
Bhagavad Gita Adhyay 18, Shlok 47
“अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar”
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சிறப்பாகச் செய்த மற்றொருவரின் கடமையை விட, ஒருவரின் சொந்தக் கடமை, அது தகுதியற்றதாக இருந்தாலும், சிறந்தது. தன் இயல்பினால் விதிக்கப்பட்ட கடமையைச் செய்பவனுக்குப் பாவம் இல்லை.
অন্যের ভালোভাবে পালন করা কর্তব্যের চেয়ে নিজের কর্তব্য, যোগ্যতার অভাব হলেও উত্তম। যে নিজের স্বভাব দ্বারা নির্ধারিত দায়িত্ব পালন করে তার কোন পাপ হয় না।
بهتر آهي هڪ پنهنجو فرض، جيتوڻيڪ اهو نيڪيءَ کان محروم آهي، ڪنهن ٻئي جي فرض کان بهتر آهي. جيڪو پنهنجي فطرت موجب فرض ڪري ٿو، ان جو ڪو به گناهه نه آهي.
अर्काले राम्रोसँग निर्वाह गरेको कर्तब्यभन्दा आफ्नो कर्तब्य नै राम्रो हो, चाहे त्यो योग्यताको अभावमा होस् । जसले आफ्नो स्वभावले तोकेको कर्तव्य गर्छ उसलाई कुनै पाप लाग्दैन।
ଅନ୍ୟର ଭଲ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଅପେକ୍ଷା ଏହା ନିଜର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ, ଯଦିଓ ଯୋଗ୍ୟତା ଅଭାବରୁ ଭଲ | ଯିଏ ନିଜ ସ୍ୱଭାବ ଦ୍ୱାରା ନିଯୁକ୍ତ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ କରେ, ସେ କ no ଣସି ପାପ କରେ ନାହିଁ |
ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯗ꯭ꯌꯨꯇꯤ, ꯀꯔꯤꯒꯨꯝꯕꯥ ꯃꯗꯨ ꯃꯦꯔꯤꯠ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯑꯣꯏꯔꯕꯁꯨ, ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯑꯃꯒꯤ ꯗ꯭ꯌꯨꯇꯤꯗꯒꯤ ꯍꯦꯟꯅꯥ ꯐꯩ, ꯃꯗꯨ ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯐꯖꯅꯥ ꯄꯥꯡꯊꯣꯀꯄꯥ꯫ ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯃꯍꯧꯁꯥꯅꯥ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯗ꯭ꯌꯨꯇꯤ ꯑꯗꯨ ꯇꯧꯔꯤꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯄꯥꯞ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯇꯧꯗꯦ꯫
अपने आप दा कर्तव्य, भले ही ओ योग्यता तों वंचित होवे, उस तों बेहतर है कि दूजे दे कर्तव्य तों वी अच्छा है। जो अपने स्वभाव दे निर्धारित कर्तव्य गी करदा ऐ, उसी कोई पाप नेईं होंदा।
बरे तरेन केल्ल्या दुसऱ्याच्या कर्तव्यापरस आपलें कर्तव्य पुण्यहीन आसलें तरी बरें. स्वताच्या स्वभावान थारायिल्लें कर्तव्य करपी मनशाक कसलेंच पाप जायना.
दुसऱ्याने केलेल्या कर्तव्यापेक्षा स्वतःचे कर्तव्य उत्तम आहे, जरी ते गुणवत्तेने निराधार असले तरी. जो स्वतःच्या स्वभावाने ठरवलेले कर्तव्य करतो त्याला कोणतेही पाप लागत नाही.
యోగ్యత లేకున్నా, బాగా చేసిన మరొకరి కర్తవ్యం కంటే సొంత కర్తవ్యమే మేలు. తన స్వభావముచే నిర్ణయించబడిన కర్తవ్యమును చేయువాడు పాపము చేయడు.
