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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्

बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है। — VaniSagar

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TeluguIND

వివేకం మరియు మనస్సు యొక్క సమానత్వంతో, ఒక వ్యక్తి ఈ జీవితంలో మంచి మరియు చెడు పనులను వదులుకుంటాడు; కాబట్టి, యోగాకు అంకితం చేయండి; యోగా అనేది చర్యలో నైపుణ్యం.

GujaratiIND

શાણપણ અને મનની સમાનતાથી સંપન્ન, વ્યક્તિ આ જીવનમાં સારા અને ખરાબ બંને કાર્યોને છોડી દે છે; તેથી, તમારી જાતને યોગમાં સમર્પિત કરો; યોગ એ ક્રિયામાં કુશળતા છે.

MarathiIND

बुद्धी आणि मनाच्या समतेने संपन्न, मनुष्य या जीवनात चांगली आणि वाईट दोन्ही कृत्ये सोडून देतो; म्हणून, स्वत:ला योगासाठी वाहून घ्या; योग म्हणजे कृती करण्याचे कौशल्य.

KannadaIND

ಬುದ್ಧಿವಂತಿಕೆ ಮತ್ತು ಮನಸ್ಸಿನ ಸಮಾನತೆಯೊಂದಿಗೆ, ಒಬ್ಬನು ಈ ಜೀವನದಲ್ಲಿ ಒಳ್ಳೆಯ ಮತ್ತು ಕೆಟ್ಟ ಕಾರ್ಯಗಳನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುತ್ತಾನೆ; ಆದ್ದರಿಂದ, ಯೋಗಕ್ಕೆ ನಿಮ್ಮನ್ನು ಅರ್ಪಿಸಿಕೊಳ್ಳಿ; ಯೋಗವು ಕ್ರಿಯೆಯಲ್ಲಿ ಕೌಶಲ್ಯವಾಗಿದೆ.

BengaliIND

প্রজ্ঞা এবং মনের সমতা দ্বারা সমৃদ্ধ, একজন ব্যক্তি এই জীবনে ভাল এবং মন্দ উভয় কাজই বন্ধ করে দেয়; অতএব, নিজেকে যোগাসনে নিবেদিত করুন; যোগব্যায়াম হল কর্মে দক্ষতা।

MalayalamIND

ജ്ഞാനവും സമചിത്തതയും ഉള്ള ഒരാൾ ഈ ജീവിതത്തിൽ നല്ലതും ചീത്തയുമായ പ്രവൃത്തികൾ ഉപേക്ഷിക്കുന്നു; അതിനാൽ, യോഗയിൽ സ്വയം അർപ്പിക്കുക; പ്രവർത്തനത്തിലെ വൈദഗ്ധ്യമാണ് യോഗ.

PunjabiIND

ਬੁੱਧੀ ਅਤੇ ਮਨ ਦੀ ਇਕਸਾਰਤਾ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ, ਵਿਅਕਤੀ ਇਸ ਜੀਵਨ ਵਿਚ ਚੰਗੇ ਅਤੇ ਮਾੜੇ ਦੋਵੇਂ ਕੰਮ ਛੱਡ ਦਿੰਦਾ ਹੈ; ਇਸ ਲਈ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਯੋਗਾ ਲਈ ਸਮਰਪਿਤ ਕਰੋ; ਯੋਗਾ ਕਾਰਜ ਵਿੱਚ ਹੁਨਰ ਹੈ।

TamilIND

ஞானம் மற்றும் மனதின் சமநிலை ஆகியவற்றைக் கொண்ட ஒருவர், இந்த வாழ்க்கையில் நல்ல மற்றும் தீய செயல்களை விட்டுவிடுகிறார்; எனவே, யோகாவில் உங்களை அர்ப்பணிக்கவும்; யோகா என்பது செயல் திறன்.

SindhiIND

عقل ۽ عقل سان نوازيو ويو، انسان هن زندگيءَ ۾ چڱا ۽ بڇڙا ڪم ڪري ڇڏي ٿو. تنهن ڪري، پنهنجو پاڻ کي يوگا ڏانهن وقف ڪريو؛ يوگا عمل ۾ مهارت آهي.

