Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 54
अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्

हे केशव ! परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MalayalamIND

ഹേ കൃഷ്ണാ, സ്ഥിരമായ ജ്ഞാനം ഉള്ളവനും അതിബോധാവസ്ഥയിൽ ലയിച്ചിരിക്കുന്നവനും എന്താണ് വിവരിക്കുന്നത്? സ്ഥിരമായ ജ്ഞാനമുള്ള ഒരാൾ എങ്ങനെ സംസാരിക്കും, അവർ എങ്ങനെ ഇരിക്കും, എങ്ങനെ നടക്കുന്നു?

PunjabiIND

ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਉਸ ਵਿਅਕਤੀ ਦਾ ਕੀ ਵਰਣਨ ਹੈ ਜਿਸ ਕੋਲ ਅਡੋਲ ਬੁੱਧੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉਹ ਅਲੌਕਿਕ ਅਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਅਭੇਦ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ? ਅਡੋਲ ਬੁੱਧੀ ਕਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬੋਲਦੀ ਹੈ, ਕਿਵੇਂ ਬੈਠਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਕਿਵੇਂ ਤੁਰਦੀ ਹੈ?

TamilIND

ஓ கிருஷ்ணா, நிலையான ஞானம் கொண்டவர் மற்றும் அதீத உணர்வு நிலையில் இணைந்திருப்பவரின் விளக்கம் என்ன? நிலையான ஞானமுள்ள ஒருவர் எப்படிப் பேசுகிறார், எப்படி உட்காருகிறார், எப்படி நடக்கிறார்?

TeluguIND

ఓ కృష్ణా, స్థిరమైన జ్ఞానాన్ని కలిగి ఉండి, అతీంద్రియ స్థితిలో విలీనమైన వాని వర్ణన ఏమిటి? స్థిరమైన జ్ఞానం ఉన్నవారు ఎలా మాట్లాడతారు, వారు ఎలా కూర్చుంటారు మరియు ఎలా నడుస్తారు?

MarathiIND

हे कृष्णा, ज्याच्याकडे स्थिर बुद्धी आहे आणि तो परमार्थात विलीन झाला आहे त्याचे वर्णन काय? एक स्थिर शहाणपणा कसा बोलतो, ते कसे बसतात आणि कसे चालतात?

GujaratiIND

હે કૃષ્ણ, સ્થિર જ્ઞાન ધરાવનાર અને પરમાત્મામાં વિલીન થઈ ગયેલાનું વર્ણન શું છે? એક સ્થિર શાણપણ કેવી રીતે બોલે છે, તેઓ કેવી રીતે બેસે છે અને તેઓ કેવી રીતે ચાલે છે?

BengaliIND

হে কৃষ্ণ, যার স্থির জ্ঞান আছে এবং অতিচেতন অবস্থায় মিশে গেছে তার বর্ণনা কি? স্থির জ্ঞানের একজন কীভাবে কথা বলে, কীভাবে তারা বসে এবং কীভাবে তারা হাঁটে?

KannadaIND

ಓ ಕೃಷ್ಣಾ, ಸ್ಥಿರವಾದ ಬುದ್ಧಿವಂತಿಕೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಮತ್ತು ಮಹಾಪ್ರಜ್ಞೆಯಲ್ಲಿ ವಿಲೀನಗೊಂಡವನ ವಿವರಣೆ ಏನು? ಸ್ಥಿರವಾದ ಬುದ್ಧಿವಂತಿಕೆಯು ಹೇಗೆ ಮಾತನಾಡುತ್ತದೆ, ಅವರು ಹೇಗೆ ಕುಳಿತುಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರು ಹೇಗೆ ನಡೆಯುತ್ತಾರೆ?

NepaliIND

हे कृष्ण, स्थिर ज्ञान भएको र परम चेतनामा विलीन हुनेको वर्णन के छ? एक स्थिर बुद्धि कसरी बोल्छ, तिनीहरू कसरी बस्छन्, र तिनीहरू कसरी हिँड्छन्?

SindhiIND

اي ڪرشن، ان شخص جو ڪهڙو بيان آهي، جنهن وٽ ثابت قدم عقل آهي ۽ هو مافوق الفطرت حالت ۾ ضم ٿي ويو آهي؟ ثابت قدم حڪمت مان هڪ ڪيئن ڳالهائيندو آهي، اهي ڪيئن ويهندا آهن، ۽ اهي ڪيئن هلندا آهن؟

KonkaniIND

हे कृष्ण, स्थिर प्रज्ञा आशिल्लो आनी अतिचेतन अवस्थेंत विलीन जाल्लो ताचें वर्णन कितें? स्थिर बुद्धीचो मनीस कसो उलयता, ते कशे बसतात आनी कशे चलतात?

