Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 52
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च

जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

మీ బుద్ధి మాయ యొక్క బురదను దాటి వెళ్ళినప్పుడు, మీరు విన్న మరియు ఇంకా వినవలసిన వాటి పట్ల ఉదాసీనతను పొందుతారు.

MarathiIND

जेव्हा तुमची बुद्धी भ्रमाच्या चिखलाच्या पलीकडे जाईल, तेव्हा तुम्ही जे ऐकले आहे आणि जे ऐकायचे आहे त्याबद्दल उदासीनता प्राप्त कराल.

GujaratiIND

જ્યારે તમારી બુદ્ધિ માયાના કાદવમાંથી બહાર નીકળી જશે, ત્યારે તમે જે સાંભળ્યું છે અને જે સાંભળવાનું બાકી છે તેના પ્રત્યે તમે ઉદાસીનતા પ્રાપ્ત કરશો.

MalayalamIND

നിങ്ങളുടെ ബുദ്ധി മായയുടെ ചെളിക്കുണ്ടിൽ നിന്ന് കടന്നുപോകുമ്പോൾ, നിങ്ങൾ കേട്ടതിലും ഇതുവരെ കേൾക്കാനിരിക്കുന്നതിലും നിസ്സംഗത കൈവരിക്കും.

BengaliIND

আপনার বুদ্ধি যখন ভ্রান্তির কাদা অতিক্রম করে, তখন আপনি যা শুনেছেন এবং যা এখনও শোনা বাকি আছে সে সম্পর্কে উদাসীনতা অর্জন করবেন।

TamilIND

உங்கள் புத்தி மாயையின் சேற்றைத் தாண்டிச் செல்லும்போது, ​​நீங்கள் கேட்டது மற்றும் கேட்க வேண்டியவற்றின் அலட்சியத்தை அடைவீர்கள்.

KannadaIND

ನಿಮ್ಮ ಬುದ್ಧಿಯು ಭ್ರಮೆಯ ಕೆಸರಿನಿಂದ ಆಚೆಗೆ ಹಾದುಹೋದಾಗ, ನೀವು ಕೇಳಿದ್ದಕ್ಕೆ ಮತ್ತು ಇನ್ನೂ ಕೇಳಬೇಕಾದ ವಿಷಯಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಉದಾಸೀನತೆಯನ್ನು ಸಾಧಿಸುವಿರಿ.

SindhiIND

جڏهن توهان جي عقل فريب جي دلدل کان ٻاهر نڪري ويندي، تڏهن جيڪي ٻڌو ويو آهي ۽ جيڪو اڃا تائين ٻڌو ويو آهي، تنهن کان توهان لاتعلق ٿي ويندا.

NepaliIND

जब तिम्रो बुद्धि भ्रमको दलदलबाट बाहिर जान्छ, तब तिमीले सुनेका र अझै सुनेका कुराहरूप्रति उदासीनता प्राप्त गर्नेछौ।

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਤੁਹਾਡੀ ਬੁੱਧੀ ਭਰਮ ਦੀ ਦਲਦਲ ਤੋਂ ਪਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਦ ਤੁਸੀਂ ਜੋ ਸੁਣਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਸੁਣਿਆ ਜਾਣਾ ਬਾਕੀ ਹੈ, ਉਸ ਤੋਂ ਤੁਸੀਂ ਉਦਾਸੀਨ ਹੋ ਜਾਵੋਗੇ।

DogriIND

जदूं तुंदी बुद्धि भ्रम दे दलदल कोला परे होई जाग, तां तुसेंगी उस गल्लै कन्नै उदासीनता हासल होई जाग जेह्ड़ी सुनी गेई ऐ ते जेह्ड़ी अजें तगर सुनेआ ऐ।