ভালদৰে পালন কৰা আনৰ কৰ্তব্যতকৈ নিজৰ কৰ্তব্য, গুণহীন হ’লেও ভাল। যি নিজৰ স্বভাৱৰ দ্বাৰা নিৰ্ধাৰিত কৰ্তব্য পালন কৰে, তেওঁ কোনো পাপ নকৰে।
ಒಬ್ಬರ ಸ್ವಂತ ಕರ್ತವ್ಯವು ಯೋಗ್ಯತೆ ಇಲ್ಲದಿದ್ದರೂ ಸಹ, ಇನ್ನೊಬ್ಬರ ಕರ್ತವ್ಯಕ್ಕಿಂತ ಉತ್ತಮವಾಗಿದೆ. ತನ್ನ ಸ್ವಭಾವದಿಂದ ವಿಧಿಸಲ್ಪಟ್ಟ ಕರ್ತವ್ಯವನ್ನು ಮಾಡುವವನು ಯಾವುದೇ ಪಾಪವನ್ನು ಹೊಂದುವುದಿಲ್ಲ.
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् -- यहाँ स्वधर्म शब्दसे वर्णधर्म ही मुख्यतासे लिया गया है।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाला मनुष्य स्व को अर्थात् अपनेको जा मानता है? उसका धर्म (कर्तव्य) स्वधर्म है। जैसे कोई अपनेको मनुष्य मानता है? तो मनुष्यताका पालन करना उसके लिये स्वधर्म है। ऐसे ही कर्मोंके अनुसार अपनेको कोई विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको साधक मानता है? तो साधन करना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको भक्त? जिज्ञासु और सेवक मानता है तो भक्ति? जिज्ञासा और सेवा उसका स्वधर्म हो जायगा। इस प्रकार जिसकी जिस कार्यमें नियुक्ति हुई है और जिसने जिस कार्यको स्वीकार किया है? उसके लिये उस कार्यको साङ्गोपाङ्ग करना स्वधर्म है।ऐसे ही मनुष्य जन्म और कर्मके अनुसार अपनेको जिस वर्ण और आश्रमका मानता है? उसके लिये उसी वर्ण और आश्रमका धर्म स्वधर्म हो जायगा। ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है तो यज्ञ कराना? दान लेना? पढ़ाना आदि जीविकासम्बन्धी कर्म उसके लिये स्वधर्म हैं। क्षत्रियके लिये युद्ध करना? ईश्वरभाव आदि वैश्यके लिये कृषि? गौरक्षा? व्यापार आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये जीविकासम्बन्धी कर्म स्वधर्म हैं। ऐसा अपना स्वधर्म अगर दूसरोंके धर्मकी अपेक्षा गुणरहित है अर्थात् अपने स्वधर्ममें गुणोंकी कमी है? उसका अनुष्ठान करनेमें कमी रहती है तथा उसको कठिनतासे किया जाता है परन्तु दूसरेका धर्म गुणोंसे परिपूर्ण है? दूसरेके धर्मका अनुष्ठान साङ्गोपाङ्ग है और करनेमें बहुत सुगम है तो भी अपने स्वधर्मका पालन करना ही सर्वश्रेष्ठ है।शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंका विधान किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म स्वधर्म हैं और उन्हीं कर्मोंका जिस वर्णके लिये निषेध किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म परधर्म हैं। जैसे यज्ञ कराना? दान लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये शास्त्रकी आज्ञा होनेमें स्वधर्म हैं परन्तु वे ही कर्म क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये शास्त्रका निषेध होनेसे परधर्म हैं। परन्तु आपत्कालको लेकर शास्त्रोंने जीविकासम्बन्धी जिन कर्मोंका निषेध नहीं किया है? वे कर्म सभी वर्णोंके लिये स्वधर्म हो जाते हैं। जैसे आपत्कालमें अर्थात् आपत्तिके समय वैश्यके खेती? व्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म ब्राह्मणके लिये भी स्वधर्म हो जाते हैं ।ब्राह्मणके शम? दम आदि जितने भी स्वभावज कर्म हैं? वे सामान्य धर्म होनेसे चारों वर्णोंके लिये स्वधर्म हैं। कारण कि उनका पालन करनेके लिये सभीको शास्त्रकी आज्ञा है। उनका किसीके लिये भी निषेध नहीं है।