
“सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मासे विमुखता) है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है। — VaniSagar”
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જે સર્વ જીવો માટે રાત્રી છે, તેમાં આત્મસંયમિત માણસ જાગ્યો છે; જ્યારે બધા જીવો જાગે છે, તે ઋષિ માટે રાત્રિ છે જે જુએ છે.
అన్ని జీవులకు రాత్రి అయినది, దానిలో స్వీయ-నియంత్రణ మనిషి మేల్కొని ఉంటాడు; అన్ని జీవులు మేల్కొని ఉన్నప్పుడు, చూసే ఋషికి అది రాత్రి.
जी सर्व प्राणिमात्रांसाठी रात्र आहे, त्यात आत्मसंयमी मनुष्य जागृत असतो; जेव्हा सर्व प्राणी जागृत असतात, तेव्हा पाहणाऱ्या ऋषींसाठी ती रात्र असते.
जें सगळ्या प्राण्यांक रात आसता, आत्मसंयमी मनीस जागृत आसता; जेन्ना सगळे जीव जागृत आसतात तेन्ना तें पळोवपी ऋषीखातीर रात.
जवन सब जीव खातिर रात होला, एह में कि संयमी आदमी जागल बा; जब सब जीव जागल होखस, त देखे वाला ऋषि खातिर रात होला।
যা সমস্ত প্রাণীর জন্য রাত্রি, তাতে আত্মনিয়ন্ত্রিত মানুষ জাগ্রত থাকে; যখন সমস্ত প্রাণী জেগে থাকে, তখন যে ঋষি দেখেন তার জন্য রাত।
ಅದು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳಿಗೆ ರಾತ್ರಿಯಾಗಿದೆ, ಅದರಲ್ಲಿ ಸ್ವಯಂ ನಿಯಂತ್ರಣದ ಮನುಷ್ಯ ಎಚ್ಚರವಾಗಿರುತ್ತಾನೆ; ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳು ಎಚ್ಚರವಾಗಿರುವಾಗ, ನೋಡುವ ಋಷಿಗೆ ಅದು ರಾತ್ರಿ.
எல்லா உயிர்களுக்கும் இரவாக இருப்பது, தன்னடக்கமுள்ள மனிதன் விழித்திருப்பதால்; எல்லா உயிர்களும் விழித்திருக்கும் போது, பார்க்கும் ஞானிக்கு அதுவே இரவு.
ആത്മനിയന്ത്രണമുള്ള മനുഷ്യൻ ഉണർന്നിരിക്കുന്നതിനാൽ എല്ലാ ജീവജാലങ്ങൾക്കും രാത്രിയാണ്; എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളും ഉണർന്നിരിക്കുമ്പോൾ, അത് കാണുന്ന മുനിക്ക് രാത്രിയാണ്.
اها جيڪا سڀني مخلوقن لاءِ رات آهي، ان ۾ پاڻ سنڀاليل انسان جاڳندو آهي. جڏهن سڀ جاندار جاڳندا آهن ته اها رات ان بابا لاءِ هوندي آهي جيڪو ڏسندو آهي.
