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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि

कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो। — VaniSagar

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MarathiIND

तुमचा अधिकार फक्त कार्य करण्याचा आहे, परंतु त्याच्या परिणामांवर नाही; कृतीचे परिणाम तुमचा हेतू असू देऊ नका किंवा तुमची आसक्ती निष्क्रियतेशी होऊ देऊ नका.

TeluguIND

మీ హక్కు పని చేయడం మాత్రమే, కానీ దాని ఫలితాలు కాదు; చర్య యొక్క ఫలితాలు మీ ఉద్దేశ్యంగా ఉండనివ్వవద్దు లేదా మీ అనుబంధం నిష్క్రియాత్మకంగా ఉండనివ్వండి.

GujaratiIND

તમારો અધિકાર ફક્ત કાર્ય કરવાનો છે, પરંતુ તેના પરિણામો પર નહીં; ક્રિયાના પરિણામોને તમારો ઉદ્દેશ્ય ન થવા દો, અને તમારા જોડાણને નિષ્ક્રિયતા ન થવા દો.

BhojpuriIND

राउर अधिकार खाली काम करे के बा, बाकिर ओकर परिणाम पर ना; कर्म के परिणाम के आपन मकसद ना बने दीं, ना ही आपन लगाव निष्क्रियता से होखे दीं.

AssameseIND

আপোনাৰ অধিকাৰ কেৱল কাম কৰা, কিন্তু ইয়াৰ ফলাফলৰ ওপৰত নহয়; কৰ্মৰ ফলক আপোনাৰ উদ্দেশ্য হ’বলৈ নিদিব, আৰু নিষ্ক্ৰিয়তাৰ প্ৰতি আপোনাৰ মোহ হ’ব নালাগে।

BengaliIND

আপনার অধিকার শুধুমাত্র কাজ করা, কিন্তু তার ফলাফল নয়; কর্মের ফলাফল আপনার উদ্দেশ্য হতে দেবেন না, বা আপনার সংযুক্তি নিষ্ক্রিয় হতে দেবেন না।

PunjabiIND

ਤੁਹਾਡਾ ਅਧਿਕਾਰ ਸਿਰਫ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਇਸਦੇ ਨਤੀਜਿਆਂ 'ਤੇ ਨਹੀਂ; ਕਰਮ ਦੇ ਨਤੀਜਿਆਂ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਮਨੋਰਥ ਨਾ ਬਣਨ ਦਿਓ, ਨਾ ਹੀ ਤੁਹਾਡੇ ਲਗਾਵ ਨੂੰ ਅਕਿਰਿਆਸ਼ੀਲ ਹੋਣ ਦਿਓ।

OdiaIND

ତୁମର ଅଧିକାର କେବଳ କାମ କରିବା, କିନ୍ତୁ ଏହାର ଫଳାଫଳକୁ ନୁହେଁ; କାର୍ଯ୍ୟର ଫଳାଫଳକୁ ତୁମର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ହେବାକୁ ଦିଅ ନାହିଁ, କିମ୍ବା ତୁମର ସଂଲଗ୍ନକୁ ନିଷ୍କ୍ରିୟ ହେବାକୁ ଦିଅ ନାହିଁ |

KannadaIND

ನಿಮ್ಮ ಹಕ್ಕು ಕೆಲಸ ಮಾಡುವುದು ಮಾತ್ರ, ಆದರೆ ಅದರ ಫಲಿತಾಂಶಗಳಿಗೆ ಅಲ್ಲ; ಕ್ರಿಯೆಯ ಫಲಿತಾಂಶಗಳು ನಿಮ್ಮ ಉದ್ದೇಶವಾಗಿರಲು ಬಿಡಬೇಡಿ ಅಥವಾ ನಿಮ್ಮ ಬಾಂಧವ್ಯವು ನಿಷ್ಕ್ರಿಯವಾಗಿರಲು ಬಿಡಬೇಡಿ.

MalayalamIND

നിങ്ങളുടെ അവകാശം പ്രവർത്തിക്കുക മാത്രമാണ്, പക്ഷേ അതിൻ്റെ ഫലങ്ങളല്ല; പ്രവർത്തനത്തിൻ്റെ ഫലങ്ങൾ നിങ്ങളുടെ പ്രേരണയാകാൻ അനുവദിക്കരുത്, നിങ്ങളുടെ അറ്റാച്ച്മെൻ്റ് നിഷ്‌ക്രിയത്വമായിരിക്കരുത്.

TamilIND

உங்களின் உரிமை உழைக்க மட்டுமே, ஆனால் அதன் முடிவுகளுக்கு அல்ல; செயலின் முடிவுகள் உங்கள் நோக்கமாக இருக்க வேண்டாம், அல்லது உங்கள் பற்றுதல் செயலற்றதாக இருக்க வேண்டாம்.

