Bhagavad Gita 3.19 — Commentary
20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः
tasmād asaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samāchara asakto hyācharan karma param āpnoti pūruṣhaḥ
"Therefore, without attachment, always perform the actions that should be done; for by performing actions without attachment, one reaches the Supreme."
Scholar Commentaries (20)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
तस्मात् असक्तः सङ्गवर्जितः सततं सर्वदा कार्यं कर्तव्यं नित्यं कर्म समाचर निर्वर्तय। असक्तो हि यस्मात् समाचरन् ईश्वरार्थंकर्म कुर्वन् परं मोक्षम् आप्नोति पूरुषः सत्त्वशुद्धिद्वारेण इत्यर्थः।।यस्माच्च
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
तस्माद् असङ्गपूर्वकं कार्यम् इत्येव सततं यावदात्मप्राप्ति कर्म एव समाचर। असक्तः कार्यम् इति वक्ष्यमाणाकर्तृत्वानुसन्धानपूर्वकं च कर्म अनुचरन् पूरुषः कर्मयोगेन एव परम् आप्नोति आत्मानं प्राप्नोति इत्यर्थः।
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
यतोऽसम्प्रज्ञातसमाधेरेव कार्याभावः तस्मात्कर्म समाचर।
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
भगवान् श्रीकृष्ण उपदेश के समय यह मानकर चलते हैं कि अर्जुन इस विषय में पूर्णतया अनभिज्ञ है परन्तु साथ ही वे उस पर केवल अपने विचार को थोपना भी नहीं चाहते जिन्हें अन्धविश्वासपूर्वक वह स्वीकार कर ले। धर्म परिवर्तन कराना वेदान्त का कार्य नहीं। हिन्दू लोग इससे अनभिज्ञ हैं। कोई भी विधेयात्मक (ऐसा करो) उपदेश देने के पूर्व विस्तार से तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं। कर्म के चक्र को पूर्णत बताने के बाद अब इस श्लोक में वे अन्तिम निर्णय पर पहुँच कर अर्जुन को कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।इसलिये समाज और राष्ट्र के एक योग्य नागरिक होने के नाते तुम सदैव करणीय कर्तव्यों को सम्यक् प्रकार से करो। यहाँ फिर एक बार सब कर्मों में अनासक्त रहने पर बल दिया गया है। आसक्ति अहंकार अहंकारमूलक इच्छा। अत अनासक्ति का अर्थ है अहंकार और स्वार्थ का परित्याग। इसके पूर्व आसक्ति से वासनाओं की उत्पत्ति के विषय में बताया जा चुका है।निम्नांकित कारण से भी तुमको कर्म करने चाहिये।
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
3.19 तस्मात् therefore? असक्तः without attachment? सततम् always? कार्यम् which should be done? कर्म action? समाचर perform? असक्तः without attachment? हि because? आचरन् performing? कर्म action? परम् the Supreme? आप्नोति attains? पूरुषः man.Commentary If you perform actions without attachment? for the sake of the Lord? you will attain to Selfrealisation through purity of heart. (Cf.II.64IV.19?23XVIII.49).