जुन सबै प्राणीहरूको लागि रात हो, त्यसमा आत्म-नियन्त्रित पुरुष जागृत हुन्छ; जब सबै प्राणी जागा हुन्छन्, त्यो ऋषिलाई हेर्ने रात हुन्छ।
ਜੋ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਲਈ ਰਾਤ ਹੈ, ਉਸ ਅੰਦਰ ਸੰਜਮੀ ਮਨੁੱਖ ਜਾਗਦਾ ਹੈ; ਜਦੋਂ ਸਾਰੇ ਜੀਵ ਜਾਗਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਰਿਸ਼ੀ ਲਈ ਰਾਤ ਹੈ ਜੋ ਦੇਖਣਾ ਹੈ।
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
2.69।। व्याख्या-- 'या निशा सर्वभूतानाम्'--जिनकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं हैं, जो भोगोंमें आसक्त है, वे सब परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। परमात्मा क्या है? तत्त्वज्ञान क्या है? हम दुःख क्यों पा रहे हैं? सन्तापजलन क्यों हो रही है? हम जो कुछ कर रहे हैं? उसका परिणाम क्या होगा?--इस तरफ बिलकुल न देखना ही उनकी रात है, उनके लिये बिलकुल अँधेरा है। यहाँ 'भूतानाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पशु-पक्षी आदि दिनभर खाने-पीनेमें लगे रहते हैं, ऐसे ही जो मनुष्य रातदिन खाने-पीनेमें, सुख-आराममें, भोगों और संग्रहमें, धन कमानेमें ही लगे हुए हैं, उन मनुष्योंकी गणना भी पशु-पक्षी आदिमें ही है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे विमुख रहनेमें पशुपक्षी आदिमें और मनुष्योंमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। हाँ, अगर कोई अन्तर है तो वह इतना ही है कि पशु-पक्षी आदिमें विवेक-शक्ति जाग्रत् नहीं है इसिलिये वे खानेपीने आदिमें ही लगे रहते हैं; और मनुष्योंमें भगवान्की कृपासे वह विवेक-शक्ति जाग्रत है, जिससे वह अपना कल्याण कर सकता है, प्राणिमात्रकी सेवा कर सकता है, परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। परन्तु उस विवेक-शक्तिका दुरूपयोग करके मनुष्य पदार्थोंका संग्रह करनेमें एवं उनका भोग करनेमें लग जाते हैं, जिससे वे संसारके लिये पशुओंसे भी अधिक दुःखदायी हो जाते हैं। कारण कि पशु-पक्षी तो बेचारे जितनेसे पेट भर जाय, उतना ही खाते हैं, संग्रह नहीं करते; परन्तु मनुष्यको कहीं भी जो कुछ पदार्थ आदि मिल जाता है, वह उसके काममें आये चाहे न आये, उसका तो वह संग्रह कर ही लेता है और दूसरोंके काममें आनेमें बाधा डाल देता है। 'तस्यां जागर्ति संयमी'-- मनुष्योंकी जो रात है अर्थात् परमात्माकी तरफसे, अपने कल्याणकी तरफसे जो विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है। जिसने इन्द्रियों और मनको वशमें किया है, जो भोग और संग्रहमें आसक्त नहीं है, जिसका ध्येय केवल परमात्मा है, वह संयमी मनुष्य है। परमात्मतत्त्वको, अपने स्वरूपको, संसारको यथार्थ-रूपसे जानना ही उसका रातमें जागना है। 'यस्यां जाग्रति भूतानि'-- जो भोग और संग्रहमें बड़े सावधान रहते हैं, एक-एक पैसेका हिसाब रखते हैं, जमीनके एक-एक इंचका खयाल रखते है; जितने रूपये अधिकारमें आ जायँ वे चाहे न्यायपूर्वक हों अथवा अन्यायपूर्वक, उसमें वे बड़े खुश होते हैं कि इतनी पूँजी तो हमने ले ही ली है, इतना लाभ तो हमें हो ही गया है--इस तरह वे सांसारिक क्षणभङ्गुर भोगोंको बटोरनेमें और आदर-सत्कार, मान-बड़ाई आदि प्राप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, उनमें बड़े सावधान रहते हैं यही उन लोगोंका जागना है। 