AssameseIND

যেতিয়া আপোনাৰ বুদ্ধি মোহৰ বোকা পাৰ হৈ যাব, তেতিয়া আপুনি শুনা আৰু শুনা বাকী কথাৰ প্ৰতি উদাসীনতা লাভ কৰিব।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.52।। व्याख्या-- 'यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति'-- शरीरमें अहंता और ममता करना तथा शरीर-सम्बन्धी माता-पिता, भाई-भौजाई, स्त्री-पुत्र, वस्तु, पदार्थ आदिमें ममता करना 'मोह' है। कारण कि इन शरीरादिमें अहंता-ममता है नहीं, केवल अपनी मानी हुई है। अनुकूल पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदिके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना और प्रतिकूल पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति आदिके प्राप्त होनेपर उद्विग्न होना, संसारमें--परिवारमें विषमता, पक्षपात, मात्सर्य आदि विकार होना--यह सब-का-सब 'कलिल' अर्थात् दलदल है। इस मोहरूपी दलदलमें जब बुद्धि फँस जाती है, तब मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। फिर उसे कुछ सूझता नहीं। यह स्वयं चेतन होता हुआ भी शरीरादि जड पदार्थोंमें अहंता-ममता करके उनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। पर वास्तवमें यह जिन-जिन चीजोंके साथ सम्बन्ध जोड़ता है, वे चीजें इसके साथ सदा नहीं रह सकतीं और यह भी उनके साथ सदा नहीं रह सकता। परन्तु मोहके कारण इसकी इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती, प्रत्युत यह अनेक प्रकारके नये-नये सम्बन्ध जोड़कर संसारमें अधिक-से-अधिक फँसता चला जाता है। जैसे कोई राहगीर अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचनेसे पहले ही रास्तेमें अपने डेरा लगाकर खेल-कूद, हँसी-दिल्लगी आदिमें अपना समय बिता दे, ऐसे ही मनुष्य यहाँके नाशवान् पदार्थोंका संग्रह करनेमें और उनसे सुख लेनेमें तथा व्यक्ति, परिवार आदिमें ममता करके उनसे सुख लेनेमें लग गया। यही इसकी बुद्धिका मोहरूपी कलिलमें फँसना है। हमें शरीरमें अहंता-ममता करके तथा परिवारमें ममता करके यहाँ थोड़े ही बैठे रहना है? इनमें ही फँसे रहकर अपनी वास्तविक उन्नति-(कल्याण-) से वञ्चित थोड़े ही रहना है? हमें तो इनमें न फँसकर अपना कल्याण करना है--ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाना ही बुद्धिका मोहरूपी दलदलसे तरना है। कारण कि ऐसा दृढ़ विचार होनेपर बुद्धि संसारके सम्बन्धोंको लेकर अटकेगी नहीं, संसारमें चिपकेगी नहीं। मोहरूपी कलिलसे तरनेके दो उपाय हैं--विवेक और सेवा। विवेक (जिसका वर्णन 2। 11 30 में हुआ है) तेज होता है, तो वह असत् विषयोंसे अरुचि करा देता है। मनमें दूसरोंकी सेवा करनेकी, दूसरोंको सुख पहुँचानेकी धुन लग जाय तो अपने सुख-आरामका त्याग करनेकी शक्ति आ जाती है। दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव जितना तेज होगा, उतना ही अपने सुखकी इच्छाका त्याग होगा। जैसे शिष्यकी गुरुके लिये, पुत्रकी माता-पिताके लिये, नौकरकी मालिकके लिये सुख पहुँचानेकी इच्छा हो जाती है, तो उनकी अपने सुख-आरामकी इच्छा स्वतः सुगमतासे मिट जाती है। ऐसे ही कर्मयोगीका संसारमात्रकी सेवा करनेका भाव हो जाता है, तो उसकी अपने सुख-भोगकी इच्छा स्वतः मिट जाती है। विवेक-विचारके द्वारा अपनी भोगेच्छाको मिटानेमें थोड़ी कठिनता पड़ती है। कारण कि अगर विवेक-विचार अत्यन्त दृढ़ न हो, तो वह तभीतक काम देता है, जबतक भोग सामने नहीं आते। जब भोग सामने आते हैं, तब साधक प्रायः उनको देखकर विचलित हो जाता है। परन्तु जिसमें सेवाभाव होता है, उसके सामने बढ़िया-से-बढ़िया भोग आनेपर भी वह उस भोगको दूसरोंकी सेवामें लगा देता है। अतः उसकी अपने सुखआरामकी इच्छा सुगमतासे मिट जाती है। इसलिये भगवान्ने सांख्य-योगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ (5। 2) सुगम (5। 3) एवं जल्दी सिद्धि देनेवाला (5। 6) बताया है। 'तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च' मनुष्यने जितने भोगोंको सुन लिया है, भोग लिया है, अच्छी तरहसे अनुभव कर लिया है, वे सब भोग यहाँ 'श्रुतस्य' पदके अन्तर्गत हैं। स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक आदिके जितने भोग सुने जा सकते हैं, वे सब भोग यहाँ 'श्रोतव्यस्य' पदके अन्तर्गत हैं। जब तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, तब इन 'श्रुत' ऐहलौकिक और 'श्रोतव्य'--पारलौकिक भोगोंसे, विषयोंसे तुझे वैराग्य हो जायगा। तात्पर्य है कि जब बुद्धि मोहकलिलको तर जाती है, तब बुद्धिमें तेजीका विवेक जाग्रत् हो जाता है कि संसार प्रतिक्षण बदल रहा है और मैं वही रहता हूँ; अतः इस संसारसे मेरेको शान्ति कैसे मिल सकती है? मेरा अभाव कैसे मिट सकता है? तब 'श्रुत' और 'श्रोतव्य' जितने विषय हैं, उन सबसे स्वतः वैराग्य हो जाता है। यहाँ भगवान्को 'श्रुत' के स्थानपर भुक्त और 'श्रोतव्य' के स्थानपर भोक्तव्य कहना चाहिये था। परन्तु ऐसा न कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो परोक्ष-अपरोक्ष विषयोंका आकर्षण होता है, वह सुननेसे ही होता है। अतः इनमें सुनना ही मुख्य है। संसारसे, विषयोंसे छूटनेके लिये जहाँ ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्गका वर्णन किया गया है, वहाँ भी 'श्रवण' को मुख्य बताया गया है। तात्पर्य है कि संसारमें और परमात्मामें लगनेमें सुनना ही मुख्य है। यहाँ 'यदा' और 'तदा' कहनेका तात्पर्य है कि इन 'श्रुत' और 'श्रोतव्य' विषयोंसे इतने वर्षोंमें, इतने महीनोंमें और इतने दिनोंमें वैराग्य होगा--ऐसा कोई नियम नहीं है, प्रत्युत जिस क्षण बुद्धि मोहकलिलको तर जायगी, उसी क्षण 'श्रुत' और 'श्रोतव्य' विषयोंसे भोगोंसे वैराग्य हो जायगा। इसमें कोई देरीका काम नहीं है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