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
3.19।। व्याख्या-- 'तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर'-- पूर्वश्लोकोंसे इस श्लोकका सम्बन्ध बतानेके लिये यहाँ 'तस्मात् पद आया है। पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने कहा कि अपने लिये कर्म करनेकी कोई आवश्यकता न रहनेपर भी सिद्ध महापुरुषके द्वारा लोक-संग्रहार्थ क्रियाएँ हुआ करती हैं। इसलिये अर्जुनको भी उसी तरह (निष्काम-भावसे) कर्तव्य-कर्म करते हुए परमात्माको प्राप्त करनेकी आज्ञा देनेके लिये भगवान्ने 'तस्मात्'पदका प्रयोग किया है। कारण कि अपने स्वरूप 'स्व' के लिये कर्म करने और न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। कर्म सदैव 'पर'-(दूसरों-) के लिये होता है, 'स्व'के लिये नहीं। अतः दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्म करनेका राग मिट जाता है और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है।अपने स्वरूपसे विजातीय (जड) पदार्थोंके प्रति आकर्षणको 'आसक्ति' कहते हैं। आसक्तिरहित होनेके लिये आसक्तिके कारणको जानना आवश्यक है। 'मैं शरीर हूँ' और 'शरीर मेरा है'-- ऐसा माननेसे शरीरादि नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व अन्तःकरणमें अङ्कित हो जाता है। इसी कारण उन पदार्थोंमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति ही पतन करनेवाली है, कर्म नहीं। आसक्तिके कारण ही मनुष्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जड पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मानकर अपने आराम, सुख-भोगके लिये तरह-तरहके कर्म करता है। इस प्रकार जडतासे आसक्तिपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही मनुष्यके बारम्बार जन्म-मरणका कारण होता है-- 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता 13। 21)। आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।आसक्तिवाला मनुष्य दूसरोंका हित नहीं कर सकता, जबकि आसक्तिरहित मनुष्यसे स्वतःस्वाभाविक प्राणिमात्रका हित होता है। उसके सभी कर्म केवल दूसरोंके हितार्थ होते हैं।संसारसे प्राप्त सामग्री-(शरीरादि-) से हमने अभीतक अपने लिये ही कर्म किये हैं। उसको अपने ही सुखभोग और संग्रहमें लगाया है। इसलिये संसारका हमारेपर ऋण है, जिसे उतारनेके लिये केवल संसारके हितके लिये कर्म करना आवश्यक है। अपने लिये (फलकी कामना रखकर) कर्म करनेसे पुराना ऋण तो समाप्त होता नहीं, नया ऋण और उत्पन्न हो जाता है। ऋणसे मुक्त होनेके लिये बार-बार संसारमें आना पड़ता है। केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करनेसे पुराना ऋण समाप्त हो जाता है और अपने लिये कुछ न करने तथा कुछ न चाहनेसे नया ऋण उत्पन्न नहीं होता। इस तरह जब पुराना ऋण समाप्त हो जाता है और नया ऋण उत्पन्न नहीं होता, तब बन्धनका कोई कारण न रहनेसे मनुष्य स्वतः मुक्त हो जाता है।कोई भी कर्म निरन्तर नहीं रहता पर आसक्ति (अन्तःकरणमें) निरन्तर रहा करती है, इसलिये भगवान् 'सततम् असक्तः' पदोंसे निरन्तर आसक्तिरहित होनेके लिये कहते हैं। 'मेरेको कहीं भी आसक्त नहीं होना है'--ऐसी जागृति साधकको निरन्तर रखनी चाहिये। निरन्तर आसक्ति-रहित रहते हुए जो विहित-कर्म सामने आ जाय, उसे कर्तव्यमात्र समझकर कर देना चाहिये--ऐसा उपर्युक्त पदोंका भाव है।वास्तवमें देखा जाय तो किसीके भी अन्तःकरणमें आसक्ति निरन्तर नहीं रहती। जब संसार निरन्तर नहीं रहता, प्रतिक्षण बदलता रहता है, तब उसकी आसक्ति निरन्तर कैसे रह सकती है? ऐसा होते हुए भी मानेहुए 'अहम्' के साथ आसक्ति निरन्तर रहती हुई प्रतीत होती है।'कार्यम्' अर्थात् कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसको कर सकते हैं और जिसको अवश्य करना चाहिये। दूसरे शब्दोंमें कर्तव्यका अर्थ होता है--अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंका हित करना अर्थात् दूसरोंकी उस शास्त्रविहित न्याययुक्त माँगको पूरा करना, जिसे पूरा करनेकी सामर्थ्य हमारेमें है। इस प्रकार कर्तव्यका सम्बन्ध परहितसे है।