'सा निशा पश्यतो मुनेः'-- जिन सांसारिक पदार्थोंका भोग और संग्रह करनेमें मनुष्य अपनेको बड़ा बुद्धिमान्, चतुर मानते हैं और उसीमें राजी होते हैं, संसार और परमात्मतत्त्वको जाननेवाले मननशील संयमी मनुष्यकी दृष्टिमें वह सब रातके समान है; बिलकुल अँधेरा है। जैसे, बच्चे खेलते हैं तो वे कंकड़-पत्थर, काँचके लाल-पीले टुकड़ोंको लेकर आपसमें लड़ते हैं। अगर वह मिल जाता है तो राजी होते हैं कि मैंने बहुत बड़ा लाभ उठा लिया और अगर वह नहीं मिलता तो दुःखी हो जाते हैं कि मेरी बड़ी भारी हानि हो गयी। परन्तु जिसके मनमें कंकड़-पत्थर आदिका महत्त्व नहीं है, ऐसा समझदार व्यक्ति समझता है कि इन कंकड़-पत्थरोंके मिलनेसे क्या लाभ हुआ और न मिलनेसे क्या हानि हुई? इन बच्चोंको अगर कंकड़-पत्थर मिल भी जायँगे, तो ये कबतक उनके साथ रहेंगे? इसी तरह भोग और संग्रहमें लगे हुए मनुष्य भोगोंके लिये लड़ाई-झगड़ा, झूठ-कपट, बेईमानी आदि करते हैं और उनको प्राप्त करके राजी होते हैं, खुशी मनाते हैं कि हमने बहुत लाभ ले लिया। परन्तु संसारको और परमात्मतत्त्वको जाननेवाला मननशील संयमी मनुष्य साफ देखता है कि भोग मिल गये, आदर-सत्कार हो गया, सुखआराम हो गया, खा-पी लिया, खूब श्रृंगार कर लिया तो क्या हो गया? इसमें मनुष्योंको क्या मिला? इनमेंसे इनके साथ क्या चलेगा? ये कबतक इन भोगोंको साथमें रखेंगे? इन भोगोंसे होनेवाली वृत्ति कितने दिनतक ठहरेगी? इस तरह उसकी दृष्टिमें प्राणियोंका जागना रातके समान है। वह मननशील संयमी मनुष्य परमात्माको, अपने स्वरूपको और संसारके परिणामको तो जानता ही है, वह पदार्थोंको भी अच्छी तरहसे जानता है कि कौन-सा पदार्थ किसके हितमें लग सकता है, इससे दूसरोंको कितना लाभ होगा। वह पदार्थोंका अपनी-अपनी जगह ठीक तरहसे सदुपयोग करता है। उनको दूसरोंकी सेवामें लगाता है। जैसे नेत्रोंमे दोष होनेपर जब हम आकाशको देखते हैं, तब उसमें जाले-से दीखते हैं और आँखें मीच लेनेपर भी मोर-पंखकी तरह वे जाले दीखते हैं; परन्तु उनके दीखनेपर भी हमारी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि आकाशमें जाले नहीं है। ऐसे ही इन्द्रियों और अन्तःकरणके द्वारा संसार दीखनेपर भी मननशील संयमी मनुष्यकी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि वास्तवमें संसार नहीं है, केवल प्रतीतिमात्र है। सम्बन्ध-- मननशील संयमी मनुष्यको संसार रातकी तरह दीखता है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि क्या वह सांसारिक पदार्थोंके सम्पर्कमें आता ही नहीं? अगर नहीं आता तो उसका जीवननिर्वाह कैसे होता है? और अगर आता है तो उसकी स्थिति कैसे रहती है इन बातोंका विवेचन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
यह जो लौकिक और वैदिक व्यवहार है वह सबकासब अविद्याका कार्य है अतः जिसको विवेकज्ञान प्राप्त हो गया है ऐसे स्थितप्रज्ञके लिये अविद्याकी निवृत्तिके साथहीसाथ ( यह व्यवहार भी ) निवृत्त हो जाता है और अविद्याका विद्याके साथ विरोध होनेके कारण उसकी भी निवृत्ति हो जाती है। इस अभिप्रायको स्पष्ट करते हुए कहते हैं तामस स्वभावके कारण सब पदार्थोंका अविवेक करानेवाली रात्रिका नाम निशा है। सब भूतोंकी जो निशा अर्थात् रात्रि है वह ( निशा ) क्या है ( उ0 ) परमार्थतत्त्व जो कि स्थितप्रज्ञका विषय है ( ज्ञेय है )। जैसे उल्लू आदि रजनीचरोंके लिये दूसरोंका दिन भी रात होती है वैसे ही निशाचरस्थानीय जो सम्पूर्ण अज्ञानी मनुष्य हैं जिनमें