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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि

उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

மனிதர்களில் எனக்குப் பிரியமான சேவை செய்பவர் எவரும் இல்லை, அவரை விட எனக்குப் பிரியமானவர் பூமியில் இருக்கமாட்டார்.

MarathiIND

माझ्यापेक्षा प्रिय सेवा करणारा मनुष्यांमध्ये कोणीही नाही आणि पृथ्वीवर माझ्यापेक्षा प्रिय कोणीही नाही.

SindhiIND

انسانن مان ڪو به اهڙو ناهي جيڪو مون کان وڌيڪ پيارو خدمت ڪري، ۽ نه ئي زمين تي ڪو ان کان وڌيڪ پيارو آهي.

PunjabiIND

ਮਨੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਕੋਈ ਵੀ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਹੈ ਜੋ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਪਿਆਰਾ ਸੇਵਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਧਰਤੀ ਉੱਤੇ ਕੋਈ ਉਸ ਤੋਂ ਪਿਆਰਾ ਹੋਵੇਗਾ।

KannadaIND

ಮನುಷ್ಯರಲ್ಲಿ ನನಗೆ ಪ್ರಿಯವಾದ ಸೇವೆಯನ್ನು ಮಾಡುವವರು ಯಾರೂ ಇಲ್ಲ, ಅಥವಾ ಅವರಿಗಿಂತ ನನಗೆ ಪ್ರಿಯರು ಭೂಮಿಯಲ್ಲಿ ಯಾರೂ ಇರಬಾರದು.

BengaliIND

মানুষের মধ্যে এমন কেউ নেই যে আমার চেয়ে প্রিয় সেবা করে এবং পৃথিবীতে আমার চেয়ে প্রিয় কেউ নেই।

GujaratiIND

માણસોમાં એવું કોઈ નથી કે જે મારાથી વધુ પ્રિય સેવા કરે છે, અને પૃથ્વી પર મારાથી વધુ પ્રિય કોઈ નથી.

TeluguIND

మనుష్యులలో నాకు అత్యంత ప్రియమైన సేవ చేసేవాడు ఎవ్వరూ లేరు, భూమిపై అతని కంటే ప్రియమైన వారు ఎవరూ ఉండరు.

NepaliIND

मलाई भन्दा प्यारो सेवा गर्ने मानिसहरु मध्ये कोही छैन र म भन्दा प्यारो पृथ्वीमा कोही छैन।

MalayalamIND

മനുഷ്യരിൽ എനിക്ക് ഏറ്റവും പ്രിയപ്പെട്ട സേവനം ചെയ്യുന്ന ആരും ഇല്ല, അവനെക്കാൾ എനിക്ക് പ്രിയപ്പെട്ട ആരും ഭൂമിയിൽ ഉണ്ടാകില്ല.

KonkaniIND

मनशां मदीं म्हजी चड प्रिय सेवा करपी कोणूच ना आनी ताचे परस म्हजे परस प्रिय कोणूच पृथ्वीचेर आसचो ना.

ManipuriIND

ꯃꯤꯁꯤꯡꯒꯤ ꯃꯔꯛꯇꯥ ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯍꯦꯟꯅꯥ ꯅꯨꯡꯁꯤꯖꯕꯥ ꯁꯦꯕꯥ ꯇꯧꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯂꯩꯇꯦ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯍꯥꯛꯇꯒꯤ ꯍꯦꯟꯅꯥ ꯅꯨꯡꯁꯤꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯄ꯭ꯔ꯭ꯏꯊꯤꯕꯤꯗꯥ ꯂꯩꯔꯣꯏ꯫