DogriIND

हे कृष्ण, जिसदे स्थिर प्रज्ञा होवे ते अतिचेतन अवस्था विच विलीन होवे, उस दा की वर्णन है? स्थिर बुद्धि दा आदमी किवें बोलदा है, किवें बैठदे हन ते किवें चलदे हन?

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.54।। व्याख्या -- [यहाँ अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें जो प्रश्न किये हैं, इन प्रश्नोंके पहले अर्जुनके मनमें कर्म और बुद्धि (2। 47 50) को लेकर शङ्का पैदा हुई थी। परन्तु भगवान्ने बावनवें-तिरपनवें श्लोकोंमें कहा कि जब तेरी बुद्धि मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिको तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा--यह सुनकर अर्जुनके मनमें शंङ्का हुई कि जब मैं योगको प्राप्त हो जाऊँगा, स्थितप्रज्ञ हो जाऊँगा तब मेरे क्या लक्षण होंगे? अतः अर्जुनने इस अपनी व्यक्तिगत शङ्काको पहले पूछ लिया और कर्म तथा बुद्धिको लेकर अर्थात् सिद्धान्तको लेकर जो दूसरी शङ्का थी, उसको अर्जुनने स्थितप्रज्ञके लक्षणोंका वर्णन होनेके बाद (3। 12 में) पूछ लिया। अगर अर्जुन सिद्धान्तका प्रश्न यहाँ चौवनवें श्लोकमें ही कर लेते तो स्थितप्रज्ञके विषयमें प्रश्न करनेका अवसर बहुत दूर पड़ जाता।]

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

प्रश्नके कारणको पाकर समाधिप्रज्ञाको प्राप्त हुए पुरुषके लक्षण जाननेकी इच्छासे अर्जुन बोला जिसकी बुद्धि इस प्रकार प्रतिष्ठित हो गयी है कि मैं परब्रह्म परमात्मा ही हूँ वह स्थितप्रज्ञ है। हे केशव ऐसे समाधिमें स्थित हुए स्थितप्रज्ञ पुरुषकी क्या भाषा होती है यानी वह अन्य पुरुषोंद्वारा किस प्रकार किन लक्षणोंसे बतलाया जाता है तथा वह स्थितप्रज्ञ पुरुष स्वयं किस तरह बोलता है कैसे बैठता है और कैसे चलता है अर्थात् उसका बैठना चलना किस तरहका होता है इस प्रकार इस श्लोकसे अर्जुन स्थितप्रज्ञ पुरुषके लक्षण पूछता है। जो पहलेसे ही कर्मोंको त्यागकर ज्ञाननिष्ठामें स्थित है और जो कर्मयोगसे ( ज्ञाननिष्ठाको प्राप्त हुआ है ) उन दोनों प्रकारके स्थितप्रज्ञोंके लक्षण और साधन प्रजहाति इत्यादि श्लोकसे लेकर अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त कहे जाते हैं। अध्यात्मशास्त्रमें सभी जगह कृतार्थ पुरुषके जो लक्षण होते हैं वे ही यत्नद्वारा साध्य होनेके कारण ( दूसरोंके लिये ) साधनरूपसे उपदेश किये जाते हैं। जो यत्नसाध्य साधन होते हैं वे ही ( सिद्ध पुरुषके स्वाभाविक ) लक्षण होते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

संन्यासिनो ज्ञाननिष्ठातत्प्राप्तिवचनं प्रश्नबीजं पृच्छतोऽर्जुनस्याभिप्रायमाह लब्धेति। लब्धा समाधावात्मनि समाधानेन वा प्रज्ञा परमार्थदर्शनलक्षणा येन तस्येति यावत्। ननु तस्य भाषा तत्कार्यानुरोधिनी भविष्यति किमित्यसौ विजिज्ञास्यते तत्राह कथमिति। ज्ञाननिष्ठस्य लक्षणविवक्षया प्रश्नमवतार्य तन्निष्ठासाधनबुभुत्सया विशिनष्टि समाधिस्थस्येति। तस्यैवार्थक्रियां पृच्छति स्थितधीरिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