मनुष्यशरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इस दृष्टिसे मनुष्यमात्र साधक है। अतः दैवीसम्पत्तिके जितने भी सद्गुणसदाचार हैं? वे सभीके अपने होनेसे मनुष्यमात्रके लिये स्वधर्म हैं। परन्तु आसुरीसम्पत्तिके जितने भी दुर्गुणदुराचार हैं? वे मनुष्यमात्रके लिये न तो स्वधर्म हैं और न परधर्म ही हैं वे तो सभीके लिये निषिद्ध हैं? त्याज्य हैं क्योंकि वे अधर्म हैं। दैवीसम्पत्तिके गुणोंको धारण करनेमें और आसुरीसम्पत्तिके पापकर्मोंका त्याग करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं? सभी सबल हैं? सभी अधिकारी हैं कोई भी परतन्त्र? निर्बल तथा अनधिकारी नहीं है। हाँ? यह बात अलग है कि कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है और कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है। जैसे? किसीके स्वभावमें दया मुख्य होती है और किसीके स्वभावमें उपेक्षा मुख्य होती है? किसीका स्वभाव स्वतः क्षमा करनेका होता है और किसीका स्वभाव माँगनेपर क्षमा करनेका होता है? किसीके स्वभावमें उदारता स्वाभाविक होती है और किसीके स्वभावमें उदारता विचारपूर्वक होती है? आदि। ऐसा भेद रह सकता है।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् -- शास्त्रोंमें विहित और निषिद्ध -- दो तरहके वचन आते हैं। उनमें विहित कर्म करनेकी आज्ञा है और निषिद्ध कर्म करनेका निषेध है। उन विहित कर्मोंमें भी शास्त्रोंने जिस वर्ण? आश्रम? देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? संयोग? वियोग आदिको लेकर अलगअलग जो कर्म नियुक्त किये हैं? उस वर्ण? आश्रम आदिके लिये वे नियत कर्म कहलाते हैं।सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंको लेकर जो स्वभाव बनता है? उस स्वभावके अनुसार जो कर्म नियत किये जाते हैं? वे स्वभावनियत कर्म कहलाते हैं। उन्हींको स्वभावप्रभव? स्वभावज? स्वधर्म? स्वकर्म और सहज कर्म कहा है।तात्पर्य यह है कि जिस वर्ण? जातिमें जन्म लेनेसे पहले इस जीवके जैसे गुण और कर्म रहे हैं? उन्हीं गुणों और कर्मोंके अनुसार उस वर्णमें उसका जन्म हुआ है। कर्म तो करनेपर समाप्त हो जाते हैं? पर गुणरूपसे उनके संस्कार रहते हैं। जन्म होनेपर उन गुणोंके अनुसार ही उसमें गुण और पालनीय आचरण स्वाभाविक ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनको न तो कहींसे लाना पड़ता है और न उनके लिये परिश्रम ही करना पड़ता है। इसलिये उनको स्वभावज और स्वभावनियत कहा है।यद्यपि सर्वारम्भा ही दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः (गीता 18। 48) के अनुसार कर्ममात्रमें दोष आता ही है? तथापि स्वभावके अनुसार शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? उन कर्मोंको अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे किया जाय? तो उस वर्णके व्यक्तिको उन कर्मोंका दोष (पाप) नहीं लगता। ऐसे ही जो केवल शरीरनिर्वाहके लिये कर्म करता है? उसको भी पाप नहीं लगता -- शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् (गीता 4। 21)।विशेष बातयहाँ एक बड़ी भारी शङ्का पैदा होती है कि एक आदमी कसाईके घर पैदा होता है तो उसके लिये कसाईका कर्म सहज (साथ ही पैदा हुआ) है? स्वाभाविक है। स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता? तो क्या कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये अगर उसको कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये? तो फिर निषिद्ध आचरण कैसे छूटेगा कल्याण कैसे होगाइसका समाधान है कि स्वभावनियत कर्म वह होता है? जो विहित हो? किसी रीतिसे निषिद्ध नहीं हो अर्थात् उससे किसीका भी अहित न होता हो। जो कर्म किसीके लिये भी अहितकारक होते हैं? वे सहज कर्ममें नहीं लिये जाते। वे कर्म आसक्ति? कामनाके कारण पैदा होते हैं। निषिद्ध कर्म चाहे इस जन्ममें बना हो? चाहे पूर्वजन्ममें बना हो? है वह दोषवाला ही। दोषभाग त्याज्य होता है क्योंकि दोष आसुरीसम्पत्ति है और गुण दैवीसम्पत्ति है। पहले जन्मके संस्कारोंसे भी दुर्गुणदुराचोंमें रुचि हो सकती है? पर वह रुचि दुर्गुणदुराचार करनेमें बाध्य नहीं करती। विवेक? सद्विचार? सत्सङ्ग? शास्त्र आदिके द्वारा उस रुचिको मिटाया जा सकता है।