Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 59
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति

अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

அகங்காரத்தால் நிறைந்து, "நான் சண்டையிட மாட்டேன்" என்று நீங்கள் நினைத்தால், உங்கள் தீர்மானம் வீண்; இயற்கை உன்னை வற்புறுத்தும்.

PunjabiIND

ਜੇਕਰ, ਅਹੰਕਾਰ ਨਾਲ ਭਰੇ ਹੋਏ, ਤੁਸੀਂ ਸੋਚਦੇ ਹੋ, "ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਲੜਾਂਗਾ," ਤਾਂ ਤੇਰਾ ਸੰਕਲਪ ਵਿਅਰਥ ਹੈ; ਕੁਦਰਤ ਤੁਹਾਨੂੰ ਮਜਬੂਰ ਕਰੇਗੀ।

MarathiIND

अहंभावाने भरलेल्या, "मी लढणार नाही" असे तू समजत आहेस, तर तुझा संकल्प व्यर्थ आहे; निसर्ग तुम्हाला भाग पाडेल.

BengaliIND

যদি, অহংবোধে ভরা, তুমি মনে কর, "আমি যুদ্ধ করব না," তাহলে তোমার সংকল্প বৃথা; প্রকৃতি আপনাকে বাধ্য করবে।

BhojpuriIND

अगर अहंकार से भरल तू सोचत बाड़ू कि "हम लड़ब ना" त तोहार संकल्प बेकार बा; प्रकृति तोहरा के मजबूर करी।

KannadaIND

ಅಹಂಕಾರದಿಂದ ತುಂಬಿ, "ನಾನು ಜಗಳವಾಡುವುದಿಲ್ಲ" ಎಂದು ನೀವು ಭಾವಿಸಿದರೆ, ನಿಮ್ಮ ಸಂಕಲ್ಪ ವ್ಯರ್ಥವಾಗಿದೆ; ಪ್ರಕೃತಿಯು ನಿಮ್ಮನ್ನು ಒತ್ತಾಯಿಸುತ್ತದೆ.

KonkaniIND

अहंकारान भरून "हांव झुजचो ना" अशें तुका दिसता जाल्यार तुजो संकल्प व्यर्थ; सैम तुका बाध्य करतलो.

MaithiliIND

जँ अहंकार सँ भरल अहाँ सोचैत छी जे "हम लड़ब नहि" तखन अहाँक संकल्प व्यर्थ; प्रकृति तोरा मजबूर करत।

MalayalamIND

അഹംഭാവം നിറഞ്ഞ്, "ഞാൻ യുദ്ധം ചെയ്യില്ല" എന്ന് നീ വിചാരിക്കുന്നുവെങ്കിൽ, നിൻ്റെ ദൃഢനിശ്ചയം വ്യർത്ഥമാണ്; പ്രകൃതി നിന്നെ നിർബന്ധിക്കും.

GujaratiIND

જો, અહંકારથી ભરપૂર, તું વિચારે છે કે, "હું લડીશ નહિ," તો તારો સંકલ્પ નિરર્થક છે; કુદરત તમને ફરજ પાડશે.

SindhiIND

جيڪڏهن، انا سان ڀريل، تون سمجهين ٿو، "مان نه وڙهندس،" ته پوء توهان جو عزم بيڪار آهي؛ فطرت توهان کي مجبور ڪندي.

TeluguIND

అహంభావంతో నిండిపోయి, "నేను పోరాడను" అని మీరు అనుకుంటే, మీ సంకల్పం వ్యర్థం; ప్రకృతి నిన్ను బలవంతం చేస్తుంది.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यदहंकारमाश्रित्य -- प्रकृतिसे ही महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है -- मैं शरीर हूँ। इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है? बदलनेवाली है? इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता 3। 5)।जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है? तो फिर वह यह कैसे रह सकता है कि मैं अमक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना -- इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो करना भी कर्म है और न करना भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता? उससे निर्लिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है)? तो फिर उसके लिये करना और न करना -- ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे? ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के शरण हो गया है? उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।न योत्स्य इति मन्यसे -- दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की -- शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) और उसके बाद अर्जुनने साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- न योत्स्ये (2। 9)। यह बात भगवानको अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी तरफसे साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी कारण कि वास्तविक शरणागत होनेपर मैं यह करूँगा? यह नहीं करूँगा ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागत होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे? वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (2। 10)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया? नहीं तो भगवान् वहींपर यह कह देते कि जैसा चाहता है? वैसा कर -- यथेच्छसि तथा कुरु (18। 63) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि मैं युद्ध नहीं करूँगा भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों -- न योत्स्ये का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है? मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो युद्ध नहीं करूँगा ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागत होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता 7। 14)। यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है? जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता 7। 13) क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है।यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं? उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं? पर हो जाते हैं उनके गुलाम परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते? उन पदार्थोंके परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थों और क्रियाओँको अपनी मान्यता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है? और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती -- यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं? वे मौतके मार्ग(संसार)में बह जाते हैं -- निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि (9। 3)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो तेरा यह कहना? तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्रप्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।मिथ्यैष व्यवसायस्ते -- व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है -- वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है? उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है? उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती है? और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है? उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? ऐसा तेरा (क्षात्रप्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है? झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये? प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं।यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है? तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है? नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारीसेदुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि,मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति -- इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है -- शूरवीरता? युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता 18। 43)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी? अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तुझे यह भी नहीं समझना चाहिये कि मैं स्वतन्त्र हूँ? दूसरेका कहना क्यों करूँ --, जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह मान रहा है -- ऐसा निश्चय कर रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा सो यह तेरा निश्चय मिथ्या है क्योंकि तेरी प्रकृति -- तेरा क्षत्रियस्वभाव तुझे युद्धमें नियुक्त कर देगा।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

स्वातन्त्र्ये सति भीतेरवकाशो नास्तीत्याशङ्क्याह -- इदं चेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

स्वतन्त्रोऽहं परोक्तं न करिष्यामीति त्वया न मन्तव्यं परतन्त्रत्वात्तवेत्याशयेनाह -- यदिति। यच्चैतत्त्वमहंकारं मिथ्यभिमानमाश्रित्य न योत्स्ये युद्धं न करिष्यामीति मन्यसे निश्चयं करोषि एष ते व्यवसायोऽहं स्वतन्त्रोऽनर्थहेतुभूतं युद्धं न करिष्यामीति निश्चयो मिथ्या भ्रममूलको निष्फलं। यतः प्रकृतिः क्षत्रियस्वभावस्त्वां क्षत्रियं नियोक्ष्यति बलात्कारेण युद्धे प्रेरयष्यति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatif
ahankārammotivated by pride
āśhrityataking shelter
na yotsyeI shall not fight
itithus
manyaseyou think
mithyā eṣhaḥthis is all false
vyavasāyaḥdetermination
teyour
prakṛitiḥmaterial nature
tvāmyou
niyokṣhyatiwill engage
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि

मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.60
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्

हे कुन्तीनन्दन ! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू (क्षात्र-प्रकृतिके) परवश होकर करेगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 59
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 59
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति

अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 59 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 59 का हिंदी अर्थ: "अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 59?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 59 translates to: "If, filled with egoism, thou thinkest, "I will not fight," then thy resolve is vain; nature will compel thee. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 59 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yad ahankāram āśhritya na yotsya iti manyase" mean in English?

"yad ahankāram āśhritya na yotsya iti manyase" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 59. If, filled with egoism, thou thinkest, "I will not fight," then thy resolve is vain; nature will compel thee. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.