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः -- जो अपनेमें लौकिकपारलौकिक प्राकृत पदार्थोंकी महत्ता? लिप्सा? आवश्यकता रखता है और रखना चाहता है? वह पराभक्ति ( 18। 68) के अन्तर्गत नहीं आ सकता। पराभक्तिके अन्तर्गत नहीं आ सकता है? जिसका प्राकृत पदार्थोंको प्राप्त करनेका किञ्चिन्मात्र भी उद्देश्य नहीं है और जो भगवत्प्राप्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदि पारमार्थिक उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है। ऐसा पुरुष ही भगवद्गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। यदि उसमें कभी मानबड़ाई आदिकी इच्छा आ भी जाय तो वह टिकेगी नहीं क्योंकि मानबड़ाई आदि प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं है।भगवान्के भक्तोंमें गीताका प्रचार करनेवाले उपर्युक्त अधिकारी मनुष्यके लिये ही तस्मात् पद देकर भगवान् कहते हैं कि मनुष्योंमें उसके समान मेरा प्रियकृत्तम अर्थात् अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है क्योंकि गीताप्रचारके समान दूसरा मेरा कोई प्रिय कार्य है ही नहीं।प्रियकृत्तमः पदमें जो कृत् पद आया है? उसका तात्पर्य है कि गीताका प्रचार करनेमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है? मानबड़ाई? आदरसत्कार आदिकी कोई कामना नहीं है केवल भगवत्प्रीत्यर्थ गीताके भावोंका प्रचार करता है। इसलिये वह प्रियकृत्तम -- भगवान्का अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला है।मनुष्योंमें प्रियकृत्तम कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का अत्यन्त प्यारा बननेके लिये मनुष्योंको ही अधिकार है। संसारमें कामनाओंकी पूर्ति कर लेना कोई महत्त्वकी? बहादुरीकी बात नहीं है। देवता? पशुपक्षी? नारकीय जीव? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि सभी योनियोंमें कामनाकी पूर्ति करनेका अवसर मिलता है परन्तु कामनाका त्याग करके परमात्माकी प्राप्ति करनेका अवसर तो केवल मनुष्ययोनिमें ही मिलता है। इस मनुष्ययोनिको प्राप्त करके परमात्माकी प्राप्ति करनेमें? परमात्माका अत्यन्त प्यारा बननेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि -- जिसमें अपनी मानबड़ाईकी वासना है? कुछ स्वार्थभाव भी है और जिसका अपना उद्धार करनेका तथा गीताके अनुसार जीवन बनानेका उद्देश्य वैसा (प्रियकृत्तमके समान) नहीं बना है परन्तु जिसके हृदयमें गीताका विशेष आदर है और गीताका पाठ करवाना? गीता कण्ठस्थ,करवाना? गीता मुद्रित करवाकर उसकी सस्ती बिक्री करना आदि किसी तरहसे गीताका प्रचार करता है और लोगोंको गीतामें लगाता है? उसके समान पृथ्वीमण्डलपर मेरा दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा।अपने धर्म? सम्प्रदाय? सिद्धान्त आदिका प्रचार करनेवाला व्यक्ति भगवान्का प्रिय तो हो सकता है? पर प्रियतर नहीं होगा। प्रियतर तो किसी तरहसे गीताका प्रचार करनेवाला ही होगा।भगवद्गीतामें अपना उद्धार करनेकी ऐसीऐसी विलक्षण? सुगम और सरल युक्तियाँ बतायी गयी हैं? जिनको मनुष्यमात्र अपने आचरणोंमें ला सकता है। तात्पर्य यह है कि जो गीताका आदर करता है? ऐसा मनुष्य हिंदू? मुसलमान? ईसाई? यहूदी? पारसी? बौद्ध आदि किसी भी धर्मको माननेवाला क्यों न हो किसी भी देश? वेश? वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो अपनी रुचिके अनुसार किसी भी शैली? उपाय? सिद्धान्त? साधनको माननेवाला क्यों न हो? वह यदि अपना किसी तरहका आग्रह न रखकर? पक्षपातविषमताको छोड़कर? किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेवाली चेष्टाका त्याग करके? मनमें किसी भी लौकिकपारलौकिक उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुकी कामना न रखकर? अपना सम्प्रदाय? अपनी टोनी बनानेका उद्देश्य न रखकर? केवल अपने कल्याणका उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार चलता है (अकर्तव्यका सर्वथा त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्यका लोकहितार्थ? निष्कामभावपूर्वक पालन करता है)? तो वह भी जीविकासम्बन्धी और खानापीना? सोनाजागना आदि शरीरसम्बन्धी सब काम करते हुए परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है? महान् आनन्द? महान् सुखको (गीता 6। 22) प्राप्त कर सकता है।गीता वेश? आश्रम? अवस्था? क्रिया आदिका परिवर्तन करनेके लिये नहीं कहती? प्रत्युत परिमार्जन करनेके लिये कहती है अर्थात् केवल अपने भाव और उद्देश्यको शुद्ध बनानेके लिये कहती है। गीताकी ऐसी युक्तियोंको जो भगवान्की तरफ चलनेवाले भक्तोंमें कहेगा? उससे उन भक्तोंको पारमार्थिक मार्गमें बढ़नेकी युक्तियाँ मिलेंगी? शंकाओंका समाधान होगा? साधनकी उलझनें सुलझेंगी? पारमार्थिक मार्गकी बाधाएँ दूर होंगी? जिससे वे उत्साहसे सुगमतापूर्वक बहुत ही जल्दी अपने लक्ष्यको प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये वह भगवान्को सबसे अधिक प्यारा होगा क्योंकि भगवान् जीवके उद्धारसे बड़े राजी होते हैं? प्रसन्न होते हैं। सम्बन्ध -- जिसमें गीताका प्रचार करनेकी योग्यता नहीं है? वह क्या करे इसको भगवान् आगे के श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, उस गीताशास्त्रकी परम्परा चलानेवाले भक्तसे बढ़कर? मेरा अधिक प्रिय कार्य करनेवाला? मनुष्योंमें? कोई भी नहीं है। अर्थात् वह मेरा अतिशय प्रिय करनेवाला है? वर्तमान मनुष्योंमें उससे बढ़कर प्रियतम कार्य करनेवाला और कोई नहीं है? तथा भविष्यमें भी इस भूलोकमें उससे बढ़कर प्रियतर कोई दूसरा नहीं होगा।