NepaliIND

तपाईको अधिकार केवल काम गर्ने हो, तर यसको नतिजामा होइन; कर्मको नतिजालाई तपाईंको उद्देश्य नबनाउनुहोस्, न त तपाईंको संलग्नतालाई निष्क्रिय हुन दिनुहोस्।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.47।। व्याख्या-- 'कर्मण्येवाधिकारस्ते'-- प्राप्त कर्तव्य कर्मका पालन करनेमें ही तेरा अधिकार है। इसमें तू स्वतन्त्र है। कारण कि मनुष्य कर्मयोनि है। मनुष्यके सिवाय दूसरी कोई भी योनि नया कर्म करनेके लिये नहीं है। पशु-पक्षी आदि जङ्गम और वृक्ष, लता आदि स्थावर प्राणी नया कर्म नहीं कर सकते। देवता आदिमें नया कर्म करनेकी सामर्थ्य तो है, पर वे केवल पहले किये गये यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही हैं। वे भगवान्के विधानके अनुसार मनुष्योंके लिये कर्म करनेकी सामग्री दे सकते हैं, पर केवल सुखभोगमें ही लिप्त रहनेके कारण स्वयं नया कर्म नहीं कर सकते। नारकीय जीव भी भोगयोनि होनेके कारण अपने दुष्कर्मोंका फल भोगते हैं, नया कर्म नहीं कर सकते। नया कर्म करनेमें तो केवल-मनुष्यका ही अधिकार है। भगवान्ने सेवारूप नया कर्म करके केवल अपना उद्धार करनेके लिये यह अन्तिम मनुष्यजन्म दिया है। अगर यह कर्मोंको अपने लिये करेगा तो बन्धनमें पड़ जायगा और अगर कर्मोंको न करके आलस्य-प्रमादमें पड़ा रहेगा तो बार-बार जन्मता-मरता रहेगा। अतः भगवान् कहते हैं कि तेरा केवल सेवारूप कर्तव्य-कर्म करनेमें ही अधिकार है। 'कर्मणि' पदमें एकवचन देनेका तात्पर्य है कि मनुष्यके सामने देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिको लेकर शास्त्रविहित कर्म तो अलग-अलग होंगे, पर एक समयमें एक मनुष्य किसी एक कर्मको ही तत्परतापूर्वक कर सकता है। जैसे, क्षत्रिय होनेके कारण अर्जुनके लिये युद्ध करना, दान देना आदि कर्तव्यकर्मोंका विधान है, पर वर्तमानमें युद्धके समय वह एक युद्धरूप कर्तव्य-कर्म ही कर सकता है, दान आदि कर्तव्य-कर्म नहीं कर सकता। 'मार्मिक बात' मनुष्यशरीरमें दो बातें हैं--पुराने कर्मोंका फलभोग और नया पुरुषार्थ। दूसरी योनियोंमें केवल पुराने कर्मोंका फलभोग है अर्थात् कीट-पतंग, पशु-पक्षी, देवता, ब्रह्म-लोकतककी योनियाँ भोग-योनियाँ हैं। इसलिये उनके लिये ऐसा करो और ऐसा मत करो'--यह विधान नहीं है। पशु-पक्षी कीट-पतंग आदि जो कुछ भी कर्म करते हैं, उनका वह कर्म भी फलभोगमें है। कारण कि उनके द्वारा किया जानेवाला कर्म उनके प्रारब्धके अनुसार पहलेसे ही रचा हुआ है। उनके जीवनमें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका जो कुछ भोग होता है, वह भोग भी फलभोगमें ही है। परन्तु मनुष्यशरीर तो केवल नये पुरुषार्थके लिये ही मिला है, जिससे यह अपना उद्धार कर ले। इस मनुष्यशरीरमें दो विभाग हैं--एक तो इसके सामने पुराने कर्मोंके फलरूपमें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आती है; और दूसरा यह नया पुरुषार्थ (नये कर्म) करता है। नये कर्मोंके अनुसार ही इसके भविष्यका निर्माण होता है। इसलिये शास्त्र, सन्त-महापुरुषोंका विधि-निषेध, राज्य आदिका शासन केवल मनुष्योंके लिये ही होता है ;क्योंकि मनुष्यमें पुरुषार्थकी प्रघानता है, नये कर्मोंको करनेकी स्वतन्त्रता है। परन्तु पिछले कर्मोंके फलस्वरूप मिलनेवाली अनुकूल-प्रतिकूलरूप परिस्थितिको बदलनेमें यह परतन्त्र है। तात्पर्य है कि मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र और फल-प्राप्तिमें परतन्त्र है। परन्तु अनुकूल-प्रतिकूलरूपसे प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करके मनुष्य उसको अपने उद्धारकी साधन-सामग्री बना सकता है; क्योंकि यह मनुष्यशरीर अपने उद्धारके लिये ही मिला है। इसलिये इसमें नया पुरुषार्थ भी उद्धारके लिये है और पुराने कर्मोंके फल फलरूपसे प्राप्त परिस्थिति भी उद्धारके लिये ही है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तेरा कर्ममें ही अधिकार है ज्ञाननिष्ठामें नहीं। वहाँ ( कर्ममार्गमें ) कर्म करते हुए तेरा फलमें कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्थामें कर्मफलकी इच्छा नहीं होनी चाहिये। यदि कर्मफलमें तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफलप्राप्तिका कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफलप्राप्तिका कारण तू मत बन। क्योंकि जब मनुष्य कर्मफलकी कामनासे प्रेरित होकर कर्ममें प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफलरूप पुनर्जन्मका हेतु बन ही जाता है। यदि कर्मफलकी इच्छा न करें तो दुःखरूप कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्तिप्रीति नहीं होनी चाहिये।