योगानुष्ठानजनित सत्त्वशुद्धिसे उत्पन्न हुई बुद्धि कब प्राप्त होती है इसपर कहते हैं जब तेरी बुद्धि मोहकलिलको अर्थात् जिसके द्वारा आत्मानात्मके विवेकविज्ञानको कलुषित करके अन्तःकरण विषयोंमें प्रवृत्त किया जाता है उस मोहात्मक अविवेककालिमाको उल्लङ्घन कर जायगी अर्थात् जब तेरी बुद्धि बिल्कुल शुद्ध हो जायगी। तब उस समय तू सुननेयोग्यसे और सुने हुएसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा। अर्थात् तब तेरे लिये सुननेयोग्य और सुने हुए ( सब विषय ) निष्फल हो जायँगे यह अभिप्राय है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यस्मिन्कर्मणि क्रियमाणे परमार्थदर्शनलक्षणा बुद्धिरुद्देश्यतया युज्यते तस्मात्कर्मणः सकाशादितरत्कर्म तथाविधोद्देश्यभूतबुद्धिसंबन्धविधुरमतिशयेन निष्कृष्यते ततश्च परमार्थबुद्धिमुद्देश्यत्वेनाश्रित्य कर्मानुष्ठातव्यं परिच्छिन्नफलान्तरमुद्दिश्य तदनुष्ठाने कार्पण्यप्रसङ्गात् किञ्च परमार्थबुद्धिमुद्देश्यमाश्रित्य कर्मानुतिष्ठतः करणशुद्धिद्वारा परमार्थदर्शनसिद्धौ जीवत्येव देहे सुकृतादि हित्वा मोक्षमधिगच्छति। तथाच परमार्थदर्शनलक्षणयोगार्थं मनो धारयितव्यं योगशब्दितं हि परमार्थदर्शनमुद्देश्यतया कर्मस्वनुतिष्ठतो नैपुण्यमिष्यते यदि च परमार्थदर्शनमुद्दिश्य तद्युताः सन्तः समारभेरन्कर्माणि तदा तदनुष्ठानजनितबुद्धिशुद्ध्या ज्ञानिनो भूत्वा कर्मजं फलं परित्यज्य निर्मुक्तबन्धना मुक्तिभाजो भवन्तीत्येवमस्मिन्पक्षे श्लोकत्रयाक्षराणि व्याख्यातव्यानि। यथोक्तबुद्धिप्राप्तिकालं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति योगेति। श्रुतं श्रोतव्यं दृष्टं द्रष्टव्यमित्यादौ फलाभिलाषप्रतिबन्धान्नोक्ता बुद्धिरुदेष्यतीत्याशङ्क्याह यदेति। विवेकपरिपाकावस्था कालशब्देनोच्यते। कालुष्यस्य दोषपर्यवसायित्वं दर्शयन्विशिनष्टि येनेति। तदनर्थरूपं कालुष्यं तवेत्यन्वयार्थं पुनर्वचनम्। बुद्धिशुद्धिफलस्य विवेकस्य प्राप्त्या वैराग्यप्राप्तिं दर्शयति तदेति। अध्यात्मशास्त्रातिरिक्तं शास्त्रं श्रोतव्यादिशब्देन गृह्यते। उक्तं वैराग्यमेव स्फोरयति श्रोतव्यमिति। यथोक्तविवेकसिद्धौ सर्वस्मिन्ननात्मविषये नैष्फल्यं प्रतिभातीत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