तत्त्वविल्लक्षणानि जिज्ञासुरर्जुन उवाच स्थितेति। स्थिता प्रतिष्ठताहंब्रह्मास्मीति प्रज्ञा यस्य स एव समाधिस्थः। नत्वात्मज्ञानशून्यस्य मुख्यसमाधिरस्तीति भावः। तस्य का भाषा कथमसौ लोकैर्भाष्यते। कैर्लक्षणैर्लक्षितः सन् लोकैः स्थितप्रज्ञ इत्युच्यत इत्यर्थः। यथा भवानपि केशिहननादिकर्मणा केशव इत्युच्यते तथेति सूचयन्नाह हे केशवेति। एतेनावस्थाद्वयवान्समाधिस्थो व्युत्थितचेताश्चेति अतो विशिनष्टि समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्येत्यादि प्रत्युक्तम्। योगिनोऽप्रक्रान्तत्वेन तस्य लक्षणप्रश्नानौचित्यात्। तत्त्वज्ञानरुपसमाधिस्थस्यैव प्रक्रान्तत्वात् उत्तरे प्राणनिरोधं यदा करोति तदा समाधिस्थ इत्यनुक्तत्वाच्च ज्ञानिनः प्राणायामानपेक्षसमाधेर्वासिष्ठे स्पष्टमुक्तत्वाच्च। तथाहि परिध उवाच। यद्यत्संसारजालेऽस्मिन्क्रियते कर्म भूमिप। तत्समाहितचित्तस्य सुखायान्यस्य नानघक्वचित्संकल्परहितं परं विश्रमणास्पदम्। परमोपशमं श्रेयः समाधिमनुतिष्ठसिरघुरुवाच। एतन्मे ब्रूहि भगवन्त्सर्वसंकल्पवर्जितम्। परमोपशमं श्रेयः समाधिर्हि किमुच्यतेयोऽज्ञो महात्मन्सततं तिष्ठन्व्यवहरंश्च वा। असमाहितचित्तोऽसो कदा भवति कः किलनित्यप्रबुद्धचित्तास्तु कुर्वन्तोऽपि जगत्क्रियाः। आत्मैकतत्त्वसंनिष्ठाः सदैव सुसमाधयःबद्धपद्मासनस्यापि कृतब्रह्माञ्जलेरपि। अविश्रान्तस्वभावस्य कः समाधिः कथं च वातत्त्वावबोधो भगवन्त्सर्वाशातृणपावकः। प्रोक्तः समाधिशब्देन नतु तूष्णीमवस्थितिःसमाहिता नित्यतृप्ता यथाभूतार्थदर्शिनी। साधो समाधिशब्देन परा प्रज्ञोच्यते बुधैःअक्षुब्धा निरहंकारा द्वन्द्वेष्वननुपातिनी। प्रोक्ता समाधिशब्देन मेरोः स्थिरतराकृतिःनिश्चिताभिगताभीष्टा हेयोपादेयवर्जिता। प्रोक्ता समाधिशब्देन परिपूर्णा मनोगतिःयतःप्रभृति बोधेन युक्तमात्यन्तिकं मनः। तदारभ्य समाधानमव्युच्छिन्नं महात्मनः इत्यादि। स्थितधीः स्वयं वा किं प्रभाषेत। किं प्रभाषणमासनं ब्रजनं वा तस्य कथमित्यर्थः। आत्मनि स्थितस्य स्थितप्रज्ञस्य लक्षणं ब्रूहीति प्रश्नार्थः। तथाच भाष्यं। स्थितप्रज्ञस्य लक्षणमनेन श्लोकेन पृच्छ्यते। यो ह्यादित एव संन्यस्य कर्माणि ज्ञानयोगनिष्ठायां प्रवृत्तः यञ्च कर्मयोगेन तयोः स्थितप्रज्ञस्य प्रजहातीत्यारभ्याध्यायपरिसमाप्तिपर्यन्तं स्थितप्रज्ञलक्षणं साधनं चोपदिश्यते। सर्वत्र ह्यध्यात्मशास्त्रे कृतार्थलक्षणानि यानि तान्येव साधनान्युपदिश्यन्ते यत्नसाध्यत्वादिति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
sthitaprajñasya
what
bhāṣhātalk
samādhisthasya
keśhavaShree Krishna, killer of the Keshi Demon
sthitadhīḥ
kimwhat
prabhāṣhetatalks
kimhow
āsītasits
vrajetawalks
kimhow
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.53
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि

जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.55
श्री भगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते

श्रीभगवान् बोले - हे पृथानन्दन ! जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 54
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 54
अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्

हे केशव ! परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 54 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 54 का हिंदी अर्थ: "हे केशव ! परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 54?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 54 translates to: "O Krishna, what is the description of one who has steady wisdom and is merged in the superconscious state? How does one of steady wisdom speak, how do they sit, and how do they walk? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमास" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 54 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। हे केशव ! परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 54. O Krishna, what is the description of one who has steady wisdom and is merged in the superconscious state? How does one of steady wisdom speak, how do they sit, and how do they walk? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.