कर्तव्यका पालन करनेमें सब स्वतन्त्र और समर्थ हैं कोई पराधीन और असमर्थ नहीं है। हाँ, प्रमाद और आलस्यके कारण अकर्तव्य करनेका बुरा अभ्यास (आदत) हो जानेसे तथा फलकी इच्छा रहनेसे ही वर्तमानमें कर्तव्य-पालन कठिन मालूम देता है, अन्यथा कर्तव्य-पालनके समान सुगम कुछ नहीं है। कर्तव्यका सम्बन्ध परिस्थितिके अनुसार होता है। मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक कर्तव्यका पालन कर सकता है। कर्तव्यका पालन करनेसे ही आसक्ति मिटती है। अकर्तव्य करने तथा कर्तव्य न करनेसे आसक्ति और बढ़ती है। कर्तव्य अर्थात् दूसरोंके हितार्थ कर्म करनेसे वर्तमानकी आसक्ति और कुछ न चाहनेसे भविष्यकी आसक्ति मिट जाती है।'समाचर' पदका तात्पर्य है कि कर्तव्य-कर्म बहुत सावधानी, उत्साह तथा तत्परतासे विधिपूर्वक करने चाहिये। कर्तव्य-कर्म करनेमें थोड़ी भी असावधानी होनेपर कर्मयोगकी सिद्धिमें बाधा लग सकती है। वर्ण, आश्रम, प्रकृति (स्वभाव) और परिस्थितिके अनुसार जिस मनुष्यके लिये जो शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म बताया गया है, अवसर प्राप्त होनेपर उसके लिये वही 'सहज कर्म' है। सहज कर्ममें यदि कोई दोष दिखायी दे, तो भी उसका त्याग नहीं करना चाहिये (गीता 18। 48) ;क्योंकि सहज कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता (गीता 18। 47) इसीलिये यहाँ भगवान् अर्जुनको मानो यह कह रहे हैं कि तू क्षत्रिय है; अतः युद्ध करना (घोर दीखनेपर भी) तेरा सहज कर्म है; घोर कर्म नहीं। अतः सामने आये हुए सहज कर्मको अनासक्त होकर कर देना चाहिये। अनासक्त होनेपर ही समता प्राप्त होती है।विशेष बातजब जीव मनुष्ययोनिमें लेता है, तब उसको शरीर धन जमीन मकान आदि सब सामग्री मिलती है और जब वह यहाँसे जाता है तब सब सामग्री यहीं छूट जाती है। इस सीधी-सादी बातसे यह सहज ही सिद्ध होता है कि शरीरादि सब सामग्री मिली हुई है, अपनी नहीं है। जैसे मनुष्य काम करनेके लिये किसी कार्यालय (आफिस) में जाता है तो उसे कुर्सी, मेज, कागज आदि सब सामग्री कार्यालयका काम करनेके लिये ही मिलती है, अपनी मानकर घर ले जानेके लिये नहीं। ऐसे ही मनुष्यको संसारमें शरीरादि सब सामग्री संसारका काम (सेवा) करनेके लिये ही मिली है अपनी माननेके लिये नहीं। मनुष्य तत्परता और उत्साहपूर्वक कार्यालयका काम करता है तो उस कामके बदलेमें उसे वेतन मिलता है। काम कार्यालयके लिये होता है और वेतन अपने लिये। इसी प्रकार संसारके लिये ही सब काम करनेसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और योग (परमात्माके साथ अपने नित्य सम्बन्ध) का अनुभव हो जाता है। 'कर्म' और 'योग' दोनों मिलकर कर्मयोग कहलाता है। कर्म संसारके लिये होता है और योग अपने लिये। यह योग ही मानो वेतन है।संसार साधनका क्षेत्र है। यहाँ प्रत्येक सामग्री साधनके लिये मिलती है, भोग और संग्रहके लिये कदापि नहीं। सांसारिक सामग्री अपनी और अपने लिये है ही नहीं। अपनी वस्तु--परमात्म-तत्त्व मिलनेपर फिर अन्य किसी वस्तुको पानेकी इच्छा नहीं रहती (गीता 6। 22)। परन्तु सांसारिक वस्तुएँ चाहे जितनी प्राप्त हो जायँ, पर उन्हें पानेकी इच्छा कभी मिटती नहीं, प्रत्युत और बढ़ती है।जब मनुष्य मिली हुई वस्तुको अपनी और अपने लिये मान लेता है, तब वह अपनी इस भूलके कारण बँध जाता है। इस भूलको मिटानेके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान ही सुगम और श्रेष्ठ उपाय है। कर्मयोगी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानते हुए उसे दूसरोंकी सेवामें (उन्हींकी मानकर) लगाता है। अतः वह सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।