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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 74
सञ्जय उवाचइत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्

सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना। — VaniSagar

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TeluguIND

ఈ విధంగా, కృష్ణుడు మరియు ఉత్కృష్టాత్ముడైన అర్జునుడికి మధ్య ఈ అద్భుతమైన సంభాషణను నేను విన్నాను, ఇది ఒకరి జుట్టును నిలువరించేలా చేస్తుంది.

MarathiIND

अशा प्रकारे, मी कृष्ण आणि उच्च आत्म्याचा अर्जुन यांच्यातील हा अद्भुत संवाद ऐकला आहे, ज्यामुळे माणसाचे केस रेंगाळतात.

BengaliIND

এইভাবে, আমি কৃষ্ণ এবং উচ্চাভিলাষী অর্জুনের মধ্যে এই বিস্ময়কর কথোপকথনটি শুনেছি, যার ফলে মানুষের চুল শেষ হয়ে যায়।

GujaratiIND

આમ, મેં કૃષ્ણ અને ઉચ્ચ આત્માવાળા અર્જુન વચ્ચેનો આ અદ્ભુત સંવાદ સાંભળ્યો છે, જેના કારણે વ્યક્તિના વાળ ખરી પડે છે.

MalayalamIND

അങ്ങനെ, കൃഷ്ണനും ഉന്നതനായ അർജ്ജുനനും തമ്മിലുള്ള ഈ അത്ഭുതകരമായ സംഭാഷണം ഞാൻ കേട്ടിട്ടുണ്ട്, ഇത് ഒരുവൻ്റെ മുടിയിഴയുണ്ടാക്കുന്നു.

PunjabiIND

ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਮੈਂ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਅਤੇ ਉੱਚ-ਆਤਮਾ ਵਾਲੇ ਅਰਜੁਨ ਵਿਚਕਾਰ ਇਹ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਸੰਵਾਦ ਸੁਣਿਆ ਹੈ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਸਿਰ ਦੇ ਵਾਲ ਖੜ੍ਹੇ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।

AssameseIND

এইদৰে কৃষ্ণ আৰু উচ্চ আত্মাৰ অৰ্জুনৰ মাজত হোৱা এই আচৰিত সংলাপ শুনিছো, যাৰ ফলত মানুহৰ চুলিবোৰ মূৰত থিয় হৈ থাকে।

OdiaIND

ଏହିପରି, ମୁଁ କୃଷ୍ଣ ଏବଂ ଉଚ୍ଚ ଆତ୍ମା ​​ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି ଚମତ୍କାର ସଂଳାପ ଶୁଣିଛି, ଯାହା କାହାର କେଶକୁ ଶେଷରେ ଠିଆ କରେ |

KannadaIND

ಹೀಗೆ ಕೃಷ್ಣನಿಗೂ ಪರಮಾತ್ಮನ ಅರ್ಜುನನಿಗೂ ಈ ಅದ್ಭುತವಾದ ಸಂವಾದವನ್ನು ಕೇಳಿದ್ದೇನೆ.

NepaliIND

यसरी, मैले कृष्ण र उच्च आत्मा भएका अर्जुन बीचको यो अद्भुत संवाद सुनेको छु, जसको कारण मानिसको कपाल खडा हुन्छ।

TamilIND

இவ்வாறு, கிருஷ்ணருக்கும் உயர் ஆன்மா கொண்ட அர்ஜுனனுக்கும் இடையிலான இந்த அற்புதமான உரையாடலை நான் கேட்டிருக்கிறேன், இது ஒருவரின் தலைமுடியை உதிர்க்கும்.