युक्तिसे भी देखा जाय तो कोई भी प्राणी अपना अहित नहीं चाहता? अपनी हत्या नहीं चाहता। अतः किसीका अहित करनेका? हत्या करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मनुष्य अपने लिये अच्छा काम चाहता है तो उसे दूसरोंके लिये भी अच्छा काम करना चाहिये। शास्त्रोंमें भी देखा जाय तो यही बात है कि जिसमें दोष होते हैं? पाप होते हैं? अन्याय होते हैं? वे कर्म वैकृत हैं? प्राकृत नहीं हैं अर्थात् वे विकारसे पैदा हुए हैं? स्वभावसे नहीं। तीसरे अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पापकर्म करता है तो भगवान्ने कहा कि कामनाके वशमें होकर भी मनुष्य पाप करता है (3। 36 -- 37)। कामनाको लेकर? क्रोधको लेकर? स्वार्थ और अभिमानको लेकर जो कर्म किये जाते हैं? वे कर्म शुद्ध नहीं होते? अशुद्ध होते हैं।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो कर्म किये जाते हैं? उन कर्मोंमें भिन्नता तो रहती है? पर वे दोषी नहीं होते। ब्राह्मणके घर जन्म होगा तो ब्राह्मणोचित कर्म होंगे? शूद्रके घर जन्म होगा तो शूद्रोचित कर्म होंगे? पर दोषीभाग किसीमें भी नहीं होगा। दोषीभाग सहज नहीं है? स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं? पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये? वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा जैसे पहले रहता था? वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है? जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एकएकसे विचित्र कर्म होते हैं? पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव रागद्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है।पहलेके किसी पापकर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है? पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति? आयु और भोग बताया गया है? नया कर्म नहीं बताया गया -- सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः। (योगदर्शन 2। 13)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका? अपने इष्टके नामका जप करे? तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है? वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपनेआप ग्लानि होगी? उपरति होगी। बिना कहेसुने उसमें सद्गुण स्वाभाविक आयेंगे।रामचरितमानसमें शबरीके प्रसङ्गमें आता है -- भगवान् रामने शबरीसे कहा -- नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। (3। 35। 4)। फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा -- सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें (3। 36। 4)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है? इसका शबरीको पता ही नहीं है परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्सङ्ग? भजन? ध्यान आदि,करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है? वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं? वे दूसरोंको तो बता देंगे? पर आचरणमें वे गुण तभी आयेंगे? जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेंगे। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध? निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है? कोई निर्बल नहीं है? कोई अयोग्य नहीं है? कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सद्गुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थोंके संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है।उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्यशरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है? सबल है? योग्य है? समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं? कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है -- साधन धाम मोच्छ कर द्वारा (मानस 7। 43। 4)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके? तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई
Sri Harikrishnadas Goenka
ऐसा होनेके कारण --, अपना गुणरहित भी धर्म? दूसरेके भली प्रकार अनुष्ठान किये हुए धर्मसे श्रेष्ठतर है। जैसे विषमें उत्पन्न हुए कीड़ेके लिये विष दोषकारक नहीं होता? उसी प्रकार स्वभावसे नियत किये हुए कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। जो बात पहले स्वभावजम् इस पदसे कही थी? वही यहाँ स्वभावनियतम् इस पदसे कही गयी है। स्वभावसे नियत कर्मका नाम स्वभावनियत है।
Sri Anandgiri
स्वधर्मानुष्ठानस्य बुद्धिशुद्ध्यादिद्वारा मोक्षावसायित्त्वात्तदनुष्ठानमावश्यकमित्याह -- यत इति। ननु युद्धादिलक्षणं स्वधर्मं कुर्वन्नपि हिंसाधीनं पापं प्राप्नोति तत्कथं स्वधर्मः श्रेयानिति तत्राह -- स्वभावेति। स्वकीयं वर्णाश्रमं निमित्तीकृत्य विहितं स्वभावजमित्यधस्तादुक्तमित्याह -- यदुक्तमिति। विग्रहात्मकमपि विहितं कर्म कुर्वन्पापं नाप्नोतीत्यत्र दृष्टान्तमाह -- तथेति।
Sri Dhanpati
यतः स्वकर्मणां परमात्माभ्यर्च्य सिद्धिं लभते तस्मात्स्वोधर्मः स्वधर्मो विगुणोऽसभ्यगनुष्ठितोऽपि परधर्मात्स्वनुष्ठितात्सभ्यगनुष्ठितात् श्रेयान्प्रशस्यतरः। ननु युद्धादिलक्षणं स्वधर्मं कुर्वन्नापि हिंसानिमित्तं पापं प्राप्नोति तत्कथं स्वधर्मः श्रेयानिति तत्राह स्वभावनियतं कर्मशौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायन मित्यादि कर्म स्वभावजं कुर्वन् किल्बिषं नाप्नोति। यथा विषजः कृमिः विषकृतं दोषं न प्रतिपद्यते तथायमधिकृतः पुरुषो दोषवदपि स्वभावनियतं कुर्वन् पापं नाप्नोतीत्यर्थः। तदुक्तंश्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः इति। एतेन तर्हि दोषरहितमेव भिक्षाटनादि सर्वैरनुष्ठीयतामतो न पापप्राप्न्याशङ्केति न शङ्कनीयम्। तर्हि पापप्राप्तिशङ्कां परिहर्तुमकर्मनिष्ठतैव सर्वैः कुतो न संपाद्यत इति शङ्कापि न कर्तव्या।नहि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।नहि देहभृताशक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः इत्यनात्मज्ञेनाकर्मनिष्ठतायाः संपादयितुमशक्यत्वात्।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| śhreyān | better |
| swa | dharmaḥ |
| viguṇaḥ | imperfectly done |
| para | dharmāt |
| su | anuṣhṭhitāt |
| svabhāva | niyatam |
| karma | duty |
| kurvan | by performing |
| na āpnoti | does not incur |
| kilbiṣham | sin |
Related Shloks
जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar
हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। — VaniSagar
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“अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 47 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 47 का हिंदी अर्थ: "अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 47?
Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 47 translates to: "Better is one's own duty, even if it is destitute of merits, than the duty of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature incurs no sin. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 47 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt" mean in English?
"śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 47. Better is one's own duty, even if it is destitute of merits, than the duty of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature incurs no sin. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.