सांख्यं बुद्धिं सदा प्राप्स्यामि यदर्थं कर्मानुष्ठानं भवतोपदिश्यत इत्यत आह यदेति। यदा यस्यामवस्थायां तव बुद्धिर्मोहात्मकमविवेकरुपं कालुष्यं व्यतिक्रमिष्यति तदा तस्यामवस्थायां श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च वैराग्यं प्राप्तासि। पूर्वं श्रुतिभिरनेकसाध्यसाधनश्रवणैर्विप्रतिपन्ना विक्षिप्ता श्रुतश्रोतवययोर्निर्वेदं लब्ध्वा यदा समाधीयते चित्तमस्मिन्निति समाधिरात्मा तस्मिन्निश्चला विक्षेपरहिता स्थास्यति स्थिरीभूता भविष्यति तदा योगं सांख्ययोगमवाप्स्यसीति द्वयोरर्थः। यद्वा योगानुष्ठानजनितसत्त्वशुद्धिजा वैराग्यादीतरसाधनसहिता नित्यानित्यवस्तुविवेकरुपा ज्ञानाधिकारसंपादिका बुद्धिः कदा प्राप्यत इत्यत आह यदेति। यदा तव बुद्धिर्मोहात्मकमविवेकरुपं कालुष्यं चित्ताशुद्धिजं व्यतितरिष्यति तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च कर्मफलस्य निर्वेदं गन्तासि। चित्तशुद्धिद्वारा लब्धात्मविवेकबुद्धिः कर्मयोगजं फलं परमात्मयोगं कदाप्स्यसीति तच्छृणु श्रुतीति। प्राग्वद्य्वाख्यानद्वयमपि भाष्याल्लभ्यत इति बोधम।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yadāwhen
teyour
mohadelusion
kalilamquagmire
buddhiḥintellect
vyatitariṣhyaticrosses
tadāthen
gantāsiyou shall acquire
nirvedamindifferent
śhrotavyasyato what is yet to be heard
śhrutasyato what has been heard
chaand
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.51
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्

समतायुक्त मनीषी साधक कर्मजन्य फलका त्याग करके जन्मरूप बन्धनसे मुक्त होकर निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.53
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि

जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 52
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 52
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च

जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 52 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 52 का हिंदी अर्थ: "जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 52?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 52 translates to: "When your intellect passes beyond the mire of delusion, then you will attain indifference to what has been heard and what has yet to be heard. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 52 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yadā te moha-kalilaṁ buddhir vyatitariṣhyati" mean in English?

"yadā te moha-kalilaṁ buddhir vyatitariṣhyati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 52. When your intellect passes beyond the mire of delusion, then you will attain indifference to what has been heard and what has yet to be heard. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.