NepaliIND

बुद्धि र मनको समानताले सम्पन्न, मानिसले यस जीवनमा असल र खराब दुवै कामहरू त्याग्छ; त्यसकारण, आफूलाई योगमा समर्पित गर्नुहोस्; योग भनेको कार्यमा सीप हो।

MaithiliIND

बुद्धि आ मनक समता सँ सम्पन्न व्यक्ति एहि जीवन मे नीक आ अधलाह दुनू काज केँ फेकि दैत अछि; तेँ योग मे अपना केँ समर्पित करू; योग कर्म में कौशल है।

AssameseIND

প্ৰজ্ঞা আৰু মনৰ সমতাৰে সমৃদ্ধ এই জীৱনত ভাল আৰু বেয়া কাম দুয়োটাকে পেলাই দিয়ে; সেয়েহে যোগৰ প্ৰতি নিজকে উৎসৰ্গা কৰক; যোগ হৈছে কৰ্মত দক্ষতা।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते'-- समतायुक्त मनुष्य जीवित अवस्थामें ही पुण्य-पापका त्याग कर देता है अर्थात् उसको पुण्य-पाप नहीं लगते, वह उनसे रहित हो जाता है। जैसे संसारमें पुण्य-पाप होते ही रहते हैं, पर सर्वव्यापी परमात्माको वे पुण्य-पाप नहीं लगते, ऐसे ही जो समतामें निरन्तर स्थित रहता है, उसको पुण्यपाप नहीं लगते (गीता 2। 38)। समता एक ऐसी विद्या है जिससे मनुष्य संसारमें रहता हुआ ही संसारसे सर्वथा निर्लिप्त रह सकता है। जैसे कमलका पत्ता जलसे ही उत्पन्न होता है, और जलमें ही रहता है, पर वह जलसे लिप्त नहीं होता, ऐसे ही समतायुक्त पुरुष संसारमें रहते हुए भी संसारसे निर्लिप्त रहता है। पुण्य-पाप उसका स्पर्श नहीं करते अर्थात् वह पुण्य-पापसे असङ्ग हो जाता है। वास्तवमें यह स्वयं (चेतन-स्वरूप) पुण्य-पापसे रहित ही। केवल असत् पदार्थों--शरीरादिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही पुण्य-पाप लगते हैं। अगर यह असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध न जोड़े, तो यह आकाशकी तरह निर्लिप्त रहेगा, इसको पुण्य-पापनहीं लगेंगे। 'तस्माद्योगाय युज्यस्व'-- इसलिये तुम योगमें लग जाओ अर्थात् निरन्तर समतामें स्थित रहो। वास्तवमें समता तुम्हारा स्वरूप है। अतः तुम नित्य-निरन्तर समतामें ही स्थित रहते हो। केवल राग-द्वेषके कारण तुम्हारेको उस समताका अनुभव नहीं हो रहा है। अगर तुम हरदम समतामें स्थित न रहते, तो सुख और दुःखका ज्ञान तुम्हें कैसे होता; क्योंकि ये दोनों ही अलग-अलग हैं। जब इन दोनोंका तुम्हें ज्ञान होता है तो तुम इनके आने-जानेमें सदा समरूपसे रहते हो। इसी समताका तुम अनुभव करो। 'योगः कर्मसु कौशलम्'-- कर्मोंमें योग ही कुशलता है अर्थात् कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें और उन कर्मोंके फलके प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहना ही कर्मोंमें कुशलता है। उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंमें योगके सिवाय दूसरी कोई महत्त्वकी चीज नहीं है। इन पदोंमें भगवान्ने योगकी परिभाषा नहीं बतायी है, प्रत्युत योगकी महिमा बतायी है। अगर इन पदोंका अर्थ 'कर्मोंमें कुशलता ही योग है'--ऐसा किया जाय तो क्या आपत्ति है? अगर ऐसा अर्थ किया जायगा तो जो बड़ी कुशलतासे, सावधानीपूर्वक चोरी करता है, उसका वह चोरीरूप कर्म भी योग हो जायगा। अतः ऐसा अर्थ करना अनुचित है। कोई कह सकता है कि हम तो विहित कर्मोंको ही कुशलतापूर्वक करनेका नाम योग मानते हैं। परन्तु ऐसा माननेसे मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये गये कर्मोंके फलमें बँध जायगा, जिससे उसकी स्थिति समतामें नहीं रहेगी। अतः यहाँ 'कर्मोंमें योग ही कुशलता है'--ऐसा अर्थ लेना ही उचित है। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी जिसके अन्तःकरणमें समता रहती है, वह कर्म और उनके फलमें बँधेगा नहीं। इसलिये उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंको करते हुए सम रहना ही कुशलता है, बुद्धिमानी है। दूसरी बात, पीछेके दो श्लोकोंमें तथा इस श्लोकके पूर्वार्धमें भी योग (समता) का ही प्रसङ्ग है, कुशलताका प्रसङ्ग ही नहीं है। इसलिये भी कर्मोंमें योग ही कुशलता है-- यह अर्थ लेना प्रसङ्गके अनुसार युक्तियुक्त है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