कर्म तो सभी प्राणी किया करते हैं, पर साधारण प्राणी और कर्मयोगीद्वारा किये गये कर्मोंमें बड़ा भारी अन्तर होता है। साधारण मनुष्य (कर्मी) आसक्ति, ममता, कामना आदिको साथ रखते हुए कर्म करता है और कर्मयोगी आसक्ति ममता कामना आदिको छोड़कर कर्म करता है। कर्मीके कर्मोंका प्रवाह अपनी तरफ होता है और कर्मयोगीके कर्मोंका प्रवाह संसारकी तरफ। इसलिये कर्मी बँधता है और कर्मयोगी मुक्त होता है।'असक्तो ह्याचरन्कर्म'-- मनुष्य ही आसक्तिपूर्वक संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है, संसार नहीं। अतः मनुष्यका कर्तव्य है कि वह संसारके हितके लिये ही सब कर्म करे और बदलेमें उनका कोई फल न चाहे। इस प्रकार आसक्तिरहित होकर अर्थात् मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिये, इस भावसे संसारके लिये कर्म करनेसे संसारसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।कर्मयोगी संसारकी सेवा करनेसे वर्तमानकी वस्तुओंसे और कुछ न चाहनेसे भविष्यकी वस्तुओंसे सम्बन्धविच्छेद करता है।मेलेमें स्वयंसेवक अपना कर्तव्य समझकर दिनभर यात्रियोंकी सेवा करते हैं और बदलेमें किसीसे कुछ नहीं चाहते; अतः रात्रिमें सोते समय उन्हें किसीकी याद नहीं आती। कारण कि सेवा करते समय उन्होंने किसीसे कुछ चाहा नहीं। इसी प्रकार जो सेवाभावसे दूसरोंके लिये ही सब कर्म करता है और किसीसे मान, बड़ाई आदि कुछ नहीं चाहता, उसे संसारकी याद नहीं आती। वह सुगमतापूर्वक संसार0-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। कर्म तो सभी किया करते हैं, पर कर्मयोग तभी होता है, जब आसक्तिरहित होकर दूसरोंके लिये कर्म किये जाते हैं। आसक्ति शास्त्रहित कर्तव्य-कर्म करनेसे ही मिट सकती है-- 'धर्म तें बिरति' (मानस 3। 16। 1)। शास्त्र-निषिद्ध कर्म करनेसे आसक्ति कभी नहीं मिट सकती। 'परमाप्नोति पुरुषः'--जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने 'परम्' पदसे सांख्ययोगीके परमात्माको प्राप्त होनेकी बात कही, ऐसी ही यहाँ 'परम्' पदसे कर्मयोगीके परमात्माको प्राप्त होनेकी बात कहते हैं। तात्पर्य यह है कि साधक (रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार) किसी भी मार्ग--कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोगपर क्यों न चले, उसके द्वारा प्राप्तव्य वस्तु एक परमात्मा ही हैं (गीता 5। 45)। प्राप्तव्य तत्त्व वही हो सकता है, जिसकी प्राप्तिमें विकल्प, सन्देह और निराशा न हो तथा जो सदा हो, सब देशमें हो, सब कालमें हो, सभीके लिये हो, सबका अपना हो और जिस तत्त्वसे कोई कभी किसी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी अलग न हो सके अर्थात् जो सबको सदा अभिन्नरूपसे स्वतः प्राप्त हो। शङ्का कर्म करते हुए कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान कैसे मिट सकता? क्योंकि कर्तृत्वाभिमान मिटे बिना परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं हो सकता। समाधान--साधारण मनुष्य सभी कर्म अपने लिये करता है। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्यमें कर्तृत्वाभिमान रहता है। कर्मयोगी कोई भी क्रिया अपने लिये नहीं करता। वह ऐसा मानता है कि संसारसे शरीर, इन्द्रियाँमन, बुद्धि, पदार्थ, रुपये आदि जो कुछ सामग्री मिली है, वह सब संसारकी ही है, अपनी नहीं। जब कभी अवसर मिलता है, तभी वह सामग्री, समय, सामर्थ्य आदिको संसारकी सेवामें लगा देता है, उनको संसारकी सेवामें लगाते हुए कर्मयोगी ऐसा मानता है कि संसारकी वस्तु ही संसारकी सेवामें लगा रहा हूँ अर्थात् सामग्री, समय, सामर्थ्य, आदि उन्हींके हैं, जिनकी सेवा हो रही है। ऐसा माननेसे कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता।कर्तृत्वमें कारण है-- भोक्तृत्व। कर्मयोगी भोगकी आशा रखकर कर्म करता ही नहीं। भोगकी आशावाला मनुष्य कर्मयोगी नहीं होता। जैसे अपने हाथोंसे अपना ही मुख धोनेपर यह भाव नहीं आता कि मैंने बड़ा उपकार किया है; क्योंकि मनुष्य हाथ और मुख दोनोंको अपने ही अंग मानता है, ऐसे ही कर्मयोगी भी शरीरको संसारका ही अङ्ग मानता है। अतः यदि अङ्गने अङ्गीकी ही सेवा की है तो उसमें कर्तृत्वाभिमान कैसा ?