परमार्थतत्त्वविषयक बुद्धि नहीं है उन सब भूतोंके लिये अज्ञात होनेके कारण यह परमार्थतत्त्व रात्रिकी भाँति रात्रि है। उस परमार्थतत्त्वरूप रात्रिमें अज्ञाननिद्रासे जगा हुआ संयमी अर्थात् जितेन्द्रिय योगी जागता है। ग्राह्यग्राहकभेदरूप जिस अविद्यारात्रिमें सोते हुए भी सब प्राणी जागते हैं ऐसे कहा जाता है अर्थात् जिस रात्रिमें सब प्राणी सोते हुए स्वप्न देखनेवालोंके सदृश जागते हैं। वह ( सारा दृश्य ) अविद्यारूप होनेके कारण परमार्थतत्त्वको जाननेवाले मुनिके लिये रात्रि है। सुतरां ( यह सिद्ध हुआ कि ) अविद्याअवस्थामें ही ( मनुष्यके लिये ) कर्मोंका विधान किया जाता है विद्यावस्थामें नहीं क्योंकि जैसे सूर्यके उदय होनेपर रात्रिसम्बन्धी अन्धकार दूर हो जाता है उसी प्रकार ज्ञान उदय होनेपर अज्ञान नष्ट हो जाता है। ज्ञानोत्पत्तिसे पहलेपहले प्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई अविद्या ही क्रिया कारक और फल आदिके भेदोंमें परिणत होकर सब कर्म करवानेका हेतु बन सकती है अप्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई ( अविद्या ) कर्म करवानेका कारण नहीं बन सकती। क्योंकि प्रमाणस्वरूप वेदने मेरे लिये अमुक कर्तव्यकर्मोंका विधान किया है ऐसा मानकर ही कर्ता कर्ममें प्रवृत्त होता है यह सब रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र है इस तरह समझकर नहीं होता। जिसको ऐसा ज्ञान प्राप्त हो गया है कि यह सारा दृश्य रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र ही है उस आत्मज्ञानीका तो सर्व कर्मोंके संन्यासमें ही अधिकार है प्रवृत्तिमें नहीं। इस प्रकार तद्बुद्धयस्तदात्मानः इत्यादि श्लोकोंसे उस ज्ञानीका अधिकार ज्ञाननिष्ठामें ही दिखलायेंगे। पू0 उस ज्ञाननिष्ठामें भी ( तत्त्ववेत्ताको ) प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणका ( विधिवाक्यका ) अभाव है इसलिये उसमें भी उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मज्ञान अपने स्वरूपको विषय करनेवाला है अतः अपने स्वरूपज्ञानके विषयमें प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणकी अपेक्षा नहीं होती। वह आत्मज्ञान स्वयं आत्मा होनेके कारण स्वतःसिद्ध है और उसीमें सब प्रमाणोंके प्रमाणत्वका अन्त है अर्थात् आत्मज्ञान होनेतक ही प्रमाणोंका प्रमाणत्व है अतः आत्मस्वरूपका साक्षात् होनेके बाद प्रमाण और प्रमेयका व्यवहार नहीं बन सकता। ( आत्मज्ञानरूप ) अन्तिम प्रमाण आत्माके प्रमातापनको भी निवृत्त कर देता है। उसको निवृत्त करता हुआ वह स्वयं भी जागनेके बाद स्वप्नकालके प्रमाणकी भाँति अप्रमाणी हो जाता है अर्थात् लुप्त हो जाता है। क्योंकि व्यवहारमें भी वस्तु प्राप्त होनेके बाद कोई प्रमाण ( उस वस्तुकी प्राप्तिके लिये ) प्रवृत्तिका हेतु होता नहीं देखा जाता। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि आत्मज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है।
Sri Anandgiri
