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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्

प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे। — VaniSagar

Global Translations

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BhojpuriIND

सृष्टिकर्ता, शुरू में मनुष्य के बलिदान के संगे रचले रहले, कहले कि, "एह से आप प्रचार करब; इहे आपके इच्छा के दूध देवे वाली गाय होखे- उ गाय जवन मनचाहा सभ वस्तु पैदा करेले।"

NepaliIND

सृष्टिकर्ताले प्रारम्भमा मानव जातिलाई बलिदानसहित सृष्टि गर्दै भन्नुभयो, "यसद्वारा तिमीहरूले प्रचार गर्नेछौ, यो तपाइँको इच्छाको दुध गाई होस् - सबै इच्छित वस्तुहरू दिने गाई।

AssameseIND

সৃষ্টিকৰ্তাই আদিতে মানৱজাতিক বলিদানৰ সৈতে একেলগে সৃষ্টি কৰি ক'লে, "ইয়াৰ দ্বাৰাই তোমালোকে প্ৰচাৰ কৰিবা; এইটোৱেই তোমালোকৰ কামনাৰ গাখীৰ দিয়া গৰু হওঁক— যি গৰুই আকাংক্ষিত সকলো বস্তু উৎপন্ন কৰে।"

MaithiliIND

सृष्टिकर्ता, आदि मे मनुष्य केँ बलिदान सँ मिलिकय सृष्टि क' कहलनि, "एहि सँ अहाँ प्रचार करब; ई अहाँक इच्छाक दूधक गाय हो-ओ गाय जे सब वांछित वस्तुक उपज दैत अछि।"

KonkaniIND

सृश्टीकर्त्यान सुरवेक मनशाकुळाक बलिदान एकठांय करून रचून म्हळें, "हाचे करून तुमी प्रचार करतले; ही तुज्या इत्सेची दुदाची गाय आसूं- जाय ती सगळी इत्सा करपी वस्तू निर्माण करपी गाय."

MizoIND

Siamtu chuan a tir lamah inthawina nen mihringte a siam khawm a, "Hetiang hian in thehdarh ang; hei hi in duhzawng bawnghnute petu chu ni rawh se—duh zawng zawng pe chhuaktu bawng chu," a ti a.

TeluguIND

సృష్టికర్త, ప్రారంభంలో మానవజాతిని త్యాగంతో కలిసి సృష్టించాడు, "దీని ద్వారా మీరు ప్రచారం చేయండి; ఇది మీ కోరికల పాల ఆవుగా ఉండనివ్వండి - కోరుకున్న వస్తువులన్నింటినీ ఇచ్చే ఆవు.

MarathiIND

निर्मात्याने सुरुवातीला मानवजातीला बलिदानासह निर्माण केले आणि म्हटले, "याद्वारे तुम्ही प्रचार कराल; ही तुमच्या इच्छेची दुभती गाय असू द्या - सर्व इच्छित वस्तू देणारी गाय.

MalayalamIND

സ്രഷ്ടാവ്, ആദിയിൽ ത്യാഗത്തോടൊപ്പം മനുഷ്യരാശിയെ സൃഷ്ടിച്ചുകൊണ്ട് പറഞ്ഞു, "ഇതുവഴി നിങ്ങൾ പ്രചരിപ്പിക്കുക; ഇത് നിങ്ങളുടെ ആഗ്രഹങ്ങളുടെ കറവപ്പശു ആയിരിക്കട്ടെ-ആവശ്യമായ എല്ലാ വസ്തുക്കളും നൽകുന്ന പശു.

GujaratiIND

નિર્માતાએ, શરૂઆતમાં બલિદાન સાથે માનવજાતની રચના કરી, કહ્યું, "આ દ્વારા તમે પ્રચાર કરશો; આ તમારી ઇચ્છાઓની દૂધવાળી ગાય બનવા દો - તે ગાય જે બધી ઇચ્છિત વસ્તુઓ આપે છે.