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
जब कि ऐसी बात है इसलिये तू आसक्तिरहित होकर कर्तव्य नित्यकर्मोंका सदा भलीभाँति आचरण किया कर। क्योंकिअनासक्त होकर कर्म करनेवाला अर्थात् ईश्वरार्थ कर्म करता हुआ पुरुष अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा मोक्षरूप परमपद पा लेता है।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
सम्यग्ज्ञाननिष्ठत्वाभावे कर्मानुष्ठानमावश्यकमित्याह यत इति। तस्मात् ज्ञाननिष्ठाराहित्यादिति यावत्। मोक्षमेवापेक्षमाणस्य कथं कर्मणि फलान्तरवति नियोगः स्यादित्याशङ्क्याह असक्तो हीति।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
तव तु चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानार्थ कर्मण्यधिकारः। तस्मादसक्तः फलासक्तिवर्जितः कार्यमवश्यंकर्तव्यं नित्यं नैमित्तिकं च कर्म सर्वदा समाचार। हि यस्मात्पुरुषोऽसक्तः कर्म समाचरन् ईश्वरार्थ कर्म कुर्वन् सत्त्वशुद्धिद्वारा ज्ञानप्राप्त्या परं मोक्षं प्राप्नोति।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
यस्मान्निष्कामस्य कर्मलेपो नास्ति तस्मात्त्वमप्यसक्तः फलासक्तिशून्यः सततं सर्वदा कार्यमवश्यकर्तव्यं कर्म नित्यनैमित्तिकं समाचर। हि यस्मादसक्तः कर्माचरन् परं मोक्षं सत्त्वशुद्धिद्वारेणाप्नोति।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
यस्मादेवंभूतस्य ज्ञानिन एव कर्मानुपयोगो नान्यस्य तस्मात्त्वं कर्म कुर्विल्याह तस्मादिति। असक्तः फलसङ्गरहितः सन्कार्यमवश्यकर्तव्यतया विहितं नित्यनैमित्तिकं कर्म सम्यगाचर। हि यस्मादसक्तः कर्माचरन्पुरुषः परं मोक्षं चित्तशुद्धिं ज्ञानद्वारा प्राप्नोति।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
तस्मात् इत्येतत्कर्मणः कर्तव्यतायां पूर्वोक्तसमस्तहेतुपरामर्शीत्यभिप्रायेणाह यस्मादिति।असक्तः कार्यम् इत्युभयमपि कर्मणोऽनुष्ठानप्रकारपरमित्यभिप्रायेणोक्तंअसङ्गपूर्वकं कार्यमित्येवेति। कार्यमित्येव न तु तत्कार्यं स्वर्गाद्यपेक्षयेत्यर्थः।सततं इत्यत्र ज्ञानयोगाधिकारे सत्यपि कर्मयोगस्यैवानुष्ठेयत्वायाह यावदात्मप्राप्तीति। ज्ञानयोगव्यवधानमन्तरेणापि कर्मयोग एवात्मप्राप्तिं साधयतीतिअसक्तो हि इत्यादिनोच्यत इत्यभिप्रायेणाह असक्त इति।कर्माचरन् ৷৷. परमाप्नोतीति। न पुनः कर्माचरणानन्तरमन्यत्कृत्वेत्यर्थः।कर्माचरन् परमाप्नोति इत्युक्ते अर्थसिद्धं कर्मणः साधनत्वं व्यनक्ति कर्मयोगेनैवेति। अत्र प्राप्यतया निर्दिष्टः परो देहातिरिक्तात्मप्रकरणत्वात् प्रकृतेः परो जीव इत्यभिप्रायेणाहआत्मानं प्राप्नोतीत्यर्थ इति।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
तस्मादसक्त इति परामर्शविषयो न प्रतीयतेऽतस्तं दर्शयन् व्याख्याति यत इति। त्वं चेदानीं असम्प्रज्ञातसमाधिर्न भवतीति शेषः। कर्मणोऽवश्यकर्तव्यत्वेऽसम्प्रज्ञातसमाधिविलोपप्रसङ्गान्नेदमवश्यं कर्तव्यमित्यतोऽहमपि न कुर्यामिति परिचोदनायामसम्प्रज्ञातसमाधिस्थविलोपप्रतिबन्दीं मोचयितुं तस्य वैलक्षण्यमुक्त्वा तत्फलमिदमुच्यत इति नासङ्गतिः।
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
यस्मान्न त्वमेवंभूतो ज्ञानी किंतु कर्माधिकृत एव मुमुक्षुः। असक्तः फलकामनारहितः। सततं सर्वदा नतु कदाचित् कार्यमवश्यकर्तव्यं यावज्जीवादिश्रुतिचोदितम्तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्यज्ञाने विनियुक्तं कर्म नित्यनैमित्तिकलक्षणं सम्यगाचर यथाशास्त्रं निर्वर्तय। असक्तो हि यस्मादाचरन्नीश्वरार्थं कर्म कुर्वन्सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण परं मोक्षमाप्नोति पूरुषः पुरुषः स एव सत्पुरुषो नान्य इत्यभिप्रायः।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
