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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 42
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्

मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

அமைதி, சுயக்கட்டுப்பாடு, துறவு, தூய்மை, மன்னிப்பு மற்றும் நேர்மை, அத்துடன் அறிவு, உணர்தல் மற்றும் கடவுள் நம்பிக்கை ஆகியவை பிராமணர்களின் கடமைகளாகும்.

TeluguIND

ప్రశాంతత, ఆత్మనిగ్రహం, కాఠిన్యం, స్వచ్ఛత, క్షమాపణ మరియు నిజాయితీ, అలాగే జ్ఞానం, సాక్షాత్కారం మరియు భగవంతునిపై నమ్మకం, బ్రాహ్మణుల కర్తవ్యాలు, వారి స్వంత స్వభావం నుండి పుట్టినవి.

GujaratiIND

નિર્મળતા, આત્મસંયમ, સંયમ, પવિત્રતા, ક્ષમા અને પ્રામાણિકતા તેમજ જ્ઞાન, અનુભૂતિ અને ભગવાનમાં શ્રદ્ધા એ બ્રાહ્મણોના પોતાના સ્વભાવથી જન્મેલા કર્તવ્ય છે.

BengaliIND

প্রশান্তি, আত্মসংযম, তপস্যা, পবিত্রতা, ক্ষমা এবং ন্যায়পরায়ণতা, সেইসাথে জ্ঞান, উপলব্ধি এবং ঈশ্বরে বিশ্বাস, ব্রাহ্মণদের কর্তব্য, তাদের নিজস্ব স্বভাবের জন্ম।

MalayalamIND

ശാന്തത, ആത്മസംയമനം, തപസ്സ്, ശുദ്ധി, ക്ഷമ, നേരുള്ളത, അതുപോലെ അറിവ്, സാക്ഷാത്കാരം, ഈശ്വരവിശ്വാസം എന്നിവ ബ്രാഹ്മണരുടെ കടമകളാണ്.

NepaliIND

निर्ममता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, क्षमा, सदाचार, साथै ज्ञान, अनुभूति र ईश्वरमा आस्था, ब्राह्मणहरूको आफ्नै स्वभावबाट जन्मेका कर्तव्यहरू हुन्।

KannadaIND

ಪ್ರಶಾಂತತೆ, ಸ್ವಯಂ ಸಂಯಮ, ತಪಸ್ಸು, ಶುದ್ಧತೆ, ಕ್ಷಮೆ ಮತ್ತು ಯಥಾರ್ಥತೆ, ಹಾಗೆಯೇ ಜ್ಞಾನ, ಸಾಕ್ಷಾತ್ಕಾರ ಮತ್ತು ದೇವರಲ್ಲಿ ನಂಬಿಕೆ, ಇವುಗಳು ತಮ್ಮದೇ ಸ್ವಭಾವದಿಂದ ಹುಟ್ಟಿದ ಬ್ರಾಹ್ಮಣರ ಕರ್ತವ್ಯಗಳಾಗಿವೆ.

SindhiIND

سڪون، پرهيزگاري، سادگي، پاڪيزگي، بخشش ۽ سچائي سان گڏوگڏ علم، احساس ۽ خدا تي ايمان، برهمڻن جا فرض آهن، جيڪي پنهنجي فطرت مان پيدا ٿين ٿا.

PunjabiIND

ਸਹਿਜਤਾ, ਸੰਜਮ, ਤਪੱਸਿਆ, ਸ਼ੁੱਧਤਾ, ਮਾਫੀ ਅਤੇ ਨਿਸ਼ਠਾ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਗਿਆਨ, ਅਨੁਭਵ ਅਤੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਵਿੱਚ ਵਿਸ਼ਵਾਸ, ਬ੍ਰਾਹਮਣਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਸੁਭਾਅ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਕਰਤੱਵ ਹਨ।

MarathiIND

शांतता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, क्षमा आणि सरळपणा, तसेच ज्ञान, साक्षात्कार आणि ईश्वरावरील श्रद्धा ही त्यांच्या स्वतःच्या स्वभावातून जन्मलेल्या ब्राह्मणांची कर्तव्ये आहेत.

