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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 31
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते

अपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है। — VaniSagar

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GujaratiIND

વધુમાં, તમારા કર્તવ્યને ધ્યાનમાં રાખીને, તમારે ડગવું જોઈએ નહીં, કારણ કે ક્ષત્રિય માટે ન્યાયી યુદ્ધથી વધુ કંઈ નથી.

TeluguIND

ఇంకా, మీ కర్తవ్యాన్ని దృష్టిలో ఉంచుకుని, మీరు తడబడకూడదు, ఎందుకంటే క్షత్రియునికి ధర్మయుద్ధం కంటే గొప్పది మరొకటి లేదు.

MarathiIND

पुढे, आपल्या कर्तव्याचा आदर करून, आपण डगमगता कामा नये, कारण क्षत्रियासाठी धार्मिक युद्धापेक्षा श्रेष्ठ काहीही नाही.

NepaliIND

यसबाहेक, आफ्नो कर्तव्यलाई ध्यानमा राखेर, तपाईंले डगमगाउनु हुँदैन, किनकि क्षत्रियका लागि धर्मी युद्धभन्दा ठूलो अरू केही छैन।

BengaliIND

তদুপরি, আপনার কর্তব্যের প্রতি লক্ষ্য রেখে, আপনার বিচলিত হওয়া উচিত নয়, কারণ একজন ক্ষত্রিয়ের পক্ষে ন্যায়পরায়ণ যুদ্ধের চেয়ে বড় কিছু নেই।

KannadaIND

ಇದಲ್ಲದೆ, ನಿಮ್ಮ ಕರ್ತವ್ಯವನ್ನು ಪರಿಗಣಿಸಿ, ನೀವು ಅಲುಗಾಡಬಾರದು, ಏಕೆಂದರೆ ಕ್ಷತ್ರಿಯನಿಗೆ ನ್ಯಾಯಯುತ ಯುದ್ಧಕ್ಕಿಂತ ಹೆಚ್ಚಿನದು ಏನೂ ಇಲ್ಲ.

MalayalamIND

കൂടാതെ, നിങ്ങളുടെ കർത്തവ്യം കണക്കിലെടുത്ത്, നിങ്ങൾ പതറരുത്, കാരണം ഒരു ക്ഷത്രിയന് നീതിയുക്തമായ യുദ്ധത്തേക്കാൾ ഉയർന്നതൊന്നുമില്ല.

PunjabiIND

ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ, ਆਪਣੇ ਫਰਜ਼ ਨੂੰ ਸਮਝਦੇ ਹੋਏ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਡੋਲਣਾ ਨਹੀਂ ਚਾਹੀਦਾ, ਕਿਉਂਕਿ ਇੱਕ ਖੱਤਰੀ ਲਈ ਧਰਮੀ ਯੁੱਧ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਹੈ।

SindhiIND

ان کان علاوه، توهان کي پنهنجي فرض جي لحاظ کان، توهان کي نه ڊهڻ گهرجي، ڇو ته ڪشتري لاء هڪ نيڪ جنگ کان وڌيڪ ٻيو ڪجهه ناهي.

TamilIND

மேலும், உங்கள் கடமையைக் கருத்தில் கொண்டு, நீங்கள் தயங்க வேண்டாம், ஏனெனில் ஒரு க்ஷத்திரியனுக்கு நேர்மையான போரை விட உயர்ந்தது எதுவுமில்லை.

OdiaIND

ଆହୁରି ମଧ୍ୟ, ତୁମର କର୍ତ୍ତବ୍ୟକୁ ଦୃଷ୍ଟିରେ ରଖି ତୁମେ ହତାଶ ହେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, କାରଣ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ପାଇଁ ଧାର୍ମିକ ଯୁଦ୍ଧଠାରୁ ଅଧିକ କିଛି ନାହିଁ |

ManipuriIND

ꯃꯈꯥ ꯇꯥꯅꯥ, ꯅꯍꯥꯛꯀꯤ ꯗ꯭ꯌꯨꯇꯤ ꯑꯗꯨ ꯌꯦꯡꯂꯒꯥ, ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯂꯩꯇꯅꯥ ꯍꯣꯠꯅꯔꯣꯏꯗꯕꯅꯤ, ꯃꯔꯃꯗꯤ ꯀ꯭ꯁꯠꯔꯤꯌꯥ ꯑꯃꯒꯤꯗꯃꯛ ꯑꯆꯨꯝꯕꯥ ꯂꯥꯅꯐꯃꯗꯒꯤ ꯍꯦꯟꯅꯥ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯀꯔꯤꯁꯨ ꯂꯩꯇꯦ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [पहले दो श्लोकोंमें युद्धसे होनेवाले लाभका वर्णन करते हैं।]