BengaliIND

সৃষ্টিকর্তা, আদিতে মানবজাতিকে ত্যাগের মাধ্যমে একত্রে সৃষ্টি করে বলেছেন, "এর দ্বারা তোমরা প্রচার করবে; এটি হোক আপনার কামনার দুগ্ধ গাভী - যে গাভী সমস্ত কাঙ্খিত বস্তুর ফল দেয়।

ManipuriIND

ꯁꯦꯝꯕꯤꯕꯥ ꯃꯄꯨꯅꯥ ꯑꯍꯧꯕꯗꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯕꯥ ꯖꯥꯇꯤꯕꯨ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯁꯦꯝꯕꯤꯗꯨꯅꯥ ꯍꯥꯌꯔꯝꯃꯤ, "ꯃꯁꯤꯅꯥ ꯅꯈꯣꯌꯅꯥ ꯁꯟꯗꯣꯛꯀꯅꯤ; ꯃꯁꯤ ꯅꯈꯣꯌꯒꯤ ꯑꯄꯥꯝꯕꯒꯤ ꯁꯉ꯭ꯒꯣꯃꯒꯤ ꯁꯟ ꯑꯣꯏꯔꯁꯅꯨ- ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯄꯣꯠꯂꯝ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯄꯨꯊꯣꯀꯄꯥ ꯁꯟ ꯑꯗꯨ ꯑꯣꯏꯔꯁꯅꯨ꯫"

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः'--ब्रह्माजी प्रजा (सृष्टि) के रचयिता एवं उसके स्वामी हैं; अतः अपने कर्तव्यका पालन करनेके साथ वे प्रजाकी रक्षा तथा उसके कल्याणका विचार करते रहते हैं। कारण कि जो जिसे उत्पन्न करता है, उसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य हो जाता है। ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करते, उसकी रक्षामें तत्पर रहते तथा सदा उसके हितकी बात सोचते हैं। इसलिये वे 'प्रजापति' कहलाते हैं। सृष्टि अर्थात् सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीने कर्तव्य-कर्मोंकी योग्यता और विवेक-सहित मनुष्योंकी रचना की है । अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग कल्याण करनेवाला है। इसलिये ब्रह्माजीने अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करनेका विवेक साथ देकर ही मनुष्योंकी रचना की है।सत्- असत् का विचार करनेमें पशु, पक्षी, वृक्ष आदिके द्वारा स्वाभाविक परोपकार (कर्तव्यपालन) होता है; किन्तु मनुष्यको तो भगवत्कृपासे विशेष विवेक-शक्ति मिली हुई है। अतः यदि वह अपने विवेकको महत्त्व देकर अकर्तव्य न करे तो उसके द्वारा भी स्वाभाविक लोक-हितार्थ कर्म हो सकते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस आगे बतलाये जानेवाले कारणसे भी अधिकारीको कर्म करना चाहिये सृष्टिके आदिकालमें यज्ञसहित प्रजाको अर्थात् ( ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य इन ) तीनों वर्णोंको रचकर जगत्के रचयिता प्रजापतिने कहा कि इस यज्ञसे तुमलोग प्रसवउत्पत्ति यानी वृद्धिलाभ करो। यह यज्ञतुमलोगोंको इष्ट कामनाओंका देनेवाला अर्थात् इच्छित फलरूप नाना भोगोंको देनेवाला हो।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

नित्यस्य कर्मणो नैमित्तिकसहितस्याधिकृतेन कर्तव्यत्वे हेत्वन्तरपरत्वेनानन्तरश्लोकमवतारयति इतश्चेति। कथं पुनरनेन यज्ञेन वृद्धिरस्माभिः शक्या कर्तुमित्याशङ्क्याह एष इति।

VaniSagar Research Vault
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Sri Dhanpati

इतश्च हेतोरधिकृतेन कर्म कर्तव्यं प्रजापतिर्ब्रह्मा सर्गादौ यज्ञसहिताः त्रैवर्णिकाः प्रजाः सृष्ट्वोवाच। अनेन यज्ञेन कर्मणा प्रसविष्यध्वं वृद्धिं लभत्वं उत्पत्तिं कुरुध्वम्। वृद्य्धादिहेतुत्वमस्यास्तीत्याह। एष यज्ञो वो युष्माकमभिप्रेतभोगप्रदो भवतु।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sahaalong with
yajñāḥsacrifices
prajāḥhumankind
sṛiṣhṭvācreated
purāin beginning
uvāchasaid
prajāpatiḥ
anenaby this
prasaviṣhyadhvamincrease prosperity
eṣhaḥthese
vaḥyour
astushall be
iṣhṭakāma
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प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके (उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्

प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 10 translates to: "The Creator, having in the beginning created mankind together with sacrifice, said, "By this shall you propagate; let this be the milch cow of your desires—the cow that yields all the desired objects. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकाम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "saha-yajñāḥ prajāḥ sṛiṣhṭvā purovācha prajāpatiḥ" mean in English?

"saha-yajñāḥ prajāḥ sṛiṣhṭvā purovācha prajāpatiḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 10. The Creator, having in the beginning created mankind together with sacrifice, said, "By this shall you propagate; let this be the milch cow of your desires—the cow that yields all the desired objects. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.