यतो भक्तानां कर्मादिकरणे अकरणे वा न कोऽपि पुरुषार्थो हानिर्वाऽस्ति अतस्त्वमपि मदाज्ञारूपत्वेनावश्यकर्त्तव्यत्वात्कर्म कुर्वित्याह तस्मादिति। यस्माद्भगवद्भक्तानां कर्मकरणे न फलम् अकरणे च न प्रत्यवायः तस्मात्तेष्वसक्तोऽनासक्तः सन् सततं कार्यं नित्यकर्म समाचर कुरु। नन्वनासक्तेनापि कृतं कर्म बाधकं भवत्येवेति चेदत आह असक्त इति। पुरुषः पुरुषांशो भोक्ताधिकारी। हीति निश्चयेन असक्तः न तु कापट्येन कर्म आचरन् परं मोक्षं प्राप्नोतीत्यर्थः।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
त्वं तु न साङ्ख्यज्ञानवान्। यतः तस्मादसक्तः कार्यं कर्म कुरु। त्वमिति साङ्ख्ययोगतत्त्वम्। यस्ययद्विहितं नित्यं नैमित्तिकं तदाचरन् असक्तः पुरुषो ब्रह्मविदाप्नोति परं पदम्। भगवदर्थमिति वाऽसङ्गपदार्थः। न हि कामव्यतिरेकेण कर्ममात्रं कश्चिद्देहाभिमानी करोति। नच अहरहः सन्ध्यामुपासीत इत्यादौ नित्ये कर्मणि कामफलाश्रवणान्नैवमिति वाच्यम् तत्रापि विधिप्रयोगेन कामफलकल्पनात् प्रत्यवायपरिहारस्यापि तत्त्वाच्च। ज्योतिष्टोमे स्वर्गकामवत्। अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तिः। अतो भगवत्कामनया कर्म कार्यमित्युक्तं भवति तदग्रे स्फुटीकरिष्यते।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
3.19 Since this is so, therefore, asaktah, remaining unattached; samacara, perform; satatam, always; karyam, the obligatory; daily karma, duty; hi, for; acaran, by performing; (one's) karma, duty; asaktah, without attachment, by doing work as a dedication to God; purusah, a person; apnoti, attains; param, the Highest, Liberation, through the purification of the mind. This is meaning. And (you should perform your duty) for the following reason also:
Dr. S. Sankaranarayan
20th century CE · Academic / Shaiva
Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.
3.17-19 Yas ca etc. upto purusah. However, for a person who rejoices in the Self and performs action simply as a [routine] business of organs of action, there is no difference between (his) action and nonaciton. That is why he inflicts punishment on, or does favour to, every being, not with desire for any gain for himself, but with a conviction that it a is thing that deserves to be performed. Therefore, just unattached, one should perform action that is to be performed.
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
3.19 Therefore, considering that work has to be performed with detachment, you perform it, considering yourself a non-agent. This will be declared in the words 'with detachment' and 'which ought to be done,' meaning that one attains the Supreme by Karma Yoga itself.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 3.19?
तस्मात् असक्तः सङ्गवर्जितः सततं सर्वदा कार्यं कर्तव्यं नित्यं कर्म समाचर निर्वर्तय। असक्तो हि यस्मात् समाचरन् ईश्वरार्थंकर्म कुर्वन् परं मोक्षम् आप्नोति पूरुषः सत्त्वशुद्धिद्वारेण इत्यर्थः।।यस्माच्च
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 3.19, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.