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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 71
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्

श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

तसेच जो मनुष्य श्रद्धेने पूर्ण आणि द्वेषमुक्त हे ऐकतो, तो सत्कर्माच्या सुखी संसाराला प्राप्त होईल आणि मुक्त होईल.

TamilIND

மேலும், இதைக் கேட்கும் மனிதன், நம்பிக்கை நிறைந்தவனாகவும், தீமையற்றவனாகவும், நேர்மையான செயல்களின் மகிழ்ச்சியான உலகத்தை அடைந்து, விடுதலை பெறுவான்.

MalayalamIND

കൂടാതെ, ഇത് ശ്രവിക്കുന്ന മനുഷ്യൻ വിശ്വാസത്താൽ നിറഞ്ഞവനും ദ്രോഹമുക്തനുമായാൽ, സത്കർമങ്ങളുടെ സന്തുഷ്ടലോകം പ്രാപിക്കുകയും മുക്തി നേടുകയും ചെയ്യും.

GujaratiIND

વળી, જે માણસ આ સાંભળે છે, વિશ્વાસથી ભરપૂર અને દ્વેષથી મુક્ત, તે સદાચારના સુખી સંસારને પ્રાપ્ત કરશે, અને મુક્ત થશે.

KannadaIND

ಅಲ್ಲದೆ, ಇದನ್ನು ಕೇಳುವ ಮನುಷ್ಯನು ನಂಬಿಕೆಯಿಂದ ಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಮತ್ತು ದುರುದ್ದೇಶದಿಂದ ಮುಕ್ತನಾಗಿರುತ್ತಾನೆ, ಸತ್ಕರ್ಮಗಳ ಸಂತೋಷದ ಪ್ರಪಂಚವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಮುಕ್ತಿ ಹೊಂದುತ್ತಾನೆ.

TeluguIND

అలాగే, ఇది విన్న మనిషి, విశ్వాసంతో నిండి, దురాలోచన లేకుండా, ధర్మబద్ధమైన కర్మల యొక్క సంతోషకరమైన లోకాలను పొందుతాడు మరియు ముక్తిని పొందుతాడు.

BengaliIND

এছাড়াও, যে ব্যক্তি এই কথা শুনবে, বিশ্বাসে পরিপূর্ণ এবং দ্বেষমুক্ত, সে ধার্মিক কর্মের সুখী সংসারে পৌঁছবে এবং মুক্তি পাবে।

PunjabiIND

ਨਾਲ ਹੀ, ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਇਸ ਨੂੰ ਸੁਣਦਾ ਹੈ, ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਅਤੇ ਦੁਸ਼ਟਤਾ ਤੋਂ ਰਹਿਤ, ਉਹ ਧਰਮੀ ਕਰਮਾਂ ਵਾਲੇ ਸੁਖੀ ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰੇਗਾ, ਅਤੇ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ।

MizoIND

Tin, chu thu ngaithlatu, rinna nena khat leh sualna nei lo mi chuan thil dik titute khawvel hlim tak chu a thleng ang a, a chhuah zalen ang.

KonkaniIND

तशेंच, हें आयकपी मनीस, श्रद्धेन भरिल्लो आनी दुस्वास मुक्त, सद्कर्मां च्या सुखी संवसारांत पावतलो आनी मुक्त जातलो.

BhojpuriIND

साथ ही ई बात सुने वाला आदमी आस्था से भरल आ दुर्भावना से मुक्त होके धर्मकर्म करे वाला लोग के सुखद लोक के प्राप्ति करी आ मुक्त हो जाई।