OdiaIND

ଶାନ୍ତି, ଆତ୍ମ-ସଂଯମତା, ଉତ୍ତମତା, ଶୁଦ୍ଧତା, କ୍ଷମା, ଏବଂ ସରଳତା, ତଥା ଭଗବାନଙ୍କ ଉପରେ ଜ୍ଞାନ, ହୃଦୟଙ୍ଗମ ଏବଂ ବିଶ୍ belief ାସ, ନିଜ ପ୍ରକୃତିରୁ ଜନ୍ମିତ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ |

MizoIND

Serenity, mahni insumtheihna, austerity, thianghlimna, ngaihdamna leh dikna bakah Pathian hriatna, hriatchhuahna leh rinna te hi anmahni nihna atanga lo piang Brahmana-te tih tur a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- शमः -- मनको जहाँ लगाना चाहें? वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाय -- इस प्रकार मनके निग्रहको शम कहते हैं।दमः -- जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें? तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें? तब वहाँसे हटा लें -- इसी प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना दम है।तपः -- गीतामें शरीर? वाणी और मनके तपका वर्णन आता है (17। 14 -- 16)? उस तपको लेते हुए भी यहाँ वास्तवमें तप का अर्थ है -- अपने धर्मका पालन करते हुए जो कष्ट हो अथवा कष्ट आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहना अर्थात् कष्टके आनेपर चित्तमें प्रसन्नताका होना।शौचम् -- अपने मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदिको पवित्र रखना तथा अपने खानपान? व्यवहार आदिकी पवित्रता रखना -- इस प्रकार शौचाचारसदाचारका ठीक पालन करनेका नाम शौच है।क्षान्तिः -- कोई कितना ही अपमान करे? निन्दा करे? दुःख दे और अपनेमें उसको दण्ड देनेकी योग्यता? बल? अधिकार भी हो? फिर भी उसको दण्ड न देकर उसके क्षमा माँगे बिना ही उसको प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देनेका नाम क्षान्ति है।आर्जवम् -- शरीर? वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और मनमें छल? कपट? छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधासादापन हो? उसका नाम आर्जव है।ज्ञानम् -- वेद? शास्त्र? पुराण? इतिहास आदिका अच्छी तरह अध्ययन होना और उनके भावोंका ठीक तरहसे बोध होना तथा कर्तव्यअकर्तव्यका बोध होना ज्ञान है। विज्ञानम् -- यज्ञमें स्रुक्? स्रुवा आदि वस्तुओंका किस अवसरपर किस विधिसे प्रयोग करना चाहिये -- इसका अर्थात् यज्ञविधिका तथा अनुष्ठान आदिकी विधिका अनुभव कर लेने (अच्छी तरह करके देख लेने) का नाम विज्ञान है।आस्तिक्यम् -- परमात्मा? वेदादि शास्त्र? परलोक आदिका हृदयमें आदर हो? श्रद्धा हो और उनकी सत्यतामें कभी सन्देह न हो तथा उनके अनुसार अपना आचरण हो? इसका नाम आस्तिक्य है।ब्रह्मकर्म स्वभावजम् -- ये शम? दम आदि ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म (गुण) हैं अर्थात् इन कर्मों(गुणों)को धारण करनेमें ब्राह्मणको परिश्रम नहीं पड़ता।जिन ब्राह्मणोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है? जिनकी वंशपरम्परा परम शुद्ध है और जिनके पूर्वजन्मकृत कर्म भी शुद्ध हैं? ऐसे ब्राह्मणोंके लिये ही शम? दम आदि गुण स्वाभाविक होते हैं और उनमें किसी गुणके न होनेपर अथवा किसी गुणमें कमी होनेपर भी उसकी पूर्ति करना उन ब्राह्मणोंके लिये सहज होता है।चारों वर्णोंकी रचना गुणोंके तारतम्यसे की गयी है? इसलिये गुणोंके अनुसार उसउस वर्णमें वेवे कर्म स्वाभाविक प्रकट हो जाते हैं और दूसरे कर्म गौण हो जाते हैं। जैसे ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेसे उसमें शम? दम आदि कर्म (गुण) स्वाभाविक आते हैं तथा जीविकाके कर्म गौण हो जाते हैं और दूसरे वर्णोंमें रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता होनेसे उन वर्णोंके जीविकाके कर्म भी स्वाभाविक कर्मोंमें सम्मिलित हो जाते हैं। इसी दृष्टिसे गीतामें ब्राह्मणके स्वभावज कर्मोंमें जीविकाके कर्म न कह करके शम? दम आदि कर्म (गुण) ही कहे गये हैं। सम्बन्ध -- अब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वे कर्म कौनसे हैं यह बतलाया जाता है --, जिनके अर्थकी व्याख्या पहले की जा चुकी है वे शम और दम तथा पहले कहा हुआ शारीरिकादिभेदसे तीन प्रकारका तप? एवं पूर्वोक्त ( दो प्रकारका ) शौच? क्षान्तिक्षमा? आर्जवअन्तःकरणकी सरलता तथा ज्ञान? विज्ञान और आस्तिकता अर्थात् शास्त्रके वचनोंमें श्रद्धा विश्वास -- ये सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं अर्थात् ब्राह्मणजातिके कर्म हैं। जो बात स्वभावजन्य गुणोंसे कर्म विभक्त किये गये हैं इस वाक्यसे कही थी? वही यहाँ स्वभावजम् पदसे कही गयी है।