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Sri Anandgiri

तर्हि परम्परया पुरुषार्थसाधनं योगमार्गं परित्यज्य साक्षादेव पुरुषार्थकारणमात्मज्ञानं तदर्थमुपदेष्टव्यं तस्मै हि स्पृहयति मनो मदीयमित्याशङ्क्याह तव चेति। तर्हि तत्फलाभिलाषोऽपि स्यादिति नेत्याह मा फलेष्विति। पूर्वोक्तमेवार्थं प्रपञ्चयति मा कर्मेति। फलाभिसन्ध्यसंभवे कर्माकरणमेव श्रद्दधामीत्याशङ्क्याह मा त इति। ज्ञानानधिकारिणोऽपि कर्मत्यागप्रसक्तिं निवारयति कर्मण्येवेति। कर्मण्येवेत्येवकारार्थमाह न ज्ञानेति। नहि तत्राब्राह्मणस्यापरिपक्वकषायस्य मुख्योऽधिकारः सिध्यतीत्यर्थः। फलैस्तर्हि संबन्धो दुर्वारः स्यादित्याशङ्क्याह तत्रेति। कर्मण्येवाधिकारे सतीति सप्तम्यर्थः। फलेष्वधिकाराभावं स्फोरयति कर्मेति। कर्मानुष्ठानात्प्रागूर्ध्वं तत्काले चेत्येतत्कदाचनेति विवक्षितमित्याह कस्यांचिदिति। फलाभिसंधाने दोषमाह यदेति। एवं कर्मफलतृष्णाद्वारेणेत्यर्थः। कर्मफलहेतुत्वं विवृणोति यदा हीति। तर्हि विफलं क्लेशात्मकं कर्म न कर्तव्यमिति शङ्कामनुभाष्य दूषयति यदीत्यादिना। अकर्मणि ते सङ्गो मा भूदित्युक्तमेव स्पष्टयति अकरण इति।

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Sri Dhanpati

मम तर्हि क्वाधिकार इत्याकाङ्क्षायामाह कर्मणीति। कर्मण्येव नतु ज्ञाननिष्ठायामन्तःकरणशुद्य्धभावात् तत्रापि चित्तशुद्धिहेतौ फलाभिसंधिरहिते कर्मणि नतु बन्धनिमित्ते काम्ये इत्याह मेति। कदाचन कस्यांचितवस्थायामपि कर्मफलतृष्णा ते मास्तु। फलतृष्णया काम्ये तेऽधिकारो मास्त्विति यावत्। ननु तृष्णाभावेऽपि भोजनात्तृप्तिरिव कर्मणः फलं स्यादेवेति तत्राह मा कर्मेति। मा कर्मफले हेतुर्भूः फलतृष्णया तदुत्पादको माभूः। कामनया कृतस्य कर्मणः पश्वादिफलदातृत्वनियमात्चित्रया यजेत पशुकामः इति श्रुतेः। यत्तु कर्मफलं प्रवृत्तिहेतुर्यस्येति तन्न। बहुव्रीह्यपेक्षया तत्पुरुषस्य लघुत्वात् दुःखरुपेण निष्फलेन कर्मणा किमिति ते कर्माकरणे सङ्ग आसक्तिर्माभूत्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
karmaṇiin prescribed duties
evaonly
adhikāraḥright
teyour
not
phaleṣhuin the fruits
kadāchanaat any time
never
karmaphala
hetuḥcause
bhūḥbe
not
teyour
saṅgaḥattachment
astumust be
akarmaṇiin inaction
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.46
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः

सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे गड्ढों में भरे जल में मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, वेदों और शास्त्रोंको तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.48
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते

हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 47
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि

कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 47 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 47 का हिंदी अर्थ: "कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 47?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 47 translates to: "Your right is only to work, but not to its results; do not let the results of action be your motive, nor let your attachment be to inaction. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 47 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana" mean in English?

"karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 47. Your right is only to work, but not to its results; do not let the results of action be your motive, nor let your attachment be to inaction. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.