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Sri Anandgiri

ननु सर्वेषां मुक्तिसाधनानां ध्यानस्य श्रेष्ठत्वात्तन्निष्ठस्य मुमुक्षोर्नास्ति विद्यासंप्रदाने प्रवृत्तिरिति तत्राह -- किञ्चेति। इतश्च विद्यासंप्रदानं मुमुक्षुणा यथोक्तविशेषणवते कर्तव्यमित्यर्थः। वर्तमानेषु मध्ये त्वत्तोऽन्यो नास्त्येव प्रियकृत्तमो नाप्यतीतेषु तादृक्कश्चिदासीदिति शेषः। तस्माद्विद्यासंप्रदायकर्तुः सकाशादित्यर्थः। ध्याननिष्ठस्य श्रेष्ठत्वेऽपि स्वसंप्रदायप्रवक्तुः श्रेष्ठतमत्वादुचिता विद्यासंप्रदाने प्रवृत्तिरिति भावः।

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Sri Dhanpati

किंच -- नचेति। तस्मान्मद्भक्तेभ्यो गीताशास्त्रव्याख्यातुः सकाशादन्यो मनुष्येषु मध्यें कश्चिदपि मम प्रियकृत्तमोऽत्यन्तं परितोषकर्ता नास्ति। नच कालातरे भविता भविष्यति। ममापि तस्मादयः प्रियतरोऽधुनो भुवि तवान्नास्ति। नच कालान्तरेऽपि भविष्यतीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nano
chaand
tasmātthan them
manuṣhyeṣhuamongst human beings
kaśhchitanyone
meto me
priyakṛit
bhavitāwill be
nanever
chaand
meto me
tasmātthan them
anyaḥanother
priyataraḥ
bhuvion this earth
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.68
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।भक्ितं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः

मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद-(गीता-ग्रन्थ) को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा -- इसमें कोई सन्देह नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.70
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः

जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 69
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि

उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 69 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 69 का हिंदी अर्थ: "उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 69?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 69 translates to: "There is no one among men who does service dearer to Me, nor shall there be anyone on earth dearer to Me than him. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुव" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 69 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na cha tasmān manuṣhyeṣhu kaśhchin me priya-kṛittamaḥ" mean in English?

"na cha tasmān manuṣhyeṣhu kaśhchin me priya-kṛittamaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 69. There is no one among men who does service dearer to Me, nor shall there be anyone on earth dearer to Me than him. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.