SindhiIND

اهڙيءَ طرح، مون ڪرشن ۽ بلند روح ارجن جي وچ ۾ هي عجيب گفتگو ٻڌو آهي، جنهن جي ڪري هر ماڻهوءَ جا وار ٽٽي پون ٿا.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः -- सञ्जय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह संवाद सुना? जो कि अत्यन्त अद्भुत? विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्षके मारे रोमाञ्चित करनेवाली है।यहाँ इति पदका तात्पर्य है कि पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः पदोंसे सञ्जय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताका आरम्भ करते हैं और यहाँ इति पदसे उस संवादकी समाप्ति करते हैं।अर्जुनके लिये महात्मनः विशेषण देनेका तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं? जिनकी आज्ञाका पालन स्वयं भगवान् करते हैं अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कर दो (गीता 1। 21)? तो भगवान् दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कर देते हैं (गीता 1। 24)। गीतामें अर्जुन जहाँजहाँ प्रश्न करते हैं? वहाँवहाँ भगवान् बड़े प्यारसे और बड़ी विलक्षण रीतिसे प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुनके और भगवान् वासुदेवके संवादको मैंने सुना है।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् -- इस संवादमें अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है शास्त्रोंमें प्रायः ऐसी बात आती है कि संसारकी निवृत्ति करनेसे ही मनुष्य पारमार्थिक मार्गपर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्योंमें भी प्रायः ऐसी ही धारण बैठी हुई है कि घर? कुटुम्ब आदिको छोड़कर साधुसंन्यासी होनेसे ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति? अवस्था? घटना? काल आदि क्यों न हो? उसीके सदुपयोगसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं? वह परिस्थिति बढ़ियासेबढ़िया हो या घटियासेघटिया? सौम्यसेसौम्य हो या घोरसेघोर विहित युद्धजैसी प्रवृत्ति हो? जिसमें दिनभर मनुष्योंका गला काटना पड़ता है? उसमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है? मुक्ति हो सकती है । कारण कि जन्ममरणरूप बन्धनमें संसारका राग ही कारण है (गीता 13। 21)। उस रागको मिटानेमें परिस्थितिका सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थितिमें रागद्वेष न करके अपने कर्तव्यका पालन करता है? वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता 5। 3)। यही इस संवादमें अद्भुतपना है।भगवान्का स्वयं अवतार लेकर मनुष्यजैसा काम करते हुए अपनेआपको प्रकट कर देना औरमेरी शरणमें आ जा यह अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात कह देना -- यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाला? प्रसन्न करनेवाला? आनन्द देनेवाला है। सम्बन्ध -- पारमार्थिक मार्गमें सच्चे साधकको जिसकिसीसे लाभ होता है? उसकी वहि कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अतः सञ्जय भी आगेके तीन श्लोकोंमें व्यासजीकी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

शास्त्रका अभिप्राय समाप्त हो चुका। अब कथाका सम्बन्ध दिखलानेके लिये संजय बोला --, इस प्रकार मैंने यह उपर्युक्त अद्भुत -- अत्यन्त विस्मयकारक रोमाञ्च करनेवाला श्रीवासुदेव भगवान् और महात्मा अर्जुनका संवाद सुना।

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Sri Anandgiri

शास्त्रार्थे समाप्ते सत्यस्यामवस्थायां संजयवचनं कुत्रोपयुक्तमिति तदाह -- परिसमाप्त इति। वासुदेवस्य सर्वज्ञस्य सर्वेश्वरस्य कृतार्थस्य पार्थस्य पृथासुतस्यार्जुनस्य महात्मनोऽक्षुद्रबुद्धेः सर्वाधिकारिगुणसंपन्नस्य सम्यञ्चं वादं संवादं गुरुशिष्यभावेन प्रश्नप्रतिवचनाभिधानमिममनुक्रान्तमद्भुतं विस्मयकरं रोमाणि हृष्यन्ति पुलकीभवन्त्यनेनेति रोमहर्षणमाह्लादकं यथोक्तं श्रुतवानस्मीत्याह -- इत्येवमिति।

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Sri Dhanpati

परिसमाप्तः कृष्णपार्थसंवादात्मकः शास्त्रार्थोऽथेदानीं कथासंबन्धप्रदर्शनार्थं संजय उवाच -- इत्यहं वासुदेवस्य सर्वात्मनः सर्वज्ञस्य सर्वेश्वरस्य पार्थस्य पृथापुत्रस्य च महात्मनोऽक्षुद्रस्वभावस्य भगवदनुग्रहीतस्य सभ्यग्वांद संवादं गुरुशिष्यवचनेन प्रश्नप्रतिवचनाभिधानमिमं त्वां प्रत्युक्तं अद्भुतमत्यन्तविस्मयकरं रोमाणि हृष्यन्ति पुलकीभवन्त्यनेनेति रोमहर्षणं हर्षनिमित्तकरोमाञ्चकरं अश्रौषं श्रुतवानस्मि। अतिधन्यो वसुदेवो यद्गृहे स्वयं भगवानतीर्णः? पृथा च धन्या यस्याः पुत्रः परमभागवतो भगवदनुगृहीतः ध्वनितम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sañjayaḥ uvāchaSanjay said
itithus
ahamI
vāsudevasyaof Shree Krishna
pārthasyaArjun
chaand
mahāātmanaḥ
saṁvādamconversation
imamthis
aśhrauṣhamhave heard
adbhutamwonderful
romaharṣhaṇam
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Bhagavad Gita · 18.73
अर्जुन उवाचनष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव

हे अच्युत ! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.75
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्

व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग (गीता-ग्रन्थ) को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 74
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 74
सञ्जय उवाचइत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्

सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 74 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 74 का हिंदी अर्थ: "सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 74?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 74 translates to: "Thus, I have heard this wonderful dialogue between Krishna and the high-souled Arjuna, which causes one's hair to stand on end. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सञ्जय उवाचइत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 74 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sañjaya uvācha" mean in English?

"sañjaya uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 74. Thus, I have heard this wonderful dialogue between Krishna and the high-souled Arjuna, which causes one's hair to stand on end. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.