समत्वबुद्धिसे युक्त होकर स्वधर्माचरण करनेवाला पुरुष जिस फलको पाता है वह सुन समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त हुआ पुरुष अन्तःकरणकी शुद्धिके और ज्ञानप्राप्तिके द्वारा सुकृतदुष्कृतको पुण्यपाप दोनोंको यहीं त्याग देता है इसी लोकमें कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसलिये तू समत्वबुद्धिरूप योगकी प्राप्तिके लिये यत्न कर चेष्टा कर। क्योंकि योग ही तो कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् स्वधर्मरूप कर्ममें लगे हुए पुरुषका जो ईश्वरसमर्पित बुद्धिसे उत्पन्न हुआ सिद्धिअसिद्धिविषयक समत्वभाव है वही कुशलता है। यही इसमें कौशल है कि स्वभावसे ही बन्धन करनेवाले जो कर्म हैं वे भी समत्व बुद्धिके प्रभावसे अपने स्वभावको छोड़ देते हैं अतः तू समत्वबुद्धिसे युक्त हो।

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Sri Anandgiri

पूर्वोक्तसमत्वबुद्धियुक्तस्य स्वधर्मानुष्ठाने प्रवृत्तस्य किं स्यादित्याशङ्क्याह समत्वेति। बुद्धियुक्तः स्वधर्माख्यं कर्मानुतिष्ठन्निति शेषः। बुद्धियोगस्य फलवत्त्वे फलितमाह तस्मादिति। पूर्वार्धं व्याचष्टे बुद्धीत्यादिना। ननु समत्वबुद्धिमात्रान्न पुण्यपापनिवृत्तिर्युक्ता परमार्थदर्शनवतस्तन्निवृत्तिप्रसिद्धेरिति तत्राह सत्त्वेति। उत्तरार्धं व्याचष्टे तस्मादिति। स्वधर्ममनुतिष्ठतो यथोक्तयोगार्थं किमर्थं मनो योजनीयमित्याशङ्क्याह योगो हीति। तर्हि यथोक्तयोगसामर्थ्यादेव दर्शितफलसिद्धेरनास्था स्वधर्मानुष्ठाने प्राप्तेत्याशङ्क्याह स्वधर्माख्येष्विति। ईश्वरार्पितचेतस्तया कर्मसु वर्तमानस्यानुष्ठाननिष्ठस्य या यथोक्ता बुद्धिस्तत्तेषु कौशलमिति योजना। कर्मणां बन्धस्वभावत्वात्तदनुष्ठाने बन्धानुबन्धः स्यादित्याशङ्क्य कौशलमेव विशदयति तद्धीति। समत्वबुद्धेरेवं फलत्वे स्थिते फलितमुपसंहरति तस्मादिति।

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Sri Dhanpati

काम्यकर्मणोऽवरत्वमुक्त्वा निष्काम कर्मणः श्रैष्ठ्यमाह समत्वबुद्धियुक्तः सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेणोभे पुण्यपापे त्यजति सांख्यबुद्धिर्युक्त इति वा तस्माद्योगाय समत्वलक्षणकर्मयागानुष्टानार्थ षटस्व ज्ञानयोगप्राप्त्यर्थमिति वा। यस्माद्योगः समत्वलक्षणः कर्मसु सर्वेषु कौशलं बन्धकानामपि तेषामीश्वरार्पितचेतस्तया मोक्षपरत्वसंपादनचातुर्यं ज्ञानयोग इति वा। अस्मिन्पक्षे कर्मसु ज्ञानप्रतिबन्धकेषु फलाभिसंधिं विहाय ज्ञानलाभचातुर्यमिति व्याख्येयम्। तस्मात्समत्वयुक्तो भवेत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
buddhiyuktaḥ
jahātiget rid of
ihain this life
ubheboth
sukṛitaduṣhkṛite
tasmāttherefore
yogāyafor Yog
yujyasvastrive for
yogaḥyog is
karmasu kauśhalamthe art of working skillfully
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.49
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः

बुद्धियोग-(समता) की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे (अत्यन्त) ही निकृष्ट है। अतः हे धनञ्जय ! तू बुद्धि (समता) का आश्रय ले; क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.51
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्

समतायुक्त मनीषी साधक कर्मजन्य फलका त्याग करके जन्मरूप बन्धनसे मुक्त होकर निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 50
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्

बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 50 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 50 का हिंदी अर्थ: "बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 50?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 50 translates to: "Endowed with wisdom and evenness of mind, one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote yourself to Yoga; Yoga is skill in action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 50 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite" mean in English?

"buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 50. Endowed with wisdom and evenness of mind, one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote yourself to Yoga; Yoga is skill in action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.