित कर रहे हैं। वास्तवमें आप तो मेरी बुद्धिका मोह दूर करनेके लिये प्रवृत्त हुए हैं फिर मुझे मोहित कैसे करते इसीलिये कहता हूँ कि आप मेरी बुद्धिको मोहितसी करते हैं। आप यदि अलगअलग अधिकारियोंद्वारा किये जाने योग्य ज्ञान और कर्मका अनुष्ठान एक पुरुषद्वारा किया जाना असम्भव मानते हैं तो उन दोनोंमेंसे ज्ञान या कर्म यही एक बुद्धि शक्ति और अवस्थाके अनुसार अर्जुनके लिये योग्य है ऐसा निश्चय करके मुझसे कहिये जिस ज्ञान या कर्म किसी एकसे में कल्याणको प्राप्त कर सकूँ। यदि कर्मनिष्ठामें गौणरूपसे भी ज्ञानको भगवान्ने कहा होता तो दोनोंमेंसे एक कहिये इस प्रकार एकहीको सुननेकी अर्जुनकी इच्छा कैसे होती क्योंकि ज्ञान और कर्म इन दोनोंमेंसे मैं तुझसे एक ही कहूँगा दोनों नहीं ऐसा भगवान्ने कहीं नहीं कहा कि जिससे अर्जुन अपने लिये दोनोंकी प्राप्ति असम्भव मानकर एकके लिये ही प्रार्थना करता।

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Sri Anandgiri

यत्तु वृत्तिकारैरुक्तं श्रौतेन स्मार्तेन च कर्मणा समुच्चयो गृहस्थानां श्रेयःसाधनमितरेषां स्मार्तेनैवेति भगवतोक्तमर्जुनेन च निर्वारितमिति तदेतदनुवदति अथेति। तत्रापि तत्किमित्याद्युपालम्भवचनमनुपपन्नं कर्ममात्रसमुच्चयवादिनो भगवतो नियोजनाभावादिति दूषयति तत्किमिति। इतश्च प्रश्नः समुच्चयानुसारी न भवतीत्याह किञ्चेति। भगवतो विविक्तार्थवादित्वादयुक्तं व्यामिश्रेणेत्यादिवचनमित्याशङ्क्याह यद्यपीति। यदि भगवद्वचनं संकीर्णमिव ते भाति तर्हि तेन त्वदीयबुद्धिव्यामोहनमेव तस्य विवक्षितमिति किमिति मोहयसीवेत्युच्यते तत्राह ममेति। ज्ञानकर्मणी मिथो विरोधाद्युगपदेकपुरुषाननुष्ठेयतया भिन्नकर्तृके कथ्येत तथाच तयोरन्यतरस्मिन्नेव त्वं नियुक्तो नतु ते बुद्धिव्यामोहनमभिमतमिति भगवतो मतमनुवदति त्वं त्विति। तदेकमित्यादिश्लोकार्थेनोत्तरमाह तत्रेति। उक्तं भागवतमतं सप्तम्या परामृश्यते। एकमित्युक्तप्रकारोक्तिः। एकमित्युक्तमेव स्फुटयति बुद्धिमिति। निश्चयप्रकारं प्रकटयति इदमिति। योग्यत्वं स्पष्टयति बुद्धीति। अस्य क्षत्रियस्य सतोऽन्तःकरणस्य देहशक्तेः समरसमारम्भावस्थायाश्चेदमेव ज्ञानं कर्म वानुगुणमिति निर्धार्य ब्रूहीत्यर्थः। निश्चित्यान्यतरोक्तौ तेन श्रोतुः श्रेयोवाप्तिं फलमाह येनेति। तदेकमित्यादिवाक्यस्याक्षरोत्थमर्थमुक्त्वा समुच्चयस्य शास्त्रार्थत्वाभावे तात्पर्यमाह यदि हीति। गुणभूतमपीत्यादिना प्रधानभूतमपि वेति विवक्षितं। नतूभयप्राप्त्यसंभवमात्मनो मन्यमानस्यार्जुनस्यान्यतरविषया शुश्रूषा भविष्यति नेत्याह नहीति। यथोक्तभगवद्वचनाभावे द्वयप्राप्त्यसंभवबुद्ध्या नान्यतरप्रार्थना संभवतीत्याह येनेति। नहि तथाविधं भगवद्वचनं भवतेष्टं भगवतः समुच्चयवादित्वाङ्गीकारादतस्तदभावादुक्तबुद्ध्या न युक्तान्यतरप्रार्थनेत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

ननु त्वया सैव ज्यायसी ममेति मद्वाक्यान्निश्चिता चेत्किमर्थमधुना पृच्छसी त्याशङ्क्याह व्यामिश्रेणेवेति।बुद्य्धा युक्तो यया इत्यादिना कर्मप्रशसां या निशा सर्वभूतानाम् इत्यादिना ज्ञानप्रशंसाकर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यादिना मम कर्मण्येवाधिकारबोधनंत्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इति ज्ञाननिष्ठाधिकारबोधनमित्येवं व्यामिश्रेण किं श्रेष्ठं किमश्रेष्ठं क्व ममाधिकारः क्व नेति संदेहोत्पादकेन वाक्येन। यद्यपि विविक्ताभिधायी भगवांस्तथापि मम मन्दबुद्धेर्व्यामिश्रमिव भगवद्वाक्यं प्रतिभातीतीवशब्दार्थः। मम बुद्धेर्मोहापनयार्थं हि प्रवृत्तस्त्वं कथं मोहयस्यतो ब्रवीमि बुद्धिं मोहयसीव म इति। भिन्नकर्तृकयोर्ज्ञानकर्मणोरेकपुरुषानुष्ठानासंभवं यदि त्वं मन्यसे तर्हि तयोर्मध्ये एकं ज्ञानं वा कर्म वा इदमेव तव योग्यमिति निश्चित्य वद येन ज्ञानकर्मान्यतरेण श्रेयो मोक्षमहं प्राप्नुयामित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vyāmiśhreṇa ivaby your apparently ambiguous
vākyenawords
buddhimintellect
mohayasiI am getting bewildered
ivaas it were
memy
tattherefore
ekamone
vadaplease tell
niśhchityadecisively
yenaby which
śhreyaḥthe highest good
ahamI
āpnuyāmmay attain
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.1
अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव

अर्जुन बोले -- हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि- (ज्ञान-) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव ! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके उस एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.3
श्री भगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्

श्रीभगवान् बोले - हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 2
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्िचत्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्

अर्जुन बोले -- हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि- (ज्ञान-) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "अर्जुन बोले -- हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि- (ज्ञान-) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 2 translates to: "With this seemingly perplexing speech, you seem to be confusing my understanding; therefore, tell me one certain way by which I may attain bliss. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्िचत्य येन श्रेयोऽहमाप्नुय" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। अर्जुन बोले -- हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि- (ज्ञान-) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vyāmiśhreṇeva vākyena buddhiṁ mohayasīva me" mean in English?

"vyāmiśhreṇeva vākyena buddhiṁ mohayasīva me" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 2. With this seemingly perplexing speech, you seem to be confusing my understanding; therefore, tell me one certain way by which I may attain bliss. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.