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यहाँ यह कहा गया कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक या मोह करना नहीं बन सकता। केवल इतना ही नहीं कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक और मोह नहीं बन सकते किंतु क्षत्रियके लिये जो युद्धरूप स्वधर्म है उसे देखकर भी तुझे कम्पित होना उचित नहीं है अभिप्राय यह कि अपने स्वाभाविक धर्मसे विचलित होना ( हटना ) भी तुझे उचित नहीं है। क्योंकि वह युद्ध पृथ्वीविजयद्वारा धर्मपालन और प्रजारक्षणके लिये किया जाता है इसलिये धर्मसे ओतप्रोत परम धर्म्य है अतः उस धर्ममय युद्धके सिवा दूसरा कुछ क्षत्रियके लिये कल्याणप्रद नहीं है।

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Sri Anandgiri

श्लोकान्तरमवतारयन्वृत्तं कीर्तयति इहेति। पूर्वश्लोकः सप्तम्यर्थः यत्पारमार्थिकं तत्त्वं तदपेक्षायामेव केवलं शोकमोहयोरसंभवो न भवति किंतु स्वधर्ममपि चावेक्ष्येति संबन्धः। स्वकीयं क्षात्रधर्ममनुसंधाय ततश्चलनं परिहर्तव्यमित्यर्थः। यद्धि क्षत्रियस्य धर्मादनपेतं श्रेयःसाधनं तदेव मयानुवर्तितव्यमित्याशङ्क्याह धर्मादिति। जातिप्रयुक्तं स्वाभाविकं स्वधर्ममेव विशिनष्टि क्षत्रियस्येति। पुनर्नकारोपादानमन्वयार्थम्। प्रचलितुमयोग्यत्वे प्रतियोगिनं दर्शयति स्वाभाविकादिति। स्वाभाविकत्वमशास्त्रीयत्वमिति शङ्कां वारयितुं तात्पर्यमाह आत्मेति। आत्मनः स्वस्यार्जुनस्य स्वाभाव्यं क्षत्रियस्वभावप्रयुक्तं वर्णाश्रमोचितं कर्म तस्मादित्यर्थः। धर्मार्थं प्रजापरिपालनार्थं च प्रयतमानस्य युद्धादुपरिरंसा श्रद्धातव्येत्याशङ्क्याह तच्चेति। ततोऽपि श्रेयस्करं किंचिदनुष्ठातुं युद्धादुपरतिरुचितेत्याशङ्क्याह तस्मादिति। तस्माद्युद्धात्प्रचलनमनुचितमिति शेषः।

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Sri Dhanpati

इत्थमात्मतत्त्वापेक्षायां शोकमोहौ न संभवत् इत्युक्तम्। न केवलमात्मतत्त्वापेक्षायामेव किंतु स्वधर्ममपि चावेक्ष्येत्याह स्वधर्ममपीति। यत्तु कैश्चित्सर्वप्राणिसाधारणं भ्रमं निराकृत्यार्जुनस्यैवासाधारणं भ्रमं निराकरोतीत्युक्तं तत्पूर्वोक्तयुक्त्या निरसनीयम्। स्वधर्मं क्षत्रियस्य धर्मयुद्धं धर्मशास्त्रादवेक्ष्य विचार्य शोकमोहाभिभूतः स्वधर्माच्चालितुं नार्हसि। यस्मात्पृथिवीजयद्वारा युद्धस्य यज्ञादिधर्मार्थत्वेन ब्राह्मणादिप्रजारक्षणार्थत्वेन च धर्मादनपेताद्युद्धादन्यच्छ्रेयःसाधनं युद्धसदृशं क्षत्रियस्य न भवतीत्यर्थः। अतो मोक्षरुपश्रेयोर्थिनो ते युद्धेन स्वधर्मेणं जयं लब्ध्वा यज्ञाद्यनुष्ठानप्रजापालनादिभ्योऽन्यत्तत्साधनं न भवतीत्याशयः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
swadharmam
apialso
chaand
avekṣhyaconsidering
nanot
vikampitumto waver
arhasishould
dharmyātfor righteousness
hiindeed
yuddhātthan fighting
śhreyaḥbetter
anyatanother
kṣhatriyasyaof a warrior
nanot
vidyateexists
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Bhagavad Gita · 2.30
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.32
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्

अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध खुला हुआ स्वर्गका दरवाजा भी है। हे पृथानन्दन ! वे क्षत्रिय बड़े सुखी (भाग्यशाली) हैं, जिनको ऐसा युद्ध प्राप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 31
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 31
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते

अपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ: "अपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31 translates to: "Further, having regard to your duty, you should not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 31 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। अपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "swa-dharmam api chāvekṣhya na vikampitum arhasi" mean in English?

"swa-dharmam api chāvekṣhya na vikampitum arhasi" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31. Further, having regard to your duty, you should not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.