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Sri Anandgiri

प्रविभक्तानि कर्माण्येव प्रश्नद्वारा विविच्य दर्शयति -- कानीत्यादिना। अन्तःकरणोपशमः शमो दमो बाह्यकरणोपरतिरित्युक्तं स्मारयति -- यथेति। त्रिविधं तपः सप्तदशे दर्शितमित्याह -- तप इति। शौचमपि बाह्यान्तरभेदेन प्रागेवोक्तमित्याह -- शौचमिति। क्षमा नामाक्रुष्टस्य ताडितस्य वा मनसि विकारराहित्यं? ज्ञानं शास्त्रीयपदार्थज्ञानं? विज्ञानं शास्त्रार्थस्य स्वानुभवायत्तत्वापादनं त्रिधा व्याख्यातं स्वभावशब्दार्थमुपेत्याह -- यदुक्तमिति।

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Sri Dhanpati

कानि पुनस्तानि कर्माणीत्यपेक्षायां तानि व्युत्पादयितुमादौ ब्राह्मणस्य कर्माणि दर्शयति। शमः अन्तःकरणोपरमः। तमः बाह्यकरणोपरमः। तपः यथोक्तं शारीरादि। शौचं बाह्याभ्यन्तरभेदेन प्राग्व्याख्यातम्। क्षमा क्षान्तिः आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा मनसि विकारराहित्यम्। आर्जवं ऋजुत्वम्। ज्ञानं शास्त्रीयं आत्मादिपदार्थज्ञानम्। विज्ञानं शास्त्रार्थस्यानुभवारुढतापादनम्। आस्तिक्यमास्तिकस्वभाव आगमोक्तार्थेषु श्रद्दधानता। ब्रह्मकर्म ब्राह्मणजातेः कर्म स्वभावजं स्वभावप्रभवेण गुणेन सत्त्वगुणेन प्रविभक्तमित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhamaḥtranquility
damaḥrestraint
tapaḥausterity
śhauchampurity
kṣhāntiḥpatience
ārjavamintegrity
evacertainly
chaand
jñānamknowledge
vijñānamwisdom
āstikyambelief in a hereafter
brahmaof the priestly class
karmawork
svabhāvajam
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.41
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः

हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.43
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्

शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 42
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 42
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्

मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 42 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 42 का हिंदी अर्थ: "मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 42?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 42 translates to: "Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness, and uprightness, as well as knowledge, realization, and belief in God, are the duties of Brahmanas, born of their own nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावज" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 42 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं। — VaniS Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhamo damas tapaḥ śhauchaṁ kṣhāntir ārjavam eva cha" mean in English?

"śhamo damas tapaḥ śhauchaṁ kṣhāntir ārjavam eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 42. Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness, and uprightness, as well as knowledge, realization, and belief in God, are the duties of Brahmanas, born of their own nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.