आत्मविदः स्थितप्रज्ञस्य सर्वकर्मपरित्यागेऽधिकारस्तद्विपरीतस्याज्ञस्य कर्मणीत्येतस्मिन्नर्थे समनन्तरश्लोकमवतारयति योऽयमिति। अविद्यानिवृत्तौ सर्वकर्मनिवृत्तिश्चेत्तन्निवृत्तिरेव कथमित्याशङ्क्याह अविद्यायाश्चेति। स्फुटीकुर्वन् बाह्याभ्यन्तरकरणानां पराक्प्रत्यक्प्रवृत्तिवत्तथाविधे दर्शने च मिथो विरुध्येते पराग्दर्शनस्यानाद्यात्मावरणाविद्याकार्यत्वादात्मदर्शनस्य च तन्निवर्तकत्वात्ततश्चात्मदर्शनार्थमिन्द्रियाण्यर्थेभ्यो निगृह्णीयादित्याहेति योजना। सर्वप्राणिनां निशा पदार्थाविवेककरीत्यत्र हेतुमाह तमःस्वभावत्वादिति। सर्वप्राणिसाधारणीं प्रसिद्धां निशां दर्शयित्वा तामेव प्रकृतानुगुणत्वेन प्रश्नपूर्वकं विशदयति किं तदित्यादिना। स्थितप्रज्ञविषयस्य परमार्थतत्त्वस्य प्रकाशैकस्वभावस्य कथमज्ञानं प्रति निशात्वमित्याशङ्क्याह यथेति। तत्र हेतुमाह अगोचरत्वादिति। अतद्बुद्धीनां परमार्थतत्त्वातिरिक्ते द्वैतप्रपञ्चे प्रवृत्तबुद्धीनामप्रतिपन्नत्वात् परमार्थतत्त्वं निशेवाविदुषामित्यर्थः। तस्यामित्यादि व्याचष्टे तस्यामिति। निशावदुक्तायामवस्थायामिति यावत् योगीति ज्ञानी कथ्यते। द्वितीयार्धं विभजते यस्यामिति। प्रसुप्तानां जागरणं विरुद्धमित्याशङ्क्याह प्रसुप्ता इवेति। परमार्थतत्त्वमनुभवतो निवृत्ताविद्यस्य संन्यासिनो द्वैतावस्था निशेत्यत्र हेतुमाह अविद्यारूपत्वादिति। परमार्थावस्था निशेत्यविदुषां विदुषां तु द्वैतावस्था तथेति स्थिते फलितमाह अत इति। अविद्यावस्थायामेव क्रियाकारकफलभेदप्रतिभानादित्यर्थः। विद्योदयेऽपि तत्प्रतिभानाविशेषात्पूर्वमिव कर्माणि विधीयेरन्नित्याशङ्क्याह विद्यायामिति। अविद्यानिवृत्तौ बाधितानुवृत्त्या विभागभानेऽपि नास्ति कर्मविधिर्विभागाभिनिवेशाभावादित्यर्थः। अविद्यावस्थायामेव कर्मणीत्युक्तं व्यक्तीकरोति प्रागिति। विद्योदयात्पूर्वं बाधकाभावादबाधिता विद्या क्रियादिभेदमापाद्य प्रमाणरूपया बुद्ध्या ग्राह्यतां प्राप्य कर्महेतुर्भवति क्रियादिभेदाभिमानस्य तद्धेतुत्वादित्यर्थः। न विद्यावस्थायामित्युक्तं प्रपञ्चयति नाप्रमाणेति। उत्पन्नायां च विद्यायामविद्याया निवृत्तत्वात् क्रियादिभेदभानमप्रमाणमिति बुद्धिरुत्पद्यते तथा गृह्यमाणा यथोक्तविभागभागिन्यप्यविद्या न कर्महेतुत्वं प्रतिपद्यते बाधितत्वेनाभासतया तद्धेतुत्वायोगादित्यर्थः। विद्याविद्याविभागेनोक्तमेव विशेषं विवृणोति प्रमाणभूतेनेति। यथोक्तेन वेदेन कामनाजीवनादिमतो मम कर्म विहितं तेन मया तत्कर्तव्यमिति मन्वानः सन् कर्मण्यज्ञोऽधिक्रियते तं प्रति साधनविशेषवादिनो वेदस्य प्रवर्तकत्वादित्यर्थः। सर्वमेवेदमविद्यामात्रं द्वैतं निषेवेतेति मन्वानस्तु न प्रवर्तते कर्मणीति व्यावर्त्यमाह नाविद्येति। विदुषो न कर्मण्यधिकारश्चेत्तस्याधिकारस्तर्हि कुत्रेत्याशङ्क्याह यस्येति। तस्यात्मज्ञस्य फलभूतसंन्यासाधिकारे वाक्यशेषं प्रमाणयति तथाचेति। प्रवर्तकं प्रमाणं विधिस्तदभावे कर्मस्विव विदुषो ज्ञाननिष्ठायामपि प्रवृत्तेरनुपपत्तेराश्रयणीयो ज्ञानवतोऽपि विधिरिति शङ्कते तत्रापीति। किमात्मज्ञानं विधिमपेक्षते किं वात्मा। नाद्यः। तस्य स्वरूपविषयस्य यथा प्रमाणप्रमेयमुत्पत्तेर्विध्यनपेक्षत्वादित्याह न स्वात्मेति। न द्वितीय इत्याह नहीति। प्रवर्तकप्रमाणशब्दितस्य विधेः साध्यविषयत्वादात्मनश्चासाध्यत्वादिति हेतुमाह आत्मत्वादेवेति। आत्मतज्ज्ञानयोर्विध्यनपेक्षत्वेऽपि ज्ञानिनो मानमेव व्यवहारं प्रति नियमार्थं विध्यपेक्षा स्यादित्याशङ्क्याह तदन्तत्वाच्चेति। सर्वेषां प्रमाणानां प्रामाण्यस्यात्मज्ञानोदयावसानत्वात्तस्मिन्नुत्पन्ने व्यवहारस्य निरवकाशत्वान्न तत्प्रति नियमाय ज्ञानिनो विधिरित्यर्थः। उक्तमेव व्यक्तीकरोति नहीति। धर्माधिगमवदात्माधिगमेऽपि किमिति यथोक्तो व्यवहारो न भवतीत्याशङ्क्याह प्रमातृत्वंहीति। तन्निवृत्तौ कथमद्वैतज्ञानस्य प्रामाण्यमित्याशङ्क्याह निवर्तयदेवेति। निवर्तयदद्वैतज्ञानं स्वयं निवृत्तेर्न प्रमाणमित्यत्र दृष्टान्तमाह स्वप्नेति। आत्मज्ञानस्य विध्यनपेक्षत्वे हेत्वन्तरमाह लोके चेति। व्यवहारभूमौ हि प्रमाणस्य वस्तुनिश्चयफलपर्यन्तत्वे सति प्रवर्तकविधिसापेक्षत्वानुपलम्भादद्वैतज्ञानमपि प्रमाणवान्न विधिमपेक्षते रज्ज्वादिज्ञानवदित्यर्थः। आत्मज्ञानवतस्तन्निष्ठाविधिमन्तरेण ज्ञानमाहात्म्येनैव सिद्धत्वात्तस्य कर्मसंन्यासेऽधिकारो न कर्मणीत्युपसंहरति तस्मादिति।
Sri Dhanpati
एवं स्थितप्रज्ञलक्षणवर्णनेन मुमुक्षुभिरतियत्नेन स्थितप्रज्ञत्वाय समनस्केन्द्रियनिग्रहः कर्तव्य इत्युक्तम्। उत्पन्नविवेकविज्ञानस्य स्थितप्रज्ञस्य तु स्वतःसिद्ध एव समनस्केन्द्रियसंयमः। अविद्याविरोधिन्या विद्यया समूलस्य सर्वव्यवहारस्य निवृत्तेरित्येतद्वक्तुकामोऽविद्यावस्थायामेव कर्माणि विधीयन्ते न विद्यावस्थायामिति द्योतयन्नाह येति। सर्वभूतानामुलूकस्थानीयानां या निशेव निशा रात्रिः परमार्थतत्त्वलक्षणा तस्यामज्ञाननिद्रातः प्रबुद्धः संयमी स्थितप्रज्ञो ज्ञानयोगी जागर्ति यस्यां ग्राह्यग्राहकलक्षणायामविद्यायां भूतानि जाग्रति सा पश्यतो मुनेर्निशेव निशेत्यर्थः।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| yā | which |
| niśhā | night |
| sarva | bhūtānām |
| tasyām | in that |
| jāgarti | is awake |
| sanyamī | self |
| yasyām | in which |
| jāgrati | are awake |
| bhūtāni | creatures |
| sā | that |
| niśhā | night |
| paśhyataḥ | see |
| muneḥ | sage |
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इसलिये हे महाबाहो ! जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत (वशमें की हुई) हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है। — VaniSagar
जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं। — VaniSagar
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“सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मासे विमुखता) है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 69 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 69 का हिंदी अर्थ: "सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मासे विमुखता) है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 69?
Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 69 translates to: "That which is night to all beings, in that the self-controlled man is awake; when all beings are awake, that is night for the sage who sees. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो म" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 69 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मासे विमुखता) है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "yā niśhā sarva-bhūtānāṁ tasyāṁ jāgarti sanyamī" mean in English?
"yā niśhā sarva-bhūtānāṁ tasyāṁ jāgarti sanyamī" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 69. That which is night to all beings, in that the self-controlled man is awake; when all beings are awake, that is night for the sage who sees. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.