DogriIND

इत्थूं तगर जे एह् सुनने आह्ला माह्नू, विश्वास कन्नै भरोचे दा ते दुर्भावना थमां मुक्त, सच्चे कम्में आह्ले लोकें दे सुखद संसारें गी हासल करी लैग, ते मुक्त होई जाग।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- श्रद्धावाननसूयश्च৷৷. पुण्यकर्मणाम् -- गीताकी बातोंको जैसा सुन ले? उसको प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसाकावैसा माननेवालेका नाम श्रद्धावान् है? और उन बातोंमें कहीं भी? किसी भी विषयमें किञ्चिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम अनसूयः है। ऐसा श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है।यहाँ दो बार अपि पद देनेका तात्पर्य है कि जो गीताका प्रचार करता है? अध्ययन करता है? उसके लिये तो कहना ही क्या है पर जो सुन भी लेता है? वह मनुष्य भी पापोंसे छूटकर शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।मनुष्यकी वाणीमें प्रायः भ्रम? प्रमाद? लिप्सा और कारणापाटव -- ये चार दोष होते हैं । अतः मनुष्यकी वाणी सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकती। परन्तु भगवान्की दिव्य वाणीमें इन चारोंमेंसे कोई भी दोष नहीं रह सकता क्योंकि भगवान् निर्दोषताकी परावधि हैं अर्थात् भगवान्से बढ़कर निर्दोषता किसीमें,कभी होती ही नहीं। इसलिये भगवान्के वचनोंमें किसी प्रकारके संशयकी सम्भावना ही नहीं है। अतः गीता सुननेवालेको कोई विषय समझमें कम आये? विचारद्वारा कोई बात न जँचे? तो समझना चाहिये कि इस विषयको समझनेमें मेरी बुद्धिकी कमी है? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ -- इस भावको दृढ़तासे धारण करनेपर असूयादोष मिट जाता है। भगवान्में अत्यधिक श्रद्धाविश्वासपूर्वक भक्ति होनेपर भी असूयादोष नहीं रहता।चैतन्य महाप्रभुका एक भक्त था। वह रोज गीताका पाठ करते हुए मस्त हो जाता था? गद्गद हो जाता था और रोने लगता था। वह शुद्ध पाठ नहीं करता था। उसके पाठमें अशुद्धियाँ आती थीं। उसके विषयमें किसीने चैतन्य महाप्रभुसे शिकायत कर दी किदेखिये प्रभु वह बड़ा पाखण्ड करता है पाठ तो शुद्ध करता नहीं और रोता रहता है। चैतन्य महाप्रभुने उसको अपने पास बुलाकर पूछा -- तुम गीताका पाठ करते हो? तो क्या उसका अर्थ जानते हो उसने कहा -- नहीं प्रभु फिर पूछा -- तो फिर तुम रोते क्यों हो उसने कहा -- मैं जब अर्जुन उवाच पढ़ता हूँ तो अर्जुन भगवान्से पूछ रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है और जब मैं श्रीभगवानुवाच पढ़ता हूँ? तो भगवान् अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर दे रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष,दीखता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका आपसमें संवाद हो रहा है -- ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है परन्तु अर्जुन क्या पूछते हैं और भगवान् क्या उत्तर देते हैं? यह मेरी समझमें नहीं आता। मैं तो उन दोनोंके दर्शन करकरके राजी होता हूँ। उसकी ऐसी श्रद्धाभक्ति देखकर चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकारकी श्रद्धाभक्तिवाला मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं रहता। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।यहाँ पुण्यकर्मणाम् पदसे सकामभावपूर्वक यज्ञ? अनुष्ठान आदि पुण्यकर्म करनेवालोंको नहीं लेना चाहिये क्योंकि भगवान्ने उनको ऊँचा नहीं माना है? प्रत्युत उनके बारेमें कहा है कि वे बारबार आवागमनको प्राप्त होते हैं (गीता 9। 21)। यहाँ उन पुण्यकर्मा भक्तोंको लेना चाहिये? जिनको भगवान्का प्रेमदर्शन आदिकी प्राप्ति होती है। ऐसे पुण्यकर्मा भक्तोंको अपनेअपने इष्टके अनुसार वैकुण्ठ? साकेत? गोलोक? कैलास आदि जिन दिव्य लोकोंकी प्राप्ति होती है? असूयादोषरहित श्रद्धावान् पुरुषको गीता सुननेमात्रसे उन लोकोंकी प्राप्ति हो जाती है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें गीता सुननेका माहात्म्य बताकर अब अर्जुनकी क्या स्थिति है? क्या दशा है? आदि सब कुछ जानते हुए भी भगवान् भगवद्गीताश्रवणके माहात्म्यको सबके सामने प्रकट करनेके उद्देश्यसे आगेके श्लोकमें अर्जुनसे प्रश्न करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा श्रोताको यह ( आगे बतलाया जानेवाला ) फल मिलता है --, जो मनुष्य? इस ग्रन्थको श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिरहित होकर केवल सुनता ही है? वह भी पापोंसे मुक्त होकर? पुण्यकारियोंके अर्थात् अग्निहोत्रादि श्रेष्ठकर्म करनेवालोंके? शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है। अपिशब्दसे यह पाया जाता है कि अर्थ समझनेवालेकी तो बात ही क्या है। शिष्यने शास्त्रका अभिप्राय ग्रहण किया या नहीं यह विवेचन करनेके लिये भगवान् पूछते हैं। इसमें पूछनेवालेका यह अभिप्राय है कि शास्त्रका अभिप्राय श्रोताने ग्रहण नहीं किया है -- यह मालूम होनेपर? फिर किसी और उपायसे ग्रहण कराऊँगा।

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Sri Anandgiri

प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरिदानीं फलं कथयति -- अथेति।

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Sri Dhanpati

प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरपि फलं कथयति। श्रद्धावान् श्रद्दधानोऽनसूयश्च पौरुषेयत्वात् श्रुतितो निकृष्टमिदमिति दोषदृष्टिरसूया तद्रहितः सन्निमं ग्रन्थं यो नरो यः कश्चिच्छ्रणुयादपि। नरशब्देनैतच्छ्रवणेनापि यो हीनो नासौ नरः किंतु पशुरिति सूचयति। सोऽपि मुक्तः पातकाद्रहितः पुण्यकर्मणामग्निहोत्राश्वमेधादिपुण्यकर्मवतां लोकान् शुभान्प्रशस्तान्प्राप्नुयात्। अपिशब्दात्किमुतार्थज्ञानवान्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhraddhāvān
anasūyaḥwithout envy
chaand
śhṛiṇuyātlisten
apicertainly
yaḥwho
naraḥa person
saḥthat person
apialso
muktaḥliberated
śhubhānthe auspicious
lokānabodes
prāpnuyātattain
puṇyakarmaṇām
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जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar

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श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्

श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 71 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 71 का हिंदी अर्थ: "श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 71?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 71 translates to: "Also, the man who hears this, full of faith and free from malice, shall attain to the happy worlds of those of righteous deeds, and be liberated. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 71 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhraddhāvān anasūyaśh cha śhṛiṇuyād api yo naraḥ" mean in English?

"śhraddhāvān anasūyaśh cha śhṛiṇuyād api yo naraḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 71. Also, the man who hears this, full of faith and free from malice, shall attain to the happy worlds of those of righteous deeds, and be liberated. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.